एक सफ़र ऐसा भी

उत्तर प्रदेश | कानपुर | भारत

27 जुलाई 2019

चम्पई से ऐजवाल वापसी

भारत वापसी तो हो चुकी है अब बारी है घर वापसी की। घर की बात है तो अभी काफी लंबा सफर तय करना है। मिजोरम के इस गांव से उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से पहले कानपुर तक।

हल्पुई के घर पर रात गुजारी। घर छोटा है मगर रोजमर्रा की सारी  व्यवस्था है। मैं रात हल्पुई से बात करने के बाद में सोफे पर ही सो गया। थकान इतनी ज्यादा थी की आंख सीधा सुबह खुली।

हल्पुई के अलावा घर में उसकी मां हैं। पिता कुछ वर्ष पहले गुजर गए। नित्य क्रिया के बाद आज सुबह मूंह धोने का अवसर मिला। शायद जब से मिजोरम आया हूँ तब से पानी से बैरहो गया है। चेहरे से इतनी गन्दी हटी जिसकी उम्मीद ना थी।

एक्सीडेंट के बाद अभी पता चल रहा है की कहाँ कहाँ से खून बहा है। पूरा चेहरा साफ करने के बाद अलग ही चमक बिखर गई है। एक ग्लास पानी पीने के बाद बैग उठाया और चल पड़ा। मेरे साथ साथ हल्पुई भी चल दिया।

हल्पुई मेरे साथ तब तक रहा जब तक उसे सुनिश्चित नहीं हो गया की मैं शकुशल ऐजवाल पहुंच जाऊंगा। सुमो की टिकट बुक कराई सवारियों के भरने के इंतजार में कुछ देर गाड़ी यूं ही खड़ी रहेगी।

सुमो में सबका समान गाड़ी की छत पर ही रखा जाता है जिसके ऊपर पानी लपेटने के बाद मजबूत रस्सी से बांध दिया जाता है। 

सुबह चौराहे पर साथी घुमक्कड़ से मुलाकात हुई जहाँ उसने बताया की वो मनिपुर निकल जाएगा। सुबह की चाय के बाद आ गया सुमो की तरफ। सुमो के भरते ही निकल पड़ा ऐजवाल।

सुमो खचाखच भरी हुई है। इसमें एक अधेड़ उम्र की दंपति और साथ में उनके नाती पोते। बातचीत में जनाब ने बताया की उनका परिवार अपनी बेटी से मिलने जा रहे हैं जो तमिलनाडु से ऐजवाल आ रही है।

पारिवारिक परंपरा

मैंने मिजोरम में अभी तक जितने भी परिवारों को देखा है या मुखातिब हुआ हूँ तो एक चीज समान पाई है वो ये की जैसे उत्तर भारत में हर घर पूरा परिवार एकत्रित हो कर चाय पीता है वैसे ही यहाँ पूरा परिवार एकत्रित होकर सिगरेट पीते हैं। जिसे ये बुरा नही समझते।

ऐजवाल के रास्ते सुमो जितनी बार रुकी उतनी बार बुजुर्ग दंपति सहित उनकी बेटी और दामाद सहित सब धुआं सूंघ रहे थे। हर स्टॉप पर मैं चाय पीता और बुजुर्ग दंपति सिगरेट के कश हवा में उड़ाती।

सफर में कुछ खास आनंद इसलिए भी नहीं आ रहा है क्योंकि आज शनिवार है। और मिजोरम में लोग साप्ताहिक छुट्टी मनाते हैं। इसलिए भी सड़क पर वाहन बहुत ही कम दिखाई पड़ रहे हैं।

ऐसे ही एक स्टॉप पर जब सुमो रुकी तो यहाँ मेरी मुलाकात एक ट्रक ड्राइवर से हुई। जो अंधेरा होने से पहले मणिपुर पहुंचना चाहते हैं।

सुरक्षा के लिहाज से भी। वहाँ पहुंच कर सोने की व्यवस्था से ले कर खाने पीने की व्यवस्था भी देखनी है। और ये जनाब भी पूर्वोत्तर भारत से हैं इसलिए थोड़ा असहज महसूस कर रहे हैं। खाने के मांसाहारी खा रहे हैं पर वो लोग जो शुद्ध शाकाहारी हैं उनका जीवन व्यापन यहाँ थोड़ा कठिन हो सकता है। जैसे की मेरा।

ऐजवाल के रस्ते पड़े जंगल

सफर का कुछ हिस्सा पिछली सीट पर बैठ कर गुजारा और बाकी बचा कूचा अगली सीट पर ड्राइवर के बगल में। अंकल जो अपनी बेटी को लेने जा रहे हैं उनसे ही बातों में सफर गुजर गया।

शाम के पांच बजे हमारी सुमो ने ऐजवाल में दाखिल हुआ। ये परिवार भी अपनी भाषा में ड्राइवर को मनचाही जगह पर उतारने को बोल रहे जिसका पालन भी हो रहा है।

जब भी कोई सफर खत्म होता है मन थोड़ा उदास जरूर हो जाता है। शायद इसलिए भी की जिनके साथ सफर किया है उनसे थोड़ा लगाव। ये तो कुछ भी नहीं था ट्रेन की लंबी यात्रा में इससे ज्यादा होता है।

सुमो में ही एक हिंदी भाषी बाबू भी हैं जो बिहार से ताल्लुकात रखते हैं। बातों बातों में काफी चर्चा हुई और मैंने अपने रुकने का प्रस्ताव भी रखा। शायद जिसे सुन कर वो घबरा गए।

ऐजवाल में नहीं हुई सूमो की बुकिंग

ऐजवाल की पहाड़ियों में ऊपर से नीचे होते हुए पहुंच गया मिलेनियम सेंटर। मेरा खयाल है या तो आज के लिए रुक जाऊं या फिर निकल जाऊं। हालांकि पहले तो बिहारी बाबू बोल पड़े थे की उनके घर रुकने को और अपना नंबर भी दे गए थे।

पर जब कुछ वक्त बीत जाने के बाद उनको फोन मिला कर पूछा तो अपने घर में सहमति ना बनने के कारण मना कर रहे हैं।

मिलेनियम सेंटर पर अधिकतर सुमो आ कर रुकती हैं। ये ऐजवाल का मुख्य स्थान है। जहाँ से हर दुकान में सुमो बुक होती है।

अभी पर्याप्त समय है मेरे पास। साथी घुमक्कड़ को फोन घुमाया तो पता चला की वो किसी ट्रक में लद कर मणिपुर को निकल चुका है। समय गुजारने के लिए मैं मॉल में दाखिल हुआ।

पूर्वोत्तर भारत में अब कुछ ही क्षणों में अंधेरा होने लगा है। सो मॉल में भी दुकानें बंद हो रही हैं। जो खुली हुई हैं वो भी बंद हो जाएंगी। लघुशंका के लिए सौंचालय की तरफ आया।

पर यहाँ तो अजब गजब ही व्यवस्था है। सौंचालय में लघुशंका के भी रुपए लगेंगे। आखिरकार इस मजबूरी में मुझे जेब ढीली करनी ही पड़ी। हांथ मूह धोने के बाद बाहर निकल आया।

अंधेरा लगभग होने ही वाला है। एकदम ही दिखना बंद हो उससे पहले सीट निर्धारित करा लेनी है। मुझे जल्द से जल्द सिलचर जाने के लिए सुमो बुक करनी होगी। 

उधर साथी घुमक्कड़ मणिपुर निकल चुका है। इधर मैं अपने डब्बे वाले फोन में बीस रुपए का रिचार्ज करवा कर इधर उधर पता करने में जुट गया।  

बिना स्मार्टफोन के आज के ज़माने में आदमी ऐसे ही अपाहिज हो जाता है। ठीक मैं भी वैसा ही महसूस कर रहा हूँ। घर पर फोन घुमा कर अगरतला से कानपुर तक के लिए टिकट बुक करा लिया। अब मुझे राजधानी एक्सप्रेस सोमवार की शाम को हर हालत में पकड़नी है।

ऐजवाल में प्रवेश के बाद जब रियक पीक जा रहा था उससे पहले मेरी मुलाकात टीटोन चंदा से हुई। जो किसी दुकान में माल चढ़वाते उतरवाते हैं। अमूमन जो कुरियर का काम होता है।

आश्चर्य की बात है कि आज इनकी दुकान अभी तक खुली है जो रोज चार बजे बंद हो जाती है। दुकान पर पहुंचा तो टीटोन से मुलाकात हुई। मैने उनको सारा विवरण बताया और उनसे सिलचर तक जाने की बात रखी।

वो राजी हो गए पर उससे पहले उन्होंने सुमो बुक करा लेने की बात दोहराई। यथास्थिति में वो अपने ट्रक से सिलचर भेजवा सकते हैं। जो उसी दिशा में जाएगा। पर अगर ट्रक खाली गया तो।

मैने बैग उन्ही की दुकान में रखवा दिया और निकल पड़ा सुमो की बुकिंग के लिए। अलग अलग दुकानें जो रेस्त्रां की हैं या पान की गुमटी की वो सभी सुमो भी चलवाती हैं।

इन सभी दुकानों में बारी बारी से पूछा पर हर दुकान पर यही सुनने को मिला की सीटें पहले से ही बुक करा ली गईं हैं। क्योंकि आज शनिवार है जिस वजह से लोग अपने अपने घर को प्रस्थान कर रहे हैं। ना सिर्फ शनिवार बल्कि कल यानी रविवार की भी बुकिंग पहले से ही तय हो चुकी हैं।

कुछ दुकानदारों में सुमो वालों के नंबर भी दिए पर उनसे बात करने का ज्यादा फायदा ना हुआ। अधिकांश सुमो भरी हुई ही थीं। थक हर के निराशाभाव से वापस ऊंचाई चढ़ते हुए टीटोन की ही दुकान में आ गया।

सिलचर तक मिला ट्रक का सहारा

टीटोन को जब मालूम पड़ा तो उन्होंने अपने ट्रक के चालक से पूछा की अगर ट्रक खाली जा रहा है तो एक राहगीर को उसकी मंजिल तक छोड़ दें।

ट्रक चालक के हामी भरते ही मैं निश्चिंत हो गया। ट्रक को निकलने में अभी समय है इसलिए टीटोन से पूछकर किसी अच्छे रेस्त्रां में चला आया जहाँ शाकाहारी भोजन मिलता हो।

रेस्त्रां की हालत देख कर ऐसा लग रहा है मानो दशकों पुराना है। फिर भी मैं दाखिल हुआ। आसपास भोजन कर रहे लोग खा पी कर निकल रहे हैं।

भोजन में दाल चावल ही कादी रहेगा मेरे लिए। जल्दी जल्दी भोजन करने के बाद रेस्त्रां की मालकिन को भुगतान किया और टीटोन की दुकान के पास आ गया।

दस बजते ही में टीटोन से विदा लिया और ट्रक में लदकर निकल पड़ा सिलचर की ओर।

शहर से बाहर निकलने में ही घंटाभर लग गया। ये शायद किसी दूसरे रास्ते से जा रहे हैं। जिस रास्ते से मैं आया था वैसा कुछ भी नहीं दिख रहा है।

कुछ साठ किमी का सफर तय किया होगा की आ पहुंचा ऐसे वीराने में जहाँ ट्रकों की लंबी कतार लगी है। बत्ती गुल और एक दम अंधेरा। ट्रक चालक और कंडक्टर के बीचो बीच बैठे मैं ये सब नजारा देख रहा था।

ड्राइवर साहब धड़धड़ाते हुए गाड़ी निकालते चले गए। ट्रकों की एक कतार तो अपनी जगह खड़ी है। पर जिनका सब्र टूट रहा है वो कतार तोड़ कर दूसरी कतार बनाने निकल पड़े।

रात के अंधेरे में लग गया एक तरफा जाम। ड्राइवर कंडक्टर गाड़ी से उतरे और निकल पड़े स्तिथि का जायजा लेने। यहाँ मैं अकेला ट्रिक में बैठा समझने की कोशिश कर रहा की आखिर कब तक खुलेगा जाम।

दोनों वापस आए तो मालूम पड़ा पहाड़ गिरने की वजह से कीचड़ इतना बड़ा है की उसको पार करके किसी गाड़ी का निकालना खतरे से खाली नहीं है। 

मैंने दरवाजा खोला तो नीचे सिर्फ कीचड़ ही पाया। रात में कुछ समझ ही नहीं आ रहा है। बिना जमीन पर कदम रखे ही ट्रक की रॉड पकड़ते हुए पीछे हिस्से में कूदा। यहाँ मेरा बैग प्लास्टिक की पन्नी में लिपटा हुआ रखा है।

साथ ही रखे हैं दो पटरे। जब ये सुनिश्चित हो गया की आज रात में कुछ होना नहीं है तो पटरों को आपस में मिला कर मैं उसी के ऊपर सो गया। हालांकि नींद ठीक से नहीं आई और कई बार टूटी।

28 जुलाई 2019

सुबह पता चला जाम लगने की वजह

पटरे के ऊपर रात भर ठीक से नींद नहीं आई। रातभर सिर्फ करवट बदलता रहा। सुबह उठा और जायजा लेने निकल गया। फिर उसी हिसाब से निर्णय ले सकूं।

जूते पहने और बैग यहीं छोड़कर ट्रक से उतरकर चला ट्रकों के बीच से होते होते। घटना वाले इलाके में पहुंचा तो हालत काफी जर्जर थे। मिट्टी का ढेर जिसके ऊपर पानी पडने से कीचड़ बन गया था। उसी में बीच ने उस तरफ से इस तरफ आते हुए एक ट्रक फंसा हुआ है।

एक के पीछे एक सकड़ों ट्रक खड़े हैं। समांतर हालत इस तरफ भी हैं। दोनो तरफ ट्रक का हुजूम ऐसा है मानो युद्ध करने आए हो मगर आदेश नहीं है। इस तरफ तो ट्रकों की तीन तीन कतार बन चुकी है।

किसी ने कहा आज रविवार का दिन है तो कोई प्रशासन भी नहीं आएगा मलबा हटाने। बैठे बैठे यहाँ समय बरबाद करने से अच्छा है कम से कम इस कीचड़ को पार करके उस तरफ जाऊं। जो करा जा सकता है।

वापस से ट्रक की तरफ आया अपना बैग उठाया और चल पड़ा। इससे पहले को सूरज सिर पर चढ़े सुबह सुबह जितना रास्ता तय कर लूं उतना बेहतर है।

ड्राइवर तो नदारद है, बस के कंडक्टर को अलविदा बोलकर निकल पड़ा कीचड़ पार करने। कीचड़ भी ऐसा जिसे बीच से पार करना तो मूर्खता ही कहा जाएगा।

किनारे किनारे लोगों का आना जाना जारी है। कुछ जगह ऊंचा है और कुछ जगह नीचा। मैं भी किनारे किनारे निकलने लगा टीले के ऊपर चढ़ कर।

उछलते कूदते। कभी किनारे से तो कभी कीचड़ से। एक ऐसी स्तिथि आई जहाँ टीला खतम हो गया और दूसरे टीले पर पहुंचने के लिए नीचे आना ही पड़ेगा। अगले टीले के पास पहुंचने से पहले कीचड़ में पर पड़ा और दाहिना पैर कीचड़ में धसने लगा।

टीले पर से निकल रहा एक युवक ये सब देख मुस्करा रहा है। गुस्से में मैने उसको लताड़ते हुए मदद के लिए कहा। तब कहीं जाकर उसकी हंसी गायब हुई और मेरी तरफ हांथ बढ़ते हुए अपनी तरफ खींचा।

सड़क पर मलबा मिजोरम में देखना आम बात है जिससे यातायात प्रभावित होता है

कीचड़ से निकलने के बाद जूते बुरी तरह से सन चुके हैं। थोड़ा कीचड़ जूते के अंदर भी चला गया है। जिसकी वजह से चलने में थोड़ी दिक्कत आ रही है।

आगे बढ़ने पर सुनाई पड़ रही है झरने की आवाज। ध्यान से सुना तो कतार में खड़े ट्रकों के दाहिने तरफ पहाड़ पर एक छोटा झरना बह रह है। जो छुपा हुआ है, यहाँ काफी लोग जमा हैं।

मैं बैग और जूतों सहित यहीं आ गया। बैग एक किनारे रख दोनो जूते धोने लगा। एक में कीचड़ बहुत ज्यादा लगा है, इस दाहिने पैर के जूते में अंदर भी गया है। तेज बहाव में जूतों में पानी भर गया जो अब पहनने लायक ही नहीं रहे।

धुलाई के बाद पास में दिख रहे ढाबे के तरफ कदम बढ़ाए। यहाँ ट्रक बंद करके उसके चालक और कंडक्टर स्टोव जला कर अपना अपना खाना पका रहे हैं। किसी की सुबह अभी हुई है तो कोई खाना खा रहा है।

ढाबे पर लोग चाय नाश्ते का स्वाद ले रहे हैं। ढाबे में बने सौंचालय के बाहर कतार लगी है। ठीक वैसे जैसे किसी ट्रेन के डब्बे के बाहर। 

मैं बैग लेके आ गया एक जरूर काम करने। लोग यहाँ इतने बेसब्र हैं की किसी को अंदर ज्यादा देर बैठने ही नहीं दे रहे।

डब्बे में पानी भी खुद ही भर कर ले जाना होगा। इससे पता चला की अंदर कोई नल या टोंटी नहीं जिससे पानी का स्त्रोत बना रहे। जब मेरा क्रम आया तब मैने अपना बैग बीच से फटे हुए दरवाजे के सामने ऐसे लगाया की अंदर बैठे होने के बावजूद बैग पर नजर बनी रहे।

नित्य कर्म के बाद अब कुछ दिमाग चलने की स्तिथि में आया है। ढाबे की छत के नीचे सबको नाश्ता करते देख मुझे भी चाय की तलब लगी। चाय और बिस्कुट ही है जो सब कर रहे हैं और यही उपलब्ध भी है अभी। ऐसा काउंटर पर पता चला। नाश्ता करने के बाद भुगतान के लिए काउंटर पर आया। 

सिलचर तक पैदल चलने की हिम्मत

बाहर ही खड़ी छोटी गाड़ी पर नजर पड़ी। जो इस ढाबे तक ही आई हुई है। इसका ड्राइवर भी काउंटर पर खड़ा होकर भुगतान की मांग कर रहा है। ड्राइवर से सिलचर जाने की बात हुई जिसमे उसने बताया की समय बेसमय उसका यहाँ से प्रस्थान होगा जिसकी वजह से कुछ कह नहीं सकता की कितनी देर में यहाँ से निकलेगा।

इससे बेहतर है की मैं पैदल ही चल दूं क्या पता रास्ते में कोई और वाहन लौटते वक्त मिल जाए। कल शाम तक हर हाल में मुझे अगरतला पहुंचना ही है और शाम की ट्रेन पकड़नी है।

चाय बहुत फीकी और बिस्कुट का स्वाद कुछ अजीब था। जहाँ कुछ भी ना नसीब हो तो ये भी उत्तम। बैग उठाकर चल पड़ा अपनी मंजिल की ओर। कहीं कीचड़ तो कहीं पक्की सड़क।

कुछ आधे किमी बाद सड़क किनारे बंधा सुअर जो शायद कई लोगों की भूख मिटाने के लिए बांध कर रखा गया है कीचड़ में लथपथ तो है ही साथ ही बदबूदार इतना की निकलना मुश्किल हो रहा है।

समय काफी हो गया है। अब सूरज उफान पर है और शायद मैं अकेला ही इन पहाड़ियों पर बैग लेके सैर कर रहा हूँ। इस उम्मीद में की कुछ तो भला होगा।

पुल पार करते समय जमीन पर साई बाबा का लॉकेट पड़ा मिला। जिसे उठा कर मैने अपने शर्ट की जेब में रख लिया। शायद इसका फल मिले!

मेरे पीछे पीछे एक आदमी पैदल चल रहा है। पुल पार करते ही एक दुपहिया वाहन सवार ने उस आदमी को बैठाया और ले कर निकल गया। खुद को ठगा सा महसूस करने लगा। ज्यादा मैं चला और फल प्राप्त हुआ कम और पीछे चलने वाले को।

यहाँ भाग्य का साथ ना मिला। अब शायद मुझे पैदल ही बचा हुआ रास्ता तय करना पड़ेगा जब तक शरीर में जान है। चल चल कर थक भी गया हूँ। शरीर भी टूटने लगा है इस भारी वजन के साथ।

आखिरकार दो किमी पैदल यात्रा करने के बाद अब ऐसा लग रहा है जैसे अब इस तपती धूप में छांव ना ली तो मृत्यु निश्चित है। आखिरकार थक हार कर एक ट्रक के पास रुका। टूटे हुए शरीर से अलग कर हर एक सामान सड़क पर रखने लगा।

शर्ट भी पसीने से भीग चुकी है और गीले जूते बैग में रखे हैं। जो वजन बढ़ा रहे हैं। रास्ते में कई ट्रक वालों ने टोका भी आराम करने के लिए पर मैं ही ना रुका कहीं भी। क्योंकि कल ट्रेन पकड़नी है। जरा सी चूक और मुझे लंबा भुगतान करना पड़ सकता है।

बैग से जूते निकाल कर सुखाने लगा। बदन से शर्ट उतार कर उसे भी सुखाने लगा। खुद भी बैठ गया ट्रक के टायर पर बैग टिका कर।

हालत इतनी बुरी है की किसी से बात करते भी नहीं बन रहा। ट्रक में बैठे एक युवक ने कुछ पूछा भी जिसे सिर हिलाते हुए जवाब दे दिया। वो मोबाइल पर लूडो खेल रहा है जिसकी आवाज साफ सुनी जा सकती है।

मिली मदद

आधा घंटा बीत जाने के बाद अब शर्ट भी सूख गई है और शरीर में जान भी आ गई है। दूर से आ रही छोटे लोडर पर नजर पड़ी। ध्यान से देखा तो नजर आया ये तो वही लोडर है जो ढाबे पर खड़ा था और शाम तक निकलने की बात कर रहा था।

मैं फौरन सामान बांधते हुए बैग में भरा और नंगे पैर ही लोडर में चढ़ गया की कहीं ये आखिरी उम्मीद भी भाग ना जाए। लोडर में पहले से ही कुछ लोग मौजूद हैं जो शायद ढाबे से ही आ रहे हैं।

लोडर में एक नवयुवक बिलकुल हुबहू हार्दिक पंड्या जैसा दिख रहा है। कैमरा बैग में भीतर रखा नहीं तो एक फोटो ले लेता। एक फोटो उस नजारे की भी लेनी चाहिए थी जैसा मैं ट्रक के आगे सारा सामान फैलाए बैठा था।

अभी पहाड़ियों से गुजर रहा हूँ। यहाँ नीचे की पहाड़ियों के ऊपर बसे बादलों का दृश्य बहुत ही अद्भुत है। कुछ चीज़ें मानव की पहुंच से और उनकी चर्चा से दूर ही रहती हैं। जिसकी वजह से उसकी सुंदरता सालों साल बरकरार रहती है।

वैसा ही हाल कुछ यहाँ का भी है। रास्ते में कुछ सवारियां उतर गई। सफर लंबा होने वाला है। इसलिए ड्राइवर ने पहले स्टॉप पर रोका। यहाँ चाय पानी के लि एदस मिनट रुकी और फिर से चल पड़ी।

वापसी मार्ग में इस लोडर के सिवाय और कोई भी गाड़ी नजर नहीं आ रही। हां ट्रकों का ऐजवाल के रास्ते जाना बरकरार है। इस बात से बेखबर की वहाँ तक पहुंच ही नहीं पाएंगे बस अपनी मंजिल की ओर चलते जा रहे हैं।

कुछ घंटे सुनहरे मौसम में ऐसे ही लोडर चलता रहा, उछलते, धक्के खाते। वातावरण इतना स्वच्छ शायद मानव का यहाँ कोई दखल नहीं है इसलिए भी। सड़क कई जगह अच्छी और बुरी दोनो ही है।

इसलिए बैठ कर जाने में तकलीफ है। इसलिए खड़े खड़े ही सफर करता जा रहा हूँ। ड्राइवर गाड़ी इतनी तेज चला रहा है की लोडर के पिछवाड़े में ना बैठे हुआ जा रहा है और ना ही खड़ा।

ड्राइवर को बोल कर गाड़ी की रफ्तार कम कराई गई। अब त्रिपुरा मिजोरम के बॉर्डर से कुछ ही दूरी बची है। गांव का बसेरा भी दिखने लगा है। अभी मिजोरम में हूँ तो दुकानें बंद ही दिखाई दे रही हैं। 

बॉर्डर से पहले सेना की सिविल लाइंस इलाका भी आ गया। यहाँ सिख रेजिमेंट से ले कर मंदिर और उनमें पूजा करने वाले पंडित भी हैं।

सड़क पर कार से रेस लगाने के बाद ड्राइवर ने समय रहते करीमगंज पहुंचा दिया। इधर लोडर से उतरना हुआ उधर सिलचर के लिए खड़ी ट्रेवलेक्स के चालकों का हल्ला शुरू हो गया।

करीमगंज में हालत पस्त

किराया थमा कर मैं चल पड़ा सिलचर के लिए वाहन में बैठने। सिलचर यहाँ से मात्र कुछ पांच किमी दूर होगा।

गर्मी बहुत लगने लगी है। मिजोरम से बाहर निकलते ही त्रिपुरा में घुसते ही ऐसा लगा मानो वापस घर आ गया हूँ। ट्रेवलेक्स गाड़ी में बैठते ही समझ आ गई यहाँ की हालत।

आधे घंटे के भीतर मैं सिलचर में खड़ा था। एक तो डब्बे वाले फोन होने के कारण मैं बीस साल पीछे चला गया हूँ। जहाँ ना कुछ समझ आ रहा है और ना कुछ कर पा रहा हूँ।

ट्रेवलेक्स वाले ने एक अनजान चौराहे पर सबको छोड़ दिया। पेट्रोल पंप के किनारे बैग रख कर सोच रहा हु आखिर क्या किया जाए अंधेरा होने से पहले। एक बार अंधेरा हो गया तो दुकानें तो बंद ही होंगी साथ ही असुरक्षा भी महसूस होने लगेगी अनजान जगह पर।

सामने दिख रहे होटल को देख मुझे दो विकल्प सूझे। पहला या तो मैं बस पकड़ कर अगरतला निकल जाऊं या फिर सिलचर में ठहर जाऊं। ये दोनो विकल्प मेरे काल्पनिक भी और जानकारी के अनुसार हैं।

ऐसे ही एक आलीशान होटल के रिसेप्शन पर कुछ सवाल किए पर ठहरने को ले कर कोई सवाल नही है। होटल के बाहर खड़े सज्जन से बात हुई जिन्होंने सिलचर का नक्शा भी समझाया। सिलचर में रुकने का स्थान के फायदे और बस से रात में अगरतला जाने के नुकसान भी।

अब बस से सिलचर जाना समझदारी नहीं लग रही है। क्योंकि रात में बसों में लूटपाट की घटना आम हैं। सिलचर से अगरतला का बस से जाने की योजना रद्द करनी पड़ रही है सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए।

इन्होंने ने ये भी सुझाया की अगरतला जाने के लिए या तो यहीं इसी शहर में रुक जाऊं या फिर धर्मानगर निकल जाऊं। मेरी कोशिश यही रहेगी की कल सोमवार की शाम की ट्रेन पकड़ने के लिए आज जितना नजदीक अगरतला के पहुंच जाऊं उतना बेहतर।

हालांकि धर्मानगर से भी सहूलियत पड़ेगी ट्रेन पकड़ने में पर बिना स्मार्टफोन और जानकारी के खतरा मोड़ नहीं लेना चाहता। दुकान दर दुकान पहुंचते हुए किसी तरह से वाहन करके रेलवे स्टेशन पहुंचा।

ऑटो में भी लोगों से पूछताछ करते ही स्टेशन पहुंचा। किसी ने कहा ट्रेन है किसी ने कहा अब कोई ट्रेन नहीं। लोग भ्रम की स्तिथि में थे और मुझे भी डाल रहे थे।

जिन्हे ठोस जानकारी है उनके मुताबिक ट्रेन के निकलने का समय आठ बजे है और चार घंटे का समय ले कर धर्मनगर पहुंचेगी रात के बारह बजे तक।

यही विकल्प सही लगा और रेलवे स्टेशन पर टिकट घर के सामने लग गया कतार में। कतार बड़ी बड़ी हैं पर होशियारी से मैं छोटी कतार में लगा।

टिकट कटा पर गलती से मुझे दो टिकट काट दिए गए खिड़की के इस पार द्वारा कर्मचारी से। अब मुझे एक किनारे खड़े हो कर इंतजार करना पड़ेगा उसका जिसे दो टिकट लेने हैं।

खैर ज्यादा इंतजार ना करते हुए दो टिकट लेने वाले शख्स भी मिले। और मैने टिकट की अदला बदली कर भीड़ के बीच से निकलते हुए स्टेशन पर खड़ी गाड़ी जो की धर्मानगर को जा रही है उसी में लपक गया। ट्रेन में सबसे अगले हिस्से में बैठ गया।

ट्रेन एक दम खाली और ये सिलचर से धर्मनगर तक ही जाती है। ट्रेन इतनी खाली है को चयन करने में आफत आ रही है की आखिर बैठूं तो कहाँ बैठूं। विद्यार्थी से लेकर कर्मचारी सभी हैं।

धर्मानगर पहुंचने के बाद अगले दिन की तस्वीर अगरतला जाते वक़्त

अँधेरी रात में धर्मानगर

ट्रेन में सफर शानदार रहा। रात के बारह बजे जब धर्मानगर पहुंची तो पहला खयाल जो मन में आ रहा है वो ये की रुकना कहाँ है!

स्टेशन से बाहर निकलते ही ऑटो और रिक्शेवालों ने घेर लिया। अंधेरी रात में ऑटोवालों का इस तरह पीछे लगाना काफी चिंता जनक है।

स्टेशन से निकलते ही सौ मीटर दूर ही मुख्य सड़क आ जाती है। सड़क पर हलचल कम है। मैं तेज़ क़दमों के साथ आगे बढ़ रहा हूँ। पास में दिख रहे एक होटल में दाखिल हुआ।

बातचीत हुई और एक सेवक निकल कर आया। भरा बैग ले कर उसने मुझे होटल के कुछ कमरे दिखाए। जो काफी महंगे पर काम पसंद आए। आधी रात में होटल से बाहर जाता देख होटल में अन्य कमरे दिखाने को तैयार हुआ। कमरा भी सही लगा और दाम भी।

रिसेप्शन पर बैठे मालिक को पैसे थमा कर रात के बारह बजे मैंने एक कमरा बुक कराया। माहौल कुछ शराबियों से घिरा हुआ लग रहा है। पर अब इस रात में अंधों में काना राजा वाला हिसाब। जो मिला उसी में संतुष्ट करना।

कमरा काफी छोटा है पर रात गुजारने के लिए सही है। कमरे में बैग रखा। कुछ गीला समान बैग से निकाल कर बाहर रखा और निकल आया स्टेशन के सामने पड़े ढाबे में खाना खाने।

शायद इस ढाबे में मैं आखिरी भूखा ग्राहक हूँ। मुझे खाना परसने के बाद ढाबे का मालिक भी अपने लिए खाना ले आया और साथ ही खाने लगा।

खाने पर कुछ बाते हुई और बातों बातों में कल की भी व्यवस्था कर ली। भुगतान के बाद अंधेरी रात में होटल आया। होटल में भी अब सन्नाटा पसरा है। कमरे में घुसा कपड़े बदले और कब नींद लग गई मालूम ही नहीं पड़ा।

29 जुलाई 2019

सात दिन बाद मिला नहाने का मौका

कल रात तो अच्छी बीती। बैग में भरे लगभग सभी कपड़े मैले हैं। इसलिए इन्हीं कपड़ो में से जो सबसे साफ कपड़ा है उसे निकाला। जो कानपुर तक पहन कर जाऊंगा।

कमरे में ताला डाला उतने में ही सफाई करने वाली महिला आ खड़ी हुई। जिनको चलता किया।

आज लगभग सात दिन बाद यानी जब से अगरतला से निकला हूँ तब से अब नहाने का मौका मिल रहा है। कपड़े धोना तो मुमकिन नहीं। ये अंतराल शायद जीवन में ना नहाने का सबसे लंबा अंतराल होगा।

कमरे में ताला जड़ने के बाद कपड़े ले कर पहुंच गया स्नानघर। शरीर पर एक बार साबुन से नहाने में संतुष्टि ना मिली तो दोबारा लगा कर साफ किया। सिर से ले कर पैर तक। ऐसा लग रहा है काफी दिनों से शुद्धिकरण नहीं हुआ है उसी की भूख मिटा रहा हूँ।

कपड़े पहन कर कमरे तक आया, ताला खोला और बैग व्यवस्थित करने लगा। घड़ी में देखा तो अभी दस ही बस रहे हैं। धर्मानगर स्टेशन से अगरतला को जाने वाली ट्रेन दिन के एक बजे है।

मेरे पास अभी पर्याप्त समय है। सोच रहा हूँ कानपुर जाने वाली ट्रेन की टिकट का प्रिंटआउट निकला लाऊं। स्मार्टफोन होता तो फोन पर ही टीटी को दिखा कर पुष्टि करवा लेता।

डब्बे वाले फोन में ऐसी कोई सुविधा नहीं है। कमरे में ताला जड़ा और होटल के सामने बनी कुछ दुकानें जो काबिल लग रही हैं उनपर रुखसत हुआ।

सभी दो तीन दुकानों में प्रयास किया पर बाजार में किसी भी दुकान में प्रिंटआउट ना निकल सका। कारण हर दुकान में अलग अलग रहा।

किसी के यहाँ बत्ती गुल तो किसी के यहाँ प्रिंटर की तकनीकी खराबी तो किसी के यहाँ इंटरनेट की समस्या। अब कानपुर जाने वाली टिकट अगरतला पहुंच कर ही निकलवानी पड़ेगी।

खाली हांथ लौटना पड़ रहा है होटल की ओर। ज्यादा समय अभी भी नहीं बीता है। दिन का खाना तो उसी ढाबे में तय है जहाँ कल रात को दिनभर की भूख मिटाई थी।

समय पर्याप्त है इसलिए होटल के कमरे में आराम फरमाने लगा।  साढ़े ग्यारह बजते ही बैग लेके फटाफट निकलने की तैयारी करने लगा। कमरा खाली करके चेकआउट किया और चल पड़ा ढाबे की ओर।

कल रात के कस्टमर को अंकल भी नही भूले हैं। मेरे पहुंचाते ही मुझे कुछ वक्त इंतजार करने को कहा। कुछ देर के इंतजार के बाद खाना आ गया।

ढाबे में ग्राहक में मनोरंजन के लिए एक टीवी भी है। जिस पर बांग्ला भाषा में फिल्म चल रही है। कुछ भी समझ नहीं आ रहा। 

खाना पीना करके भुगतान किया, अंकल से अलविदा लिया और सामने दिख रहे स्टेशन की ओर निकल पड़ा।

स्टेशन पहुंचते ही टिकट घर से अगरतला तक का टिकट कटाया। ट्रेन के अगरतला पहुंचने का समय पांच बजे दिखा रहा है। अगरतला से राजधानी एक्सप्रेस का निकलने का समय शाम के साढ़े छह बजे का है।

मतलब कितना भी लेट लतीफी हो जाए गिरी हालत में मैं पहुंच जाऊंगा ये तो तय है। तपती धूप में ट्रेन के इंतजार में काफी भीड़ खड़ी है।

स्टेशन पर एक अजीबो गरीब वाक्य हुआ। कुछ आधे घंटे बाद लोगों का एक हुजूम स्टेशन के अंदर अचानक घुस आया। पहनावे से मुस्लिम जगत के लग रहे हैं। जो साथ में लाश ले कर आगे बढ़ रहे हैं। आधे घंटे चले इस तमाशे में हर कोई शांत खड़ा है। यहाँ  तक कि पुलिस भी।

जत्था कुछ देर में निकल भी गया। पर इतनी देर में यहाँ क्या करने आए थे कुछ समझ न सका कोई।

अगरतला के लिए रवानगी

ट्रेन समय पर आई। मैं इतनी देर से जो प्लेटफार्म पर चक्कर लगा रहा हूँ आखिरकार अब रुक गया। ट्रेन का अगला इंजन पीछे लगा दूसरी पटरी से हो कर आगे लगा।

कल की तरह आज ट्रेन खाली तो नहीं पर जगह है बैठने के लिए। स्टेशन पर काफी देर खड़े रहने के बाद ट्रेन चल पड़ी अगरतला। 

कल रात में सिलचर से धर्मानगर पहुंच कर बहुत अच्छा निर्णय रहा। जिसमे स्थानीय काफी मददगार साबित हुए। अन्यथा आज दौड़ भाग में ही सारा समय गुजर जाता।

धर्मनगर से अगरतला का सफर काफी शानदार रहा। ट्रेन ने रास्ते भर अपनी गति बनाए रखी। एक स्टेशन पर दोबारा इंजन की बदली हुई जिसमे ट्रेन आधे घंटे खड़ी रही।

शाम के पांच बजे ट्रेन ने अगरतला शकुशाल पहुंचा दिया। अगरतला स्टेशन पर ये मेरा पहली दफा आगमन है। प्लेटफार्म संख्या एक पर राजधानी को खड़ा देख अब लग रहा है घर तो सुनिश्चित ही पहुंच जाऊंगा।

तीसरे प्लेटफार्म से पहले प्लेटफार्म पर आने के लिए खतम होते प्लेटफार्म से एक नंबर पर आ गया। अगरतला स्टेशन के बैनर के साथ रह चलते आदमी से फोटो निकलवाई।

कैमरा पकड़ते वक्त लग रहा था की कहीं लेके भाग ना जाए। पर अब शरीर में ऊर्जा है तो पीछे पीछे भाग कर मैं भी पकड़ सकता हु उसे।

ट्रेन की बोगी में चढ़ा और अपनी सीट पर बैग रख कर निकल पड़ा स्टेशन के बाहर टिकट का प्रिंटआउट निकलवाने। ट्रेन में अधिकांश सेना के जवान हैं। जिनमे से एक से विनती कर आया हूँ की वह बैग देखें रहे बस। अब सेना पा तो आंख मूंद कर भरोसा करा जा सकता है।

स्टेशन के बाहर निकल कर प्रिंटआउट निकलवाने के बाद कुछ बिस्कुट लिए और आ गया अपनी सीट पा वापस। यहाँ से करीब दो दिन तो लगेंगे ही कानपुर तक पहुंचने में।

आखिरकार 31 जुलाई की सुबह कानपुर पहुंच गया। ट्रेन के भीतर जवानों के संग अच्छा समय गुजरा। जिसमे उन्होंने अपने रोचक किस्से सांझा किए और मैने अपने घुमक्कड़ी के।

चम्पई से कानपुर तक की कुल यात्रा 2737km

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3 Comments

  1. मेरे साथ भी कई बार ऐसा हुआ है कि मैं आगे चल रहा हूं और जो है लिफ्ट पीछे वाले को मिल जाती है।

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