भारत के अंतिम छोर पर रामेश्वरम ज्योतिलिंग

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करईकुडी से रामेश्वरम

रात के दो बजे की ट्रेन छोड़ने का कारण था भयंकर नींद का आना। आंख खुली जरूर थी पर अन्नामलाई को देख कर दोबारा सो गया सुबह का अलार्म लगा कर।

सुबह तड़के उठ समान बांध कर निकलने लगा। मुझे उम्मीद नहीं थी की अन्नामलाई मुझे स्टेशन तक छोड़ने आएंगे। पर सुबह सवेरे अपनी नींद खराब करके अपने दुपहिया वाहन से हमें स्टेशन पर छोड़ा।

अंतरजाल पर टिकट कल रात्रि ही आरक्षित करा लिया था। जिसका फायदा मिल रहा है। ट्रेन आने पर सामान्य डिब्बे में गजब की भीड़ है। इधर सामान डिब्बा खाली नजर आ रहा है।

बैग सहित इसी डिब्बे में घुस आया। सामान रखने वाली जगह में अपनी चटाई बिछा कर नींद पूरी करने का प्रयास करने लगा।

सुबह की अंधेरी रात में आसमान तारों से चमचमा रहा है। हल्की सुबह होने पर नींद टूटने लगी है। चलती ट्रेन के कारण सीट पर ठीक से नींद भी नहीं आई। उतरकर दरवाजे के पास आ गया।

सूरज उगता हुआ शायद आज देखने को मिले। हल्की रोशनी से आसमान का निचला हिस्सा जगमगाने लगा है। ट्रेन इस कदर इलाके में आगे बढ़ रही है जैसे यहीं अंत है।

इंजन के ठीक पीछे होने का यही फायदा है की ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है। जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है।

कुछ दिन पहले आए तूफान ने यहाँ भारी तबाही मचाई जो साफ देखा जा सकता है। कहीं पेड़ इधर उधर पड़े हैं कहीं किसी का आशियाना उजड़ गया है।

सूर्योदय हो रहा है और धीरे धीरे प्रकाश फैल रहा है और अंधेरा छट रहा है। कुछ किमी आगे आने के बाद समुद्र भी दिखाई देने लगा है।

पूरब से सूर्य उगा घाना उजियारा

रामेश्वरम  पमबम पुल

ट्रेन से रामेश्वरम का पमबम पुल पार करने में जो आनंद है उसका वर्णन अक्षरों में करना संभव नहीं दिखता। यह दुनिया का एक मात्र रेलवे पुल है जो समुद्र के ऊपर बना हुआ है।

इस पुल पर काम करने वाले कर्मचारी अक्सर समुंदर में गिर कर मर जाते हैं। खासतौर पर चट्टान से टकरा कर।

ऐसा इसलिए भी क्यों कि पुल के दोनों तरफ रेलिंग ना होना। फिर भी कर्मचारी अपने काम के प्रति संकल्पी हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी वह यही काम कर रहे हैं।

काफी समय पूर्व यह द्वीप भारत की भूमि से जुड़ा हुआ था। परन्तु बाद में सागर की लहरों ने भारत और द्वीप के भूमि रास्ते को काट डाला। जिससे वह चारों ओर पानी से घिरकर टापू बन गया।

रामेश्वरम हिन्द महासागर और बंगाल की खाड़ी से चारों ओर से घिरा हुआ एक सुन्दर शंख के आकार का एक द्वीप है। इस पुल पर जंग लगा लोहा भी देखा जा सकता है। जो की नमी के कारण है।

यहाँ पुताई भी नियमित रूप से होती रहती होगी अन्यथा ऐसी नमी में ये पुल टिक ही नहीं पाएगा।

हाल ही में रामेश्वरम और आस पास के इलाकों में तूफान की चेतावनी जारी की गई थी। पुल के पहले के गांव में कुछ रात पहले जोर कि आंधी तूफान से तबाही देखी जा सकती है।

किसी के घर की छत उड़ गई, कहीं पेड़ गिरे पड़े थे, किसी का खेत उजड़ा हुआ था तो किसी का आशियाना।

आंधी तूफान आना यहाँ आम बात है। 1954 में जब भयंकर तबाही हुई थी तब यह पुल एकदम नस्ट हो चुका था। लेकिन आश्चर्यजनक, मात्र 46 दिनों में दोबारा पुल का निर्माण कर लिया गया था। रामेश्वरम मंदिर जाने के लिए कंक्रीट के 145 खम्भों पर टिका करीब सौ साल पुराना पुल है।

रामेश्वरम जाने वाले लोग इस पुल से होकर गुज़रते हैं। समुद्र के बीच से निकलती ट्रेन का दृश्य बहुत ही रोमांचक है। इस पुल के अलावा सड़क मार्ग से जाने के लिए एक और पुल भी बनाया गया है। पुल पार कर आखिरकार टापू पर ट्रेन आ गई है। गांवों से गुजरने लगी।

वर्षों पुराना पमबम पल

व्यवस्था

दस बजे तक मैं रामेश्वरम स्टेशन आ पहुंचा। रामेश्वरम स्टेशन पर कुछ तस्वीर के बाद बाहर के रास्ते की ओर चल पड़ा। शरीर की थकावट दूर करने के लिए चाय की प्यास लगने लगी।

स्टेशन के अंतिम छोर पर आ खड़ा हुआ चाय का स्वाद लेने। कुछ देर गपशप के बाद ढूढने लगा अमानती घर। जानकारी मिली की भीतर ही अमानती घर है पर उसके लिए अलग से इमारत में व्यवस्था है।

ट्रेन का टिकट दिखा बैग जमा करने आ पहुंचा। पर यहाँ तो जमाकर्ता ही कुर्सी पर नहीं हैं। धीरे से अंदर से अपनी कुर्सी पर आ धमके। उचित मूल्य पर अमानती घर में बैग जमा करवा दिया। जैसा माहौल बनेगा वैसा रात तक निर्णय लूंगा।

स्टेशन के ठीक बाहर रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग जाने वाली कई बसें खड़ी हैं। मैं बारह नंबर की बस में बैठ गया। कुछ समय लगा भरने में पर अधिकतर श्रद्धालु ही हैं।

बस ने ठीक मुझे समुद्र तट के सामने उतारा। इस तटवर्ती अड्डे पर समुद्र का पानी ऐसा घिनाहा पड़ा है जिसकी कोई सीमा नहीं। किनारे किनारे होते हुए मैं मंदिर की ओर बढ़ चला।

मैं देख सकता हूँ की समुद्र के किनारे का पानी इतना काला पड़ चुका है कि जो नहाने योग्य बिलकुल भी नहीं है। उपयोग में लाए गए फूल, पन्नी, मैले पुराने कपड़े पड़े हुए हैं। लेकिन फिर भी अनुनाई भक्तिभाव से स्नान कर रहे हैं। इसी जगह।

घूमते फिरते मंदिर के सामने आ पहुंचा। यहाँ कुंड में नहाने का भी प्रचलन है लेकिन मुझे कुंड ढूंढने पर भी नहीं मिल रहा है।

एक महिला से नहाने के लिए कुंड पूछा तो उन्होंने पीछे के स्थान की ओर इशारा करते हुए यहाँ नहाने को कहा।

मंदिर के पास बने स्नानघर में स्नान करके निकल आया। स्नान करने के लिए एक कक्ष भी नहीं है। बैग बाहर रख बारी बारी से स्नान करने लगे।

साथी घुमक्कड़ के बाद मैं चल पड़ा नहाने खुले में ही। कपड़े गीले कर यहीं फैला दिए। पर अभी भी जूते और छोटे बैग रखने की समस्या है। जो की साथी ने पास के लॉकर में रखवा दिए हैं।

रामेश्वरम स्टेशन परिसर के बाहर लेखक

रामेश्वरम मंदिर

प्रेम ने चिदंबरम में ही बता दिया था की रामेश्वरम मंदिर में कमर के नीचे बिना धोती के प्रवेश वर्जित है। सो मैं धोती का वेश बना कर पास के लॉकर में छोटा बैग जमा करा कर मंदिर के बड़े विशाल गलियारे में प्रवेश कर गया। स्टेशन से चप्पल में आया हूँ जिससे कोई तनाव ही नहीं है जैसा अक्सर मंदिर के बाहर जूते उतरने के बाद होता है।

मंदिर के भीतर छोटे मंदिर से गुजर कर बड़े मंदिर में आ गया। यहाँ कतार अभी छोटी है मौका पा कर खड़ा हो गया धक्का मुक्की के बीच।

यहाँ भगवान राम ने नल एवं नील नामक दो बलशाली वानरों की सहायता से लंका पर चढ़ाई करने से पूर्व एक पत्थरों के सेतु का निर्माण करवाया था, जिसे रामसेतु कहा गया। यह वही रामसेतु है, जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘एडेम्स ब्रिज’ के नाम से जाना जाता है।

नल और नील को एक ऋषि का श्राप था कि वह दोनों जिस वस्तु को भी पानी में फेकोगे वह नहीं डूबेगी। यही श्राप सेतु बनाते समय भगवान राम के काम आया। इसलिए वह दोनों योद्धा पत्थरों को जल में डालते गए और एक विशाल सेतु का निर्माण हो गया।

जिस पर चढ़कर वानर सेना ने लंका पहुंच विजय पाई। बाद में श्री राम ने विभीषण के अनुरोध पर धनुषकोटि नामक स्थान पर यह सेतु तोड़ दिया था। आज भी इस 30 मील (48 कि.मी.) लम्बे सेतु के अवशेष सागर में दिखाई देते हैं।

रामेश्वरम मंदिर में ये पत्थर आज भी भक्तों के दर्शन के लिए रखे गए हैं। वाल्मीकि रामायण के अनुसार इस मंदिर में जो शिवलिंग हैं, उसके पीछे मान्यता यह है कि जब मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम सीताजी को रावण से छुड़ाने के लिए लंका जा रहे थे, तब उन्हें रास्ते में प्यास लगी।

जब वे पानी पीने लगे तभी उनको याद आया कि उन्होंने भगवान शंकर के दर्शन नहीं किए हैं। ऐसे में वे कैसे जल ग्रहण कर सकते हैं।

तब श्री राम ने विजय प्राप्ति के लिए बालू का शिवलिंग स्थापित करके शिव पूजन किया था। क्योंकि भगवान राम जानते थे कि रावण भी शिव का परम भक्त है और युद्ध में हरा पाना कठिन कार्य है।

इसलिए भगवान राम ने लक्ष्मण सहित शिवजी की आराधना की और भगवान शिव प्रसन्न होकर माता पार्वती के साथ प्रकट होकर श्री राम को विजय का आशीर्वाद दिया।

भगवान राम ने शिवजी से लोक कल्याण के लिए उसी स्थान पर शिवलिंग के रूप में सदा के लिए निवास करने को कहा जिसे भगवान शिव ने स्वीकार कर लिया।

यहाँ दर्शन के लिए देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। भारतवर्ष को एकता के सूत्र में पिरोने के लिए परम पवित्र चार धामों की स्थापना चार दिशाओं में की गई है।

उत्तर दिशा में हिमालय की गोद में बद्रीनाथ, पश्चिम में द्वारकापुरी, पूर्व में जगन्नाथपुरी तथा सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित है रामेश्वरम धाम।

भौगोलिक दृष्टि से चार धाम एक परिपूर्ण वर्ग का निर्माण करते हैं। जिसमें बद्रीनाथ और रामेश्वरम एक देशांतर पर पड़ते हैं एवं द्वारका और जगन्नाथपुरी एक ही अक्षांश पर पड़ते हैं।

भारत के उत्तर मे काशी की जो मान्यता है, वही दक्षिण में रामेश्वरम् की है। पुराणों में रामेश्वरम का नाम गंधमादन बताया गया है।

कतार धीरे धीरे बड़ी ही होती जा रही है। आगे चल कर लकड़ी के पटरे पर चढ़ कर मंदिर के भीतर आया गया। यहाँ कतार विभाजित हो कर दो भाग में बट गई।

जिससे श्रद्धालुओं को सहूलियत हो रही है। फटफट दर्शन भी हो रहे हैं। कभी कभी एक कतार खाली रह जा रही है जिसे सुरक्षाकर्मी जबरन जनता को उसमे भेज रहे हैं।

दर्शन के बाद पास में लगी मूर्तियों को निहारने लगा। साथी को लगा उसे दोबारा दर्शन करने चाहिए। इसलिए कूद पड़ा दोबारा कतार में। कुछ मिनट के इंतजार के बाद मैं बाकी छोटे मंदिरों में दर्शन करने लगा।

मंदिर में दर्शन के बाद चारो ओर से मंदिर को अंदर से घूमने लगा। पहले तो ये शिवलिंग रहा होगा। मंदिर तो वर्षों बाद बना है।

दर्शन करने के बाद लेखक

अब धनुषकोड़ी

अंदर आने और बाहर जाने का रास्ता एक ही है। निकल कर चप्पलों के ढेर में चप्पल ढूंढने की जद्दोजहद शुरू हो गई। जो आखिरकार पूरी हुई एक यहाँ तो दूसरी कहीं और से उठा कर।

मंदिर के भीतर तो यंत्र ले जाना मना है। बाहर से ही कुछ तस्वीर लेना बेहतर रहेगा। अब सामान समेट कर इस जगह से निकलना है।

लॉकर कक्ष से अपना बैग उठा कर भोजन की तलाश में निकल पड़ा। धार्मिक स्थल होने के कारण यहाँ हर सुविधा उपलब्ध है। जैसे उत्तर भारतीय खाना, गुजराती, बंगाली हर तरह का।

ऐसे ही एक गुजराती ढाबे में चला आया बैग लादकर। भोजन में एक गुजराती थाली सज कर आई। खाना बेहद स्वादिष्ट।

भोजन के पश्चात निकल गया अपनी अगली मंजिल धनुषकोडी की ओर।

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