कोयंबटूर पहुंचने में हुई भारी चूक

कोयंबटूर | तमिलनाडु | भारत

हुआ एहसास

ट्रेन में नींद खुली। घड़ी देखी तो समय सुबह के साढ़े पांच बज रहे हैं। दो चार घंटे की नींद ही सफर के दौरान पर्याप्त मानने लगा हूँ मैं।

रात्रि के एक बजे ट्रेन का आना हुआ था। जिस कारण भागम भाग में जहाँ जगह मिली वहां बैठ गया। खुसकिस्मती से सबसे ऊपर वाली सीट मिल गई।

जिसपर रात भर मैं जमकर सोया। मोबाइल पर ट्रेन एप्लीकेशन पर ट्रेन की मौजूदा स्तिथि जाननी चाही। इसके मुताबिक बस दो घंटे के भीतर यानी आठ बजे तक मैं कोयंबटूर पहुंच जाऊंगा।

स्टेशन दर स्टेशन भी जांचा जा सकता है। अभी पिछला स्टेशन जो निकला वो तो ट्रेन की इस एप्लीकेशन पर दर्शा ही नहीं रहा है। हो सकता हो कभी कभार ट्रेन किसी स्टेशन पर रुक जाती हो।

मोबाइल पकड़ कर बैठ गया। हर स्टेशन पर जनता चढ़ रही है उतर रही है। भीड़ पहले भी कम थी अब भी कम ही है। ऊपर सीट पर रखे बैग को नीचे उतार कर रख लिया।

अगला स्टेशन आया। इस बार भी एप्लीकेशन पर वो स्टेशन नहीं दर्शा रहा जिस पर ट्रेन खड़ी है। शंका हो रही है आखिर माजरा क्या है।

ट्रेन यहाँ से भी चल पड़ी। अंदाजा लगाया और मालूम भी पड़ रहा है की मैं गलत दिशा में जा रहा हूँ। ये वो ट्रेन नहीं है जिसका मैंने टिकट लिया है।

गूगल नक्शे पर देखने पर पाया की मैं त्रिसूर से निकल कर कन्नूर की ओर बढ़ रहा हूँ। बल्कि कन्नूर से कोयंबटूर में काफी बड़ा अंतर है। हालांकि कन्नूर में भी सामुदायिक मित्र है। दोनों ओर जाने के लिए त्रिसूर से हो कर ही गुजरना पड़ेगा। पर आज मुझे कोयंबटूर जाना है जैसा मैंने अपने सामुदायिक मित्र से पहुंचने का वादा किया है।

गलती सुधरने का मौका

अगले स्टेशन पर ट्रेन के रुकते ही मैंने यहीं उतरना बेहतर समझ रहा हूँ। ताकि इत्मीनान से बैठ कर विश्लेषण कर सकूं पूरे माजरे का। दिमाग बिलकुल भी काम नही कर रहा है इस समय। जाना किस दिशा में था और निकल किस दिशा में गया हूँ।

गलत दिशा में बढ़ने का कोई फायदा नहीं। जितना पहले उतर जाओ उतना बेहतर। स्टेशन पर उतरकर सीट पर बैग रख सिर खुजा रहा हूँ की आखिर करूं तो अब करूं क्या। घड़ी में समय छह हो चला है।

पहले ये सुनिश्चित करना होगा की आखिर किस दिशा में मैं बढ़ रहा था और कोयंबटूर यहाँ से कितनी दूर है। कोशिश जारी है की कहाँ खड़ा हूँ, यहाँ से कहाँ जाना होगा कोयंबटूर के लिए?

स्टेशन पर अपनी ट्रेन का इंतजार कर रहे यात्री को पास बुला कर यही सब पूछने की कोशिश करने लगा। साथी घुमक्कड़ इस कार्य को करने में जुटा है।

सीट पर बिठा कर बातचीत होने लगी। इन भाईसाहब को ना तो हिंदी या अंग्रेजी भाषा का ज्ञान है। ना ही हमें तमिल या मलयालम का ज्ञान है।

झूझते हुए नक्शे पर जगह के बारे में पूछते हुए मालूम पड़ा की हम अभी कोयिलोंडी नाम की जगह पर खड़े हैं। ये पहली सफलता है जो हासिल हुई।

अब ये जानकारी करनी है की कोयंबटूर जाने के लिए क्या करना होगा। साथी घुमक्कड़ और अनजान व्यक्ति जुट गए दोनो इसी कार्य में।

मेरी तो जैसे बुद्धि भ्रष्ट हो चली है। लग रहा है कितनी जल्दी यहाँ से निकल जाऊं। कितनी जल्दी समाधान मिले। स्टेशन छोटा है और यात्री भी गिने चुने नजर आ रहे हैं।

कोयिलोंडी कोई गांव जैसा प्रतीत हो रहा है। उतरने के बाद से अब तक किसी ट्रेन का आना नहीं हुआ है। जूझने के बाद मालूम पड़ा की कोयंबटूर जाने के लिए कोयिलोंडी से ओट्टापालम जाना होगा।

जिसके लिए ट्रेन संख्या क्रमांक दो से मिलेगी। जो कुछ ही देर में आ रही है। करीब आधा घंटा जूझने के बाद समाधान सामने आया है। अनजान मुसाफिर ने हमें मुसीबत से निकाला है।

उस जगह पर जहाँ मैं एक विदेशी हूँ। ना मुझे यहाँ की भाषा का ज्ञान ना आदमी की पहचान। विदेश में बैठ कर है कोई मदद करना भी नहीं चाहता। बेहतर रहा की किसी ओटापलम जाने वाली ट्रेन के आने के पहले ही निवारण निकल आया।

कोइलन्दी पर उतारकर मिला समाधान

कुछ यूँ रहा बीती रात का घटनाक्रम

मैं एर्नाकुलम से एर्नाकुलम टाउन स्टेशन निकल पड़ा था आधी रात पैदल ही। जब मालूम पड़ा की एर्नाकुलम से आखिरी ट्रेन दस बजे निकल चुकी है।

अगली ट्रेन सिर्फ एर्नाकुलम टाउन से ही मिल सकेगी। पटरी के किनारे किनारे गूगल नक्शे की सहायता से सूनसान गलियों से मैं एर्नाकुलम टाउन को आधी रात में निकल लिया था।

भय भी लग रहा था एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर इस तरह जाते हुए सूनसान गलियों से गुजरते हुए जहाँ कुत्ते लगाकर भौंकने में जूते थे।

डर पर काबू पाते हुए पहुंच गया था रात्रि साढ़े बारह तक। एर्नाकुलम टाउन पर प्लेटफार्म संख्या दो पर ही पहुंचकर सुकून मिला था।

मजेदार वाकया तो तब हुआ जब मैं ट्रेन की प्रतीक्षा करते हुए प्लेटफार्म पर चहलकदमी कर रहा था। पड़ोस की पटरी पर खचाखच भरी दूसरी ट्रेन खड़ी थी।

कुछ लड़के नीचे उतर आए और सलामी देने लगे। वो मुझे भारतीय सेना का जवान समझ बैठे थे। जिद्द पर अड़ गए की तस्वीर लेने है। बहाना कर मुझे वह स्थान छोड़ना पड़ा था।

रात जिस ट्रेन में मुझे चढ़ना था उस ट्रेन से मैं कोयंबटूर पहुंच जाता। जिसमे चढ़ गाय चुका था उससे कन्नूर पहुंच जाता।

हुआ यूं की जिस प्लेटफार्म क्रमांक पर कोयंबटूर वाली गाड़ी आनी थी ठीक उसी समय कन्नूर वाली ट्रेन आ पहुंची जो कुछ देरी से आई थी। जिसे मैं कोयंबटूर वाली समझ कर बैठ गया रात्रि के अंधेरे में।

हालांकि कोयंबटूर वाली ट्रेन इस ट्रेन के निकल जाने के बाद आई। ये रेलवे की तरफ से किया गया छल था और मुझसे धोखा।

एर्नाकुलम जंक्शन

कोयिलोंडी से ओट्टापलम

खैर अभी कोयिलोंडी से निकलने का समाधान और कोयंबटूर पहुंचने का रास्ता पता लग गया है। जिससे काफी राहत की सांस ले पा रहा हूँ।

अन्यथा मुझे यही लग रहा था की यहाँ ना जाने कब तक फंसा रहूँगा। अनजान मुसाफिर का तहे दिल से धन्यवाद देते हुए बैग उठा कर पटरी के रास्ते दो नंबर पर प्लेटफार्म पर आ गया।

स्टेशन बेहद छोटा है। मैं अंतिम छोर पर खड़ा हूँ। यहाँ प्लेटफार्म का अंत हो रहा है। प्लेटफार्म पर यात्री भी गांव के अनुसार ठीक ठाक हैं।

ट्रेन आई जो को खाली भी दिख रही है। ज्यादा देर ना रुकते हुए चल पड़ी। बैठ कर निकल गया उसी टिकट पर। ट्रेन में भीड़ ना के बराबर है। दफ्तर वाले लोग ज्यादा दिखाई पड़ रहे हैं।

इधर मैं अपने सामुदायिक मित्र को अपने आने का नया समय बता रहा हूँ उसके पूछने पर। बस कहीं खिसिया कर परेशान ना हो जाए।

ट्रेन में यात्री अखबार पढ़ रहे हैं जो मेरी समझ से परे है। मैं देख रहा हूँ तो सिर्फ तस्वीर। वही देख कर खबर का अंदाजा लगाने की कोशिश कर रहा हूँ।

कुछ साढ़े तीन घंटे के सफर में मैं ओट्टापलम आ पहुंचा। ट्रेन से उतरकर प्लेटफार्म संख्या एक पर आ गया। कोयंबटूर को जाने वाली ट्रेन कुछ देर में है।

साथी घुमक्कड़ स्टेशन के बाहर निकल गया और मैं यहाँ अंदर नजर बनाए हुए हूँ बस्तों पर। अब कुछ सुकून आ रहा है जब सही दिशा में बढ़ रहा हूँ।

कुछ देर के इंतजार के बाद ओट्टापलम से निकल पड़ा कोयंबटूर के लिए। कोयंबटूर में प्रवेश करते हुए दिख रहे हैं पहाड़। जो कोयंबटूर की पहचान हैं।

दोबारा तमिलनाडु में प्रवेश करना अच्छा लग रहा है। पर भीषण गर्मी का सामना करना पड़ रहा है।

ओट्टपलम स्टेशन से कोयंबटूर के लाई रावणगी

अंततः कोयंबटूर

आखिरकार दो घंटे के सफर के बाद ओट्टापलम से कोयंबटूर आ पहुंचा। थक हार कर सही पर मंजिल तक पहुंचा तो सही। केरल से वापस तमिलनाडु में। थकान, भूख और धूप इतनी जोरदार है जिसका कोई जवाब नहीं।

स्टेशन से बाहर निकल पास खड़े पुलिसवालों से सामुदायिक मित्र द्वारा दिए गए पते पर पहुंचने के लिए बस संख्या पूछना चाहा जो उस दिशा में प्रस्थान कर रही हो।

पर सहायता प्राप्त होती दिख नहीं रही। इधर ऑटोवाले अपनी मुझे अपनी कमाई का जरिया समझ कर लूटने के लिए तैयार हैं। शायद इसी वजह से पुलिसवालों ने मदद से इंकार कर दिया।

पहुंचना छोड़ सोच रहा हूँ पहले भूख का निवारण किया जाए। कुछ आगे चल बाएं हाथ पर एक छोटे रेस्त्रां में भूख मिटाने के लिए निकल आया। यहाँ इडली, डोसा के अलावा, आलू पराठा भी मिल रहा है सो मंगा रहा हूँ।

रेस्त्रां में ज्यादा जनता तो नहीं। पर सड़क पर जमकर भीड़ है। सवारियों और यात्रियों की। जिस पर बस और ऑटोवालों की खींचतान मची हुई है।

पराठा खा कर भुगतान कर निकल पड़ा पैदल ही। सोच रहा हूँ लूटने के बजाए लिफ्ट लेते हुए पहुंच जाऊं तो क्या बुरा है।

रास्ते से गुजर रहे भाईसाहब ने गाड़ी रोक कर पूछने लगे क्या मैं विक्रेता तो नहीं।

गूगल नक्शे और लिफ्ट के माध्यम से दो बजे सामुदायिक मित्र के घर आ पहुंचा। नमन घर से कुछ दूर पहले ही मुझे लेने आ गया था।

अब शरीर में कहीं और जाने की शक्ति नहीं। खाना खा कर लंबा सो गया।

एर्नाकुलम से कोयिलैंडी से ओट्टपलम से कोयंबटूर तक का कुल सफर 440किमी

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