बद्रीनाथ, उत्तराखंड, चारधाम, चारधाम यात्रा, धार्मिक स्थल, स्टोरीज ऑफ इंडिया
comment 1

चार धाम में से एक बद्रीनाथ

मंदिर जाने की तैयारी

कल दिनभर की थकान रातभर इस होटल में सो कर गुजारी। हंसमुख और गजेन्द्र भाई का साथ है इसलिए होटल ले लिया। ना होता तो शायद किसी आश्रम में ठहरता।

ऐसे धामों में आश्रम में रुकने का मज़ा ही अलग होता है। ये ज्ञात है कि मंदिर में जितनी जल्दी पहुंच जाऊंगा उतनी जल्दी दर्शन हो जाएंगे।

और ये बात इन तीनों को भी बतला दी थी कल रात। वैसे तो मेरी योजना तंबू गाड़ने की थी पर सुविधानुसार कमरा लेना ज्यादा बेहतर रहा।

कमरे का दरवाजा खोला तो ठीक सामने बद्रीनाथ मंदिर। इससे बढ़िया जगह और क्या ही हो सकती है पूरे बद्रीनाथ में। कमरे में वापस से आकर कैमरे के सेल, गोप्रो, फोन, पॉवर बैंक वगैरह चार्ज करने के लिए लगा दिए।

इतने में कमरे के अंदर सब ही लोग फटाफट तैयार होने लगे। बारी बारी से नित्य क्रिया हुई। स्नान की बारी आई तो गजेन्द्र भाई ने बताया की बद्रीनाथ धाम के दर्शन के पहले नारद कुंड में स्नान करना जरूरी होता है।

सो यहाँ होटल में नहाने से बेहतर है वहीं स्नान किया जाए। सो कपड़े लत्ते ले कर गजेन्द्र भाई और हंसमुख भाई स्नान करने को निकल जाना बेहतर समझा।

उनके आने के बाद हम जाएंगे स्नान करने। इसी योजना पर सहमति बनी और वो दोनों अपना समान समेट कर स्नान के कपड़े ले कर फ़ौरन निकल पड़े।

जब तक वो वापस आएं तब तक मुझे सारे काम से निपटारा पा लेना चाहिए। उनको पहले इसलिए भी भेज दिया क्यूंकि मेरे साथी खिलाड़ी थोड़ा समय लेते हैं दुसलखाने में।

खैर उनके आने तक जितना मोबाइल, पॉवर बैंक, सेल जितना ज्यादा चार्ज हो जाए उतना बेहतरी से दिन बीतेगा। अच्छा ये रहा की गजेन्द्र भाई और हंसमुख भाई सुबह जल्दी उठ कर फटाफट सारा काम निपटा लिए।

आज मेरी नींद और दिन के मुकाबले देर से खुली। लेकिन अभी सुबह के साढ़े सात बज रहे हैं। वैसे इतने समय तक मंदिर के बाहर की कतार में लग जाना चाहिए था।

कुल्ला मंजन करने के लिए कल रात ही होटल के मलिक ने गरम पानी देने का वायदा किया था। कमरे से बाहर निकल कर होटल के लड़को से पानी लाने को कहा। उनमें से एक भागते हुए कमरे में एक बाल्टी गरम पानी रख भी गया।

ये बेहतर था। झटपट वाली सर्विस से हम प्रभावित हुए। दैनिक दिनचर्या निपटने के बाद अब मेरी बारी है नारद कुंड में जा कर स्नान करने की।

इससे पहले वो दोनो जने आ जाएं मैं अपने नहाने के वस्त्र निकाल कर अलग रख लूं वो ज्यादा बेहतर रहेगा। कपड़े निकाल ही रहा था कि आधे घंटे के भीतर गजेन्द्र और हंसमुख आ धमके।

नारद कुण्ड

मैं और अजय फटाफट अपने अपने कपड़े लेके फ़ौरन निकल पड़े कुंड की ओर। जितना जल्दी बद्रीनाथ के दर्शन हो जाएंगे उतना ज्यादा समय मैं माना गांव को दे पाऊंगा।

होटल की सीढ़ियों से उतरते हुए मुख्य सड़क पर आ गया। सुबह सवेरे हलचल तो है ही साथ में दुकानें भी खुली हुई हैं। दुकानें प्रसाद, धार्मिक वस्त्रों की और माले, फूल की भी।

चप्पल ही बची हुई हैं केदारनाथ के बाद सो चप्पल पहन कर ही निकल आया हूँ। सामने बने अलकनंदा नदी के ऊपर बने इस पुराने पुल को पार करने के बाद ही बद्रीनाथ धाम भी है और कुंड भी।

अलकनंदा नदी का बहाव बहुत तेज़ है। इतना तेज़ की इसके पास जाने में भी आदमी कांप जाए। मुझे तो इस पुल के ऊपर गजरने से भी जी कतरा रहा है।

क्या पता कब कौन सी अनहोनी हो जाए। जल्दी जल्दी पुल पार करके आ गया इस तरफ। अब खुद को ज्यादा सुरक्षित महसूस कर रहा हूँ।

होटल के सामने से दीखता बद्रीनाथ मंदिर

पुल के ऊपर से ही धुआं निकलते हुए दिख गया था। ये समझने में देर ना लगी कि कुंड पुल के बाईं तरफ है। दो चार सीढ़ियां उतर कर आ गया नारद कुंड।

जहाँ सैकड़ों की संख्या में भीड़ है। कुंड के पास तो आ कर खड़ा हो गया पर ये चप्पल कहाँ उतारनी है समझ नहीं आ रहा। सो चार सीढ़ियों के बाद स्नान के लिए कुंड है।

चप्पल पहन कर नीचे तो जाना उचित नहीं होगा। वापस आ कर बरामदे में जगह ढूढने लगा जहाँ किस्मत से एक रैक में खाली जगह दिख रही है।

चप्पल उतार कर यहीं खोंस दी। अब बारी है कपड़ों की। तय हुआ कि बारी बारी से नहाया जाएगा और दूसरा आदमी कपड़ों का ध्यान रखेगा।

कपड़े उतरने लगा, बटुआ सहित कपड़े भी अजय को थमा दिया। यहाँ पर वैसी व्यवस्था कहीं नजर नहीं आ रही जैसी यमनोत्री में थी।

पुरुषों के लिए अलग महिलाओं के लिए अलग। सब एक ही कुंड के पास नजर आ रहे हैं। मजेदार बात ये है कि इस कुंड के भीतर कोई भी नहीं है जैसा यमनोत्री में अन्दर डुबकी लगा कर स्नान कर रहे थे।

मैंने सोचा इन सबसे इतर मैं कुंड के अंदर जा कर नहाऊंगा। कदम आगे बढ़ाए और जैसे ही कुंड की तरफ बढ़ा कदम डगमगाए।

कुंड में जैसे ही हाँथ डाला दिन में तारे नज़र आ गए। अब समझ आया क्यों सभी कुंड से पानी ले ले कर नहा रहे हैं। इतना गर्म पानी जैसे इसे खौलाया गया है हमारे लिए।

नुक्सान होने से बचा

सभी की तरह मैं भी चुपचाप एक किनारे खड़ा हो कर नहाने का प्रयास करने लगा। वापस घूम कर कुंड के समांतर बनी नीचे की ओर जाती हुई सीढ़ियों पर आ खड़ा हुआ।

हाँथ लगा एक मग्घा। और इसी मग्घे को भर भर कर नहाने लगा। गरम पानी शरीर पर पड़ते ही महीनों पुराना पीठ का दर्द छूमंतर हो गया कुछ देर के लिए।

ऊपर से आवाज़ आई कि ये घड़ी जो पहने हो उतार दो। कोई और नहीं बल्कि मेरे महा ज्ञानी मित्र की ये पुकार है। सोच रहा हूँ से ही दूं वरना ये आदमी नहाना दुश्वार कर देगा।

हाँथ से बैंड उतारा और ऊपर की ओर खड़े अजय की तरफ उछाल दिया। मेरा बैंड उछालना हुआ पर अजय तक वो बैंड ना पहुंच सका और सीढ़ी के बीच में बनी ढलान वाली नाली में गिरा।

जिसमे ऊपर से पानी आ रहा है। देखते ही देखते बैंड नीचे पहुंच गया। मैं फ़ौरन भाग कर नीचे आया। मुझे पूरी आशंका है कि हो सकता है कि बैंड आगे लगी जाली को पार करके अलकनंदा में ना गिर गया हो।

जूतों के बाद अब मैं बैंड का नुक़सान नहीं सह पाऊंगा। नाली के आसपास जमे कचरे पर हाँथ पैर मारा पर कोई लाभ होता नहीं दिख रहा है।

ऊपर की और जमे हुए कूड़े को ही अजय ने हाँथ में उठा लिया। किस्मत से इसी कूड़े के ढेर में मेरा बैंड भी है। ऊपर वाले का शुक्रिया अदा कर के मैं ऊपर आने लगा चुपचाप।

अब और नुकसान नहीं सह सकता था मैं केदारनाथ के बाद। कुछ मग्घे पानी डाला और सीढ़ी चड़ते हुए खुद को एक किनारे सुखाने लगा।

इधर अजय कपड़े उतार कर तैयार खड़ा हो गया स्नान के लिए। एक किनारे कपड़े रख चल पड़ा। जबतक वो नहा कर वापस आया उतनी देर में मैंने अपने बदन को ढकने भर के कपड़े लपेट लिए।

ठंड बहुत है, और जब गरम पानी से नहा लो तो और लगती है। सो वही इस समय मुझे एहसास हो रहा है। लेकिन मेरे जैसा हाल यहाँ सभी का है।

अजय भी नहा कर आ गया और बदन पर कपड़े लपेट स्टैंड से चप्पल ले कर चल पड़ा होटल की तरफ। यहाँ से होटल भले ही सामने है पर दिखाई कुछ भी नहीं दे रहा है।

भीड़ और भी ज्यादा हो गई है। समय बीतने के साथ लोगों की तादाद में भी इजाफा हो रहा है। मंदिर में लगी कतार इस बात को प्रमाण है जो हनुमान जी की पूछ की तरह बढ़ती ही जा रही है।

किनारे पर नदी होने के कारण हर तरफ गीला गीला है। पुलिस की चौकसी भी तेज़ है और पंडितों की दुकान भी खुल चुकी है। फटाफट तेज़ क़दमों के साथ होटल की प्रस्थान कर गया

होटल से मंदिर

मंदिर की ओर जाने वाले लोग ज्यादा हैं और कुंड की ओर भी। और मेरी तरह विपरीत चलने वाले एक दो व्यक्ति ही हैं। होटल में जा कर जो काम का समान नहीं है वो रख दूंगा वहीं और ठंड से बचने के लिए जैकेट उठा लूंगा।

गजेन्द्र भाई और हंसमुख भाई अबतक तो तैयार भी हो चुके होंगे। आसपास कोई ऐसी दुकान नहीं दिख रही है जो बंद हो। सबने समय से प्रस्तुति दी है।

रेस्त्रां के बगल से मुड़ते हुए होटल की ओर आ गया। दो चार कदम ऊपर और कमरे के सामने आ खड़ा हुआ। गजेन्द्र और हंसमुख तैयार ही बैठे हैं हमारे इंतजार में।

मैंने गीले कपड़े छत पर फैलाए और वापस कमरे में आ कर जैकेट उठाई। निकल पड़े सब जाने मंदिर की ओर दर्शन करने के लिए। कमरे में ताला लगाने की बात आईं तो अभी तक जो चैन में बड़ा ताला लटकाता था वहीं यहाँ काम आने वाला है।

ताला लगा चाभी डाली जेब में और इस भीड़ भाड़ वाली भीड़ से निकल कर धाम की ओर चल पड़े। दिन के भोजन की बात छिड़ी तो गजेन्द्र भाई का इसी बगल वाले रेस्त्रां में आने को कहा।

फिलहाल तो कतार में लग जाना है। लोगों का आना जाना जारी है। अलकनंदा के ऊपर बने पुल पर भीड़ काफी है। सालों पुराना पुल अभी भी टिका हुआ।

पुजारी जगह जगह भक्तों के टीकाकरण करते दिख रहे हैं। कोई मंदिर की सीढ़ी के पास कोई अलकनंदा के पास। मुझे तो कुछ लोग कुंड के बजाए तेज़ अलकनंदा के किनारे नहाते दिखाई पड़ रहे हैं।

बहाव इतना तेज़ है की कोई इस नदी में उतरने की भी जुर्रत नहीं करेगा। कतार में लगने से पहले चुनौती है चप्पल छुपाने की।

पुल के नीचे और आसपास तमाम चप्पलें भिखरी पड़ी हैं। मैं सही जगह की तलाश में हूँ कि वापसी म चप्पल मिल जाए। क्यूंकि इन चप्पलों के सिवा और कुछ भी नहीं है।

जगह मिल गई और उसी अंदाज़ में चप्पल सीढ़ियों के बीच में छुपाने लगा। एक यहाँ तो दूसरी ना जाने कहाँ। कहीं खुद ही ना भूल जाऊं कहाँ छुपाई है।

चार किमी लम्बी कतार

कतार अभी तक टीन की छांव तक थी। देखते ही देखते अब कतार उससे भी बाहर निकल गई है। कतार में लगने के लिए भी लोग भाग भाग कर आ रहे हैं।

गजेन्द्र भाई फुर्ती के साथ गए और अन्य तीन लोगों की जगह घेर ली। और हमें अपने आगे खड़ा कर लिया। पलक झपकते ही कतार इतनी लंबी हो गई की मोड़ से मुड कर और विकराल जो गई।

बद्री विशाल के दर्शन के लिए लगी लम्बी कतार

उनसे तो बेहतर ही स्तिथि में हूँ जो कतार में बहुत पीछे खड़े हैं और ना ही दिखाई पड़ रहे हैं। इधर कतार के आसपास हाँथ में टोकरी लिए कोई कुछ ना कुछ बेंच ही रहा है।

कोई चाय तो कोई रुद्राक्ष का फल। ऐसे ही एक फल वाला आया और रुद्राक्ष दिखाने की बात करने लगा। आगे से आता देख भीड़ बार बार उसे रोक कर खरीददारी कर रही है।

ये भी एक नायाब तरीका है कतार में समय बिताने का। बोलते बोलते जबतक यहाँ आया गजेन्द्र भाई ने उसे रोक कर जानना चाहा कैसे ये जनाब ढोलची में रुद्राक्ष बेंच रहे हैं।

भाईसाहब ने सिर के ऊपर से ढोलची उतारी और एक कार्ड पकड़ा कर चालू हो गए तोते की तरह। एक से लेकर 21 मुखी रुद्राक्ष और उसके फायदे गिनाने लगे।

पर इन जनाब के पास या तो तीन मुखी या फिर पांच मुखी रुद्राक्ष के है फल हैं। एक मुखी रुद्राक्ष को सबसे अच्छा माना जाता है जो यह खुद ही धारण किए हुए हैं।

पर इनके ऊपर मुझे इस रुद्राक्ष का कोई खास असर नहीं दिख रहा क्यूंकि बेंच अभी भी ये यही रहे हैं। एक फल का दस रुपए दाम लगाते हुए हम सबने बारी बारी से छिलवाए।

सबसे पहले गजेन्द्र भाई ने, तो उनका तीन मुखी निकला, अजय का पंचमुखी। मैंने हाँथ आजमाया तो मेरा भी पंचमुखी और हंसमुख भाई का तीन मुखी।

ये तो फल के ऊपर था, एक मुखी भी निकल सकता था। वैसे निजी जीवन में कर्म का ही फल मिलता है किस्मत का नहीं।

बद्रीनाथ की विशेषता

कतार उतनी ही तेज आगे बढ़ रही है जितना तेज़ कछुआ अपनी मंज़िल की ओर बढ़ता है। जो लोग खड़े खड़े थक। जा रहे हैं वो साइड में लगी बेंच पर विश्राम करते दिख रहे हैं।

जैसे ही कतार आगे बढ़ती भाग कर आ जाते लगने। चाय वाला अलग से अपनी दुकान चला रहा है। कोई पैसे की तो कोई समाज सेवा के नाम पर मुफ्त की चाय लोगों में बांट रहा है।

जिस तरह त्रेता युग में रामेश्वरम, द्वापरयुग में द्वारका, कलयुग का धाम जगन्नाथपुरी को माना गया है उसी तरह सतयुग का धाम बद्रीनाथ को माना गया है।

कहते हैं यहाँ भगवान विष्णु बद्री नारायण के रूप में अभी भी तप कर रहे हैं। गुजराती भाइयों के साथ कतार में जैसे समय बीत रहा है उसका पता नहीं चल रहा।

गजेन्द्र भाई जिस हिसाब से कथा सुना रहे हैं उससे मालूम पड़ता है कि इनको वेदों का काफी ज्ञान है। ये तो कल बस में ही पता चल गया था।

और आज हमें उनके मुख से बद्रीनाथ में पंडुओं के रुकने के बारे में भी मालूम पड़ रहा है। साथ ही नर नारायण नाम के दो पर्वतों के बारे में भी।

ऐसा मानना है की जब ये दो पहाड़ नर नारायण आपस में मिल जाएंगे तब बद्री विशाल भविष्य में दूसरे स्थान पर निवास करने लगेंगे।

चौकस पुलिस

कतार आगे बढ़ी और अब हम टीन की छांव के नीचे आ गए हैं। सुरक्षाकर्मी पूरी तत्परता के साथ जुटे हुए हैं। जनता भी उनकी पूरी बात मान रही है।

ऐसी बड़ी बड़ी लाइन में को व्यक्ति विशेष देर से आते है वो अक्सर आगे खड़े लोगों से निवेदन कर के आगे खड़े होने का निवेदन करने लगते हैं।

ठीक वैसा यहाँ भी कुछ लोग करने की कोशिश में हैं। जनता भी होशियार, ऐसे लोगों को शोर मचाकर पीछे धकिया देती। या तो आदमी उल्टे पांव पीछे कतार में लगने के लिए निकल जाता अथवा पुलिसकर्मी अपनी लाठी ले कर आ जाते सही दिशा दिखाने।

ऐसे लोग भागते फिरते ही दिख रहे हैं। हद तो तब हो गई जब कतार को पार करने के बहाने लोग कतार में घुस रहे हैं। ऐसे लोग तो अपनी इज्जत ही गंवा रहे हैं।

अगर पुलिस और जनता इतनी मुस्तैद ना हो तो ऐसे लोग जहाँ मन करे वहीं से लाइन चालू करदे।

कतार धीमे धीमे आगे बढ़ती है फिर अचानक से रोक दिया जाता है। इधर मेरे पीछे खड़े गजेन्द्र भाई अपनी ज्ञान कि गंगा से हमें पवित्र कर रहे हैं।

मुझे तो लग रहा है एक दिन सिर्फ गजेन्द्र भाई का धार्मिक ज्ञान ग्रहण कर लूं तो सामने कोई ना टिक सकेगा। इनके अनुसार पांडव पुत्रों ने इन पहाड़ियों मे अज्ञात वास बिताया था।

इस बारे में तो मुझे ज्यादा जानकारी नहीं है पर कुछ अज्ञात लोगों को सुरक्षाकर्मी उठा कर पीछे धकेल रहे हैं। अबतक आधी टीन पार कर चुका हूँ। ठीक उसी स्थान पर हूँ जहाँ से समांतर कुछ दूरी पर चप्पल रखी हुई हैं।

लंबी कतार होने के कारण पुलिस ने कतार को दो भागों में विभाजित कर दिया। इससे थोड़ी मात्रा में भीड़ कम हुई है। मैं पहले की तरह पुरानी वाली कतार में ही हूँ।

बद्रीनाथ कपाट द्वार

जैसे जैसे मंदिर के कपाट के करीब आता जा रहा हूँ वैसे वैसे भीड़ और नजदीक आती जा रही है। आखिरकार हमारे लिए भी बैरिकेडिंग हटा दिए गए।

बद्रीनाथ कपाट पर अनियंत्रित भीड़

अन्दर आ कर तो ना कोई कतार है ना कोई लाइन बस भीड़ है। और इस भीड़ में मैं अपने दल से अलग हो गया। मैं अकेला और वो बाकी तीन पता ही नहीं चल रहा आगे निकल गए या पीछे रह गए।

जयकारे के भक्तगण मंदिर के गर्भ गृह की ओर बढ़ रहे हैं। कपाट से गर्भ गृह थोड़ा दूर है। पुलिस यहाँ भी है। भीड़ में अक्सर जेब से बटुआ और मोबाइल बड़ी आसानी निकल जाता है।

मेरा एक हाँथ जेब मे दूसरा जयकारे के लिए ऊपर उठाएं हुए हूँ। हालांकि यहाँ मोबाइल से कोई फोटो या वीडियो लेना सख्त मना है फिर भी एक दो लोग ऐसा करते दिखे।

और पुलिस वालों ने उन्हें झड़प दिया। गर्भ गृह के अंदर जाते ही खचाखच भीड़ में विशाल बद्री के दर्शन हो रहे हैं। अत्यंत मनमोहक।

ये मेरा पहला धाम है आजतक पूरी, द्वारका, रामेश्वरम नहीं गया पर शायद भविष्य में जाऊं। आनंद आ गया। दर्शन करके बाहर निकाल आया।

बाहर कुछ भक्त ही मंदिर की सफाई कर रहे हैं। मैंने भी अपना कुछ योगदान सफाई में करते हुए उठा की झाड़ू। ये भी एक तरह की सेवा में आता है। जैसे अमृतसर के गोल्डन टेंपल में।

मुख्य मंदिर के गर्भ गृह के बाहर छोटे छोटे मंदिर बने हुए हैं जिनमें गणेश, हनुमान, पार्वती, शिवलिंग और भी इत्यादि देव विराजमान हैं।

अगर आप भूल रहे हैं कि आप मंदिर में हैं तो भीड़ जयकारा लगा कर आपको याद दिला देगी। ऐसे ही सभी देवी देवताओं के दर्शन करके हनुमान जी की शरण में आ गया।

जहाँ पंडित जी सबके टिका लगा रहे हैं सो मैं भी खड़ा हो गया। यहाँ भी एक सज्जन फोटो लेने की कोशिश में है पर उन्हे पंडित जी ने झड़प दिया।

मंदिर के अंदर ही मुझे गजेन्द्र भाई मिले।

बद्रीनाथ के बाहर चबूतरा

दर्शन के बाद हम दोनों एक साथ कपाट के बाहर निकल आए। मंदिर के अंदर इतनी भीड़ नहीं है जितनी मंदिर के बाहर है। गजब का नज़ारा है।

बद्रीनाथ के सामने तस्वीर खिंचवाते अजय, ऐश्वर्य, हंसमुख, गजेन्द्र

अतिरिक्त भीड़ के लिए अतिरिक्त जगह का निर्माण भी किया हुआ है। ताकि भक्त आराम से मंदिर के सामने फोटो खिचवा सकें।

कपाट के बाहर ही अजय और हंसमुख भाई भी मिल गए। भीड़ कम होने का इंतजार करूंगा तो शायद समय बीत जाएगा। और ना तो भीड़ कम होने वाली है।

एक कैमरामैन को पकड़ा और उसे अपना कैमरे थमाया। और उसको उसी अंदाज़ में फोटो लेने को कहा जैसे वो व्यावसायिक फोटो निकालते हैं।

गनीमत है इन्होंने बाकियों की तरह पैसे नहीं मांगे। नहीं तो कई कई जगह कैमरामैन पैसे मांग लेते हैं। जैसे केदारनाथ में, अपने कैमरे से भी खिचवाओ तो भी।

चबूतरा इतना बड़ा की बस इसके ऊपर खड़े हो कर अलकनंदा को निहारते रहने का जी चाह रहा है।

भीड़ चाहें जितनी भी हो यहाँ पर जो सकारात्मक माहौल है उससे जी तो चाह रहा है यहीं रुक जाऊं। पर अब वक्त हो चला है भारत के आखिरी गांव में जाने का।

माना गांव। जहाँ से पांडव पुत्र स्वर्ग को सिधार गए थे। वैसे ऐसा भी कहाँ जाता है कि बद्रीनाथ आए और माना नहीं आए तो क्या खाक घूम कर आए।

क्या आपने तो नहीं कि माना ना जाने की गलती?

बद्रीनाथ कैसे जाएं?

 

भारी भरकम भीड़ के बीच लेखक

1 Comment

  1. Hansmukh says:

    Bahot hi Badhiya yar

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *