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चंडीगढ़ से मनाली तक का जोखिम भरा सफर

जम्मू से अम्बाला

शालीमार एक्सप्रेस से सुबह के पांच बजे मैं अंबाला पहुंचा। यहाँ से ये तय किया कि चंडीगढ़ से दिन की बस में बैठ कर मनाली निकल जाऊंगा।

ट्रेन से उतरा तो स्टेशन पर काफी भीड़ देखने को मिली। बैग लेके इधर उधर दुसलखाने की खोज करने लगा। काफी देर और दूर तक चलने के बाद दाहिने हांथ पर मुझे लोगों का जमावड़ा दिखा।

जिससे मुझे लगा शायद यही वो जगह है जिसकी तलाश है। पर वो ना है। थोड़ा आगे बढ़ा तो दुसालखाना भी मिल गया।

कुछ एक घंटे में तैयार होकर मैं स्टेशन के बाहर आया। सुबह के आठ बज रहे हैं। अब ये पता करना है कि चंडीगढ़ के लिए बस कहाँ से मिलेगी।

स्टेशन के बाहर ही पता चला चंडीगढ़ को जाने के लिए बहुतेरी बसें हैं। मैन रोड पर आते ही यहाँ खड़ी एक बस नजर आई।

चंडीगढ़ से अंबाला

कंडक्टर द्वारा चंडीगढ़ चंडीगढ़ आवाज़ सुन मैं लद गया इसी बस में।

बस में अधिकतर सवारियां रोजमर्रा की मालूम पड़ रही हैं। कोई चंडीगढ़ अपने दफ्तर को निकला है तो कोई शिक्षक विद्यार्थियों को पढ़ाने।

बस में बैठे एक सज्जन ने जिज्ञासावश मुझसे इतने बड़े बैग के साथ घूमने का कारण पूछा। मुझे अपना वो पहला दिन याद आ गया जब चंडीगढ़ पहुंचा था। उनको विस्तार से सबकुछ समझाया और बताया कि मैं इंडिया टूर पर निकला हूँ।

और पूरा भारत घूमने का लक्ष्य है। ये सुनना ही था कि उनकी आंखे खुली की खुली रह गईं। मानो ऐसा लगा रहा है जैसे कभी सुना नहीं किसी के मुख से इतना भरी शब्द।

चंडीगढ़ आईएसबीटी आगमन

खैर घंटे भर के सफर में चंडीगढ़ आ धमका। उसी बस अड्डे जहाँ से रात में अमृतसर के लिए भागा था।

बस से उतरकर बैग एक किनारे रखा। बस भी यहीं खाली हो गई। चाय की टपरी पर पूछने पर पता चला सेक्टर 23 के लिए बस दस बजे तक आयेगी।

अभी तो एक घंटा है बस आने में। तब तक बैग एक किनारे रख चाय की प्याली की इच्छा हुई। चाय वाले भैया ने गरमा गरम कड़क चाय थमा दी।

चाय पर चर्चा में योजना ये बनी है कि जिस समान कि जरूरत नहीं आगे आने वाले सफर में वो सामान निकाल कर तोशीब के घर रखना बेहतर होगा।

चंडीगढ़ से मनाली जाने की बस देखी। एप से पता चला कि दिन की बस खाली है और उसमें टिकट भी उपलब्ध है। फटाफट मनाली की दो टिकट बुक कर दी। एक बड़ा काम हो गया वो है टिकट का जिसकी फिक्र थी।

आईएसबीटी बस अड्डे पर दोनों बड़े बैग से अनावश्यक सामान निकाल कर जम्मू में खरीदे गए झोले में भरने लगा।

ये झोला लिया तो था इसी काम में लिए मगर जम्मू में रखवाने के लिए और काम आ रहा है चंडीगढ़ में। सब कुछ एक दूसरे से जुड़ा है। बड़ा बैग अब पहले से काफी हल्का हो चला है।

अब जब कुछ समय है मेरे पास तो सोचा क्यों ना मनसा देवी मंदिर भी हो लिया जाए। जो पिछली बार समय की कमी के कारण रह गया था।

गोप्रो की झलक।

बैग का ठिकाना

इसी के चलते बेहतर रहेगा बैग को अमानती घर में जमा करवा कर निकल लिया जाए सैर पे। डीपों में 17 नंबर के सामने बने अमानती घर में पहुंचा बैग जमा कराने। यहाँ कहीं भी बैग रखने की जगह ही नहीं दिख रही।

बड़ी बड़ी मूछ लिए बैठे अंकल अपने रजिस्टर पर एंट्री करने लगे। चाक से उसमे संख्या अंक भी खुद ही डाल दिया।

ऐसी चाक गड़ाई है जिसे अगर पानी से भी धोए जाए तो शायद ही छूटे। सामने वाली लोहे कि अलमारी में बैग लिटा के बाहर निकल आया।

घूमने के लिहाज से और उससे भी पहले तोशीब के घर बैग रखने पहुंचना है। वापस संख्या नंबर पांच आ पहुंचा। कुछ ही देर में बस आई जिससे मैं रवाना हो चला सेक्टर 23।

कुछ ही देर में बस से घर पहुंच गया। यहाँ उसके मां और बाउजी से मिलकर बहुत खुशी हुई। तोशीब को बैग थमाया और फिर भविष्य में कभी मुलाकात हुई तो बैग लेने के वायदा किया।

ज्यादा देर ना रुक कर सेक्टर 23 से निकल गया मनसा देवी मंदिर। यहाँ से डायरेक्ट बस मिल गई जिससे बड़ी सुविधा रही। पिछली बार जब आया था तब पर्याप्त समय ना होने के कारण मनसा देवी मंदिर जाने से वंचित रह गया था।

जो इस बार जाने का अवसर प्राप्त हो रहा है। मनसा देवी चंडीगढ़ के बाहरी इलाके में स्तिथ है जो हरियाणा में आता है।

रास्ते भर डोलती हुई बस में कभी इधर कभी उधर। जब रेलवे फटाक पर आ खड़ी हुई तब लगा। कहीं देर ना हो जाए। लेकिन फिर भी ये खाली बस समय से पहुंच गई।

मनसा देवी मंदिर

बस से मुझे घण्टेभर का समय लगा मनसा देवी मंदिर पहुचनें में। बस से उतरना ही था कि वहाँ सजी दुकानों ने बता दिया। स्वागत है माता के दरबार में।

ये मंदिर का पिछला हिस्सा मालूम पड़ता है। क्योंकि जब पिछली दफा आया था तब आगे वाले हिस्से से एंट्री की थी।

यहाँ कैंपस इतना बड़ा है भीड़ भाड़ में कोई खो जाए तो जल्दी ना मिले। फूल माला की दुकान, माता की चुन्नी की अलग दुकान, प्रशाद की अलग दुकान।

हर एक ने अपनी अपनी जगह और सामान चुन लिया है ताकि तराजू बराबर रहे।

मंदिर की सीढ़ियों पर नजर पड़ी तो देखा ये लंबी कतार। जिसकी आशा थी। मनसा देवी मंदिर में भीड़ हमेशा से रही है। जो इस मंदिर की शोभा बढ़ाता है।

मनसा देवी मंदिर में बरगद का पेड़ के पास मन्नत मांगते लोग।

दाहिने हांथ पर जूते चप्पल और बैग जमा करने की दुकान भी दिखी। खड़े खड़े मैंने जूते उतार कर इसी दुकान में जमा करवा रसीद भी लेली। साथ ही बैग भी जमा करवा दिया।

मंदिरों में लंबी लंबी कतार होना लाजमी है। जूते, बैग आदि जमा करवा कर लग गया मैं लाइन में।

गर्भ गृह तक पहुंचने की होड़

धीरे धीरे कछुए की चाल के बराबर लाइन आगे बढ़ रही है। अगर यही हाल रहा तो बेड़ा गर्ग ही समझो।

लंबी लाइन में अगर इसी तरह मैं खड़ा रहा तो बस का छूटना लाजमी है। सीढ़ियां चढ़ते चढ़ते दिविडर आ गया। जहाँ से लाइन दो हिस्सों में विभाजित हो गई।

लाइन आगे रूकी, बढ़ी, इसी बीच में जगह बना कर धीरे धीरे आगे खिसकता गया। कतार में भी ठहराव जरूरी है। कतार में कुछ शरारती तत्व कूद फांद करते हुए आगे निकलते गए।

जब पुलिस वालों की उन पर नजर पड़ी। तब आ गए रुआब में ड्यूटी करने। इधर वो आते आते और पीछे निकल गए। मौका पा कर मैं डिविडर के नीचे से झुक कर आगे बढ़ता गया।

इधर माता का जयकारा होने लगा। वही शरारती तत्व जोर ज़ोर से जय माता दी पुकारने लगे। आते आते मैं इतना आगे आ गया कि खुद को गर्भ गृह के सामने पाया।

गर्भ गृह के सामने यहाँ एक अलग ही लाइन लगी है। बाकी सब कतारों से अलग। उसी लाइन में लग कर आगे बढ़ने लगा।

इसी बीच माता का जयकारा लगा जिससे भक्तों में एक नया जोश भर गया। गर्भ गृह तक पहुंचने में समय नहीं लगा।

गर्भ गृह में माता के दर्शन

अगर कूद फांद करते हुए ना आता तो पता नहीं कहाँ खड़ा होता। गर्भ गृह के सामने वाली कतार धीरे धीरे बढ़ रही है। ठीक सामने पहुंच पर मनसा देवी के दर्शन प्राप्त हुए।

अन्दर जाना तो मना है इसलिए ही बाहर बनी सभी मूर्तियों के दर्शन कर संतुष्टि पा ली। गर्भ गृह के बाहर आस पास सभी के सभी देवी देवताओं के दर्शन करके बरामदे में आ गया।

तेज धूप के कारण यहाँ पांव रखना भी मुश्किल हो रहा है। जमीन तो जैसे आग उगल रही हो। ऐसा लग रहा है मानो मैं अंगारों के ऊपर खड़ा हूँ।

लेकिन सुंगंधित माहौल के बीच कुछ पल बिताने का और मन है। बीचों बीच लगे बरगद के पेड़ में हर कोई धागा बांधते हुए नजर आ रहा है।

मनसा देवी मंदिर चंडीगढ़

शायद सब अपनी मनोकामना पूर्ण कराने आए हैं। तकरीबन आधे घंटे बिताने के बाद अब लगा वक़्त रहते निकल लेना चाहिए। वरना मनाली को जाने वाली बस भी छूट सकती है।

मंदिर से बाहर आ गया। ठीक सामने दुकान से टोकन दिखा कर जूते और बैग वापस ले लिया। जूते पहनने के बाद निकल पड़ा आईएसबीटी बस अड्डे जहाँ से दिन में दो बजे मनाली के लिए बस है।

मनसा देवी से वापसी

मनसा देवी बस अड्डे के बाहर ही एक के बाद बसें खड़ी हैं। पूछने पर पता चला इनमें से कोई भी आईएसबीटी के लिए नहीं रवाना हो रही है।

कुछ एक मिनट में बस आई। आगे पीछे करके सामने आ खड़ी हुई। सवारियां खाली बस में आराम से बैठने लगीं।

अपनी रफ्तार पकड़ेने से पहले सवारियां भरने में जुट गई। मनसा देवी से निकलीं कुछ एक सवारियां भरने के बाद बस निकल पड़ी अपनी मंज़िल की ओर।

यहाँ से बस अड्डे पहुंचने में एक घंटा तो लगेगा ही। लेकिन जिस रफ्तार से बस आगे बढ़ रही है उसको मद्देनजर रखते हुए लग नहीं रहा मनाली के लिए बस पकड़ पाऊंगा।

दो बजे की बस को पकड़ने के लिए आधे घंटे पहले पहुंचना बेहद जरूरी है। लेकिन कुछ यात्रियों के साथ कारवां रेलवे क्रॉसिंग पर आ कर थम गया।

इसकी उम्मीद तो बिल्कुल नहीं थी। की क्रॉसिंग बंद मिलेगी। लगभग आधे घंटे बंद क्रॉसिंग के बाद सनसनाते हुए ट्रेन गुजरी।

इधर क्रॉसिंग से छुटकारा मिला तो गाड़ी आ अटकी जाम में। ये फिलहाल चंडीगढ़ में है। ना बंद क्रॉसिंग की उम्मीद थी ना जाम की।

जल्दी पहुंचने के असार नज़र नहीं आ रहे हैं। इसी बीच मेरे पास मनाली जाने वाली बस के ड्राइवर का फोन आता है। जिसमें वो मेरे बस तक आने का समय पूछने लगा।

इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की बस कुछ ही देर में स्टैंड से निकलने वाली है और मैं अभी तक रास्ते में ही अटका हूँ।

मनाली की बस छूटने से बची

ड्राइवर साहब ने रफ्तार पकड़ी और तेज़ी के साथ आईएसबीटी घसीट लाए।

नज़ारा कुछ ऐसा है कि इधर बस पहुंची ही है और मैं कूदते फांदते बस से उतरकर सीधे 17 नंबर पर आ खड़ा हुआ। जहाँ से मनाली जाने वाली बस खड़ी मिलेगी।

उधर अजय को अमानती घर भेज दिया बैग लेने को। 17 नंबर पर खड़ी बस में चढ़ा तो पाया पूरी बस भरी है। और वो सीट भी जो मैंने बुक कराई है।

अपनी बुक कराई हुई सीट पर बैठने को पहुंचा तो देखा वहाँ एक जोड़ा पहले से ही पैर जमाए बैठा हुआ है।

है मेरे कुछ समझ ना आया। ऐसा हुआ कैसे। मैंने उनसे सीट से हटने की दरख्वास्त की। पर उनके मुताबिक ये सीट उन्होंने बुक कराई है।

मैं घनचक्कर होने लगा हूँ। एक ही बस में एक ही सीट दो लोगों के लिए कैसे बुक हो सकती है। मैंने निश्चित करने के लिए एक दफा फिर पूछा कि क्या ये बस मनाली जाएगी।

भाईसाहब ने सिर हिला कर जवाब में हामी भारी। तभी अजय का कॉल आता है और बताया की मैं धोखे से गलत बस में चला गया हूँ।

जो सही बस है वो 25 नंबर से निकलने वाली है। इस जल्दबाजी में मैं दूसरी बस में चढ़ जाऊंगा ये मैंने ना सोचा था।

फाटक से बस से उतर कर मनाली को निकल रही बस में चढ़ गया। बेशक इस बार मेरी सीट खाली है। ये बस तो लगभग छूट ही गई थी। वो तो शुक्र है समय रहते मिल गई।

फिर भी कुछ मिनट की देरी से आखिरकार बस चंडीगढ़ आईएसबीटी बस अड्डे से निकल पड़ी। रूकी भी सिर्फ दो यात्रियों लेे लिए ही थी।

मनाली को रवानगी

पक्की रोड पर जबतक रही बस तब तक लगा सफर अच्छा गुजरेगा। लेकिन जैसे ही बस हाईवे पर अाई जहाँ सड़क की ऐसी खस्ता हालत और निर्माण कार्य प्रगति पार होने के कारण बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा।

यकीन हो गया है कि ये सफर बहुत है कठिन मगर उदास ना होना है। मिनटों में बस के अंदर धूल भर गई। इतनी की सारे शीशे बंद करने पड़े।

भरी मात्रा में ट्रक दिखाई पड़े चंडीगढ़ से मनाली के रास्ते।

मैं अपनी सीट पर बैठे खिड़किंस बाहर के नज़ारे का आनंद ले रहा हूँ। पर धूप भी इतनी तेज़ है को सीधे मूह पर पड़ रही है। मुझे पर्दे गिरने पड़े। लेकिन फिर भी पर्दे और खिड़की की आढ से बाहर का नज़ारा मिलता रहा।

तभी किसी ने कंधे पर हांथ मारा। मुड़ कर देखा तो एक आंटी जी आगे की सीट पर आने की दरख्वास्त करने लगीं। बदले में मैं पीछे आ जाऊं ऐसा उनका कहना था।

सफर के दरमियान अक्सर ऐसी चुनौतियों का समना करना पड़ता है। कभी कभी तो मजबूरन हामी भरनी पड़ती है कभी मना भी किया जा सकता है। मुझे भी मजबूरन पीछे आना पड़ा।

पहला ठहराव रेस्त्रां

एक ढेढ़ घंटे का सफर तय करने के बाद हाईवे पर ही बस एक रेस्तरां के पास आ कर रूकी।

बस में कुछ कॉलेज के छात्र भी हैं। वो अपने अल्लहड़बजी में मशगूल हैं। कुछ एक कैमरा ले जगह जगह फोटो खींचने में जुटे हैं।

और रास्ता भी जाम कर दिए हैं सो अलग। इन्हे देखे मुझे अपने कॉलेज के दिन याद आ गए जब मैं आगरा टूर पर गया था। कॉलेज की मौज मस्ती की बराबरी कोई और नहीं कर सकता।

रेस्तरां में बच्चे अचानक घुस कर पूरा रेस्तरां घेर लिए। जब थोड़ा खाली हुआ तब मुझे आने का अवसर मिला। जैसे इसी पल का इंतजार था मुझे।

आर्डर में देरी

फिर भी आलू पराठा ऑर्डर किया। ऑर्डर लेने वालों को ठीक से सुनाई नहीं पड़ा जाने क्या। उसने दोबारा तीबारा ऑर्डर पूछा। उसे तब भी कुछ ना सुनाई पड़ा।

जाने क्या है कान में इसके? मैं तो यही सोचने लगा। ऑर्डर तब जा कर लिखा गया जब एक दूसरे सज्जन आए।

एक लड़का मेज़ साफ करने आया। सिर उठा के देखा तो ये वही गोलमाल वाला निकला। जिसे अभी तक ऑर्डर ना लिखा जा रहा था। जग भर के निकल लिया अपने रास्ते।

इधर पराठे का इंतजार करता रह गया मैं लेकिन पराठे ना आए। दोबारा टोकना पड़ा मुझे। शायद खुन्नस की वजह से देर से परोस रहा हो। क्या पता इस दुनिया का किस बात को लेके बैठ जाए।

इधर गरमा गरम पराठे आखिरकार मेज़ पर परोस कर आ ही गए। पर आलू के इस पराठे में तो आलू मानो है ही नहीं। मुझे ढूंढ़ना पड़ा। पूरा पराठा खोल डाला पर आलू ना मिला।

खाना शुरू ही किया था किस बस की पीपडी बजने लगी। मतलब साफ है। बहुत देर बैठ लिए अब चलो मनाली। ठीक से सोचा तो याद आया सुबह से चाय के सिवाय कुछ गया ही नहीं पेट में।

बेचारा पेट। पेट का खयाल करते हुए मैंने पराठे लपेट कर बस की तरफ भागा। आलम ये होगया कि मुझे बाकी का खाना पार्सल करवाना पड़ा।

इधर दौड़ भाग में याद आया पेमेंट किया या नहीं। बुद्धि पर ज़ोर डाला तो याद आया सबसे पहले तो पेमेंट ही किया था।

ये भागते हुए बस पकड़ना अब मानो जीवन का हिस्सा बन गया हो। इसमें भी एक अलग ही मज़ा है। बस रफ्तार पकड़ती की इससे पहले मैं अपनी जगह पर विराजमान हो गया।

रस्ते भर हरियाली ही हरियाली नज़र आयी

शाम के चार बज चुके है। पहाड़ी इलाका भी चालू हो गया है। इतना भव्य, इतना सुन्दर, कमाल का दृश्य है ये।

बस में कॉलेज के छात्र कभी अंताक्षरी खेलते नजर आते कभी थक कर सो जाते। कभी नाचने गाने लगते।

बस का टायर पंचर

बस अपने होश में चल रही है कि झटका लगा और जोरदार आवाज़ आई। क्या हुआ? सोते हुए आदमी जाग गए। मानो बम फट हो।

ड्राइवर और कंडक्टर नीचे उतरे। पता चला मनाली के रास्ते पहाड़ों में बस का अगला टायर पंचर हो गया। बस जहाँ की तहाँ खड़ी हो गई।

हद तो तब हो गई जब मालूम पडा की बस की डिक्की में रखा हुआ अतिरिक्त टायर भी पंचर है। कमाल करते हैं ड्राइवर साहब भी। बिना तैयारी के है निकल लिए।

अगर टायर सही सलामत होता तो भी क्या बात थी। हांथों हांथ काम निपट जाता। पर यहाँ तो नेहले पे दहला हो गया। जिससे परेशानियों का सबब और बढ़ गया है।

इसी बीच बस से सारी सवारियां एक एक कर उतर गई। इनमे से कॉलेज छात्र ज्यादा हैं। कुछ अपने बैग से कैमरा निकाल फोटोग्राफी करने लगे बाकी सब मटरगस्ती में जुट गए।

धीरे धीरे कर पूरी बस खाली हो गई। उधर ड्राइवर और कंडक्टर फोन करके टायर मंगाने लगे। अब कहाँ से ये तो वो ही जाने।

मैंने बैग से अपना कैमरा निकला और चल पड़ा कुछ तस्वीरें कैद करने। आस पास खड़े लोगों की, सीना ताने खड़े पहाड़ों की। कभी पेड़ की, कभी दूर दिख रहे जलते धुएं की।

कमी है तो किसी नदी या झरने की। वरना इस खिलखिलाती धूप में सब मौजूद है। कैमरा ज़ूम करके देखा तो पहाड़ के एक हिस्से में कुछ जलता हुआ दिखा।

अगर पहाड़ों में भी धुएं का गुब्बार दिखने लगेगा तो कहाँ जाएगा मानव। इधर समझ नहीं आ रहा पंचर टायर बनने या बदलने ने कितना वक़्त लगेगा।

सब कुछ छोड़ बस की तरफ आ गया। कंडक्टर से पूछा तो पता चला इसमें आधा घंटा अभी और लगेगा।

चंडीगढ़ से मनाली के रास्ते ख़राब हुई बस

पानी का चक्कर

प्यास की वजह से गला सूखा जा रहा है। बोतल में भी पानी की एक बूंद नहीं है। मैं कंडक्टर को बोल पानी लेने निकल गया।

समय को देखते हुए बस के अगले हिस्से के सामने वाली रोड पर मैं सैर सपाटे पर निकल गया। ताकि मैं और बस एक दूसरे की नजर में बने रहें।

फोटो खींचते हुए चलते चलते इतना दूर निकल आया जहाँ से बस भी ओझल होने लगी।

यहाँ मुझे एक कोने पर बेहद ही छोटी बाज़ार नजर आईं दो चार दुकानों की बाज़ार। जहाँ पानी या कोल्ड ड्रिंक खरीदी जा सकती है। बिना देरी किए दुकान से पानी की बोतलें ले कर वापस चल दिया बस की ओर।

पहले तो मैं उल्टे हांथ पर चल रहा हूँ। जब भी सीधे रस्ते आने का प्रयास करता कोई ना कोई गाड़ी आ जाती सामने से हॉर्न बजते हुए।

बस तक पहुंच तो गया लेकिन कंडक्टर महाशय अभी भी टायर कसने में लगे हुए हैं। बस के पास पहुंचते ही सबसे पहले मैंने अपना बैग चेक किया। है भी या लेके भाग गया कोई।

वैसे भी इतने भारी भरकम किलो किलो भर वजनी बैग उठाने की जुर्रत ना करेगा कोई।

चल पड़ी बस

कुछ ही देर में पंचर बन गया और कंडक्टर बाबू ने सबको बस में बैठने का आदेश दे डाला। एक एक कर सभी सवारियां बस में बैठने लगीं। वो कॉलेज छात्र भी को उधम काट रहे थे। अब थके नजर आ रहे हैं।

बस चालू हुई और हौले हौले चल पड़ी। शुक्र है कारवां आगे तो बढ़ा। लेकिन इस कारवां में सब अब थके नजर आ रहे हैं।

ड्राइवर साहब ने सबकी नींद हराम करते हुए गानों की बरसात कर दी। गमगीन दुख भरे प्रताड़ित गाने। सुना सुना कर सबको जगा दिया।

हल्का हल्का अंधेरा होने लगा है। पहाड़ी के पीछे सूरज डूबने लगा है। और देखते ही देखते ओझल भी हो गया। इधर बस का गाना बजाना भी धीमा पड़ गया है। काफी अंधेरा हो चला है।

अनजान बस अड्डा

शाम के आठ बजे बस एक अड्डे पर आ रूकी। अबतक बस में अधमरी छा चुकी है। अंधेरे में कुछ ठीक से दिखाई ही नहीं दे रहा। बस से नीचे उतरा तो देखा और भी लग्जरी बसें खड़ी हैं।

हसीन पहाडियों के दर्शन।

भूख के कारण अब तो पेट में चूहे भी दौड़ने लगे हैं। पर यहाँ तो और भी ज्यादा सन्नाटा छाया हुआ है। अंधेरे में जगह भी नहीं पता चल रही कौन सी है।

पहले तो जम कर टंकी खाली की। अब जाके कहीं दिमाग की बत्ती जली। कोने पे कहीं एक दुकान नजर आई। पहुंचा तो देखा खाने पीने के नाम पे भी ज्यादा कुछ नहीं है।

सिर्फ कुछ पैकेट बिस्कुट और कुछ तले भुने समोसे। दुकान में बिस्कुट की संख्या देख मैंने कुछ एक पैकेट खरीद लिए।

समोसे ना लेकर उसके बदले गरमा गरम जलेबी लेली। जिसके कुछ चांद पीस ही थे। जलेबी तो धाकड़ हैं। खा कर मज़ा आ गया।

खाने की दिली ख्वाहिश तो और है लेकिन चंद ही बची थीं। सो समोसे खरीद कर गुज़रा करना पड़ा।

घुमक्कड़ी में सब जायज है। जैसे वो कहते हैं ना इश्क़ और जंग में सब जायज है! इधर बस ड्राइवर अपनी पीपडी बजने लगे। इनसे देखा ही नहीं जाता मुझे खाते हुए।

बाकी सवारियां जिनमे कॉलेज छात्राएं ज्यादा हैं। जो अभी तक मजे से समोसे खा रही थीं। भागी तेज़ी से बस की ओर। मैं फिर से सबसे आखिरी में बचा। दिन की तरह फिर से समोसे पैक कराने पड़े।

अँधेरी रात में निकल पड़ी

भागते हुए बस में चढ़ा। इस बार ड्राइवर ने बस आगे बढ़ा दी है।

ना जाने क्या इरादा है। यहीं छोड़ लेे निकल जाने का या डराने का। कुछ और कदम ही सही आखिरकार बस में चढ़ गया।

इस थकान भरी रात में कुछ बदलाव से मन चेहेक गया है। समोसे बिस्कुट जलेबी ही सही पेट में कुछ तो गया। ये भी नहीं मालूम मनाली कब तक पहुंचेगी।

कंडक्टर से जवाब मांगा तो भाईसाहब बोले रात के एक भी बज सकते हैं। इतनी रात! मतलब पूरे 11 घंटे का सफर। इससे ज्यादा भी हो सकता है इसका मुझे अंदेशा है।

अंधेरी रात में कुछ नजर भले ही ना आ रहा हो मगर इतना अंदाज़ा लग गया कि पहाड़ों में कैसे घूमते हुए बस जा रही है।

जब सामने से कोई गाड़ी आती दिखती तब बगल की खाई का अंदाज़ा लगता। आवाज़ भी सुनी जा सकती है।

अंतिम ढाबा

दो घंटे के इस सफर में बस आखिरकार एक ढाबे पर आ कर रूकी। मतलब साफ है ड्राइवर साहब भूखे हैं।

ये उसी जगह बस लगाते हैं जिस ढाबे या दुकान से अच्छा कमिशन मिल रहा हो। ये तो जग जाहिर है। पिछली बार जब परिवार के साथ आया था तब भी ये ही हुआ था।

इन सब झंझटों को देख कर लगता है खुद की गाड़ी से घूमो तो ज्यादा बेहतर। खैर ड्राइवर कंडक्टर और बाकी सभी बस की सवारियां भुखड्ड की तरह ढाबे पर धावा बोल दिया।

पूरा ढाबा भर गया। बस में मेरे और एक बूढ़ी काकी के सिवाय कोई ना था। बाकी जो नीचे उतरे हैं उनके लिए ढाबे में बैठने की जगह कम पड़ गई।

पता नहीं क्यों पर भूंख रही ही नहीं। शायद समोसे ने अपना जलवा बिखेर दिया। या फिर मुझे का मन ही नहीं रहा। फिर भी बस से उतरकर पानी भरा। मन ना मना तो फिर से चिप्स और बिस्कुट लेे लिए।

इतने में ड्राइवर साहब बस में चढ़ कर हॉर्न बजाने लगे। उधर सवारियां भी इधर उधर से इक्कठा हो कर बस में आ गईं। सब बारी बरी से चढ़ने लगीं।

मैंने अपनी सीट पर पानी की भरी बोतल रख दी। ताकि कोई गलती से भी ना बैठ जाए। ये इस तरह से हम भारतीयों का सीट पर दावेदारी करने का अंदाज़ है।

जो सदियों से जगजाहिर है। कतार ख़तम हुई और मैं अपनी सीट पर। बैठ कर सुस्ताने लगा। कब झपकी लग गई पता ही ना चला।

आधी रात में मनाली

रात के ढाई बजे आंख खुली तो देखा कंडक्टर साहब मनाली आने का दावा ठोक रहे हैं।

अपना बड़ा बैग उठाया। उसमे सारा समान भरा और बस से बाहर उतारने लगा। जैसे ही मैंने धरती पर कदम रखा वो ज़ोर की ठंड लगी जिसका कोई हिसाब नहीं।

अभी बारह घंटे पहले कहाँ धूप धूल में था और अब एकदम ठंड। इस ठंड से बचने के लिए मुझसे बैग से जैकेट निकालनी पड़ी अपने आप को ठंड से बचाने के लिए।

डरावना सफर

माहौल कम डरावना नहीं है जो ये कुत्ते भौकते जा रहे हैं। उधर काउच्सरफिंग पर नरेंद्र भाई से लगातार संपर्क में हूँ। की उन तक पहुंचा कैसे जाए।

इधर वॉट्सएप में उन्होंने मुझे अपना पता भेजा। गूगल नक्शे की सहायता से मैं दिए गए पते पर चलने लगा। कुत्तों मुझे घूरते तो भी बात अलग है।

लेकिन ये तीन चार गुट बना कर आपस में ही टूट पड़े। कोई किसी का जबड़ा नोचने पर तुला है तो कोई मूह। ये भयानक माहौल मुझसे देखा ना गया।

और कुत्तों के इस जमावड़े को दूर भगाने के लिए बैग के साइड से बेल्ट निकाल सड़क पर पटका ही है कि सारी फौज नदारद हो गई।

मानो कुत्तों की बस्ती में धारा 144 लग गई हो। सब अपनी अपनी बस्ती में। अब माहौल में शांति स्थापित हुई है। जो दंगे अभी तक भड़क रहे थे उसके बाद रास्ते से गुजरने में माहौल ठीक लग रहा है।

गूगल नक्शे के हिसाब से अभी तक सही चल रहा हूँ। किनारे किनारे नदी के बहने की भी आवाज़ आ रही है।

घनघोर अंधेरे में चांद और मोबाइल की रोशनी में आहिस्ता आहिस्ता आगे बढ़ रहा हूँ। गूगल नक्शे पर पूरा भरोसा करते हुए।

इधर नरेंद्र भाई ने फोन करके हाल जाना और उनके बताए हुए रास्ते पर अभी तक तो ठीक ही चल रहा हूँ।

गूगल नक्शे के हिसाब से सही चला रहा था। मगर अब जब दाहिनी तरफ मुड़ना था तो आगे निकल गया। ये वहाँ से गुजर एक राहगीर से मालूम पड़ा नरेंद्र भाई के होटल का पता।

रात के समय ठंड इतनी है जिसे बर्दास्त नहीं किया जा सकता। जैसे बाईं तरफ मुड़ा तो बहती नदी के ऊपर बने पुल पर आ खड़ा हुआ।

जिसे पार करने लगा। आधा किमी चलने के बाद दाहिने तरफ दीवार से सटे एक सज्जन हांथ लहराते दिखे। ये कोई और नहीं बल्कि नरेंद्र भाई ही हैं।

जिनसे बराबर फोन पर संपर्क में रहा। कुछ इस प्रकार रात के तीन बजे उन्होंने मेरा स्वागत किया। और मुझे अपने होटल में कमरा दिखाया।

चंडीगढ़ -मनाली हाईवे।

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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