जानकीचट्टी, उत्तराखंड, किस्से, स्टोरीज ऑफ इंडिया
comment 1

भूतिया बिरला हाउस की व्याख्या

यमनोत्री वापसी के बाद

यमनोत्री धाम से लौटने के बाद सीधा बिरला हाउस ही आ पहुंचा। धूप तेज है इसलिए यहीं आगन में बैठ कर धूप की सिकाई में मस्त हो गया हूँ।

थकान के कारण हालत पस्त है। लवली भैया से एक और रात की मोहल्लत मांगते हुए रुकने का प्रस्ताव रखा। जिसे उन्होंने बिना किसी शर्त के स्वीकार तो लिया।

मगर शायद आज उस कमरे को भी बुकिंग के लिए उठना पड़ जाए। ऐसे में मैंने भी बोल दिया अगर बाहर टेंट लगा लिया जाए तो बेहतर होगा।

हां इस स्तिथि में ये करना ही ठीक रहेगा। बिरला हाउस के ठीक बगल मे बने ढाबे में भोजन करने के लिए बाहर निकल आया। ढाबे में पहुंचा तो मालूम पड़ा ज्यादा कुछ भी नहीं है खाने को।

फिर भी ये दो आदमी भर के लिए खाने की व्यवस्था करने लगे। भट्टी पर तवा चढ़ा और रोटियां सिकनी चालू हो गईं। खाना परोसा गया।

खाना बेहद ही स्वादिष्ट बना है। ज्यादा ना खा कर थोड़े में ही पेट भर गया। भुगतान किया और अब योजना बन रही है सैर सपाटे की।

शाम के चार बज रहे हैं। सोच रहा हूँ बस अड्डे पर जा कर कल की बस की समय सारिणी पता कर ली जाए तो और भी बेहतर रहेगा।

पैदल ही निकल पड़ा। जैसे जैसे शाम हो रही है यमनोत्री जाने वालों की तादाद भी घट रही है। जो जा भी रहे हैं वो यात्री है जिन्होंने आज ही आगमन किया है।

हो सकता है वो होटल या गेस्ट हाउस ढूंढने निकले हों। लबालब कीचड़ के सैलाब के बीच नीचे की ओर बने बस अड्डे की हालत देख रोना आ गया।

बस अड्डा

इतनी दयनीय स्तिथि में ये बस अड्डा जिसका कोई हिसाब नहीं है। जिसका जहाँ मन है वहाँ थूक रहा है। सौंचालाय है परन्तु वह इतना गन्दा की किसी को जोर की भी लगी हो तो वो जाने में एक दफा सोंचे।

बसें तो तमाम हैं लेकिन कौनसी बस गंगोत्री के लिए रवाना होगी ये पता नहीं चल पा रहा है। बहुत पूछताछ के बाद एक जीप वाले ने बताया कि गंगोत्री के लिए तो नहीं बल्कि उत्तरकाशी तक के लिए साधन जरूर मिल जाएगा।

थोड़ा आगे आ कर मालूम पड़ा की उत्तरकाशी को जाने वाली बसें यहीं से जाएंगी। एक कतार में खड़ी तीन बसों मे से एक बस में कुछ हलचल है।

जिसमे चढ़ा तो स्टाफ गप्पे मारने में व्यस्त दिखाई दिया। वार्तालाप में मालूम पड़ा कि शाम या रात्रि के समय कोई बस नहीं जाती है उत्तरकाशी या किसी और स्थान के लिए।

इसलिए भी एक और रात तो यहाँ गुजारनी ही पड़ेगी। ऊपर से कंडक्टर महाशय जोर दे रहे हैं अभी टिकट बुक कराने को ताकि अगर सीट फुल भी हो जाए तो हमारा जाना तय रहे।

उनकी बात में वज़न तो है। और तो और सुबह पांच बजे निकलने का समय बताया। तब जा कर कहीं समय से उत्तरकाशी पहुंच पाएंगे।

एक पर्ची दिखाते हुए बताने लगे कि इतनी सीटें बुक हो चुकी हैं। एक तो साधन नहीं ऊपर से अधिक यात्री। बेहतर यही रहेगा कि सीट बुक करवा ली जाए। अन्यथा एक और दिन यमनोत्री में या फिर दुगने किराए के साथ जीप का सफर।

कुछ रुपए देकर दो सीटें बुक खड़ा ली। समय अभी पर्याप्त है सोचा क्यों ना जानकीचट्टी का बाज़ार ही घूम लिया जाए। जाने का तो उस मंदिर में भी मन हो रहा है। मगर पुल पार करके फिर चढ़ाई करके जाने में बहुत समय लग सकता है।

पैदल ही निकल पड़ा ढलान के रास्ते नीचे की ओर यमनोत्री नदी के समांतर जाते हुए रास्ते पर। रास्ते से परे हट कर नदी किनारे झांका तो गंदगी के ढेर के सिवाय कुछ नजर नहीं आया।

ऐसी दुर्दशा किसी और धार्मिक स्थल की शायद ही हो जितनी यहाँ की है। बाज़ार के रास्ते से गुजर रहा हूँ तो कहीं कपड़ों की दुकान कहीं चाय पानी की।

चाय पर चर्चा का समय

चाय गटकने का मन तो है पर अच्छी टपरी की तलाश है। बाएं हाँथ पर एक दुकान नजर आई। सोचा यहीं बैठ कर इत्मीनान से चाय पी जाए और विचार किया जाए आगे की रणनीति का।

चाय के लिए दुकान में आ भी गया मगर इस कदर भीड़ है मानो हमें कोई पहचान ही ना रहा हो। कुछ देर मुहाने पर ही रुका और वापस चल पड़ा बाज़ार की ओर।

यूंही बाते करते करते एक बड़ी सी झोपडी जैसी दिखने वाली दुकान में घुसा। देखा तो यहाँ भी चाय के लिए काफी भीड़ है। पुलिस दरोगा तक यहाँ दस्तक दे रहे है एक कप चाय की खातिर।

सोचा यही बेहतर जगह होगी चाय के लिए इसलिए भीड़ भी खूब है। सीट खाली होने का इंतजार करने लगा। मेरे समांतर खड़ा एक परिवार भी सीट की तलाश में ही है।

यमनोत्री जाते भक्तगण

इससे पहले वो सीट लपकें मैं झट से बैठ गया कुर्सी पर। हालांकि मेज़ में चाय ही चाय बिखरी है, जिसे बाद में साफ करवाया गया।

दो कप चाय का ऑर्डर दे कर विचारने लगा कि अभी कितना वक्त लगेगा बद्रीनाथ तक पहुंच कर वापस दिल्ली जाने में। वक्त का तो अता पता नहीं पर चाय गिलास में छन कर जरूर आ चुकी है।

बेहतरीन स्वाद वाली कड़क चाय और झोपडी जैसी दुकान के आगे का नजारा कमाल का है। चाय पीने के बाद खाली नहीं बैठ सकते क्योंकि और भी ग्राहक अपने बैठने का इंतजार कर रहे होते हैं।

इस कदर दीवानगी देखना तो हर दुकानदार के नसीब में नहीं। पूरा का पूरा परिवार इस कारोबार में लगा हुआ है। चाय के पैसे दिए और चलता बना और आगे के सफर पर।

इतना आगे आ गया कि टैक्सी स्टैंड भी काफी पीछे छूट गया है। दिन भी ढलने के नजदीक आ गया है। समय की बारिकता को देखते हुए वापस लौटना मुनासिफ समझा।

कपड़े लेने की इच्छा तो बिल्कुल भी नहीं है फिर भी कपड़े की दुकान में आया। पर कपड़े की क्वालिटी और ऊंचे दाम देख ना तो मन को भाया ना ही दिमाग को।

वापस जाते हुए एक दफा फिर उसी चाय की दुकान अपनी ओर खींच लाई चाय के बहाने। अबकी बार भीड़ कम है। चाय ऑर्डर करी पर वो पुराना स्वाद नहीं।

झटपट पैसे दिए और बिरला हाउस की ओर रवाना हो चला। नदी के उस पर बने मंदिर में घंटी के ऊंचे स्वर सुने जा सकते हैं। लग रहा है आरती का समय हो चला है।

ठंडा मतलब कूल कूल

एकाएक कुछ ठंडा पीने का मन हुआ। और उस दुकान से ठंडा लेने लगा जहाँ से चाय के लिए लौट गया था। अब यही दुकान में सन्नाटा पसरा है।

समय समय की बात है। जैसे जैसे अंधेरा हो रहा है जानकीचट्टी जगमगा रहा है। उल्टे रास्ते से ना हो कर के उस रास्ते से जाना बेहतर समझा जो सीधा यमनोत्री के लिए जाता है।

सोचा नाश्ते के लिए कुछ जलेबी और पकौड़ी ले ली जाएं। उनके लिए भी जिनके यहाँ मैं रुका हुआ हूँ। हालांकि कुछ महंगी जरूर हैं लेकिन ढाई सौ ग्राम बहुत हैं।

घोड़ों और खच्चरों का इलाका अब शुरू होने वाला है। आगे बढ उस टूट हुए मकान कि छत पर नजर पड़ी तो देखा दद्दू विराजमान हैं। जिनके साथ कल आते वक्त सफर तय किया था।

ये जरूर वृद्ध दिखाई पड़ रहे हों लेकिन ऊर्जा में मुझसे भी कहीं अधिक जान पड़ रहे हैं। दद्दू जोशीले स्वभाव के हैं। उनकी ऊर्जा मुझे एकाएक अपनी ओर खींच लाई।

जिस जगह का त्याग कर के मैं आगे बढ़ चला था, बातचीत में मालूम पड़ा दद्दू ने इसी जगह पर रात गुजारी है। काफी साहसी कदम उठाया दद्दू और उनके काबिल साथी ने।

शायद मैंने सही भी किया यहाँ ना रुक कर। तभी बिरला हाउस में बैग रख कर इत्मीनान से घूम भी पा रहा हूँ। दद्दू से अलविदा ले चल पड़ा बिरला हाउस की ओर।

घोड़ों के अस्तबल

थोड़ा आगे बड़ा तो बाएं हाँथ पर बने घोड़ों के अस्तबल दिखाई पड़े। जहाँ जाने की इच्छा प्रकट हुई। आया तो यहाँ का नजारा ही कुछ अलग पाया।

लोग लकड़ी जलाकर आग से सिकाई ले रहे हैं। और तो और कोई दूध धो रहा है। तभी उनमें से एक चिंतित सज्जन उठ खड़े हुए और आने का कारण पूछने लगे।

जानकीचट्टी का अस्तबल

आकरण ही मैं जब घुसा चला आया तो मुख से बोल फूट पड़े की यमनोत्री तक के लिए घोड़े या खच्चर कितने में मिलेंगे। वाजिब दाम सुन भाईसाहब हमें मुहाने तक छोड़ने आए।

वातावरण में तेज़ी है जिस कारण धंधा पानी जोरों पर चल रहा है। बिरला हाउस के पास ही पहुंचा हूँ कि महिलाओं का एक दल भटकते हुए पास आया और बिरला हाउस जाने का रास्ता पूछने लगीं।

पीछे की ओर जब इशारा किया तब जा कर उनकी आंख खुली की यहीं बिरला हाउस है। तभी एक और सवाल दागते हुए बुकिंग के बारे में पूछताछ करने लगी।

बस अधिक जानकारी के लिए मैंने उन्हें अंदर जाने का इशारा किया। और खुद भी चंद लम्हों के बाद अन्दर आया तो देखा उनको वापस लौट जाने का आदेश मिला है।

ऐसा इसलिए भी क्योंकि उनकी ऑनलाइन बुकिंग नहीं है और पहले से ही सारे रूम बुक हैं। मैं अपने कक्ष में जाता इससे पहले लवली जी के कमरे से बैग उठना जरूरी समझा।

जलेबी पार्टी

और उन्हें बताना भी एक आज शाम बस की अनुपलब्धता के कारण एक रात और बितानी पड़ेगी यहाँ पर। यहीं पर हमने जलेबी पार्टी की।

जलेबी और कोल्ड ड्रिंक पार्टी में लवली भाई ने बताया की जब हम केदारनाथ जाएं तो उनके सहयोगी कर्मचारियों से जरूर मिलें। ये बात मैंने अपने दिमाग में बैठा ली।

बातों बातों में और भी बातों का खुलासा हुआ। और अगल बगल रह रहीं पुलिस कर्मचारियों के बारे में भी जानने को मिला। की कैसे वो आम नागरिक से भी ज्यादा वक्त जन सेवा में निकल जाता है।

कभी कभी ड्यूटी पर ही खाना नसीब होता है। यमनोत्री तक तो उनका शायद दिन में दो दफा चक्कर लग जाता होगा। तभी यहाँ के नागरिक मोटे ही नहीं होने पाते हैं।

अपनी व्यथा भी बताते हुए कहा कि की इनका कैमरा देखने और लगाने का काम है इस कारण इनका पूरा का पूरा दिन इसी बंद कमरे में गुजर जाता है।

देश के कई हिस्सों में काम कर चुके हैं। इससे पहले केदारनाथ में इनकी कैमरा लगाने की ड्यूटी थी। थ्री डी, एच डी हर तरह के कैमरे हैं जिससे मंदिर के अंदर तक का नजारा दिख जाता है।

चारो धाम में ड्यूटी कर चुके हैं जनाब। मैंने धन्यवाद दिया उनकी सेवा का जानता के प्रति और उसके अलावा जो उन्होंने रात बिरात हमें पनाह दी उसके लिए भी।

सुस्ताते लेखक और उनके साथी अजय

आज कमरे की शायद बुकिंग होनी है तो थोड़ा मुश्किल सा लगता है रुकना। पर दिलासा देते हुए बोले वहीं रुक जाना कोई कुछ कहे तो अपना दोस्त बता देने पर कोई चूं तक नहीं करेगा।

बस यही बात लेके आ गया और बस्ता उठा कर चल पड़ा कमरे की ओर। निर्माण को देख कर लगता है बिरला हाउस अलग और ये क्वॉर्टर का निर्माण बाद ने किया गया है।

जैसी उम्मीद थी वैसे ही लोगों का जमावड़ा यहाँ पर मिला। और उनको कैमरे वाले भैया का दोस्त बता अपना बैग पटक दिया। बाकी कुछ एक लोग बात करने भी निकल गए।

कुछ ही देर के भीतर ये कमरा भी खाली हो गया। कल के मुकाबले थोड़ा मैला तो है पर एक रात बिताने के लिए काफी साफ है।

ढल गया दिन

जमीन पर गद्दे बिछा कर बिस्तर लगाने लगा। रात के आठ बजने को आए हैं। मुझे तो नहीं पर अजय को भूँख लग आईं है। सो अजय बगल के ढाबे में खाना खाने निकल गया।

जम्मू से लाए हुए अखरोट जो कि काफी मात्रा में खराब निकल चुके हैं, उन्हे तोड़ कर खाने की इच्छा जाहिर हुई। शायद कुछ एक सही निकल आएं ऐसी आस है।

अखरोट का बैग ले कर बाहर निकल आया। गार्डन में बैठ अखरोट तोड़ ही रहा था कि एक सज्जन टोकते हुए नाम पता पूछने लगे।

उनके चले जाने के काफी देर बाद आभास हुआ जैसे मानो उस कमरे से कोई झांक रहा हो। मुड़कर देखा तो वहाँ पर कोई भी ना था।

पर कुछ सही ना लगा। बार बार ऐसा लगा कोई पीछे से या तो देख रहा है या पीछा कर रहा है। अखरोट तो टूटे पर टुकड़ों में। हाँथ ज्यादा कुछ ना लगा।

वातावरण सही ना लगने के कारण मैंने अखरोट वाला बैग कमरे में रखा और निकल गया बाहर। बगल के ढाबे में आया तो अजय खाने का समापन कर चुका था।

उसे पूरी घटना का जिक्र किया पर मुझ पर उसे यकीन ना हुआ। मैंने भी मन का वहम समझ उस बात को जाने दिया। रात काफी बीत चुकी है। सुबह की बस को देखते हुए बेहतर यहीं रहेगा कि समय से सो लिया जाए।

सो ढाबे से आ कर बिरला हाउस में मिले कमरे में व्यवस्था कर ली सोने की। पता चला बगल में एक नए मेहमान आए हुए हैं जिन्होंने बुकिंग करवाई थी।

रात के नौ बज रहे होंगे कि मैं चादर तान कर सो गया।

आधी रात बिरला हाउस का भूतिया इतिहास

गहरी नींद में ही था कि लगा दरवाज़े को कोई ज़ोर ज़ोर से पीट रहा है और मेरा नाम ले रहा है। नींद टूटी और जब होश आया तो आवाज़ कुछ पहचानी सी लगी।

ये तो लवली भैया हैं जो गेट भड़भड़ा रहे हैं। घड़ी पर नजर पड़ी तो बारह बजने में कुछ पंद्रह मिनट शेष हैं। जाने इतनी रात को क्या आफत आन पड़ी जो दरवाज़ा पीट रहे हैं।

नींद से उठ कर अजय को दरवाज़ा खोलने भेजा तो आव देखा ना ताव सीधे अन्दर घुसते चले आए और गद्दा लेने लगे। नींद भंग करने के लिए क्षमा मांगते हुए बिरला हाउस की कहानी बयां करने लगे।

की कैसे एक आदमी की यहाँ अकाल मृत्यु होने के कारण सन् 1980 से उसकी आत्मा इसी घर में भटकती रहती है। और भी कुछ किस्से इससे जुड़े यहाँ हो चुके हैं।

जैसे पिछले वर्ष की बात है जब एक महिला अपने कमरे में रूकी हुई थी और आधी रात के बाद अकारण ही उसके कमरे का दरवाज़ा खुलने बंद होने लगा। इस घटना के बाद वो बेहोश हो गईं और फिर उन्हें केयरटेकर के कमरे में सो कर रात गुजारनी पड़ी।

और अगले ही दिन वो कमरा खाली करके भाग खड़ी हुईं। आधी रात को ये सब वाक्ये सुन मेरे तो हाँथ पांव फूल गए। वो अपने तीन साथियों सहित गद्ददा ले के जाने लगे और जाते जाते आश्वाशन भी देते गए की डरने की कोई बात नहीं है।

आधी रात को अच्छा मजाक किया है। कुछ ही घंटे पहले मैंने एक अनहोनी घटना का जिक्र अजय से किया था। जो पहले तो वेहेम पर अब सही लगने लगी है।

अपने दो और साथियों के साथ लवली महाशय तो निकल लिए पर मेरी नींद उड़ा गए। शुक्र इस बात का कि कमरे में दो लोग हैं। तो थोड़ी हिम्मत भी है।

ये कथा सुनने के बाद वापस गद्दे पर आ लेटा और जैसे तैसे करके बची कुची रात गुजरी। इंतजार है तो कल सुबह की बस का।

बिरला हाउस का पीछे का दृश्य

1 Comment

  1. Swati Mishra says:

    You travel so much, aab ghr main kaise rehe rahe ho?

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *