क्रिकेट का मक्का इडेन गार्डेंस

पश्चिम बंगाल | भारत | सियालदाह

चिंतन मनन

रात्रि की ट्रेन से आज मुर्शिदाबाद निकलना है। मुर्शिदाबाद किसी काल में मुगल साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। जो आज जर्जर है या यूं कहें कोई पूछने वाला नहीं है अब इस शहर को।

कल अष्टमी है। अभी महोत्सव जोरों पर है। दुर्गा पूजा के चलते शहर में कोई अपने परिवार को छोड़ कर बाहरी व्यक्ति से शायद ही मिलने का कष्ट करे।

इधर राहुल सेन को भी अपने परिवार के साथ पूजा में शामिल होना आवश्यक है।

इसलिए वो भी इस इमारत से मेरे निकलने के कुछ देर बाद घर निकल जायेंगे। उनके साथ शायद उनके मित्र भी।

सोच रहा हूँ की मुर्शिदाबाद जाने के लिए दिनभर का समय बिताने जाऊं तो जाऊं कहाँ!

कोलकाता के जाने माने स्थल घूम चुका हूँ। चाहें वो विक्टोरिया ममोरियल हो या फिर कालीघाट मंदिर। 

ट्रेन पकड़ने के लिहाज से शाम तक घर में रुकना भी संभव नहीं है।

साथी घुमक्कड़ के साथ हुई चर्चा में यही निर्णय पर पहुंचा की दोनो बड़े बैग सियालदाह रेलवे स्टेशन के अमानती घर में जमा करवा कर दिनभर सैर सपाटा करूंगा। 

छोटे बैग में जरूरी सामान भर कर रात की ट्रेन से मुर्शिदाबाद निकल जाऊंगा। हालांकि मुर्शिदाबाद जाने वाली रेल का टिकट आरक्षित नहीं हुआ है।

स्नान ध्यान करने के बाद राहुल के फ्लैट पर बिखरे सामान को समेटने की प्रक्रिया शुरू हुई। हर कोने में कुछ ना सामान रखा हुआ है।

राहुल ने कुछ खास जगहों पर जाने की सलाह दे रहे हैं। जैसे बाग बाजार के रसगुल्ले। जो बहुत ही लजीज होते हैं।

मेरे मूंह में तो ऐसे ही पानी की धार बहने लगी ये सुनते ही।

आखिर आज इनके घर में मेरा ये तीसरा दिन भी है। यहाँ जमकर मौज काटी। राहुल ने अपने घर तब आमंत्रित किया जब सबने अपने घर के द्वार हमारे लिए बंद कर लिए थे पूजा के चलते।

कपड़ा धुलाई से ले कर शहर घुमाई भी जम कर हुई। मन में टीस है की आज अगर शाम तक यहीं रुक जाता तो सुविधा हो जाती।

पर राहुल को भी फ्लैट से घर निकलना है। यही घुमक्कड़ी है। सोचता तो घुमक्कड़ अपनी सुविधानुसार है पर होता विपरीत है।

फ्लैट से तैयार हो कर निकालने लगा। राहुल और उनके मित्र हमें इमारत के गेट तक छोड़ने आए।

कल रात भर पंडालों की तस्वीर लेने के बाद भी राहुल नहीं छके जो आज जाते समय भी तस्वीर निकाल रहे हैं।

दिन के एक बज रहे हैं। यहाँ से सोनारपुर तक की ऑटो में लदकर जाना है। खुसकिस्मति से ऑटो भी सोनारपुर स्टेशन तक का मिल गया।

ज्यादा पैदल नहीं चलाना पड़ा। अन्यथा पिछले तीन दिन का अभिलेख(रिकॉर्ड) रहा है जब शायद ही कभी समय पर ऑटो मिला हो।

स्टेशन और अमानती घर

सोनारपुर स्टेशन पर पधारने के बाद ऑनलाइन टिकट आरक्षित करवा लिया है। भरी धूप में बैग ले कर स्टेशन पर पहुंच तो गया हूँ पर ट्रेन नहीं।

ट्रेन को आने में अभी काफी समय है। तब तक मुझे यहीं प्लेटफार्म नंबर एक पर इंतजार करना होगा।

आज सोनारपुर स्टेशन पर गजब की भीड़ है। ज्यादातर व्यवसाई या शिक्षक दिख रहे हैं। धूप से बुरा हाल है।

स्टेशन का मुआना कर रहा था की ट्रेन का भोंपू बज पड़ा। छांव में खड़ी सवारियां भी बाहर निकल आईं ट्रेन लपकने।

अब तादाद और भी जायदा लग रही है। छुपारुस्तम सवारियां!

घंटे भर के भीतर सियालदाह जंक्शन पर ट्रेन ने ला कर पटक दिया। 

इधर साथी घुमक्कड़ के मोबाइल का पोर्ट बड़ा होने के कारण उससे किसी भी तरह का डाटा का लेन देन होना भारी पड़ रहा है। राहुल के द्वारा बताई हुई बजरबोई तरफ निकल गया ये काम निपटाने।

बाजार में भीड़ जमकर है। शुरुआत की कुछ दुकानों में पूछने पर तो पोर्ट मिला ही नहीं।

तीसरी दुकान मिला भी तो कीमत इतनी बता दी की वापस निकलने का जी करने लगा।

पर दुकानदार समझदार निकला। सही दाम पर चीज थमा दी। इतने देर घूमने फिरने के बाद भी पेट खाली ही है।

आगे बढ़कर सबको लस्सी पिता देख मैं भी आ गया लस्सी का स्वाद लेने। पर मैने चाय को ज्यादा प्राथमिकता दी और साथी घुमक्कड़ ने लस्सी को।

वापस से स्टेशन निकल आया ये सोच कर की बैग लादे लादे घूमने का कोई अर्थ नहीं इसे अमानती घर में जमा कराना सही रहेगा।

रात की ट्रेन को मद्देनजर रखते हुए मैं सियालदाह में ही अमानती घर में बैग जमा कराना चाहूँगा।

स्टेशन पर अमानती घर ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा। बैग ले कर तो मैं प्लेटफार्म में दाखिल हो गया।

लोगो से पूछने के बावजूद और उनके बताने के बावजूद अमानती घर कहीं नजर ना आया।

नज़रें तेजी से दौड़ने पर स्टोर रूम के पास जहाँ भारी भरकम रेलवे का सामान कब्जाया जाता है वहाँ बना है अमानती घर।

यहाँ बैग ले कर आया। उसमे से जरूरी उपकरण निकाल कर बैग में डाल लिए।

स्टोर रूम के मुहाने कुर्सी लगाए बैठे एक सज्जन ने बैग की जांच की, पर्ची काटी और अंदर कमरे में बैग रखने की सलाह दी।

मैं दोनो बैग ले कर आ गया अंदर कमरे में रखने। यहाँ चॉक से क्रम संख्या मेरे बैग पर डाल दी गई। ऊपर के खाने में बैग रख कर निकल पड़ा।

इत्मीनान से तो नहीं पर बैग जमा करवा कर निकल पड़ा सैर सपाटे के लिए। अब आराम से बिना कोई बोझा लादे शहर भर में घूम सकता हूँ।

शाम तक अगर मुर्शिदाबाद ट्रेन का आरक्षण सुरक्षित हो जाएगा तो अमानती घर से बैग ले कर जाऊंगा। ऐसी योजना है।

अन्यथा बैग के साथ ना तो ठीक से घूम पाता और थकान होती सो अलग। सियालदाह से बाहर निकलने के बाद सबसे पहले तो मैं ईडन गार्डन जाना चाहूँगा।

स्टेशन से निकल पड़ा पैदल। मार्ग में बहुत सी लुभावनी इमारते भी देखी जा सकती हैं। जो अपनी छाती पर इतिहास छपाए बैठी हैं।

क्रिकेट का मक्का इडेन गार्डेंस

भूख भी लगी है पर उससे कहीं ज्यादा उत्साह स्टेडियम को देखने का है। चलते फिरते मैं कुछ देरी में मैदान के बाहर आ कर खड़ा हो गया।

धर्मशाला क्रिकेट स्टेडियम के बाद ये दूसरा स्टेडियम होगा जहाँ आज मैं आया हूँ। मेरे शहर के खुद के स्टेडियम ग्रीन पार्क में कभी नहीं गया।

बाहर से मालूम ही नहीं पड़ रहा है की अंदर इतना बड़ा स्टेडियम होगा।

क्रिकेट प्रेमी होने के नाते मेरा यह फ़र्ज़ बनता है कि मैं भारतीय क्रिकेट का मक्का कहे जाने वाली ईडन गार्डन जरूर जाऊ। हावड़ा से कुछ ही दूरी पर स्थित यह मैदान आकर्षण का केंद्र है।

यह वह ऐतिहासिक मैदान है जहाँ वीवीएस लक्ष्मण और राहुल द्रविड़ ने सन् 2001 में फॉलोऑन बचाकर ऐतिहासिक पारी खेली थी।

भारत गत चैंपियन ऑस्ट्रेलिया पर पलटवार करते हुए ऐतिहासिक जीत दर्ज की थी। उस जीत को कोई क्रिकेट प्रेमी कैसे भूल सकता है। मैं तब मात्र आठ साल का था।

क्रिकेट के भगवान कहे जाने वाले सचिन तेंदुलकर ने अपना 199 वां टेस्ट मैच यहीं खेला था। 

इस मैदान के बाहर इन सभी ऐतिहासिक पलों की तस्वीर मुख्य स्थल के बाहर टंगी है। अंदर जाने की इच्छा हो रही है, लेकिन अन्दर तभी जाया जा सकता है जब कोई मैच चल रहा हो। 

यहाँ खड़े सुरक्षाकर्मी ने बताया कि तत्कालीन बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष सौरव गांगुली अंदर जरूरी टीम मीटिंग में आए हुए हैं। वह घंटे दो घंटे में बाहर निकलेंगे। 

सौरव गांगुली का दीदार

जैसे ही मुझे यह बात पता चली मैं कुछ क्षणों के लिए थम सा गया। मैं बाहर उनकी एक झलक के दीदार के लिए इंतजार करने लगा। 

सौरव गांगुली, भारत को इससे बेहतर कप्तान ना तो मिला है, ना मिलेगा। जिसने अपने बलबूते भारतीय क्रिकेट को फिक्सिंग के प्रकरणों से निकाल कर नई बुलंदियों पर ला कर खड़ा कर दिया था।

बस गम था तो इस बात का उनकी कप्तानी में की भारत 2003 का विश्व कप हार गया था। इस बात का खेद मुझे आजीवन रहेगा। 

प्रतीक्षा करने के दौरान गांगुली से तो नहीं बल्कि मेरे जैसे ही एक मुसाफिर से राह टकरा गई। ये जनाब भी नौकरी धंधा छोड़ कर भारत निकल आए हैं भारत भ्रमण के लिए।

ये दुबई से आए भारतीय है और लखनऊ का रहने वाले है। किन किन हिस्सों में घूम चुके हैं। पान की गुमटी पर धुआं उड़ाने में व्यस्त हो गए।

जाते जाते कहीं का पता पूछने लगे। इत्तेफाक से उसी जगह से मैं आया था। उनके मंजिल तक जाने वाली बस भी सामने से चली आ रही है।

एक घंटे तक प्रतीक्षा करने के उपरांत भी दादा नहीं आए। शायद मीटिंग की अवधि और बढ़ गई हो। ऊपर सजे पर खड़ा एक वृद्ध सुरक्षाकर्मी नाक में दम किए है।

साथी घुमक्कड़ और उस सुरक्षाकर्मी की तीखी नोक झोंक भी होने लगी। जिसका साथी घुमक्कड़ तो आनंद ले रहा है पर वो सुरक्षाकर्मी खिसिया रहा है।

मेरे जैसे और भी कई लड़के ऐसे हैं जो यहाँ बाहर गांगुली के निकलने का इंतजार कर रहे हैं।

कोई जाली पर लटक कर, कोई दरवाजे के पास। सबने अपना मोबाइल तैयार कर लिया है गांगुली की एक तस्वीर लेने के लिए।

सौरव गांगुली तो इतनी जल्दी आने से रहे। बेहतर रहेगा की मैं अपनी अगली मंज़िल की ओर निकल जाऊं।

फेरी कि सवारी

दो दिन तक कोलकाता में रहने के बावजूद भी मैं फेरी कि सवारी नहीं कर सका हूँ। समय है फैरी में सवारी करने का। 

ईडन गार्डन के बाद निकल पड़ा फेरी की सवारी के लिए नदी किनारे। किनारे पर पहुंचते पहुंचते पता चला की हावड़ा जाने के लिए बाबू घाट से देरी उपलब्ध है।

दिन की धूप में बाबू घाट पर पहुंचा गया। रेलवे स्टेशन की भांति यहाँ भी दाखिल होने से पहले टिकट लेना पड़ता है।

कतार में लगने के लिए पहले काउंटर पर खड़ा हुआ। यहाँ से ना जाने किस वजह से उन्होंने मुझसे दूसरे काउंटर पर भेज दिया।

दो टिकट लेने के बाद पैसे दिए। टिकट इतने सस्ते होंगे मैने सोचा ना था। बाग बाजार तक का सीधा टिकट नहीं प्राप्त हुआ।

पहले नदी पार करके हावड़ा उसके बाद बाग बाजार। सफर कितना लंबा होगा देखने वाली बात होगी। 

फेरी का टिकट ले कर फेरी में चढ़ गया। यहाँ पहले देरी आती है। जबतक खाली नहीं हो जाती या सवारी उतर नहीं जाती तब तक प्रतीक्षा कर रही सवारियां खड़ी रहती हैं।

फेरी से नदी पार करने में ना सिर्फ समय की बचत बल्कि कई मायनों में थकान से भी मुक्ति।

जहाँ सड़क मार्ग इतना व्यस्त होने के चलते थकाऊ है वहीं फेरी भी इसका एक समाधान है। ये सुविधा हर इस शहर में होने चाहिए जहाँ नदी से शहर विभाजित हो।

फेरी में भीड़ कम ही है। बैठने को जगह भी उपलब्ध थी पर मैंने खड़े खड़े जाने का निश्चय किया।

मोबाइल बटुआ जेब के भीतर तक घुसा लिए हैं। इस नदी में अगर कुछ भी गिरा तो उसकी वापसी की उम्मीद कम ही है। ना निकलूंगा ना निकालने दूंगा।

फेरी में अच्छी खासी बैठने की जगह है। बीच में ही एंजिन और उसका भीमकाय जेनरेटर है। जब अब सवारी के आने की उम्मीद कम है तो फेरी भी निकल पड़ी।

हावड़ा ब्रिज को पार करते हुए।  वर्षों पुराना हावड़ा पुल के इस तरह से दीदार करना आनंदमय है। 

मिनटों तक मैं उस पुल को बारीक से निहारता रहा। पहली बार किसी ब्रिज के नीचे से गुजर रहा हूँ।

खास बात ये है की जब भी बना होगा बहुत मजदूर और पैसों की लागत आई होगी। समय समय पर मरम्मत भी होती ही रहती होगी।

हावड़ा पहुंचने के बाद एक और फेरी का इंतजार करना होगा। जो हमें बाग बाजार तक छोड़ेगी।

कुछ देर में फेरी भी आ गई। शायद यहाँ ज्यादा देर नहीं करता मानव इसलिए ही फेरी जल्दी जल्दी आती रहती हैं।

बीच पानी में दो फेरी का आमने सामने आना ही या अगला बगल से गुजरना हो। दोनो ही प्रसंगयुक्त हैं।

हावड़ा से बाग बाजार की फेरी में बैठने के बाद कब होगा इनका निकलना ये देखना होगा। यहाँ भी ज्यादा सवारियां नहीं हैं।

आखिरकार फेरी वाला चल पड़ा। रास्ते में कुछ खराब पड़ी फेरी भी देखने में आ रही हैं।

समझ नहीं आ रहा है बाजार जा रहा हूँ या शमशान घाट। अब तक दो शमशान घाट दिख चुके हैं।

कलकत्ते का मशहूर हावड़ा ब्रिज

नहीं ले सका रसगुल्लों का स्वाद

तनिक देर में आ गया हावड़ा के बॉलीगंग इलाके में जो बाग बाजार ही है।

सुना है यहाँ के रोशोगुले बहुत स्वादिष्ट हैं। भूंख़ भी उफान मार रही है।

फेरी से उतरने के बाद रेलिंग के सहारे बाहर की ओर जाने लगा। टिकट की पर्ची की जांच अब यहाँ निकलते वक्त हो रही है।

जमीन पर हजारों की तादाद में फटे टिकट पड़े हुए हैं। जिनका दोबारा उपयोग करा ही नहीं जा सकता।

टिकट की जांच के लिए भी तीन चार मुस्टंडे खड़े हैं। जिनके पास टिकट ना मिला तो क्या पानी में भिगो भिगो कर धोते होंगे।

मेरा तो टिकट साथी घुमक्कड़ के पास है। उसी के हाथों फट भी गया। पर मेरी जांच तक न हुई। शायद भूल गए होंगे।

सौ में एक के साथ होने वाला मामला लगता है। वैसे अभी तक जो मैं निरीक्षण कर पा रहा था उसमे शायद ही कोई प्राणी इनके हाथों बचा हो।

फेरी से बाहर निकल कर बाजार की तरफ आया एक महीन गली से। चौराहे के उस बाजार चकाचौंध से भरा।

चौराहे के उस पट्टी पर कदम रखने से पहले खुद को तरो ताज़ा करने का समय आ गया है। ताकि ये सब इतमीनान से देख सकूं।

दाएं हांथ पर बनी टपरी पर चाय की चुस्की लेने के बाद ट्रैफिक दादा के इशारा मिलते ही इस पट्टी पर निकल आया।

चाय कुछ फीकी थी। ना चायवाले को पता था की वो स्वादिष्ट रसगुल्ले कहाँ मिलेंगे।

जोरदार भूख के चलते लगा अब खा ही लेना चाहिए इससे पहले मैं चक्कर खा कर गिर जाऊं।

पंडाल और भूख

पंडाल के कारण भीड़ काफी है। भीड़ के चलते इस हिस्से पर वाहन को आवाजाही पर पूरी तरह से रोक है।

मैं भी पंडाल की तरफ आकर्षित होते हुए निकल गया। पर भूख वापस पीछे खींच लाई।

बाएं हांथ पर मैदानी इलाके में बड़े तंबूरे के नीचे व्यंजनों का ठेला लगा है। जैसा आमतौर पर हम देखते है उसी का बड़ा संस्करण।

अंदर बाई तरफ खाने का टोकन कट रहा है। और वो टोकन ले कर उसे भी आगे खाना परस कर मेज तक भिजवाया जा रहा है।

व्यवस्था तो अच्छी जान पड़ रही है। मैने अपने लिए एक प्लेट चावल और साथी घुमक्कड़ ने नूडल्स मंगा लिए।

बाकियों की तरह इंतजार में बैठ गया मेज कुर्सी पर। अब जब खाना आया तब पता चला नाम बड़े और दर्शन छोटे।

ज्यादा कुछ लजीज नहीं पर काम चलाऊ। शरीर में ऊर्जा पैदा करने लायक तो है ही। पेट पूजा करके निकल गया पंडाल देखने।

पंडाल का साजो सज्जा भव्य। भीड़ भी अच्छी लग रही है भरे पेट के कारण। 

पंडाल में मां दुर्गा की अत्यंत विशाल मूर्ति स्थापित है। काफी देर तक तो इर्द गिर्द घूमता रहा।

यहाँ भी खाने का बंदोबस्त है। सोचा और आगे चल कल और पंडाल देखे जाएं। चौराहे तक आ भी गया पर समय की कमी के चलते वापस निकलना ही उचित रहेगा।

अब समय हो चुका है वापस सियालदाह की तरफ अग्रसर होने का। सियालदाह पहुंच कर अमानती घर से बैग लेके रात के बारह बजे की ट्रेन से मुर्शिदाबाद निकलना है। 

जेब टटोली तो बैग की पर्ची गायब है। शायद बैग की रसीद कहीं गिर गई है।

बाग बाजार पर फेरी की दो टिकटें कटाने के लिए खिड़की पर खड़ा हो गया। पर यहाँ समस्या आ रही ही खुले पैसे की।

मेरे पीछे खड़े भाईसाहब ने इस समस्या को हल करने का प्रयास किया। टिकट ले कर फेरी की सवारी करते हुए हम निकल पड़े।

अंधेरी रात होने को आई है। फेरी खचाखच भरी है। लोग दफ्तर से वापस घर की ओर रवाना हो रहे हैं।

हर बार की तरह जैसे ही फैरी आती उसको रोकने के लिए फेरी से जुड़ी रस्सी को टीले में बांध दिया जाता। ताकि वो रुक जाए।

फेरी अगर बंदरगाह से दूर रुकती है तो उसे पास लाने का भी नायब तरीका है। आगे और पीछे के द्वार को अपनी तरफ खींचना।

या फिर पटरा डाल देना ताकि सवारियां आ जा सकें। मैं ये सब खड़े देख रहा था जब से फेरी के चक्कर लगा रहा हूँ।

भारत में फेरि की सवारी केवल कलकत्ता में

शाम के सात बजे तक मैने पहली फेरी ली हावड़ा ब्रिज तक के लिए। उसी प्रक्रिया को दोहराते हुए सियालदाह पहुंचना है।

आधे घंटे से भी कम समय में सियालदाह आ पहुंचा। यहाँ पर जश्न का माहौल है। मानो भारत विश्व कप जीत गया हो।

खोई रसीद की कहानी

स्टेशन में दाखिल होते हुए अमानती ढूढने लगा जो सुबह भी ढूढना पड़ा था। अमानती घर मिलते ही यहाँ दाखिल हुआ। सारी घटना का वर्णन करने लगा। 

खुस्किस्मती इस बात की है कि जिस लड़के के हांथो सुबह बैग जमा करवाया था। वही अभी भी मौजूद है। वो इसलिए क्योंकि उसकी ड्यूटी अभी खतम नहीं हुई है।

जमाकर्ता मुझे पहचान गया। इसलिए उसने मेरे भले के लिए सुझाव दिया कि पुलिस स्टेशन जाकर गुम हुए बटुए की रसीद बनवा लो। और यहाँ से बैग ले जाओ।

फटाफट इस काम को बिना देरी के पूरा करने के लिए मैंने साथी घुमक्कड़ को भेज पुलिस स्टेशन भेज दिया। मैं यहाँ बैठ कर बैंड बजाओ वालों का वीडियो बनाने लगा।

बैंड प्रतिस्पर्धा

राहुल ने बताया था की दुर्गा पूजा के समय देश के विभिन्न हिस्सों से ढोल नगाड़े वाले अपना प्रदर्शन करने यहाँ आते हैं।

तीन दिन तक ये प्रतिस्पर्धा चलती है। विजेता को भारी इनाम से नवाजा जाता है। ये भी तीन दिन तक ऐसे ही ढोल पीटेंगे।

सैकड़ों की संख्या में बैंड वाले दिखाई पड़े जो पंडालों में बैंड प्रतियोगिता में शिरकत करने देश के दूसरे राज्यों से आए हुए हैं।

मैं उनके से हिंदी भाषी बैंड वाले से मुखातिब हुए तो बताया कोई तमिलनाडु तो कोई राजस्थान, हरियाणा, बिहार, महाराष्ट्र, देश के अलग अलग राज्य से इस प्रतियोगिता में शिरकत करने आए हैं।

रपट दर्ज कराने में साथी घुमक्कड़ को बहुत समय लग रहा है। फोन पर मालूम पड़ा की कभी कलम तो कभी काग़ज़ की मशक्कत के चलते ऐसा ही रहा है।

पर बहुत जद्दोजहद के रिपोर्ट दर्ज कर ली गई। जिसने घंटा भर निकल गया।

एफआईआर दर्ज कराने के बाद गुमशुदगी पर्ची की चिट्ठी मिली। जिसको दिखाने से बड़े बैग खंगालने का अनुमति मिली।

तय किया की जब भूभनेश्वर के लिए भी हावड़ा से ट्रेन है तो क्यों बैग ले कर मुर्शिदाबाद जाऊं और फिर वापस आऊं। जिसकी टिकट भी आरक्षित है।

बेहतर यही है की एक दिन ये बैग यहीं रखा रहे।

सियालदह में बैंड प्रतिस्पर्धा

अब तक वो सज्जन भी निकल गए जिन्होंने तरकीब सुझाई थी। उनकी जगह दूसरे बैठ गए हैं। पर्ची और दलील पेश करने के बाद अंदर गया।

जहाँ से बैग उठाए और जरूरी सामान अपने छोटे बैग में भरने लगा। बड़े बैग का काम हो जाने के बाद उसको उसी पर्ची पर वापस रखवा दिया।

एक दिन और रखने पर थोड़ा अधिक शुल्क पड़ेगा पर सहूलियत भी है। 

वापस कोलकाता अना निश्चित है तो फिर क्यों बैग लाद के के जाऊं। 

ऑनलाइन एप के माध्यम से पता चला मुर्शिदाबाद तक जाने के लिए टिकट आरक्षित नहीं हो सका है। 

आज की ट्रेन की तो नहीं हो पाई। कुछ सीटों से रह गई। अब जनरल टिकट ले कर जाऊंगा लेकिन जाऊंगा तो जरूर।

आज रात का सफर जनरल डब्बे से करना पड़ेगा।

समय का फायदा उठाते हुए स्टेशन के ही भोजनालय में आ गया। भोजन उतना लजीज तो नहीं पर पेट भरने के लिहाज से सही रहेगा।

हुआ भी कुछ ऐसा ही। मेरी तरह बाकी और भी सवारियां खाने के इंतजार में बैठी हैं।

रात के ग्यारह बजे खाने पीने के बाद प्लेटफार्म की तरफ निकल आया।

सीट के लिए अफरा तफरी

ट्रेन अपने निरधारित समय से आधे घंटे देर से सियालदाह के एक नंबर स्टेशन पर लगी। 

मैंने अनुमान लगाया था कि ज्यादा भीड़ नहीं होगी।

लेकिन हुआ इसके उलट। भीड़ इतनी है कि धक्का मुक्की होने लगी। जनरल डिब्बे का जैसे ही दरवाजा खुला यह धक्का मुक्की और तेज़ हो गई। 

यह तो तय है कि सीट तो मिलने वाली नहीं। एकाएक मेरी नजर आपातकालीन खिड़की पर पड़ी। मैंने वहाँ से साथी घुमक्कड़ को अंदर जाने को कहा।

फ़ौरन उसके हांथ से छोटा बैग लिया। उसके पैर उठा कर उसे अंदर धकेल दिया। फिर दोनों छोटे बैग उसे थमा दिए और सीट कब्ज़ा करने को कहा।

सफर में सोने का अच्छा इंतजाम हो गया है। हालांकि ट्रेन अपने निर्धारित समय के बजे रात्रि एक बजे चली मगर भोर में मुर्शिदाबाद पहुंच जाऊंगा।

सोनारपुर से ईडन गार्डेंस से हावड़ा से सियालदह 50km

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *