भरतपुर का अभेद्य लोहागढ़ किला

भरतपुर | भारत | राजस्थान

निद्रा भंग

कल रात खाना खाते ही बिस्तर पर लेटना ही हुआ और गहरी निद्रा में सो गया। दिनभर की थकान और खराब तबियत के कारण भी ऐसा हुआ।

सुबह नींद खुली घड़ी पर नजर पड़ने पर पाया पांच बज रहे हैं। दवा ना खा कर सोने का असर ये है की अब बुखार चढ़ रहा है। बक्से के उपर रखी दवा निकाल कर पानी से भरा जग ढूंढा।

दवा तो खा की है। अब लंबी नींद ली जरूरत है ताकि दवा का असर हो जाए। आधे घंटे बाद मोबाइल बजा। कुछ खटपट हो रही है।

मालूम पड़ रहा है क्षितिज निकल रहा होगा पक्षी विहार तसवीरबाजी के लिए। ऐसे ही उसने कल भी किया था हालांकि कुछ देरी से। और कल भी करेगा।

जैसे तैसे सो गया। टूटी नींद ही सही। राज के जाने का भी आभास हुआ और विष्णु के भीतर आने का भी। साढ़े सात बजे उठ ही गया। सुबह दवा खाने का सकारात्मक असर हुआ है।

अब काफी आराम है। बुखार भी गायब है। अच्छी खुराक लूंगा तो ऊर्जा भी हासिल कर लूंगा। कमरे में मेरे अलावा कोई नहीं है। मोबाइल चार्जिंग पर लगा बाहर बालकनी में आ गया।

यहाँ सामने वाले घर में भैसे बंधी हुई हैं। पास में ही तालाब। अच्छा वातावरण है यहाँ प्रदूषण मुक्त। आज सवाई माधोपुर निकल रहा हूँ दिन की लगभग तीन बजे की ट्रेन से। सुबह देर से नींद खुलने के कारण काफी समय तो यूं ही निकल गया।

उठने के कुछ ही देर बाद स्नान के लिए तौलिया ढूंढने पर भी ना मिली। पहले राज को सूचित किया उधर राज ने घर के किसी कोने से ढूंढ कर मेरी तौलिया ला कर पकड़ाई।

समय से स्नान भी कर ही लिया। राज घर से नदारद है। आठ बजे ही वो अपने कॉलेज परीक्षा देने निकल चुका है। इधर उसका भाई विष्णु है मेरे साथ। जो आज अपने विद्यालय ना जा कर घर पर ही रुक गया है।

जाते जाते राज ने भरतपुर की मशहूर कचौड़ियों का स्वाद चखने का न्योता दिया। पर खराब तबियत के चलते कोई भी तैलीय पदार्थ खाने से बच रहा हूँ।

सोच रहा हूँ भरतपुर में हूँ तो लोहागढ़ किला भी चला जाऊं। इसी उधेड़बुन में बस समय गुजर रहा है। दस बज रहे हैं और अब नाश्ता करने का समय हो चला है। खा पी कर ही तय करता हूँ क्या करना है माधोपुर निकलने से पहले।

भरपेट नाश्ता करने के बाद थकान के कारण फिर से सो गया। उठा तो पाया बारह बज रहे हैं। आज अगर माधोपुर के लिए ट्रेन ना होती तो शायद मैं दिनभर आराम करने को ही प्राथमिकता देता।

लोहागढ़ किले का नक्शा

लोहागढ़ किले पर जाने की योजना

यहाँ स्थानीय लोगों के अनुसार किले में ऐसा कुछ खास भी नहीं है। टहलते हुए निकल जाऊंगा या उस द्वार तक पहुँच जाऊं जो अंतरजाल पर तस्वीर में दिख रहा है।

इधर घर में काम भी चल रहा है। आज मैं रुका हुआ हूँ शायद इस वजह से भी मजदूरों को छुट्टी पर भेज दिया गया है। राज संयुक्त परिवार में रहते हैं जिसका अपना अलग ही मजा है।

स्टेशन निकलने से पहले राज घर पर आ गया। इधर मैं उससे लोहागढ़ किला में भ्रमण के लिए पूछ रहा हूँ पर संतुष्टि भरा जवाब नहीं मिल रहा। राज तो ना जाने की सलाह दे रहा क्योंकि ऐसा कुछ खास भी नहीं हैं वहां।

शायद इसलिए भी वो यहाँ का मूल निवासी है। पर मैं पता नही कब दोबारा आऊं इसलिए मेरा जाना तो बनता है। मैं समय का सदुपयोग भी करना चाह रहा हूँ स्टेशन जाने से पहले का।

बैठे बैठे तय कर लिया की रेल परिसर पहुँचने से पूर्व मैं किले तक तो जरूर जाऊंगा। भले ही दरवाजे तक पहुँच पाऊं।

बस्ता तैयार कर घर के बाहर आ खड़ा हुआ। इधर राज अपनी स्कूटी से मुझे ऑटो स्टैंड तक छोड़ने के लिए तैयार है। जहाँ से मुझे रेल परिसर तक के लिए सीधा वाहन मिल जाएगा।

सरसराते हुए स्कूटी से ऊबड़ खाबड़ गलियों से आ पहुँचा। ऑटो में बैठ तो गया हूँ रेल परिसर जाने। इधर राज के जाते ही मैं गूगल नक्शे के अनुसार किले के सबसे निकटतम मार्ग पर उतर रहा हूँ।

जैसा राज ने बताया था यहाँ बाजार है जो की मैं देख पा रहा हूँ। बाजार में अच्छी खासी भीड़ है। किले के प्रमाण भी जगह जगह मिल रहे हैं।

बाजार से होते हुए किले की दीवार दिख रही है जो तसल्ली दे रही है की मैं मुख्य द्वार के समीप हूँ। दाहिने मुड़ते हुए मैं किसी पार्किंग की ओर आ खड़ा हुआ हूँ।

यहाँ से किले की चौड़ाई बखूबी देखने को मिल रही है। पर आगे जाने के लिए यहाँ से मार्ग नहीं है। पास खड़े मानव ने मार्गदर्शन किया। वापस घूम कर मुख्य फाटक की ओर जा रहे मार्ग पर आ निकल गया।

आखिरकार उस द्वार के ठीक सामने आ खड़ा हूँ जो अंतरजाल पर सुबह से देख रहा था। लोगों से रास्ता पूछते हुए और गली बाजार से होते हुए किले के सामने अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा हूँ।

लोहागढ़ किले का इतिहास

लोहागढ़ जैसा नाम से ही पता चल रहा है की कभी अभेद्य किला रहा होगा। कहा जाता है इसे कभी कोई जीत नहीं पाया था। अंग्रेजो को भी हार का सामना करना पड़ा था।

राजा सूरजमल द्वारा सन् 1733 में इस किले का निर्माण कराया गया था। तोप के गोलों को बेअसर करने को ध्यान में रखकर निर्माण हुआ।

महाराजा रणजीत सिंह की प्रतिमा

किले के निर्माण के पूर्व चौड़ी और मजबूत पत्थर की दीवार बनाई गई। जिस पर तोप के गोलों का असर ना हो, इसके लिए दीवार के चारो ओर ऊंची कच्ची मिट्टी की दीवार का निर्माण हुआ।

ठीक नीचे चौड़ी गहरी खाई बनाकर उसमें पानी भर दिया गया। दुश्मन तैरकर भी दीवार तक पहुँचता तो भी सपाट दीवार पर चढ़ना असंभव के करीब था।

या तो डूब कर मर जाता या किले के दीवार से दुश्मन की गोली का शिकार होता। कच्ची मिट्टी के गारे से बनी किले की दीवार में नाममात्र का भी लोहा इस्तेमाल नहीं हुआ था।

सूरजमल ने इस किले का निर्माण इतनी बुद्धिमानी से किया था की दुश्मन का आक्रमण भी आसान नहीं था। तोप से निकले गोले दीवार में धस जाते थे जिनकी आग भी शांत हो जाती थी।

यही कारण है की दुश्मन कभी भीतर प्रवेश ही ना कर सका। कब्जाने के लिए अंग्रेजो ने तेरह बार आक्रमण किया पर एक बार भी भेद ना सका।

किले की दीवार मिट्टी से बनी होने के बावजूद भी दुश्मन के लिए लोहे के चने चबाने जैसा था। जाटों की आन बान कहे जाने वाले इस किले की हालत आज चरमराई हुई दिखाई दे रही है।

होलकर नरेश जसवंत राव जब अंग्रेजों से पीछा छुड़ाकर जब रंजित सिंह के पास शरण मांगी तब भरतपुर के महाराजा ने अपना सब कुछ न्यौछावर करने को तैयार हो गए थे।

अंग्रेजो के संदेश के बावजूद रंजित सिंह ने होलकर को अंग्रेजी को सौंपने से मना कर दिया। जिस बात से अंग्रेज काफी नाखुश थे और उन्होंने किले पर धावा बोल दिया था।

किले के दूसरी ओर लगा अष्टधातु का दरवाजा जो मध्यकाल का बताया जाता है वो जाटों की वीरता का प्रतीक था। पर चापरनासी अलाउद्दीन खिलजी ने चित्तौड़ के आक्रमण के बाद ये दरवाजा अपने साथ दिल्ली ले गया था।

पर वीरता का प्रमाण देते हुए जवाहर सिंह जाट दिल्ली पर आक्रमण कर 1765 में ये दरवाजा वापस ले आए थे। जिसके बाद लोहागढ़ में फतह बुर्ज का निर्माण कराया था।

इस किले ने मुगल, मराठाओं और अंग्रेजों तक का आक्रमण सहा है। अंग्रेजों ने तो जनवरी से ले कर अप्रैल 1805 तक घेरे रखा पर सफलता हाथ ना लगी। वापस जाने को मजबूर होना पड़ा।

अंग्रेजों ने किले पर तेरह बार हमला किया उसके बावजूद भी एक छेद ना कर सके किले में। यही कारण है की इसे लोहागढ़ किले की संज्ञा मिली।

पर कहावत है घर का भेदी लंका ढाए। जब बाहर वाले कुछ ना कर सके तक भीतर के लोगो ने ही गद्दारी करी। 1826 में अंदरूनी कलह के कारण अंग्रेजों का यहाँ पर आधिपत्य स्थापित हो गया।

आज का लोहागढ़ किला

पर आज के समय जिस खाई में पानी भरा है वो अब दूषित नाला हो चला है। किले के मुख्य फाटक को शहर के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक जाने की जरिया बनाया गया है।

मैं फाटक के सामने खड़े हो कर कुछ तस्वीरबाजी करने लगा। तालाब के इस तरफ जिधर मैं खड़ा हूँ इधर की किले का कुछ निर्मित हिस्सा दिख रहा है।

श्री गंगा महारानी जी मंदिर

पर गंदगी इतनी है की यहाँ खड़ा होना भी दूभर है। इसी ओर पिछले हिस्से में आया तो पाया श्री गंगा महारानी जी मंदिर। जो भरी दोपहरी में बंद है।

बाहर ही कुछ तस्वीर निकलवा कर चल पड़ा रेल परिसर। ठीक घंटेभर बाद ट्रेन है माधोपुर के लिए। पैदल ही किले में निकल आया।

किले के भीतर यहाँ लोगो का निवास भी है। उद्यान और संग्रहालय भी। समय से लिफ्ट मांगते हुए निकल पड़ा रेल परिसर। किले के दूसरे हिस्से से निकलते हुए नाला साफ सुथरा दिख रहा है।

नया शहर सवाई माधोपुर

कुछ तस्वीर लेते हुए दोबारा लिफ्ट ले कर अगले चौराहे तक। चौराहे से स्टेशन से कुछ कदम की लिफ्ट मिल गई। स्टेशन पर समय से पहुँच कर राहत मिल रही है।

यहाँ चाय की चुस्की लेते हुए ट्रेन के आने का समय देख रहा हूँ जो बस बीस मिनट की दूरी पर है। स्टेशन में सन्नाटा पसरा हुआ है। कोरोनाकाल के बाद से यही हालात हर जगह हैं।

स्टेशन में दाखिल हो अपना टिकट जांच कराया। सीढी के माध्यम से प्लेटफार्म संख्या चार पर पहुँच ट्रेन का इंतजार करने लगा। कुछ ही क्षणों में ट्रेन का आना हुआ।

बैठ कर निकल पड़ा माधोपुर। ट्रेन की यह व्यवस्था देख मन खुश हो चला है। हर कोई अपनी निर्धारित सीट पर विराजमान है। अगर ये व्यवस्था हमेशा के लिए बनी रहे तो क्या बात है।

ट्रेन चलती की मैं अपनी सीट पर बैठ गया हूँ। यहाँ एक भाईसाहब अपना आधिपत्य जमाने की कोशिश में हैं। जो मुझे आता देख स्वत ही उठकर निकल लिए।

सवाई माधोपुर में कुछ यूँ रहा दृश्य

शाम के पांच बजे तक आ पहुँचा सवाई माधोपुर। जहाँ आने के लिए जाने कितने महीनो से योजना बना रहा था। ऐसे प्रतीक्षित जगह आ कर बहुत ही सुकून मिलता है।

आज यहाँ अपने पुराने सामुदायिक मित्र आर्यन के साथ गुजरूंगा। जो मेरा स्टेशन परिसर के बाहर इंतजार कर रहे हैं। स्टेशन पर बाघों की चित्रकारी है जग देखने को मिल रही है।

स्टेशन से बाहर निकल कर आर्यन की गाड़ी में लदकर निकल पड़ा जहाँ वो ले जा रहे हैं।

भरतपुर से माधोपुर तक कुल सफर 196किमी

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