ब्रह्मांड का गर्भ कामाख्या देवी मंदिर

कामाख्या | असम | धार्मिक स्थल | भारत दर्शन

स्वच्छ गुवाहाटी

आज कामाख्या देवी मंदिर जाने की योजना है। फिर वहीं से शिलोंग। पर अभी प्रशांत जी के घर में आंख खुली है। कुछ हलचल तो है घर में।

जैसा प्रशांत जी ने कल बताया था सुबह वो भी निकल जाएंगे अपने कार्यालय शायद उसी की तैयारी में जुटे हुए हैं। जमीन पर ही बिछे गद्दों पर चैन की नींद ली।

मखमली बिस्तर का भी कोई मुकाबला नहीं है जमीन पर लगे बिस्तर से। जमीन से जुड़े लोग ये बात समझ सकते हैं। नींद टूटी तो मैं भी उठकर तैयारी करने लगा निकलने की।

इच्छा तो है एक दिन और रुकने की पर ऐसा करने पर शायद बाकी के जगहों के लिए देरी भी हो सकती है। घर के सामने का नजारा तो बहुत ही लाजवाब है।

खासतौर पर ये दाहिने हिस्से पर बसी पहाड़ी। प्रशांत जी ने कभी चढ़ाई तो नहीं कि पर वो जरूर इस जगह पर जाना चाहेंगे।

इनके घर में सुबह तो बहुत ही कमाल की होती है। बताते है प्रदूषण पहले के मुकाबले यहाँ भी बढ़ गया है। जिस वजह से सरकार ने बंदिशे लगा रखी हैं।

क्रिकेट विश्व कप फाइनल

कल रात क्रिकेट विश्व कप का न्यूजीलैंड बनाम इंग्लैंड का फाइनल था। जिसे मैंने पहले तो सुना फिर हॉट स्टार पर देखा भी।

पता तो तब लगा था जब अगल बगल के घरों से हो हल्ले की आवाज़ें आ रही थीं। इंग्लैंड की जीत से कोई भी संतुष्ट ना था जिस तरह से अंपायर ने वो नाजायज चौका दिया।

उनके इस फैसले ने सबको चौंका दिया अंत में तो आईसीसी के नियमों ने चौंकाया। जिसमें अगर सुपर ओवर में दोनों ही टीम बराबर के स्कोर पर होंगी तो विजेता ज्यादा बाउंड्री लगाने वाली टीम को घोषित किया जाएगा।

इंग्लैंड ने विश्वकप जीता और न्यूजीलैंड ने दिल। इतिहास में ट्रॉफी जीतने वालों का नाम दर्ज होता है ना कि दिल।

निराश तो था पर और ना ही मंजूर था। घर की दीवारों पर पेंसिल की कलाकृतियां बनी पाई जिसे देख कर मालूम पड़ रहा है कि घर में छोटा बच्चा भी है।

अब प्रशांत जी तो इस उम्र में ये सब करने से रहे। फिलहाल तो आजकल प्रशांत जी घर पर अकेले ही हैं। और परिवार के ना होने का फायदा पढ़ाई लिखाई करके बीता रहे हैं।

पढ़ाई का महत्व इंसान को बदल कर रख देता है। बशर्ते आप पढ़ क्या रहे हैं उस पर भी निर्भर करता है। इधर साथी घुमक्कड़ मैं अपने दांत घिस रहा हूँ उतने में काम वाली बाई आ गईं।

प्रशांत जी ने आज अतिरिक्त पराठे बनाने को कहा। जब तक सुबह का नाश्ता बनता साथी घुमक्कड़ ने फौरन नहा धो लिया।

प्रशांत जी नाश्ता करके घड़ी में नौ बजते ही अपने कार्यालय को निकल गए। बैंक में कार्यत उनका कार्यालय भी कुछ कदम की दूरी पर ही है।

और स्थान निवास भी यही है। जबतक वो आंटी जी घर का काम निपटाती मैं नहा धो कर तैयार हो गया।

आंटी जी के का। खतम करते ही मैं भी सारा समान उठा निकल पड़ा।

फ्लैट में ताला डाला और लिफ्ट से नीचे उतरने लगा। कार्यालय पर पहुंच कर प्रशांत जी को कॉल लगाया। बैंक में आज भीड़ खूब लग रही है सिवाय एटीएम के।

कुछ ही देर में प्रशांत जी अपने ऑफिस से बाहर निकले। उनको चाभी पकड़ाना हुआ और मेरा कामाख्या के लिए निकलना। पिछली रात उनके साथ समय बिता कर काफी अच्छा लगा।

प्रशांत जी के साथ लेखक

सफर शुरू हो गया

सफर की शुरुआत तो अच्छी हुई है। सोच रहा था बैग यहीं रख कर कामाख्या निकल जाता लेकिन शिलोंग निकलने से पहले घर के दो चक्कर लग ही जाते।

यहाँ से कुल पांच किमी का सफर दिखा रहा है कामाख्या के लिए। सोच रहा हूँ चार पहिया वाहन से निकल जाऊं। चार पहिया वाहन करने चला तो एक सज्जन ने बताया कि बस से जाना ज्यादा बेहतर होगा।

सड़क पार करके इस पट्टी पर आ गया। इसी पट्टी की एक दुकान पर कल रात में भोजन किया था। ये एकमात्र दुकान थी जिसने शाकाहारी भोजन मिल रहा था।

अन्यथा सभी दुकानों में मांसाहारी वो भी ऐसा जिसका नाम लेना भी उचित नहीं होगा। कुछ एक मिनट का इंतजार और इतने में ही कामाख्या जाने के लिए बस आ धमकी।

कामाख्या मंदिर तो नहीं पर कामाख्या मंदिर गेट तक जरूर जाएगी। सो चढ़ गया। बस में ज्यादा सवारी नहीं है पर फिर भी बैठने को कहीं जगह नहीं है।

अचानक मौसम में तब्दीली हुई और वर्षा होने लगी। ये भारी भरकम वर्षा के कारण बाहर कुछ भी नहीं दिख रहा। ऊपर से वातावरण में ठंड बढ़ गई है।

बीस मिनट के भीतर ही हम कामाख्या गेट आ पहुंचे। यहाँ पर कंडक्टर ने उतार तो दिया साथ ही कामाख्या मंदिर तक जाने के लिए बस का आने का समय भी बताया।

हल्की फुल्की बूंदाबांदी के बीच खड़े रह कर थोड़ा भीग गया हूँ। पास में दर्जी कि दुकान पर कामख्या के लिए मार्ग पूछने पर पता चला कि मैं ग़लत ओर खड़ा हूँ।

सड़क पार करके उस पट्टी पर कामाख्या मंदिर जाने के लिए बस आयेगी। बारिश ने अब तेज़ रूप ले लिया है। इससे पहले कि पूरा भीग जाऊं सड़क पार करके बस अड्डे की सीट पर पहुंच कर खुद को बारिश से बचा लूं।

अन्यथा पहले ही दिन बीमार पड़ने के ज्यादा अवसर लग रहे हैं। पूर्वोत्तर भारत में यूं ही बारिश से दो चार होना पड़ेगा। एक तो यहाँ का जलवायु ही कुछ ऐसा है कि बिना बारिश के जी नहीं भरता ऊपर से जुलाई का महीना।

दिन के बारह बजने वाले हैं और इस टूटे फूटे बस अड्डे पर बस का इंतजार है। कुछ ही क्षण में बस का आना हुआ। इधर लबालब सवारियां उतरी उधर मैं चढ़ा।

कामाख्या गेट बस अड्डे पर बस का इंतज़ार करते लेखक और साथी

कामाख्या को जा रही बस से एक मर्तबा फिर पुष्टि की। तब जा कर कंधे से बैग उतर कर बस की सतह पर रखा। शुक्र है इस बार बैठने को जगह मिल गई भले ही वो पिछली सीट हो।

कामाख्या मंदिर का रहस्य क्या है?

नीलांचल पर्वत पर बसे इस मंदिर की मान्यता बहुत अधिक है। देवी सती के इस मंदिर में बारहों मास भक्तों का तांता लगा रहता है। कामाख्या नाम का अर्थ है दुर्गा, कामना को पूर्ण करने वाली।

अग्नि समाधी लेने के बाद जब शिव जी माता सती का शव लेके घूम कर विलाप कर रहे थे। तब देवताओं के आग्रह पर विष्णु जी ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के 51 भागों में विभाजित के दिया था।

जो धरती पर आ गिरे थे। उन भागों में से एक माता सती की योनि इस स्थान पर आ कर गिरी थी। कामाख्या देवी मंदिर बहुत ही चमत्कारी मंदिर है।

खासतौर पर इसे अघोरियों और साधुओं का गढ़ माना जाता है। जिन 51 भागों में माता के शरीर के टुकड़े गिरे थे वो आज शक्तिपीठ हैं।

और उन सभी शक्तिपीठों का महापीठ माना जाता है। मजेदार बात है कि इस मंदिर में किसी भी देवी की मूर्ति नहीं है। सिर्फ एक योनि के आकार का पत्थर है जिसकी पूजा की जाती है।

हर साल तीन दिन यह मंदिर माता के मासिक के दौरान बंद रखा जाता है। जिस दौरान इस पत्थर पर सफेद वस्त्र डाल दिया जाता है। इस वस्त्र को अम्बुवाची कहते हैं।

तीन दिन बाद धूमधाम से कपाट खोले जाते हैं और ये सफेद वस्त्र लाल हो जाता है। जिसे प्रसाद के तौर पर भक्तों में बांटा जाता है। इसलिए अम्बुवाची उत्सव मनाया जाता है।

मासिक के दौरान साधु संत, अघोरी आसपास गुफाओं में इक्कठा हो कर विशेष सिद्धियां हासिल करते हैं।

माता की योनि हमेशा फूल से ढकी रहती है। और इस कुंड से हमेशा पानी निकलता रहता है।

वैसे तो सालभर भीड़ होती ही है पर विशेष तौर पर दुर्गा पूजा, पोहान बिया, दुर्गादेऊल, वसंती पूजा, मदानदेऊल, अम्बुवासी और मनासा पूजा कामाख्या देवी मंदिर का अलग महत्व है।

पहुंचा कामाख्या मंदिर

घुमावदार रास्तों पर बस जैसे जैसे ऊपर चढ़ रही है मंदिर के उतने ही नजदीक आता जा रहा हूँ। सावरियों का चढ़ने उतरने का क्रम जारी है।

कुछ पंद्रह मिनट के भीतर मंदिर से कुछ एक किमी पहले बस रूकी। इससे पहले सवारियां उतरती ड्राइवर ने बस को मोड़ना ठीक समझा।

दूसरी सवारियां चढ़ती की पहले उतरने वाली सवारियों को मौका दिया गया। इस भीड़ में खुद को बचाते हुए बैग सहित उतर गया। शायद बैग प्रशांत जी के यहाँ रखवा देता तो ज्यादा सहूलियत होती।

गली कुंचों से गुजरते हुए आ गया बाज़ार जहाँ फूल मंडी के साथ साथ जूता चप्पल, बैग रखने की सहुलियत भी देखी जा सकती है।

फूल तो बाद में पहले इस वजनी बैग को ठिकाने लगाता हूँ। सामने दिख रही इमारत में दोनों ही सुविधा हैं। सो आ गया इमारत के सामने और बैग के काउंटर पर दो बैग की पर्ची कटाने लगा।

पर्ची नीचे कट रही है और बैग पहले माले में जमा करना होगा। कूपन लेके आए पहुंचा ऊपर और एक बड़े से लॉकर में दोनों बैग रखवा दिया।

एक छोटा बैग निकाल कर उसमे दोनों कैमरे रख लिए। बैग का तो इंतजाम हो गया अब जूतों का भी देख लेता हूँ। पर यहाँ साथी घुमक्कड़ जूते जमा करने को राजी नहीं हो रहा है।

केदारनाथ में जो कुछ हुआ उसके बाद से अब जूते चोरी होने का दोबारा जोखिम नहीं लेना चाहता। तय हुआ कि जूते नहीं जमा करेंगे और बारी बारी से मंदिर में दर्शन करेंगे।

ये प्रक्रिया थोड़ी लंबी है पर साथी घुमक्कड़ को लंबी प्रक्रिया मंजूर है पर जूते चुरवाना नहीं। जूता काउंटर पर बहुत भरोसा दिलाने के बाद भी साथी घुमक्कड़ को तसल्ली ना हुई।

कुछ मीटर दूर स्तिथ मंदिर की ओर चल पड़ा। रास्ते भर साधु संत और फूलवालों कि दुकान ही दिखाई पड़ रही है। साथ ही दिख रहा है एक आश्रम जहाँ भक्तों को भोजन कराया जाता है।

ब्रह्मांड का गर्भ कामाख्या देवी मंदिर

कामाख्या मंदिर की रोचक बातें

1.मान्यता है कि माता सती की योनि यहाँ गिरी थी।

2.देवी के महामुद्रा रूप को योनि रूप कहा जाता है।

3.तांत्रिक सिद्धि के लिहाज से सबसे उच्च स्थान है। दुनिया भर के तांत्रिक और अघोरी अपनी शक्तियों का विस्तार करने यहाँ आते हैं।

4.पूरे ब्रह्मांड का केंद्र बिंदु माना जाता है कामाख्या देवी मंदिर।

5.गर्भगृह में सिर्फ योनि के आकार का पत्थर है।

6.बलि चढ़ाने की प्रक्रिया वर्षों पुरानी है। यहाँ मादा जानवर की बलि नहीं चढ़ाई जाती। बकरा, भैसा, सांड, कबूतर के अलावा कद्दू, लौकी जैसे फलों की भी बलि चढ़ाई जाती है।

7.मंदिर का महत्वपूर्ण हिस्सा जमीन से बीस फीट नीचे है।

8.वर्ष में तीन दिन के लिए ब्रम्हपुत्र का पानी मासिक चक्र के समय लाल हो जाता है।

9.देवी कामेश्वरि और भगवान कामेश्वर की शादी के रूप में पूजा पूस महीने में कि जाती है।

कामख्या देवी मंदिर में दर्शन

बात आईं दर्शन की तो एक बार फिर मैंने साथी घुमक्कड़ को जूते दुकान में रखवा कर साथ चलने को कहा। पर वो राजी ना हुआ। अयज को यहीं रोक कर पहले मैं मंदिर की ओर बढ़ा दर्शन के लिए।

अब जूते साथी घुमक्कड़ के पास हैं और मैं अन्दर। भारी भरकम कतार में भी लगने की इच्छा है। पर साथी घुमक्कड़ इतनी देर बाहर ही खड़ा रहेगा वो भी ठीक नहीं।

अगर जूते जमा करवा दिए जाते तो कतार में भी लगना बुरा नहीं है। जितनी लंबी रेलिंग बनी है उसकी एक चौथाई भी लाइन नहीं है माता के दर्शन के लिए।

भारत के किसी भी मंदिर में दर्शन करने हों तो सुबह सवेरे पहुंच कर ही कर लेने चाहिए। सबसे बेहतर रहता है इत्मीनान से दर्शन भी हो जाते हैं और समय भी बचता है सो अलग।

मंदिर के सामने लोग फोटो खींचा रहे हैं। मैंने पहले पूरे मंदिर का। चक्कर लगाना ठीक समझा। मुख्य परिसर के दाहिने ओर आ गया।

मंदिर की दीवारों पर चित्र बने हुए हैं। 5०० सालों से भी ज्यादा पुराने इस मंदिर को लेके अनेकों कहानियां हैं। जिसका वर्णन किसी और ब्लॉग में करूंगा।

कामख्या देवी मंदिर का बलि घर

मंदिर के पिछले हिस्से में आया जहाँ खून ही खून बिखरा पड़ा है। बलि घर में एक ज़िंदा सांड खड़ा है। आसपास के माहौल को देख कर इस जानवर को आभास तो है यहाँ क्या हो रहा है।

कामख्या देवी मंदिर का बलि घर

इसलिए पहले से ही वो हाँथ पैर पटक रहा है। और उसे पकड़े हुए हैं तीन से चार लोग उसकी बली चढ़ाने के लिए। सांड पूरा जोर लगा रहा है यहाँ से भागने के लिए पर वो भाग नहीं सकता।

सांड जोर जोर से चिंघाड़ भी मार रहा है। और ये सब देख कर मेरा ह्रदय मोम कि भांति पिघल रहा है। रोना भी आ रहा है पर इस प्रथा के खिलाफ यहाँ कुछ कहना या बोलना ठीक नहीं रहेगा।

व्याकुलता के कारण मैं कतार की ओर देखने लगा। कतार ज्यादा लंबी नहीं है। और सभी की निगाहें या तो बलि घर या फिर मंदिर के गर्भगृह पर हैं।

गर्भ गृह और कतार के बीच है मंदिर का आंगन जहाँ से लोगों को आवाजाही भी है।

इसी के चलते जब भी मंदिर के गर्भगृह में भक्तों को भेजा जाता है तब तब शिफ्टिंग डोर से रास्ते को बंद करके भक्तों को इस पार भेज दिया जाता है। और फिर से रास्तों को खोल दिया जाता है।

वर्षों पुरानी यह समस्या रही होगी जिसका ये समाधान निकला है। देखते ही देखते उस सांड के उपर तीन चार वार किए गए जिसके बाद उसकी गर्दन धड से अलग हो गई और उसकी चीख पुकार की आवाज़ भी नहीं सुनाई से रही।

एक तेज़ धारा का खून बस निरंतर बह रहा है। और उस सांड का धड जमीन पर एक किनारे पड़ा हुआ है। जो पल भर पहले सांसे ले रहा था उसकी सांसे छीन ली गईं हैं।

बलि घर के दूसरे हिस्से में छोटे जानवरों की बलि चढ़ाई जा रही है। जैसे बकरे या भेड़। कैसे काटे जा रहे हैं ये देखने के कि मैं थोड़ा और समीप आ गया।

पिछले हिस्से में एक बकरे को पकड़ कर उसकी गर्दन v आकार वाले टीले पर रखी और गड़ासा उठा कर चला दिया। एक झटके में जो मेमना चीख रहा था शांत हो गया और गर्दन धड से अलग।

एक लाइन से बकरे और भेड़ों के सिर लगे हुए हैं। धड का ना जाने क्या हो रहा है। शायद पका कर खाएंगे।

यहाँ चल रहे इस मौत के तांडव से दूर मंदिर की ओर आ गया।

कामाख्या देवी मंदिर की वास्तु-कला

सीढ़ी उतर कर नीचे आया और मंदिर की दीवार पर बनी कलाकृतियों को निहारने लगा।

कामाख्या देवी मंदिर क्व दीवार पर बनी कलाकृतियां

कितनी बारीकी से इस पर काम किया गया है। हैरानी की बात नहीं है कि इतने पुराने मंदिरों की रचना आज के बने मंदिरों से लाख गुना बेहतर है।

संरचना कुछ इस प्रकार की जाती थी कि तीव्रता वाले भूकंप भी झेल ले जाएं और सालों साल धूप, बारिश पड़ने के बाद भी खड़े रहें।

मंदिर के झरोखों में पता नहीं क्यों ये कबूतर दबे बैठे हैं। एक दो नहीं सैकड़ों की संख्या में। कांप रहे हैं फिर भी टस से मस नहीं हो रहे।

कुछ तो मरे भी पड़े दिखाई पड़ रहे हैं। मंदिर की दीवारों पर बनी कलाकृतियां कुछ और ही संदेश दे रही हैं। यहाँ पर भी फोटो खिचने की होड है।

मूर्तियों के पैरों पर कच्चे चावल और फूल चढ़ा हुआ है। मैं भी फोटो खींचा कर बाहर निकल जाऊं। साथी घुमक्कड़ इंतजार में होगा।

सीढ़ी चढ़ कर एक कैमरे वाले भैया से दरख्वास्त की तस्वीरें निकालने की। और उसके बाद तो उन्होंने कुछ शानदार तस्वीरें निकलीं। एकदम हटके!

आश्रम में भोजन

मेरे बाहर आने के बाद साथी घुमक्कड़ उस स्थान पर नहीं है जहाँ उसे मैं छोड़ कर गया था। कुछ ही दूर नजर पड़ी हरी टीशर्ट में एक लड़का हाँथ हिलाते हुए दिखाई दिया वो साथी घुमक्कड़ ही है।

 

कामाख्या देवी मंदिर के सामने लेखक

फूल की दुकान के पास रखी कुर्सी पर इत्मीनान से जूते पहने और साथी घुमक्कड़ दर्शन करने के लिए निकल गया। जबतक यहाँ बैठा रहा तब तक बच्चों का शरारती व्यवहार ही देखने को मिला।

इधर दुकानदार सोया उधर गाय धीरे से उसकी डोलची पर रखे फूल चबा गई। गाय को भागना हुआ और इधर सांड का आना। मतलब साथी घुमक्कड़ का आना हुआ।

भूख तो जोरों की लगी है दिन के तीन बज रहे हैं। बैग काउंटर की तरफ जाते वक्त दिखा एक आश्रम जहाँ कुछ और अवधि तक के लिए भोजन उपलब्ध है।

पर यहाँ साथी घुमक्कड़ के मन में डर बैठा हुआ है जूते चोरी होने का। फिर से एक एक करके अंदर जाने का सिलसिला किया तो बहुत देर हो जाएगी।

साथी घुमक्कड़ को समझा बुझा कर इस बार जूते काउंटर में जूते जमा करवा ही दिए। चौराहे तक जाना हुआ और इससे पहले आश्रम का भोजनालय बंद होता खाना खा लेना उचित रहेगा।

वैसे भी आसपास कोई भी रेस्त्रां या भोजनालय नहीं दिखाई पड़ रहा है जहाँ बैठ कर सुकून से खाना खाया जा सके। ये भी बेहतर और साफ सुद्ध जगह लग रही है।

थोड़ा सिस्टम यहाँ पर अलग लग रहा है। सड़क के इस तरफ खाने वालों का पंजीकरण हो रहा है और दूसरी तरफ भोजन बंट रहा है।

हमें अगर खाना है तो पहले पंजीकरण कराना पड़ेगा। इसलिए बाईं तरफ मुड़ कर अन्दर आ गया। अब नंगे पैर हूँ जूते आखिरकार काउंटर पर जमा करवा ही दिए।

अन्दर एक रसीद मिली जिसपर संख्या लिखी हुई है। मेरे साथ और भी भक्त हैं उनको भी रसीद पकड़ाई गई। जूते उतरवा कर सबको लाइन से अन्दर कमरे में लगी कुर्सियों पर बैठा दिया गया।

आज सालों बाद लग रहा है कि फिर से कक्षा में आ गया हूँ। कमरा बना ही कुछ ऐसा है। कुछ ही देर बैठा होऊंगा की एक पूरी कतार को उठा कर सड़क के दाईं तरफ भेजा जाने लगा।

इस कतार में मैं भी शामिल हूँ। रास्ता पार करके आ गया बाईं तरफ। हाँथ धोए और थाली पकड़ाई गई। उस थाली पर गरमा गरम भोजन भी परसा जाने लगा।

यहाँ महिलाओं के खाने के लिए अलग कमरा और पुरुषों के लिए अलग। महिलाएं कम मात्रा में है इसलिए उनका कमरा भी छोटा है।

पुरुषों के लिए एक बहुत बड़ा हॉल है। जहाँ पास ही कुछ देर पहले तक भोजन बना था। मैं थाली लेकर इसी हॉल में आ कर खाना खाने लगा।

भूख इतनी जोर की है कि दोबारा खाने लेने में भी ना सकुचाया। खा पी लेने के बाद खीर परोसी गई जिसको चख कर मज़ा ही आ गया।

टूरिज्म इनफार्मेशन सेंटर

आत्मा भर खाने के बाद चल पड़ा बैग काउंटर की ओर। खाना खाने के बाद अब मन खुशनुमा भी ही गया है। जूते और बैग काउंटर से उठा कर चलता कि आसाम टूरिज्म इनफार्मेशन सेंटर दिखा।

जहाँ आसाम के बाकी के हिस्सों का जायजा लेने पहुंचा। बैग काफी वजनी है। यहाँ आया पर कार्यालय में कोई भी नजर ना आया।

इतने में एक महाशय आए और किताब पकड़ा कर राज्य की परिस्थितियों के बारे में बताने लगे कि कहाँ कहाँ जाने लायक है और कहाँ नहीं।

अहम जानकारी इक्कठा करने के बाद हम निकल पड़े शिलोंग की ओर। आज की रात शिलोंग में ही गुजरेगी।

कामाख्या देवी मंदिर कैसे जाएं?

दिल्ली से गुवाहाटी

ट्रेन : 28 से 43 घंटे

हवाई यात्रा: डेढ़ से ढाई घंटे

गुवाहाटी से कामाख्या सिटी बस या प्राइवेट टैक्सी: बीस मिनट

भलरूमुख से कामाख्या से सूमो पॉइंट तक 15किमी

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