चामुंडी पहाड़ी पर महिषासुर वध

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चर्चा

कल देर रात तक जागने के कारण नींद भी उसी प्रकार खुली। प्रशांत के अनुसंधान संस्थान में देर रात तक चहलकदमी होती रही। जिससे कुछ मैसूरु और कुछ संस्थान के बारे में भी जाना।

मैसूरु में देर से आने के कारण ना महल के भीतर जा सका। ना कहीं और। इसलिए आज की यही योजना है की महल के संग्रहालय में जाने के बाद दिन की ट्रेन से बैंगलोर निकल जाऊं। मैसूरु को अब तक जानता था टीपू सुल्तान के नाम से जिन्होंने अंग्रेजों की नाक में दम मचा दिया था।

यहाँ महल के अलावा चामुंडी पहाड़ी भी है जहाँ माना हुआ मंदिर है जिसे 51 शक्तिपीठ में से एक माना गया है।  यहां माता के बाल गिरे थे। ये मंदिर चामुंडेश्वरी देवी को समर्पित है जिन्हे दुर्गा का रूप माना जाता है। इस पहाड़ी पर माता द्वारा महिषासुर का वध किया गया था।

प्रशांत के छोटे से क्वार्टर में अपनी चटाई बिछाकर सो गया था और प्रशांत अपने तख्त पर। कल आगमन के वक्त प्रशांत के अनुसंधान के मित्रों से मुलाकात हुई।

अब तक कुल तीन प्रशांत नाम के व्यक्ति के घर पर रुक चुका हूँ। पहले गुवाहाटी में दूसरे भूभनेश्वर में तीसरे यहाँ मैसूरु में।

आंगन में ही स्नान ध्यान की व्यवस्था है। इधर आंगन में भी प्रवेश करने का द्वार है। जो बंद पड़ा है। खोलने पर बाहर सिर्फ झाड़ियां ही झाड़ियां नजर आ रही हैं।

प्रशांत ने बताया की वो और उनके मित्र पर्यावरण से जुड़े कार्यों में काफी रुचि रखते हैं। इसलिए इन झाड़ियों को हटा कर यहाँ हरियाली करेंगे।

मौसम कुछ सर्द है इसलिए भी प्रशांत ने नहाने के लिए गरम पानी कर दिया है। बारी बारी से स्नान कर तैयार हो गया। इधर गैस पर सुबह की चाय उफान मार रही है।

चाय पर चर्चा के दौरान प्रशांत के मित्र स्टंप बल्ला ले कर आ खड़े हुए। जो आज छुट्टी के दिन क्रिकेट का मैच खेलने जा रहे हैं। प्रशांत को भी खेलने का न्योता मिल रहा है।

आठ बजने से पहले ही निकल पड़ा। संस्थान से सीधे महल के लिए। ऑटो के बजाए लिफ्ट के माध्यम से। भोर का समय है इसलिए ज्यादा जनता भी नजर नहीं आ रही। शायद आज शनिवार भी है इसलिए भी।

महल या चामुंडी

महल पहुंचने पर मालूम पड़ा की महल के खुलने का समय नौ बजे का है। फिलहाल घड़ी में बज रहे हैं साढ़े आठ।

इधर साथी घुमक्कड़ महल के संग्रहालय में जाने का इच्छुक कम ही नजर आ रहा है। इसलिए वो अकेले ही चामुंडी देवी मंदिर के लिए पहाड़ी पर बस के माध्यम से जा रहा है।

साथी के निकलते ही मैं यहाँ काउंटर के सामने इंतजार करने लगा कब टिकट काउंटर खुले और कब मैं टिकट ले कर भीतर प्रवेश करूं। उधर जैसे जैसे घड़ी में नौ बजने को आ रहा है पर्यटकों की संख्या भी लगातार बढ़ रही है।

समझदार पर्यटक समय बचाने के लिए कतार भी बना कर खड़े हो रहे हैं। अब मै भी सोच रहा हूँ की चामुंडी देवी मंदिर ही निकल जाऊं। संग्रहालय तो हैदराबाद में भी देखा था। जहाँ मुझे तीन घंटे लगे थे।

महल का दीदार तो कल बाहर से हो ही गया है। हालांकि महल देखने की प्रबल इच्छा है और चामुंडी पहाड़ी जाने की भी। पर महल देखने के बाद इतना समय नहीं रहेगा की मैं चामुंडी जा सकूं।

सरकार की मेहरबानी से शुक्रवार की छुट्टी के दिन चमचमाता हुआ महल भी देख लिया। अपने निर्णय से साथी घुमक्कड़ को अवगत करा कर बस अड्डे की ओर बढ़ा।

फोन पर मालूम पड़ा वो तो निकल चुका है बस से। मैं भी अगली बस पकड़ कर निकल पड़ा चामुंडी पहाड़ी।

जो यहाँ से ज्यादा दूर तो नहीं है। कुछ आधे घंटे के भीतर ही आ पहुंचा। पहाड़ी पर भी बस अड्डा है निजी और सरकारी दोनो बसों का।

चामुंडी पर्वत पर महिषासुर की मूर्ती

चामुंडी पर्वत

पहाड़ी पर पहुंचने के बाद यहाँ वापस से साथी घुमक्कड़ से मुलाकात हुई। सुबह से सिर्फ पेट में चाय ही गई है इसलिए भूख जोरों की लगी है। आगे बढ़ने से पहले बेहतर है कुछ खा लिया जाए इससे पहले की कमजोरी पकड़ ले शरीर को।

यहाँ दुकानें और ढाबे बहुत है। अपनी दुकान के बाहर तक पैर पसार रखे हैं। इन्हीं में से एक दुकान में इडली खाने निकल आया। काफी वक्त हो चला है इडली खाए हुए भी।

आखिरी बार कोयंबटूर में खाया था। जब नमन एक विशेष इडली की दुकान में छोड़ गया था जहाँ भट्टी में हंथेली बराबर इडली बनकर तैयार होती है।

खाने के बाद कुछ ऊर्जा का एहसास हो रहा है। यहाँ चामुण्डेश्वरी देवी मंदिर भी है। जहाँ जाने के लिए ही भीड़ एकत्रित है। अन्यथा चामुंडी भला कौन ही आएगा?

पौराणिक कथा के अनुसार महिषासुर नामक राक्षस को ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त था की उसकी मृत्यु किसी स्त्री द्वारा ही होगी। वरदान मिलते ही उसने देवताओं और ऋषि मुनियों पर अत्याचार प्रारंभ कर दिए। छुटकारा पाने के लिए मां भगवती की आराधना की। जिसके बाद मां ने महिषासुर का वध करने का आश्वाशन दिया। इन्हीं पहाड़ियों ने भयंकर युद्ध हुआ था।

मंदिर के बाहर बने घेराव से मैसूरु का बेहतरीन नजारा देखने को मिल रहा है। मंदिर में प्रवेश ना करते हुए आसपास की पहाड़ियां घूमने लगा। अगर कतार में लग गया तो जाने कब दर्शन होंगे। शायद दिन की ट्रेन भी छूट जाए।

ग्यारह बज रहे हैं। साथी घुमक्कड़ ने बताया की यहाँ कहीं आसपास नंदी प्रतिमा है जो काफी ऊंची है। जिसे देखने के लिए निकल पड़ा।

नंदी प्रतिमा देखने के बाद निकल पडूंगा वापस मैसूरु। ग्यारह से साढ़े ग्यारह हो चला है और अभी मैं यहीं टहल रहा हूँ शैतान की मूर्ति के पास।

शैतान के साथ तस्वीर लेने के लिए शैतानों में होड़ मची हुई है। मैने भी अपने भीतर के शैतान को जगा कर शैतान के साथ तस्वीर ली। शैतान का नाम जो पट्टी पर दर्शा रहा है वो है महिषासुर।

नंदी बाबा की प्रतिमा देखने के लिए पहाड़ी से कुछ नीचे की ओर जाना होगा। अपने दुपहिया वाहन से जा रहे काली बुशर्ट में भाईसाहब से कुछ आगे तक छोड़ने का निवेदन किया।

जिस पर उन्होंने मुझे बैठा लिया। कुछ आगे आने के बाद वाहन का आगे जाना संभव नहीं दिख रहा है। ये महाशय अपना नाम नितिन बता रहे हैं जो बैंगलोर के निवासी हैं।

नंदी बाबा की स्थापित मूर्ति

सधगुरू स्थल

ये भाईसाहब यहाँ सधगुरू का वो स्थल देखने आए हैं जहाँ पर सधगुरू ने सिद्धि हासिल की थी। इन्हीं के बहाने मैं भी वो स्थल देख लूंगा। सीढी दर सीढ़ी उतरते हुए आगे बढ़ रहा हूँ। कुछ मांगने वाले बैठे हैं कुछ बांटने वाले।

रास्ता से निकल आने के बाद यहाँ एक मंदिर पाया। नई निर्माण हो रही नंदी बाबा की प्रतिमा भी दिख गई। भगवान और नंदी बाबा के दर्शन के बाद आसपास काम कर रहे लोगों से सधगुरू के स्थल के बारे में पूछा पर संतुष्टि भरा कोई उत्तर ना मिल रहा है।

सधगुरू के उस स्थल की खोज में हम तीनो निकल पड़े गूगल नक्शे की सहायता से। यहाँ से अब जंगल प्रारंभ हो रहा है। बाबा की प्रतिमा से आगे निकलते हुए पहाड़ी चढ़ने लगा।

जंगल जंगल होते हुए दुर्गम मार्ग के मध्य से होते हुए जंगल के भीतर प्रवेश करने लगा। यहाँ कांटेदार पेड़ के बीच में आगे निकलना भी मुश्किल हो रहा है।

चट्टानों पर कूदते फांदते हुए आगे बढ़ने पर एक चट्टान पर आ गया। यहाँ कुछ फूल रखे हुए हैं और अगरबत्ती जल रही है। पर गूगल नक्शे के अनुसार ये वो जगह नहीं है।

कुछ देर यहीं पर आसपास खोजने के बाद भी स्थल ना मिल रहा है। स्थल की खोज में यहाँ के दुर्गम मार्ग से निकलते हुए पहाड़ी पर चढ़ाई करना प्रारंभ कर दिया।

करीब सौ मीटर चढ़ने के बाद भी कुछ हाथ ना लगा। पर यहाँ सांप की भांति लिपटे प्रेमी युगल जरूर दिखाई पड़ रहा है।

काफी देर स्थल ना मिलने के बाद कुछ देर के लिए यहीं सिर खुज़ाते हुए हम बैठ गए। टूटी सड़क पर गुजरते हुए उसी दिशा में चल पड़ा इसी आस में शायद यहीं कहीं आगे मिल जाएगा स्थल।

पहाड़ी से मैसुरु का दृश्य

सड़क मार्ग पर आगे निकल आया। बाहर निकलते हुए पहाड़ी का अंत है जिसके ऊपर से पूरा मैसूरु देख पा रहा हूँ। यहाँ से मैसूरु को देखने के लिए बकायदा गलियारा भी बनाया गया है।

भरपूर समय दे रहा हूँ। घोड़ों की दौड़ के लिए बना मैदान भी दिख रहा है मैसूरु का महल भी। हरियाली ज्यादा है बजाय इमारतों के जो मैसूरु की सेहत की लिए सर्वश्रेष्ठ है।

मैसूरु के इस रूप के साथ तस्वीरबाजी होने लगी। कभी गलियारे में कभी बाहर। यहाँ बैठने के लिए छांव भी नहीं है और ना ही कुर्सी। धूप में पर्याप्त समय बिताने के बाद वापस अपनी खोज पर निकल पड़ा।

आखिरकार ढूंढते हुए नक्शे के अनुसार उस जगह पर आ पहुंचा जहाँ जो दर्शा रही है। सफलता हाथ लगी जब कूदते फांदते वो पवित्र स्थल मिल गया।

ध्यान दिया की ये तो वही स्थल है जहाँ से कुछ देर पहले ही दूसरी ओर से चढ़ आया था। हालांकि दोनों ही ओर से चढ़ाई सरल नहीं है।

नितिन जी तो यहीं बैठ कर ध्यान केंद्रित करने लगे। उनका उद्देश्य भी यही था। सधगुरु के स्थल पर ध्यान में डूब जाना।

नितिन ने बताया की सधगुरु इसी स्थान पर तपस्या करते थे। किसी दिन वो तपस्या में इस कदर को गए की वो भूल गए वो हैं कहाँ। लंबे समय तप के बावजूद उनको लगा की यह क्षण भर की बात हो।

उस दिन के बाद फिर सधगुरु ने बहुत कोशिश की पुनः उस सिद्धि को हासिल करने की पर कभी प्राप्त ना हुई।

सधगुरु स्थल
मैसुरु से बंगलुरु तक का कुल सफर 192किमी

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