कैमरे वाला बैग जब छूटा रेस्त्रां में

भारत | उत्तरकाशी | उत्तराखंड

निकलने की तैयारी

खाना पीना करने के बाद निकलने की बारी है। उत्तरकाशी ज्यादा दूर भी नहीं है और साधन भी बहुत से मिल जाते हैं इसलिए भी इत्मीनान से सारे काम कर रहा हूँ।

खाने में वैसे तो एक ही पराठा ऑर्डर किया था। मगर पराठा इतना लज़ीज़ था एक और चट कर गया। और भूख भी जोरों पर थी। अब लग रहा है पेट में कुछ गया है।

बाज़ार खूब जमी है गंगोत्री में जिसकी धूम है। खरीदने वाले खरीद भी रहे हैं। पर मुझे ऐसा लगता है ये आपके ही शहर से लाया हुआ समान आपको दुगने दाम में बेंचते हैं।

भीड़ भाड़ वाले इस इलाके में इस कदर भी भीड़ नहीं है। मगर पूरे गंगोत्री का आकर्षण का केंद्र है गंगा मैया का वेग। जिसे कोई एक बार निहारे तो नज़रे ही ना हटा सके।

एक दुकान से निरंतर भजन की गूंज सुनाई दे रही है। जो कि मंत्रमुग्ध कर रहा है। चलते फिरते टैक्सी स्टैंड आ पहुंचा। बस की समय सारिणी पता कि तो मालूम पड़ा दो बजे तक बस का आगमन होगा। जो उत्तरकाशी को निकलेगी।

अभी बारह ही बज रहे हैं मतलब की मुझे डेढ़ दो घंटे इंतजार करना होगा। क्या किया जाए तब तक के लिए? इंतजार!

इंतजार के सिवाय और कोई चारा भी नहीं है। भुट्टा भूंझ रही एक महिला से बस अड्डा पूछा तो पता लगा कमरे जैसा निर्मित आधी खुली इमारत में ही इंतजार करना होगा।

जहाँ से सवारियां भर के निकलती हैं बसें। बैग ले कर इसी छोटे से अधकमरे जैसी इमारत में आ धमका। ठीक बगल में चाय कॉफी की दुकान सटी लगी है।

पर ये बस अड्डा बैठने लायक तक नहीं है। इतना मैला कुचैला। पहले तो इसको साफ करूं फिर बैठने का सोचूं। तीनो सीटों में से एक भी सीट बैठने लायक नहीं है।

अखबार से एक बेंच साफ की और बैग उठा कर ऊपर रखा। अब जा के कुछ बैठने लायक बना है। अड्डे के पीछे पूरा पहाड़ी इलाका। फिलहाल तो ये ढाका हुआ है।

पर मानव ने कचरा का ढेर जमा कर दिया है। ये सब देख मेरा ह्रदय विहीन होने लगता है। क्या किया जाए इतनी देर। भुट्टा ही चबा लिया जाए।

गुज़रता समय

पास में बैठी भुट्टे की दुकान लगाए महिला से दो भुट्टे गरम करवाए और वाजिब दाम में खरीद कर खाने लगा। बैठे बैठे सोचा सारी फोटो और वीडियो ट्रांसफर कर लिया जाए पेनड्राइव में।

भुट्टा खाते खाते आधा घंटा बीत गया पर इस बस अड्डे पर मेरे अलावा कोई भी ना आया। कुछ एक मिनट के लिए एक परिवार आया बैठा और चल पड़ा।

चाय के लिए साथी घुमक्कड़ ने हामी भरी फिर मना के दिया। अड्डे के बगल से सटी चाय की टपरी पर एक कप चाय के लिए बोल दिया।

जबतक चाय आती एक जनाब अपनी पत्नी के साथ आ गए। ये अधेड़ उमर के साहब अच्छे घराने के मालूम पड़ते हैं। स्वत ही बोल पड़े “बेगम को दवा खिलानी है”।

खैर ज्यादा पैसा भी हानिकारक साबित होने लगता है। वो हम आलसी, इतना आलसी बना देता है कि उठने बैठने तक के लिए दूसरों को सहारा लेना पड़ता है।

वही ये जनाब भी अपनी व्यथा बताते हुए अपने जीवन की व्याख्या करने लगे। बताने लगे वह पिछले तीस सालों से घूम रहे हैं। और भारत के अलग अलग हिस्सों में जा चुके हैं।

और एक मैं हूँ साल भर के भीतर ही पूरा भारत घूमने का सपना लिए निकल पड़ा हूँ। अंकल जी के मुताबिक ये लगभग हर धार्मिक स्थल में जा चुके हैं।

फिर फिलहाल जीवन दवाइयों के सहारे गुजर बसर कर रहे हैं। उनकी पत्नी और बेटी भी पीछे से आ गई कुछ ही वक्त में। उनकी बेगम भी उन्हीं के किस्सों में शामिल हो गईं।

गंगोत्री से अलविदा लेने का समय

बस आगमन

बातें काफी गहरा मोड़ के रही हैं कि इतने में ही बस आ धमकी। देवियों और सज्जन से विदा लिया और बस खाली होने और वापस मुड़ने का इंतजार करने लगा।

आसपास भी भीड़ कम है तो उम्मीद है बस में सीट मिल ही जाए। बस घूम कर वापस लगी उत्तरकाशी के रास्ते। सरकारी बस का तो अता पता नहीं। इसी प्राइवेट बस में बैठ गया।

कंडक्टर साहब ने एक एक कर हर सवारी के बैग बस की छत पर लदवा दिए।

गंगोत्री के इस द्वार पर लोगों का मजमा लगा ही हुआ है। गाड़ियों से आना जाना जारी है। इसमें सबसे ज्यादा से भाड़े कि टैक्सी ही नजर आ रही हैं।

रोजी रोटी से इतर अगर इन टैक्सी वालों को हटा लिया जाए तो आवागमन के लिए हाहाकार मच जाए।

उधर नजर पड़ी उस विदेशी पर जो यमनोत्री में मिला था बाबा के लिबास में। उनके इर्द गिर्द अभी भी कुछ लोग कैमरा लिए घूम रहे हैं।

देख कर तो यही जान पड़ता है इस विदेशी ने हिन्दू धर्म अपना लिया है। और आसपास की भीड़ देख कर भी यही लगता है कि सिद्ध महात्मा हैं।

लेकिन ये यहाँ बड़ी देर से पधारे या फिर मैं ही जल्दी जल्दी यात्रा कर रहा हूँ। हो सकता है अब इनसे केदारनाथ में मुलाकात हो।

तकरीबन आधे घंटे तक तो ड्राइवर सवारियां ही बुलाता रह गया। जब एक एक सीट भर गई। और खड़े ना होने की भी गुंजाइश ना बची तो ड्राइवर को लगा अब काफी बस भर चुकी है।

अब निकलना चाहिए। शायद प्राइवेट बस वाले इसी विचारधारा के साथ रोड पर उतरते हैं फिर चाहें वो खाई में ही क्यों ना जा गिरे ओवरलोडिंग करने के चक्कर में।

बस पंचर का अजब संयोग

आखिरकार लंबे इंतजार के बस चल पड़ी। मुझे पिछली सीट नसीब हुई। बस में वो जोशीले दद्दू भी हैं कुछ आगे सो चार सीट छोड़ कर।

बस ने आखिर गंगोत्री से अलविदा लिया और मैंने भी। ठसा ठस भरी बस में कंडक्टर के इजाज़त के बिना ना कोई अन्दर घुस सकता है ना बाहर निकल सकता है।

इस कदर भीड़ है। कुछ ही आगे बस पहुंची है कि धचका खाते हुए एक मोड़ पर आ खड़ी हुई। कंडक्टर साहब बस से उतर के देखने लगे और बीच सड़क से ही हल्ला मचाने लगे कि टायर पंचर हो गया।

फिर क्या भीड़ के चेहरे के हाव भाव ही बिगड़ गए। सबने तय मान लिया है आधा एक घंटा रुकने का। पिछले पच्चीस दिनों में मेरे साथ बस खराब होने का यह चौथा वाक्या है।

पहला जब चंडीगढ़ से मनाली आ रहा था, सूझा जब जलोरी से रेक्लोंग पियो, तीसरा जब रामपुर से शिमला और आज ये चौथा। मेरा तो चौथा निकल गया।

पहाड़ों में बस का इस तरह खराब होना जैसे आम बात हो गई हो। शायद यहाँ के मौसम के कारण भी और सड़को के भी। जिस हिसाब का यहाँ वातावरण है उसका भी खासा प्रभाव पड़ता है गाड़ियों पर।

बाहर रहा मौसम बदला बदला

जैसे पहाड़ों पर सीएनजी गाड़ी नहीं चल सकती क्योंकि प्रेशर ज्यादा होता है। वैसे ही शायद इन टायरों पर भी दबाव बढ़ जाता हो। क्या पता!

फिलहाल तो ड्राइवर और कंडक्टर टायर बदलने को लेकर चिंतित दिखाई पड़ रहे हैं। कंडक्टर ने पीछे को डिक्की खोली और एकदम नया टायर निकाल कर किनारे रख लिया।

अपने औजारों से पंचर टायर खोलने लगा। देखते ही देखते ये पंचर भी बन गया। अब तक बेताब यात्री बस से सड़क पर उतर आए हैं। उनसे बस की गर्मी बर्दाश्त ना हो सकी।

कोई फोन पर बात करते करते उत्तरकाशी तक पहुंचने की फिराक में है। कंडक्टर ने सबको इक्कठा करते हुए बस में ठूसा और एक दफा फिर घरघराते हुए चल पड़ी बस अपनी मंज़िल की ओर।

घंटे भर की मशक्कत के बाद सफलता हाँथ लगी। पहाड़ों पर हमें हर परिस्थिति से सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ऐसा महीने भर पहाड़ी में रहने के बाद जान चुका हूँ।

क्यूंकि समतल जगह पर जो सफर चंद मिनटों का होता है वो यहाँ घंटों में तब्दील हो जाता है। सफर में काफी समय जाया होता है पहाड़ों में।

ढीठ कंडक्टर

कंडक्टर साहब के इरादे ही कुछ अलग जान पड़ रहे हैं। जहाँ दूसरे कंडक्टर सीट भरते हैं है खाली जगह पर भी सवारियां भर रहे हैं।

इनका बस चले तो ये जनाब बस की छत और बोनट पर भी लाद दे सवारियां। वैसे कंडक्टर ड्राइवर की जोड़ी बिल्कुल पति पत्नी की तरह होती है।

तालमेल बिगड़ा वहीं हालात बिगड़ते हैं। इधर बस में थके मांदे लोग बैठे हुए हैं। मेरे पीछे बैठा है एक नौजवानों का झुंड जो शोक मना रहा है गौमुख ना जाने का।

कारण जाना तो पता लगा भूस्खलन के चलते इनको बीच रास्ते से ही वापस लौटना पड़ा। ऊपर वाले की भी अजब लीला है। वैसे तो गौमुख अपने आप में एक रहस्य है जो काफी वर्षों से बना हुआ है।

इस झुंड में से एक जनाब बोले कि गौमुख सुबह सवेरे पहुंचा जा सकता है और शाम तक वापस भी आया जा सकता है अगर आप सेहतमंद हैं तो।

वरना ये ट्रेक्किंग लोग दो दो दिन में भी पूरी करते हैं। जो शारीरिक रूप से स्वस्थ होते हैं। क्यूंकि गौमुख में ऑक्सीजन लेवल काफी कम हो जाता है।

अहम जानकारी देते हुए किनारे बैठे जनाब थक कर सुस्ताने लगे। सात लोगों के इस दल में एक भाईसाहब गाना बजाना करने लगे।

भारी मात्र में भीड़ होने के कारण बाहर का नज़ारा देख पाना सम्भव नहीं है। बस कहाँ है पता ही नहीं चल पा रहा।

गरमा गरम बहस

मेरे समांतर बैठे एक जनाब खराब सड़को की कड़ी निंदा करने लगे।

निंदा करते करते सरकार पर जमकर बरसे। ऐसा बरसे की पीछे शांत बैठे नौजवान सेना उनके वचनों से आहत होने लगी। और दोनों के बीच जमकर बेहेसबजी चालू हो गई।

दोनों ही पक्ष सरकार की कमियों को उजागर कर रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि एक दल अभी के सरकार के पक्ष में है दूसरा पिछली सरकार के।

आगे बैठे रिक्शा चालक जैसी शकल वाले बीच मे कूदते हुए अपनी विशेषज्ञ सलाह देना शुरू ही हुए की दूसरा दल उन पर हावी हो गया। तो ये अपनी जान बचाते अपना बोरिया बिस्तर उठा कर चल पड़े आगे।

उसके बाद इन जनाब ने पीछे मुड़ कर देखने की हिमाकत नहीं की। बहस इतनी गरम होती दिख रही है कि बीच बचाव के लिए मुझे कूदना पड़ रहा है।

मुझसे भी ये जनाब उलझे पर ऐसा उलझे की सुलझते ही रह गए। जब नौजवान दल इनपर हावी हो गया तो ये महाशय तो बस छोड़ कर ही अगले स्टॉप पर उतर गए।

बस में जितने भी लोग अचेत सो रहे थे अबतक लगभग सब जाग चुके हैं। और हर कोई इस तीखी बहस का आनंद ले रहा था।

भागीरथी नदी

अंतिम स्टॉप

उनके उतरने के बाद ही कुछ किमी की दूरी पर बस रूकी। ये पहला स्टॉप है बस का और शायद आखिरी भी। क्यूंकि पहले ही घंटा भर पंचर बनाने में जा चुका है। तो शायद कम ही स्टॉप लिए जाएं।

पहले तो टंकी खाली करने की चुनौती। फिर जगह ढूंढने की। चाय की दुकान के बगल मे बने घर के शौचालय की ही बस की सवारियों ने निशाना बना डाला।

एक एक कर हर कोई अपनी टंकी खाली करने के बाद चाय की दुकान में नाश्ता पानी करते नजर आ रहे हैं। मैंने भी एक समोसा और चाय से थोड़ा पेट को तस्साली देने की कोशिश कर रहा हूँ।

बस की छत पर नजर पड़ी तो देखने को मिला सभी बैग एक तिरपाल के छांव में ढके हुए हैं। कंडक्टर साहब लंगूर की भांति ऊपर चढ गए हैं कुछ बैग उतारने।

परिवार की ट्रैकिंग

कुछ चंद मिनट और बस रूकी रही फिर चल पड़ी अपनी राह। गंगनानी तक पहुंचते पहुंचते बस काफी खाली हो चली है। कुछ नई सवारियां भी चढ़ीं।

जिनमे से एक परिवार है जो चूल्हा बर्तन, तंबू के साथ चढ़ा। सीट खाली होने के कारण आराम से बैठने को मिल गया इन्हे। स्वत ही अपनी कल रात से लेकर अभी तक की यात्रा का बखान करने लगीं।

मुझे उनकी कहानी सुन लगने लगा डिस्कवरी चैनल की कोई डॉक्यूमेंटरी सुन रहा हूँ। बताया कि ये भी चार धाम यात्रा पर निकले थे।

पहाड़ी के रास्ते बिल्कुल पर्वतारोही के अंदाज़ में। पति मिलिट्री रिटायर्ड होने के कारण ऐसे रिस्क लेते रहते हैं। मेरे विचार में मैं भारत में पहली बार किसी ऐसे परिवार से मिल रहा हूँ जो परिवार सहित ट्रेक्किंग करता हो, वो भी बच्चों के साथ।

ये अपने आप में इनको अलग ही श्रेणी में खड़ा करता है। शायद यह कभी मेरे लिए कर पना संभव हो। हालांकि की जालोरी जाथ में ऐसे एक जोड़े से मिला जरूर था पर वो अपने बच्चों के बगैर ही यात्रा पर निकलते हैं।

अद्भुद प्राणी है भांति भांति प्रकार के। कुछ ही आगे चल कर सड़क किनारे एक विदेशी महिला खड़ी नजर आईं। जिन्हे कोई गांव वाला यहाँ तक छोड़ने आया है।

घने जंगलों में ट्रैकिंग

दद्दू का साथ

बस रूकी और मैंने उनको उस गांव वाले का शुक्रिया अदा करते सुना। हिन्दू लिबास में ये महिला बस के अन्य यात्रियों से हुई बातचीत में पता चला ये मोहतरमा भी चारधाम यात्रा पर निकले हैं।

फिलहाल गंगोत्री हो कर आईं हैं और पिछले एक हफ्ते से इसी गांव में ठहरी हुई थीं। एक ये विदेशी हैं जो बढ़ चढ कर हिन्दू धर्म अपना रहे हैं और एक तरफ हम हैं जो हिंदुत्व से ही भागते फिरते हैं।

समय मिला तो थोड़ा जोशीले दद्दू के पास आ कर बैठ गया। उनसे बातचीत में जाना थोड़ा बहुत उनके बारे में। की कैसे वो सब कुछ छोड़ चल पड़े हैं यात्रा पर।

शाम का समय हो चला है। अब दिन भी ढल रहा है और अंधेरा भी बढ़ रहा है। उम्मीद है एक दो घंटे में उत्तरकाशी में आगमन हो जाएगा।

बस काफी खाली हो चुकी है। हर मोड़ पर सवारियां उतर रही हैं। भागीरथी के किनारे चलते हुए घने पहाड़ नजर आ रहे हैं। शुक्र है मौसम ठीक रहा आज। बारिश के कोई लक्षण नजर नहीं आए।

टिकट की आफत

शाम के साढ़े छह बज रहे हैं और आखिरकार हम उत्तरकाशी आ ही गए।

शाम के समय तो केदारनाथ के लिए कोई वाहन का मिलना संभव नहीं है ये तो तय है।

पर कल सुबह की व्यवस्था कर ली जाए तो उतना बेहतर है। बस के रुकते ही सवारियां उतरने लगीं। बस अड्डे की खिड़की तो इतनी शाम को बंद दिख रही है।

पर ड्राइवर साहब से पता चला कि सुबह चार बजे यहाँ से एकमात्र बस प्रस्थान करेगी। पर इस बस की टिकट सामने वाली इमारत से बुक होगी।

उत्तरकाशी के बस अड्डे की व्यवस्था बहुत ही खस्ता हाल जान पड़ी है अभी तक तीन दफा आना हुआ है यहाँ पर बस अड्डे से कोई सुविधा नहीं मुहैया हो सकी है।

बस अड्डे के सामने वाली खिड़की पर जा पहुंचा। यहाँ मालूम पड़ा टिकट की बिक्री समाप्त है चुकी है। और हमें आधे घंटे के बाद दोबारा आने को कहा गया।

थकान उतारने का भी मौका मिल गया इसी बहाने। पास में चाय के ठेले पर गरमा गर्म चाय की प्याली पर यही चर्चा छिड़ी की कल बस से जाने को ना मिला तो दूसरा रास्ता क्या है।

इस सवाल का जवाब भी नहीं मिला मुझे। बिस्कुट खा कर भूख शांत करने की कोशिश कर रहा हूँ। पैसे दिए और चल पड़ा उस इमारत की ओर।

अब तक टिकट बुक करने वाले साहब पधार चुके हैं। शाम के साढ़े सात बज रहे हैं। जनाब बता रहे हैं कि टिकट उपलब्ध है पर एक ही सीट का।

दो चार जगह फोन घूमा कर अन्य गाड़ियों के विषय में पता करने लगे। पर कोई सफलता हाँथ ना लगी। ना जाने से बेहतर है एक टिकट पर दो आदमी चले जाएं।

अगर ये जनाब अनुमति दे तो। मैं अनुमति मांगता की इससे पहले उन्होंने है मुझे इस प्रस्ताव पर विचार करने को कहा। और जो भी हो एक टिकट पर कंडक्टर से सलाह मशवरा कर जा सकते हैं।

मतलब उत्तरकाशी से रुद्रप्रयाग तक ऐसा ही सफर करना होगा। सहमति बनी और एक ही टिकट सही पर बुक करवा लिया।

ना घर ना ठिकाना

टिकट बुकिंग के बाद बात आईं रुकने की। बस से उत्तरकाशी आते समय एक बिरला हाउस दिखा था। अगर वहाँ कमरा खाली मिल जाता है तो और भी अच्छा।

बैग लेके वापस मेन रोड पर चलने लगा जहाँ से कुछ आधे मील पर बिरला हाउस है। बिरला हाउस पहुंचा तो मालूम पड़ा यहाँ एक भी कमरा खाली नहीं है।

अनुमान है ये जानकीचट्टी की तरह भूतिया तो नहीं होगा। कमरा खाली ना होने की खबर निराशाजनक तो है ही। पास में ठेला लगाए जनाब को जब पूछा किसी ऐसी जगह के बारे में बताए जहाँ खुद का तंबू गाड़ कर रात बिताई जा सके।

इस पर वो किसी और आगे बने मैदान की ओर जाने का इशारा करने लगे। ना तो गूगल नक्शे पर किसी मैदान का जिक्र है ना हकीकत तौर पर मुझे दिख रहा है।

बस आ गया हूँ तो भागीरथी नदी के पास। ख्याल तो यहाँ कहीं नदी किनारे ही तंबू गाड़ दूं पर ये घातक भी साबित हो सकता है। यहाँ तंबू लगाने का विचार त्याग दिया।

खान पान और कमरा

ठिकाने का तो पता नहीं पर इससे पहले कि सब रेस्त्रां बंद हो जाएं खाने का ठीकाना ढूंढ लेना चाहिए।

वापस चल पड़ा बस अड्डे की ओर जिसके आसपास कोई ना कोई तो ढाबा या रेस्त्रां मिल ही जाएगा। बस स्टॉप के कुछ ही आगे दो ढाबे दिखाई पड़ रहे हैं जो अगल बगल ही हैं।

उसमे से दाएं हाँथ वाला बेहतर दिख रहा है और खुशबू भी यहीं बुला रही है। ज़रा से ढाबे में कुल चार मेजें पड़ी हुई हैं। जिनमे से दो तो पहले से ही भरी हैं।

एक में हमने कब्ज़ा जमा लिया है जिसमे सांठ गांठ वाला हिसाब है। खाने में दाल चावल रोटी पर्याप्त रहेगा ऊर्जा प्रदान करने के के लिए।

खा पी कर भुगतान किया और निकल पड़ा एक बार फिर से होटल की तलाश में। उत्तरकाशी के मार्केट वाली गली में कमरा मिलने की कुछ उम्मीद है।

इसी उम्मीद के साथ आ पहुंचा इस गली में। अब तक लगभग काफी शटर गिर चुके हैं। दूर से एक लडके को रूम बुकिंग पुकारते सुना।

पास पहुंचते पहुंचते वो खुद ही आ गया और कमरे के लिए पूछने लगा। दाम वाजिब लगे तो इन्हीं जनाब के होटल में ठहरने के लिए राजी हो गया।

होटल के रिसेप्शन में पहुंचा और यहाँ एंट्री करने के बस आधार कार्ड की एक कॉपी पकड़ाई। और उन्होंने मुझे चाभी।

चाभी पकड़ते हुए अपने होटल के चुने हुए कमरे तक ले आए। कमरा उतना बड़ा तो नहीं पर कुछ घंटे बिताने के लिहाज से बुरा भी नहीं है।

कम से कम सारे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण चार्ज तो हो जाएंगे। कमरे में बैग रख वापस चल पड़ा मार्केट। मलिक ने दस बजे तक आ जाने का निवेदन किया।

दुकान बंद होने से पहले याद आया बैग

भुगतान की बात आईं तो इन जनाब के पास खुले पैसे ही ना मिले। दो चार दुकानों में चक्कर काटने के बाद भी हालत जस की तस।

किसी तरह एक पान वाले की दुकान में दो हजार का छुट्टा मिला। तब कहीं जा कर इनका भुगतान किया।

सारी व्यवस्थाएं होने के बाद लगा थोड़ा टहल लेना भी जरूरी है। सो निकल पड़ा बहुत दूर। कुछ पैसे भी निकालने हैं एटीएम से। जितनी जगह भी एटीएम खंगाला वो खाली ही मिला।

दूसरे जनाब से भी यही सुनने की मिला की पूरे उत्तरकाशी में एटीएम खाली हो चुके हैं। भारी मशक्कत के बाद किसी तरह एक एटीएम में कुछ पैसे आखिरकार मिल ही गए।

दो तीन किमी आगे आने के बाद अब वापस पीछे चलने का समय हो चुका है। इससे पहले कि समय सीमा समाप्त हो होटल पहुंच जाना चाहिए।

होटल के पास ही पहुंचा था कि साथी घुमक्कड़ के घर से फोन आ गया और कुछ ही देर में मेरा फोन भी बज पड़ा। फोन पर बात करते करते ध्यान आया कि कैमरे से भरा बैग रेस्त्रां में ही छूट गया है।

सबकुछ छोड़ भागा रेस्त्रां की तरफ। पहुंचा तो देखा मेज़ के ही सिरहाने जहाँ का तहाँ बैग रखा मिला। करीब एक डेढ़ घंटा गुजर जाने के बाद होश आया कि बैग छूट गया है।

गनीमत है दुकान खुली मिली। एक दफा बंद हो जाती तो पता नहीं कल मिलता बैग या कोई और अपना समझ कर चल पड़ता।

गंगोत्री से उत्तरकाशी 116km

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