बोधगया जहाँ हुई भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति

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बोधगया को रवाना

बस में मनोरंजन की पूर्ण व्यवस्था है। टीवी, एसी जैसी हर सुविधा मुहैया है। गाड़ी चल पड़ी और मैं सबसे पीछे विराजमान हो गया। पीछे की काफी सीटें खाली हैं।

कंडक्टर आगे से चल कर आते हुए सबका टिकट काटते हुए मेरी तरफ ही आ रहा है। बस में लगा टीवी चालू हो गया है।

ड्राइवर साहब ने भोजपुरी सुरस्टार दिनेश लाल यादव की फिल्म बस के टीवी में चलाकर सभी यात्रियों का भरपूर मनोरंजन का इंतजाम कर दिया है। इधर कंडक्टर टिकट काटते हुए बार बार टीवी के सामने आ जा रह है जिससे फिल्मी दृश्य छूटे जा रहे हैं।

यादव जी अच्छा अभिनय करते हैं और कपिल शर्मा शो में भी शिरकत कर चुके हैं। कंडक्टर साहब टिकट काटते हुए मुझ तक पहुंच गए। दो टिकट कटवा कर पैसे दिए और चलता किया। फिल्म भी अच्छी है।

बस चल रही है पर बाहर क्या हो रहा है कुछ खबर नहीं। राजगीर से गया जाते वक़्त मार्ग में दशरथ जी की समाधि स्थल है।

आप गलत समझ बैठे महाराज दशरथ नहीं। आम आदमी दशरथ। जी हां वही दशरथ मांझी जिन्होंने अपना पूरा जीवन एक खुरपी मात्र से एक पहाड़ काटने में समर्पित कर दिया। पूरी दुनिया भर में मिसाल कायम की।

जिन्हें “माउंटेन मैन”के रूप में भी जाना जाता है। पहाड़ काटने के पीछे प्रेरणा उनकी गर्भवती पत्नी थीं जो पहाड़ पार करते वक़्त दूसरे गांव की तरफ जाते हुए अपनी जान गंवा बैठी थीं। यह पहाड़ दो गावों के बीच का वो अड़ंगा था। फिर क्या था दशरथ जी ने उस हत्यारे पहाड़ को ही मिटाने का निश्चय कर लिया।

केवल एक हथौड़ा और छैनी लेकर अकेले ही पच्चीस फुट ऊँचे पहाड़ को काट कर एक सड़क बना डाली जिसमें उन्हें काटने में उन्हें बाईस वर्ष लगे।

उनके इस परिश्रम से अतरी और वजीरगंज ब्लाक की दूरी को पचपन किमी से घटाकर पंद्रह किमी कर दिया। उनके जीवन पर आधारित फीचर फिल्म मांझी भी बनी जिसमे नवाजुद्दीन सद्दिकी ने अपने बेहतरीन अदाकारी से रुपहलू पर्दे पर उकेरा।

फिल्म देखते देखते कब सफर गुजर गया पता ही नहीं चला। ड्राइवर ने भी फिल्म चुन कर लगाई थी। जितनी देर का सफर उतनी देर की फिल्म।

गया  आगया

सुपरफास्ट बस शाम के चार गया के बाद अड्डे पर प्रवेश कर गई। पहुंच तो गया हूँ पर अब आगे का मार्ग भी तय करना है। उधर घुमक्कड़ी समुदाय में कई लोगों से बात भी हो चुकी है पर मिलने में ज्यादा रुचि कोई नहीं दिखा रहा। कारण ये भी हो सकता है की ऐन मौके पर मिलने की दरख्वास्त डाल रहा हूँ शायद इसलिए भी।

बस कंडक्टर से बोधगया जाने का रास्ता पूछने पर पता चला की सड़क के उस पार से टेंपो से जाना होगा। गया से बोधगया का मार्ग आधे घंटे की दूरी पर है। बस अड्डे से कुछ दूरी पर गया जाने का टेंपो उपलब्ध है।

सड़क पार खड़ा हुआ ही की पहली ही टेंपो बोधगया जाने को मिल गई। टेंपो की पिछली खुली हवादार सीट पर पैर जमा कर बैठ गया। गली कूचों से होते हुए टेंपो निकलने लगा।

शायद गया में चुनाव के आसार लग रहे हैं जो जगह जगह नेताओं के बैनर पोस्टर लगे हुए हैं। ऐसे बिना वजह या जनता की सेवा के लिए कोई नेता कष्ट नहीं लेता और ना लेगा।

टेंपो में लटक कर आधे घंटे के भीतर बोधगया पहुंच गया। टेंपो वालो को पैसे पकड़ाए और साथ ही मंदिर की दूरी भी पूछ डाली। कुछ कदम पर बता कर चालक टेंपो ले कर निकल पड़ा।

उतरते ही मात्र सौ मीटर की दूरी पर मंदिर है। पर यहाँ बाजार और सकरी गली में जिस तरह का वातावरण है उससे बिल्कुल नहीं लग रहा की फाटक इतनी पास है।

गूगल नक्शे पर भी इतनी ही दूरी बता रहा है पर माहौल देख कर लग ही नहीं रहा की मंदिर का प्रवेश द्वार इतनी पास हो सकता है। जैसा अन्य मंदिरों का होता है। दूर दराज से ही माला, फूल, चुन्नी के ठेले दिखाई देने लगते हैं। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं।

निमल राजगीर से बोधगया तक का 80 km का सफर

चल पड़ा मंदिर की दिशा में कुछ सीढियां चढ़ कर ऊपर आया तो काफी मात्रा में भीड़ दिखी। उससे भी कहीं ज्यादा लंबी लंबी कतार। जिसको देख अब विश्वास हो गया है की मंदिर यहीं है।

मंदिर की सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए इसके खुले रहने की अवधि शाम के छह बजे तक की ही है। हर चीज की व्यवस्था उच्चतम दर्जे की है। बैग लेके आगे बढ़ रहा हूँ और ये भी सोच रहा हूँ की मंदिर बंद होने से पहले मैं दर्शन कर लूं। अन्यथा कल तक का इंतजार करना पड़ेगा।

पर दर्शन करने के लिए ये बैग, जूते, चप्पल जमा करने होंगे। ड्यूटी पर तैनात सुरक्षाकर्मी के पास आया और पूरी प्रक्रिया समझी। जो इन भाईसाहब ने बखूबी समझाई।

बड़े से चौराहे के पास बाएं हाथ पर सारी सुविधाएं मुहैया कराई गईं हैं। जूते चप्पल के लिए अलग स्टैंड, बैग रखने के लिए अलग, और तो और मोबाइल फोन भी लेना जाना प्रतिबंधित है। जिसकी भी जमा करने की व्यवस्था है।

फोटो खींचने के लिए मंदिर परिसर में कैमरा ले जाया जा सकता है। जिसकी राशि निर्धारित है। मैं फटाफट मोबाइल और बिजली उपकरण जितना भी है सब एक काउंटर पर जमा कराने के लिए खड़ा हो गया।

दूसरे काउंटर पर साथी घुमक्कड़ को बैग जमा करने के लिए भेज दिया। इधर मोबाइल जमा हुए उधर बैग। अब बारी है जूते जमा करने की। यहाँ आधा समय तो जमा कराई ने निकला जा रहा है।

दोनो लोगों ने जूते उतार कर जमा करा दिए। जमा कराए हुए सभी समान का टोकन ले कर टीन के बाहर निकल आया। जो बात काबिले तारीफ़ है वो ये की यहाँ की चाक चौकसी और व्यवस्था। जगह जगह सुरक्षाकर्मी तैनात हैं।

मैंने भी समय रहते सब कुछ जमा करवा दिया और कतार में लग कर चलने लगा। हालांकि कुछ लोग मोबाइल परिसर में ले जा रहे हैं।

पुलिसकर्मी मना भी कर रहे हैं कि आगे से आपको वापस भेज दिया जाएगा। पर ये बुद्धिजीवी इन्हे अनसुना कर के आगे बढ़ते जा रहे हैं। हुआ भी वही जो लेके जा रहे थे वो वापस भेज दिए गए हैं जमा करवाने को। अब दुगना समय नष्ट करेंगे ये।

बोधगया मंदिर

कई दर्जे की सुरक्षा से लैस है ये मंदिर। सभी प्रकार की सुरक्षा जांच कराते हुए मैं अन्दर आ गया। पास में लगे एक सीमेंट से बने एक बोर्ड में मंदिर के इतिहास का वर्णन है सो मैं पढ़ने लगा।

मंदिर का निर्माण सम्राट अशोक द्वारा किया गया था। भगवान बुद्ध की पद्मासन मुद्रा में भव्य मूर्ति स्थापित है। मजे की बात है की ये मूर्ति उसी जगह स्थापित है जहाँ भगवान बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।

मंदिर के चारों ओर पत्थर की नक्काशीदार रेलिंग लगी है जो प्राचीन अवशेष है। मंदिर परिसर में उन सात स्थानों को भी चिन्हित किया गया है जहाँ बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद सात सप्ताह व्यतीत किये थे।

लेकिन बख्तियार खिलजी की बर्बरता ने इस पवित्र स्थल को भी नहीं छोड़ा और बारहवीं शताब्दी में इस मंदिर को इतना नुकसान पहुंचाया की इसे पहचानना मुश्किल पड़ गया था।

यहाँ पर कड़ी सुरक्षा का एक कारण बम धमाका भी है। मुझे याद है जब सन् 2013 में मंदिर परिसर में सुबह सुबह एक के बाद एक दस बम धमाके होने से पूरा मंदिर हिल गया था।

ये खबर हर अखबार के पहले पन्ने पर छपी थी। लेकिन किसी के हताहत होने की खबर नहीं थी और ना ही मंदिर को कोई श्रृती पहुंची। हालांकि दो भिक्षु सहित पांच घायल जरूर हुए थे। 

यहाँ वाकई बहुत ही अच्छा महसूस हो रहा है। सबसे पहले तो उस तालाब को तरफ आया जहाँ पर बुद्ध ने सप्ताह भर तपस्या की थी। यहाँ लोग अपने परिजनों का शांति पाठ भी करवा रहे हैं। कुछ क्रिया कर्म भी।

काफी भीड़ जमा है यहाँ। स्नान के बाद लोग लुटिया साधे धोती में अपना कार्यक्रम समेट रहे हैं। वक्त बिताने के बाद मंदिर के दाईं ओर चल पड़ा। पीपल के पेड़ के अलावा भी बहुत से पेड़ हैं।

यहाँ पर कुछ बच्चे खेल रहे हैं। थोड़ा चैन का वक्त बिताने के लिए कुछ देर यहीं बैठने का मन बनाने लगा। पास में ही कुछ कुत्ते और पेड़ पर बंदर। यहाँ मंदिर के पिछले हिस्से में बैठ कर बहुत आनंद आ रहा है।

सीढियां उतर कर मंदिर के पीछे कई लामा साधना करते दिख रहे हैं। कुछ पूजा पाठ कर रहे हैं। छोटे छोटे स्तूप बने हुए हैं। हर स्तूप पर भगवान बुद्ध की एक मूर्ति लगी हुई है।

कुछ पाठ कर रहे हैं तो कुछ अपने लाल कमीज के अंदर माला जप रहे हैं। कहते हैं की जिस पेड़ के नीचे बुद्ध को ज्ञान की प्राप्ति हुई थी वो पेड़ आज भी है।

पर ऐसा नहीं है। साथ में बैठे बिक्षु ने बताया की जिस पेड़ के नीचे बैठ कर ज्ञान प्राप्त किया था उस पेड़ को उनकी सौतेली माता ने उखड़वा दिया था। बाद में किसी ने ठीक उसी जगह पर नया पेड़ उगाया था। ये उस पेड़ का पांचवा वंशज है।

भिक्षु ने बताया की अशोक की बेटी संघमित्रा ने पेड़ की एक डाल श्रीलंका ले गईं थी। उसे अनुराधापुरा में बो दिया था। पूरे विश्व में उस पेड़ को सबसे पुराना बोधी पेड़ माना जाता है।

काफी वक्त बीत जाने के बाद और महत्वपूर्ण ज्ञान अर्जित करने के बाद मंदिर परिसर की ओर बढ़ने लगा। सीढी चढ़ कर दाईं ओर मुड़ा और गलियारे में चलने लगा। यहाँ लोग दंडवृत प्रणाम कर रहे हैं मंदिर की दिशा में।

महाबोधि मंदिर में लामा अपना पाठ करते हुए

मंदिर के बाहर दर्शन के लिए लोग कतार में खड़े हैं। मुख्य प्रांगण में कई लोग मंदिर का चक्कर लगा रहे हैं। घूमते घूमते पिछली तरफ आया तो अद्भुत नजारा पता। मंदिर के ठीक पीछे बोधी पेड़ के नीचे ही कई लोग बैठे हुए हैं।

जो ध्यान कर रहे हैं। मैं भी कुछ देर के लिए यहीं बैठ गया। भक्तगण या भिक्षु ही यहाँ फर्श को साफ कर रहे हैं ताकि लोग बैठ सकें। यहाँ माहौल मन को शांत कर देने योग्य वातावरण से लैस है। काफी देर के लिए आंख भी बंद कर ली।

परिसर में मैंने काफी समय बिताया। मैं इर्द गिर्द घूम रहा हूँ। मंदिर को घेरे अर्ध दीवार के पास आ कर बैठ गया। यहाँ एक व्यापारी अपनी पीड़ा का बखान करते हुए भिक्षु के पास बैठ गए।

कुछ देर बाद मुख्य प्रांगण में भगवान बुद्ध की मूर्ति के दर्शन के लिए कतार में लग गया। कतार धीरे धीरे आगे बढ़ रही है। पीछे मुड़ कर देखा तो साथी घुमक्कड़ भी कहीं खड़ा हुआ है। प्रवेश द्वार पर महिला सुरक्षाकर्मी पहरा दे रही हैं जो भीड़ को आगे बढ़ा रही हैं।

उनके बोलने से पता चला की कपाट कभी भी बंद हो सकता है। बरहाल मैं प्रवेश द्वार के अंदर आ गया। जहाँ भगवान बुद्ध की बड़ी प्रतिमा के दर्शन के बाद प्रसाद के तौर पर पानी। प्रसाद ले कर बाहर निकलने लगा पर जो कतार में हैं उनको जल्दी करने का आदेश दिया जा रहा है।

मेरे दर्शन करने के कुछ देर बाद ही मंदिर के मुख्य कपाट बंद कर दिए गए हैं। अब अंधेरा हो चुका है। बाहर निकले से पहले पूरा प्रांगण घूम लिया। वैसे ही बाहर निकल कर बाईं ओर भी आया।

लघुशंका करने के लिए भी यहाँ प्रबंध है। साफ सफाई का पूरा ध्यान रखा गया है। बाहर निकल कर अपना सामान इकट्ठा  करने काउंटर पर आया।

अब जा कर थोड़ा नक्शा समझ आ रहा है की मंदिर में एक नहीं बल्कि भीतर जाने के कई दरवाजे हैं। हर एक पर काउंटर पर टोकन दिखाया और समान निकला।

जूते, बैग, मोबाइल। अब चुनौती है की रात गुजारने की। मंदिर में प्रवेश बंद हो चुका है और काउंटर पार बैग जमा करने का कार्यक्रम भी। सिर्फ वापसी हो रही है।

व्यवस्था की तलाश

चौराहे पर पुलिस वालों से पूछने पर पता लगा कि होटल के लिए आगे सड़क से दाएं मुड़ना पड़ेगा। वहां ना सिर्फ होटल हैं बल्कि आश्रम भी हैं।

निकल पड़ा होटल तलाशने। सड़क के ठीक सामने मठ बना है जहाँ सोने की सुविधा हो सकती है। यहाँ पर गेट के पास खड़ा हो कर खटखटाने लगा। काफी देर खटखटाने के बाद कोई जवाब ना आया। यहाँ तो निराशा ही हांथ लगी। कई मठ में सोने का आग्रह किया। परन्तु भारी भीड़ के चलते मठ भी लोगों से भरे हुए हैं।

दूसरे फिर तीसरे मठ का भी यही हाल रहा। या तो सब मठ में ताला पड़ चुका है या फिर अंधेरा छाया हुआ है। लगभग सभी होटल का भी यही हाल है।

भरे होने के कारण मैं एकांत सड़क पर टहलने लगा। कुछ आगे चल कर इकलौता ढाबा दिखा। जहाँ भीड़ भी ज्यादा नहीं है। यहीं पर भोजन करने बैठ गया।

ढाबे पर लगे सेवाकर्मी भोजन परस परस कर ला रहे हैं। आज फिर बैगन की सब्जी। बैगन मुझे कतई पसंद नहीं। दाल चावल रोटी से ही पेट भर लिया जाएगा।

भरपेट भोजन करने के पश्चात नल्के के पास हांथ धोए और फिर भुगतान करने काउंटर पर आ गया। पर इन जनाब के काउंटर पर सौंफ इलाइची नदारद है। ऐसे काउंटर बहुत सूने सूने लगते हैं। भुगतान भी अधूरा लगता है।

सोने के लिए मशक्कत अभी भी करनी है। बस अब शरीर में थोड़ी ज्यादा जान आ गई है। अब मैं जगह ढूढने लगा जहाँ खुद का तंबू गाड़ कर सो सकु।

अब तंबू ही आखिरी सहारा है। कुछ दूरी पर पुलिस की टोली दिखी। जहाँ पुलिस सहायता ली उनसे आग्रह किया कि आपके तंबू के पास अपना गाड़ दू। आप को कभी किसी शहर में दिक्कत परेशानी हो तो सीधे पुलिस की शरण में चले जाएं। क्योंकि पुलिस मैदानी स्तर पर रहती है जिनके पास हर सूचना और ताजा खबर रहती है।

तभी एक अन्य पुलिस कर्मचारी ने जानकारी दी की मंदिर से ही कुछ दूरी पर भागवत गीता का प्रवचन चल रहा है जहाँ पंडाल में रात गुजार सकते हैं। ये भी एक अच्छा विकल्प है।

एक झटके में समस्या का निवारण मिल गया। ऐसे ही सोनप्रयाग में सेना ने मेरी मदद की थी जब जरूरत थी। पैदल मार्ग से दस मिनट में ठीक उसी जगह पहुंच गया। रास्ते में भटका तो ड्यूटी पर तैनात अन्य पुलिसकर्मी से पूछने पर सुनिश्चित हो गया।

यहाँ इस पंडाल में अभी प्रवचन समाप्ति की तरफ बढ़ रहा है। मैं भी बैग रख कर पंडाल के बाहर से ही प्रवचन सुनने लगा। इस बड़े से मैदान में मीडिया की कुछ गाड़ी, पुलिस की एक दो जीप खड़ी हैं।

मजेदार बात ये है की कार्यक्रम आस्था चैनल पर प्रसरित हो रहा है। प्रवचन समाप्त हुआ, कुछ ही देर में धीरे धीरे जनता पंडाल से प्रस्थान करने लगी। 

उनमें से कुछ यहीं रुक गए। आज प्रवचन की आखिरी रात है जिसके बाद कल यज्ञ करके समापन हो जाएगा। आज की रात पंडाल में गुजारना होगा।

जनता जनार्दन के निकलने के बाद सोने की व्यवस्था देखने लगा। आसानी से कुर्सियों के पास दो लोगों के सोने की व्यवस्था दिख रही है।

सोने के लिए बैग से चटाई, स्लीपिंग बैग निकाल कर बिछाने लगा। इधर उधर हुआ, इतने में एक आदमी खड़ा हो कर बेहस करने लगा जगह को ले के।

अब ये महाशय यहाँ इसी जगह पर पिछले पंद्रह दिनों से पसड रहे हैं। सो आज आखिरी दिन भी इनको यहीं पंखे के नीचे सोना है। तो उस हिसाब से ये जगह पर उनका नाम लिख चुका है।

पास में लेटी माता जी के कहने पर मैंने अपना बिस्तरा खिसका लिया। स्लीपिंग बैग में सारे उपकरण और पन्नी में जूते डाल कर और बगल में बैग लिपट कर सोने लगा।

माता जी ने अपना परिचय देते हुए खुद को गोरखपुर का निवासी बताया। बाते करते करते कब आंख लग गई पता ही नहीं चला।

पंडाल के नीचे बिस्तर बिछा कर चैन की नींद लेते हुए लेखक

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One Comment

  1. Nice bro….acha likha, Ek do chiz he jo sahi karni bus….. otherwise acha laga …lg ra jaise vahi he🙂

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