भारत का सबसे चौंडा जलप्रपात(वाटरफॉल)

छत्तीसगढ़ | बस्तर | भारत

जिला जगदलपुर

जगदलपुर से बस्तर 45 किलोमीटर की दूरी पर है जहाँ से यह अनोखा जलप्रपात देखने को मिलेगा।

खाना पीना करने के बाद स्टेशन से बाहर निकला। यहाँ मुहाने पर ही टेंपो खड़ा है।

जनाब का कहना है की ये मुझे वहाँ तक छोड़ देंगे जहाँ से बस्तर के लिए बस या जीप की सुविधा उपलब्ध है।

ये भी सही है। कुछ और सवारियों के ले कर चालक साहब निकल पड़े।

नक्सली प्रभावित राज्य छत्तीसगढ़ में एक अजब सी वन शांति देखने को मिल रही है।

चारों दिशाओं में हरियाली ही हरियाली। अमूमन दूसरे राज्य छत्तीसगढ़ के सामने फीके जान पड़ते हैं।

रास्ते में दशहरा का उत्सव मनाते लोगों को देखा जा सकता है। ऐसे ही एक जुलूस में बड़ी मूर्ति के सामने मदमस्त होली खेलते नजर आ रहे हैं।

डीजे इस कदर ऊंची आवाज में बज रहा है की टेंपो भी हिला जा रहा है।

शोर शराबे से दूर शहर में भी ज्यादा भीड़ भाड़ नहीं है। ना ही ज्यादा दुकानें देखने में आ रही हैं।

दुकानों के बाहर केले ऐसे लटके हैं मानो फांसी दे दी गई हो। दोपहर के तीन बज रहे हैं।

भाईसाहब ने मुझे अनुपमा चौक में उतार दिया। यहाँ से बस्तर जाने के लिए दूसरी टेंपो में बैठना होगा। या फिर बस।

पहले तो कुछ लोगों ने कहा बस्तर जाने के लिए बस की सुविधा हर एक घंटे में उपलब्ध है।

देखा की जीप वाला ही बस्तर बस्तर पुकारते हुए अपनी गाड़ी भर रहा है।

बैग लेके इसी जीप में आ गया लदने। मैंने पीछे की बजाए आगे बैठेने को ज्यादा महत्व दिया।

किसी भी वाहन में आगे से सामने का लगभग सारा नज़ारा दिखाई पड़ता है। जीप लगभग भरी हुई है समय रहते निकल पड़ा।

नक्सल प्रभावित क्षेत्र

शहर से बाहर निकलने के बाद कई जगहों पर पुलिस की चौकी देखने में आ रही है।

पर जीप को कहीं रोका नहीं गया है अभी तक। 

एक दो पोस्ट तो ऐसे ही निकल गईं। आगे बढ़ने पर और चौकियां मिली। यहाँ पर रोक कर गाड़ी की तलाशी ली जा रही है।

इतनी भारी सुरक्षा का घेराव यहाँ ये आम है। देश इतना आतंकवाद से ग्रसित नहीं है जितना नक्सलवाद से है।

नक्सलवाद की शुरुआत तो अच्छे कार्यों के लिए हुई थी पर समय के साथ नक्सली अपनी ही बनाई हुई मंजिल से भटक गए।

अब नौबत ये है की ये खून खराबे पर उतर आए हैं। सरकार तरह तरह को योजनाएं ला कर इनको आकर्षित तो करती है।

इनमे से कई समर्पण भी करते हैं। उसके बदले सरकार इनके बच्चो को उच्च शिक्षा प्रदान करती है।

कई तो पुलिस में भी शामिल हुए हैं।

गांव के लोगों को भड़का कर दूसरे नक्सली अपने दल में गांव वालों को शामिल भी कर लेते हैं।

जब किसी नक्सली को अपनी ही बिरादरी के आदमी पर शक होता है तो वो उसे बक्शते भी नहीं हैं।

चालीस मिनट के अंतराल में जगदलपुर से बस्तर पहुंच गया। यहाँ भी वाहन एक चौक तक ही आया।

जिससे आगे जाने की किसी भी वाहन को अनमति नहीं है।

किराया थमाया और चल पड़ा झरने की तरफ।

महज तीन चार ढाबे, एक सरकारी होटल और दो कमरे का एक एंप्योरियम के आलावा और कुछ भी नहीं है। 

पर माहौल में हलचल है। पर्यटक अच्छी तादाद में हैं।

वजनी बैग को से छुटकारा

सामने तनी बड़ी भारी इमारत खड़ी है। जो सरकारी जान पड़ती है।

इसी सरकारी होटल की ओर बढ़ते हुए यहाँ कमरा लेने पर विचार किया।

बैग सहित ही मैं अंदर आ गया। रिसेप्शन पूछते हुए बाईं ओर मुड़ते हुए होटल परिसर में दाखिल हुआ।

पर यहाँ रिसेप्शन पर कोई भी मौजूद नहीं है। ना जाने कैसी व्यवस्था है।

सीढियां से ऊपर जा रहे अन्य सज्जन के द्वारा मालूम पड़ा की यहाँ एक रात्रि के लिए कोई भी कमरा खाली नहीं है।

जब कमरा ही नहीं खाली है तो बैग रखने की अनुमति भी कैसे मिलेगी।

समझ नहीं आ रहा करूं तो करूं क्या। झरने को भी देखना है। समय भी ज्यादा नहीं है। सूरज अलविदा कहने को आतुर है।

होटल से निराश हो कर बाहर निकल आया। दाहिने तरफ नजर पड़ी तो देखने में आता है एक छोटा कमरा।

साथी घुमक्कड़ ने वहाँ जा कर व्यवस्था देखी। बैग रखने की भी बात हो गई।

तय हुआ की बैग यहीं रख दिया जाए। खमखा बैग लेके इधर उधर घूमना थकाऊ और व्यर्थ दोनो ही होगा।

अमानती घर से ले कर सहकर्मी के वादे से अब कहीं जा कर बैग रखने की व्यवस्था होती दिख रही है।

साथी घुमक्कड़ ने बताया की जब पूरा वर्णन सुनाया तो वो बैग रखवाने को राज़ी हो गए।

पर एक शर्त के साथ की शाम के छह बजे तक आ जाने का सुझाव दिया। उसके बाद ये ये इंपायोरियम बंद हो जाता है।

बैग ले कर इम्योरियम पहुंचा। ये दो कमरों का इम्योरियां है। जहाँ पुरानी शिल्पकारी रखी हुई है।

अनेकों भव्य मूर्तियां और भी बहुत कुछ। दो कमरों में से दद्दू अंदर वाला कमरा तो बंद कर जायेंगे।

बाहर वाले कमरे में बैग रखा रहेगा। जिसकी निगरानी दद्दू करते रहेंगे।

सीढ़ियों से इंद्रावती नदी की और जाते वक़्त का नज़ारा

नदी से झरना

बड़े बैग यही रख दिए। छोटे बैग में कैमरा और कुछ वस्त्र डाल लिए।

अब मैं भी शाम तक आराम से झरने को निहारूंगा। बैग रखकर सुकून से निकल पड़ा झरने की ओर।

ऊपर खड़े लोग झरने को बस निहारे जा रहे हैं। झरने की गर्जना इतनी जोर है की बात करते समय भी चिल्लाना पड़ रहा है।

जहाँ से झरना नीचे गिर रहा है उस स्थान के आस पास भी काफी लोग जामा हैं।

अतः बेहतर होगा अगर सीढ़ी के मार्ग से नीचे जाकर झरने को देखे।

सरकारी होटल के बगल से नीचे जाने का मार्ग बना है। जिससे कुछ आते जाते दिख रहे हैं।

सुरक्षा को मद्देनजर रखते हुए रेलिंग हर जगह लगाई गई है। 

पास आया तो देखा बाईं ओर से नीचे जाने का रास्ता है। जहाँ काफी लोग जा रहे हैं।

बकायदा यहाँ सीढियां बनी हुई हैं। पर नीचे जाने का रास्ता काफी लंबा जान पड़ रहा है।

सीढियां पर से गुजरते हुए नीचे जा रहा हूँ पर जलप्रपात कहीं से भी नहीं दिख रहा। सिर्फ उसकी आवाज सुनी जा सकती है।

छींटों से पेड़ पौधे गीले हैं। सीढी का कुछ भाग भी गीला है। जबरदस्त जलप्रपात है जिसकी छींटे इतनी दूर तक पड़ रही हैं। गजब है!

इंद्रावती नदी जो पश्चिम में जा कर गोदावरी से मिलती है

इंद्रावती नदी  में स्नान

नीचे उतरने के बाद देखता हूँ तो बस इक्का दुक्का दुकानें। जो पर्यटकों की सुविधा के लिए हैं।

चाय पानी मैगी नूडल जैसी खुराक भी है। पर उतनी ही ज्यादा मात्रा में यहाँ गंदगी।

हजारों पन्नियां छोटे पौधों में लिपटी हुई हैं। जो प्रदूषित कर रही है वातावरण।

बड़ी बड़ी चट्टानों के बीच लोगों ने झरने के समीप तक जाने का मार्ग भी बना लिया है।

झरने जहाँ गिर रहा है उसके आगे नदी और नदी के उस पर पेड़ ही पेड़।

मैं झरने के पास जाने के बजाए इंद्रावती नदी की तरफ चलने लगा।

सकरीले पत्थर पार करते हुए झरने से लगभग आधा किलोमटर दूर पर आकर खड़ा हो गया।

यहाँ तो हालत और भी बदतर हैं। फटे हुए कपड़े झाड़ियों में चिपके हुए हैं।

दाईं ओर कुछ युवक ताश खेलते भी दिख रहे हैं। अलाव जलाए जाने के सबूत भी हैं।

रात में लोग यहाँ आते होंगे। ठंड से बचने के लिए अलाव का प्रयोग होता होगा।

झरने का वेग इतना तेज़ है की गिरते हुए पानी की छींटे इतनी दूर खड़े होने के बावजूद भी चेहरा भीगा देने लायक हैं।

साथी घुमक्कड़ ने सुझाया स्नान कर लिया जाए।

दाएं बाएं देखने पर जनता नजर नहीं आ रही। सामान छोड़ कर पानी में कुछ देर रहा भी तो कोई खतरा नहीं है।

बैग में सामान भरकर निकल आया नदी में। पानी इस कदर ठंडा है जिसकी हद नहीं।

अगर इतनी बड़ी नदी है तो मगरमच्छ तो जरूर ही होगा यहाँ। पर आसपास तो नजर नहीं आ रहा।

मित्र ने अपने मोबाइल के इंस्टाग्राम में लाइव लगा दिया। अब इनके अकाउंट में मेरा नहाते हुए वीडियो को जनता देख रही है।

यह अभद्रता बिल्कुल पसंद नहीं आई। मेरे निकल आने के बाद साथी घुमक्कड़ भी कूद गया पानी में।

साथी तो अपने वस्त्र इसी के वास्ते लाया है। पर मैं खाली हांथ ही आया हूँ।

है तो एक मात्र अंगौछा। जिससे शरीर ढकने के काम आ रहा है और पूछने के भी।

बैग में भरे कपड़े निकाले और वापस धारण कर लिए।

सूर्यास्त और नाव

सूर्यास्त होने को है। हल्का हल्का अंधेरा छा रहा है। साथी मित्र के स्नान के बाद मैं वापस निकलने लगा होटल की ओर।

रात बिरात या सूर्यास्त के बाद यहाँ ठहरना उचित नहीं होगा जिससे जरा भी परिचित नहीं हूँ।

पास में टहल रहे दो लड़कों से मगरमच्छ वाली की पुष्टि की तो पता लगा ये सत्य है।

नदी के दूसरे छोर पर मगरमच्छ रहता है। जो इधर कम ही आता है। और मानव उधर कम ही जाते हैं।

इसका मतलब ये था कि मैं अकेला नहीं नहा रहा था। मेरे साथ कोई और भी था नदी में, वो बात अलग है हमारी भेंट नहीं हुई।

नदी हो समुंदर प्राकृतिक पानी में नहाने में मज़ा भी है और उतना ही खतरा भी। चूक होने पर दुर्घटनाएं घटती हैं।

स्नान के बाद चल तो दिया वापस लेकिन ऐसा लग रहा है मानो सिर में पानी भर गया हो। 

तबीयत कुछ नासाज़ होने लगी है।

भारी मन के साथ ऊपर जाने के लिए बढ़ा तो यहाँ देखने को मिला कई मल्लाह अपनी सवारी नाव में बिठा कर झरने के पचास मीटर पास तक ले सजा रहे हैं।

ये जितना रोमांचकारी है उतना खतरनाक भी। लेकिन इस काम के लिए पूर्ण सुरक्षा का भी ध्यान रखा जा रहा है।

बकायदा जीवन रक्षक जैकेट पहना कर सवारियों को नाव में बैठने दिया जा रहा है।

साथ ही जा रहे हैं प्रशिक्षक जो दुर्घटना होने पर लोगों को बचा सकें।

झरने के इतने पास खड़े होने पर छींटे और भी तेजी से आ रहे हैं। स्नान करते वक्त तो आ ही रहीं थी पर अभी ज्यादा हैं।

मैने आखिरकार खामोश पड़े अपने कैमरे को निकाला और तस्वीरें लेने लगा।

छींटाकशी इस कदर हावी है की कैमरा भी भीगा जा रहा है।

यही कारण कि एक तस्वीर लेने के बाद कैमरे के लेंस को पोछना पड़ रहा है। ऐसा बार बार हो रहा है।

मैं नाव से झरने के समीप जाने के पक्ष में नहीं हूँ। वो भी अब जब अंधेरा हो रहा है।

उतने करीब जा कर शायद ही कुछ दिखे इस छींटाकशी में। बल्कि वहाँ जाने पर भीग और जाऊंगा।

जीवन रक्षक जैकेट तो ठीक है पर कुछ ऐसा वैसा हुआ तो तैरना भी नहीं आता। ऊपर से घायल कंधा अलग।

खैर साथी घुमक्कड़ ने नाविक से कम पैसे में चलने की बात की पर वो राजी ना हुआ।

वैसे भी ये अंतिम नाव है जो वहाँ तक जा रही है। सवारियां भी काम ही हैं अब।

झरने के इतने पास ही बार बार कैमरा पोछ कर तस्वीर निकाल ले रहा हूँ।

अंधेरा भी हो गया है नाव से जाने की सेवा भी समाप्त हो चुकी है।

मैं चल पड़ा इस अंधेरे में वापस इंपायोरियम की तरफ। पास में बने ढाबे में चाय का भगौना उबाल मार रहा है।

कुछ लोग परिवार सहित अभी भी यहीं ठहरे हुए दिख रहे हैं।

चित्रकूट जलप्रपात को पास से दिखने के लिए नाव सेवा

ठहराव कहाँ?

पर मेरे लिए असल चुनौती है कि ठहरने की। तंबू भी है और जगह भी।

पर क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्र में खुले आसमान के नीचे तंबू लगाना उचित होगा।

यही है असल समस्या। सीढियां पर मोबाइल की टॉर्च की रोशनी के सहारे ऊपर आ गया।

साथ ही और भी लोग ऊपर आ चुके हैं। कुछ लोग तो इस बड़ी इमारत में ठहरे हुए हैं।

बाकी जो अपने अपने वाहन से आए हुए हैं वो उसी वाहन से वापस भी जाते दिख रहे हैं।

मेरे कदम एंप्योरियम की ओर बढ़े बैग लेने की मंशा से। समय छह से ज्यादा हो गया है।

पर दद्दू अभी भी यहीं मौजूद हैं। बताने लगे की सिर्फ बैग की निगरानी के लिए वो अभी तक रुके हुए हैं।

बैग उठने से पहले एक बार मैंने दद्दू से बाहर वाले कमरे में सोने का आग्रह किया।

जिस पर वो तुरंत मान गए। आगे की जानकारी देते हुए बताया की अगला सुरक्षाकर्मी कुछ देर में आ जाएगा।

जो यहाँ रात्रि में पहरा देता है। कभी कभार सो भी जाता है।

दद्दू बोले की यहाँ सोने से पहले एक बार रात्रि तक संचालक से अवश्य बात कर लें।

अब संचालक को ढूढना भी एक काम है। काम मिलेगा शायद इस होटल में।

बैग रख कर निकल पड़ा भोजन करने। झरने की तेज गर्जना इस अंधेरे में मोहक तो है ही साथ ही दिल दहला देने वाली भी।

सायंकाल के दौरान कुछ ऐसा दीखता चित्रकूट जलप्रपात

रात्रि भोज या नाश्ता

सड़क की पहली चौकी से आगे पड़े रेस्त्रां में आ गया। खाने की इच्छा को पूर्ण करने के लिए।

ना भीड़ ना जनता और ना ज्यादा स्टाफ। होटल के मालिक और दो चार सेवक।

खाने में भी ज्यादा व्यंजन नहीं। शुद्ध शाकाहारी भोजन के अलावा कुछ भी नहीं।

एक थाली ही काफी होगी ऊर्जा के लिए। परिसर में अंदर में कुर्सी पर विराजमान हो गया।

बाहर है तो एक बाप अपने बेटे के साथ मस्ती करते हुए। जो जिद्द पर अड़ा है चिप्स खाने के लिए।

जाने किस दिशा से आए हैं ये लोग इतने बड़े चार पहिया वाहन से इतनी रात में।

पास में तो सिर्फ एक ही होटल है। उसके बाद दूर दूर तक सिर्फ घना जंगल।

साथी घुमक्कड़ के भोजन करने के बाद निकल पड़ा वापस अपने होटल में। जिसे अलग ढंग से बुक कराया है।

भोजन ना करने की इच्छा से ही यहाँ तक आया था। कुछ हल्का खाने का मन है जो इस रेस्त्रां में तो मिला नहीं।

पुलिस चौकी पार करके अंदर इलाके में आ गया। ऐसा लग रहा है मानो पुलिस चौकी के इस तरफ ही सुरक्षित है।

उस तरफ से कभी भी हमला हो सकता है।

होटल के पास दिख रहा है एक छोटा ढाबा। यहीं आ गया कुछ बेहतर हल्का खाने।

परिवार द्वार संचालित इस ढाबे में घर का बना चाय नाश्ता मिलता है।

हल्के नाश्ते की तलाश में मैने भोजन लेना आवश्यक समझा। पोहा ठीक रहेगा।

इनके मेनू में दो चार ही आइटम है पर प्रेम ज्यादा है। नाश्ता कुछ ही देर में बन कर तैयार हो गया।

टीवी में चल रही पुरानी फिल्म का घर के बच्चे लूट उठा रहे हैं। ढाबे के मालिक ही परिवार के मालिक हैं।

जो बहुत प्रेम के साथ बच्चों से बरताव कर रहे हैं।

पोहा अच्छा बना था। कल सुबह भी यहीं आ कर नाश्ता कर सकता हूँ।

चित्रकूट जलप्रपात रात में कुछ यूँ नज़र आया

अनुमति

ढाबे से निकल कर आसपास टहलने लगा। झरने की जोर की बुलंद आवाज रोंगटे खड़े कर रही है।

यहां टहल रहे पालतू कुत्ते स्वताः ही मेरे निकट आ खड़े हुए। जो शायद यहीं रात गुजारते हैं।

जगह तो अच्छी है तंबू गाड़कर सोने के लिए पर जलप्रपात के पास सोना ठीक नहीं। क्या पता रात भर में क्या हो जाए।

टहलते टहलते बिक्री भंडार के पास आ पहुंचा। यहाँ मौजूद रात्रि की ड्यूटी पर आए सुरक्षाकर्मी से बात हुई।

उनके माध्यम से पता चला की यहाँ का संचालक कहाँ मिलेगा। मैं सुरक्षाकर्मी के साथ संचालक को खोजने निकल पड़ा।

जो ज्यादा दूर नहीं बल्कि होटल के बाएं हिस्से में मुआयना करते हुए मिले।

उनसे सारी कहानी और अब तक की यात्रा के बारे में बताया। जिससे शायद वो थोड़ा कहीं ना कहीं प्रभावित नजर आए।

एक रात्रि की बात रखी जिससे उन्होंने स्वीकार कर लिया। ना कोई सवाल न कोई जवाब।

काम शब्दों में ज्यादा बात। वैसे तो सोने की कोई समस्या नहीं है क्योंकि तम्बू है साथ में।

तम्बू झरने के आस पास के इलाके में लगाना सही नहीं रहेगा। बाकी इलाका जंगली और घोर अंधेरे में डूबा है। इस नक्सलियों प्रभावित राज्य में सर पर छत होना जरूरी है।

अनुमति मिलने के बाद मैं अब चैन की नींद सो सकूंगा। एक कमरे में तीन लोग सोएंगे।

मैं मेरा मित्र और शायद सुरक्षाकर्मी भी।

गर्मी और उमस के हाल ठीक कम ही हैं। मैने बैग से अपनी अंग्रेजी चटाई निकाली और बिछाकर उसी पर सोने लगा।

बैग और जूते पटिया के नीचे रख दिया।

पर काफी देर हो गई सुरक्षाकर्मी अंदर नहीं आए। जब आए तो कुछ सामान लेने के लिए भीतर आए तो पर वापस ही चले गए।

सुबह की यही योजना है की जल्दी उठकर नित्य क्रिया से निपटकर झरने के पास कुछ वक्त बिताना।

खासतौर पर सुबह इसलिए क्योंकि भीड़ ना के बराबर होगी। जैसे जैसे सूरज परवान चढ़ेगा भीड़ भी बढ़ेगी।

सुबह जल्दी उठने का एक और मकसद ये भी है की अकेले झरने की तस्वीरें ले सकूं।

जिसमे एक भी प्राणी आसपास भी ना दिखाई दे। जो आज शाम को लेने में असफल रहा अत्यंत भीड़ के कारण।

गर्मी में मैं और मेरा साथी घुमक्कड़ कब सो गया पता ही नही लगा। शायद थकान ही इतनी थी की झपकी बिना बताए ही लग गई।

सुबह अलार्म बज पर मेरी निद्रा भंग हुई। उठने का मन तो नहीं है पर अगर नही उठा तो ये मौका दोबारा नहीं आएगा।

ना मैं यहाँ एक और दिन रुकूंगा ना ये सुबह दोबारा होगी।

अगली सुबह

बिक्री भंडार में नींद अच्छी आई। मैं ठीक से सो सकूं इसलिए यहाँ का सुरक्षाकर्मी रात भर अन्दर नहीं आया।

ये उसके आदर्श और अच्छी मेहमाननवाजी के संकेत हैं।

रात्रि में ही यह तय कर लिया था कि अगले दिन भोर में उठकर है झरने के पास कुछ बेहद अच्छी तस्वीरें लेनी हैं।

हमारे बड़े बुज़ुर्ग कह गए हैं जल्दी उठने के फायदे होते हैं और हुआ भी। बिक्री भंडार से बाहर झांकने पर झरने के किनारे कोई भी नहीं दिख रहा है।

यह बेहतरीन मौका है बहुत सी अच्छी तस्वीरें लेने का, जिससे कल शाम को वंचित रह गया था।

गेट खोलने पर सुरक्षाकर्मी को बाहर नहीं पाया। बाहर रखी है तो सिर्फ एक कुर्सी।

शायद इसी कुर्सी पर उन्होंने ये रात बिताई होगी ताकि मुझे और मेरे मित्र को कष्ट न हो।

लोटा ले कर मैं निकल पड़ा सौंचघर। रात में तो कुछ भी नही नजर आ रहा था। पर अब सब साफ साफ दिखाई पड़ रहा है।

ढाबे पर आ कर सौंचघर के बारे में पता किया तो मालूम पड़ा की दाहिने हांथ पर ही थोड़ा आगे एक सफेद इमारत में ये सुविधा है।

गनीमत है यहाँ ये सुविधा उपलब्ध है अन्यथा किसी जंगल में झाड़ी के पीछे बैठना पड़ता।

पुलिस चौकी से काफी पहले पड़ी इमारत तक तो आ गया। पर यहाँ देखरेख करने वाला ही अभी तक नही आया है।

पर घर का ताला खुला है। अंदर दखिलब्तो हुआ पर साफ सफाई उतनी नहीं जितनी अपेक्षा की थी।

नित्य क्रिया के बाद मैं वापस बिक्री भंडार में आ गया। बैग से अच्छे कपड़े निकाले और राजा बाबू बन कर बैठ गया।

उतनी देर में साथी भी हो कर आ गया। तैयार होते होते छह बज गए।

जल्दी इसलिए भी उठना और अनिवार्य हो गया क्योंकि आज दिन की ट्रेन से विशाखापट्टनम निकलना है।

बैग बिक्री भंडार में एक दफा फिर छोड़कर निकल आया झरने की तरफ।

चित्रकूट जलप्रपात की उठती छींटे और सूरज की किरण पड़ने से बनता इंद्रधनुष देखने लायक नज़ारा है

भारत का सबसे चौंडा जलप्रपात(वाटरफॉल)

इस झरने की तुलना कनाडा देश के नाइग्रा झरने से होती है। जो कुछ ऐसा ही दिखता है।

आकर में घोड़े की नाल की तरह होने की कारण इसकी तुलना नियाग्रा से भी होती है।

98 फीट ऊंचा और 980 फीट चौड़ा ये वाटरफॉल भारत का सबसे चौंडा जलप्रपात(वाटरफॉल) है।

90 फीट की ऊंचाई से गिरती धारा जब गर्जना करती है तब कुदरत ये संदेश दे देती है की उससे बड़ा कोई नहीं।

इसमें बनता इंद्रधनुष का मनोरम दृश्य अद्भुत है। इंद्रावती नदी पर स्तिथ ये जलप्रपात रायपुर से 340किमी दूर है।

रायपुर और विशाखापत्तनम से सीधी हवाई यात्रा की सुविधा उपलब्ध है जो जगदलपुर में स्तिथ हवाई अड्डे से जुड़ती है।

जगदलपुर से कई राज्यों के ट्रेन रूट भी जुड़े हैं। इंद्रावती नदी आगे जा कर गोदावरी से मिल जाती है।

अंतर है तो बस इतना की इस झरने की ऊंचाई ज्यादा नहीं है।

सुबह सवेरे झरने का पानी शुद्ध और हल्का पीलापन नजर आ रहा है। जो बहाव के कारण हो रहा है।

विशालकाय झरने को करीब से देखने में आनंद ही आनंद है। झरने का बहाव थोड़ा धीमा जरूर है लेकिन यहाँ से नीचे गिरने पर मौत निश्चित है।

मैं अच्छे कपड़े पहन कर सिर्फ हांथ में कैमरा ले कर ही आया हूँ। तस्वीरें लेने का कार्यक्रम शुरू कर दिया।

हर दिशा से हर तरीके से। होटल से कुछ लोग निकल रहे हैं।

शायद ये भी कमरा खाली करके यहाँ से जा रहे हैं। इसलिए एक एक कर झरने के निकट आ रहे हैं।

निकल रहा है सूरज भी। सूरज की किरण पानी पर पड़ते ही कई इंद्रधनुष बनी देखे जा सकते हैं।

एक के बाद एक तीन चार इंद्रधनुष। शायद ही कभी एक साथ इतने इंद्रधनुष देखे हों।

जितनी तरीके से हो सका उतनी तरीके से फोटु निकाल रहा हूँ। वीडियो बनाने में भी कोई कसर नही बक्श रहा।

इंद्रधुनुष को भी कैमरे में कैद कर लिया। ये सिलसिला तब तक चला जब तक कुछ भीड़ ना आ गई।

चित्रकूट जलप्रपात के पास शांति में बैठे ऐश्वर्य तिवारी

यमराज को बुलावा

भीड़ में से तीन मित्रों का एक झुंड आया। मौज मस्ती और तस्वीर लेते हुए झरने के पास पहुंच गए।

प्रकृति के साथ खेलते हुए नजर आ रहे हैं। शायद ये खिलवाड़ इन्हे भारी पड़ सकता है।

एक ने तो हद ही कर दी जब वो झरने के छोर को पर करके पत्थर के पास पहुंच गया।

जहाँ पानी तो नहीं है पर अगर ज़रा सा भी बहाव तेज हुआ तो इसकी आत्मा को यमराज तक पहुंचने में ज़्यादा देर नहीं लगेगी।

उन्हें चेताया भी फिर भी उनमें से एक नहीं मना। ये बेहद खतरनाक है। जिसे मैं तो कभी ना दोहराऊं।

मैं जिस पहाड़ी पर खड़ा हूँ यहाँ एक छोटी सी प्राकृतिक गुफा है।

जिसमें कोई शिवलिंग स्थापित कर गया है। फूल माला चढ़ा कर पूजा अर्चना भी हो गई है।

थोड़ा आगे झाकने पर देखने को मिलती है पन्नी, चिप्स के पैकेट, प्लास्टिक की पानी की बोतलें और हमारे द्वारा मचाई गई ढेर सारी गंदगी।

हमें इस बात को समझना होगा कि जहाँ भी जाए अपनी गंदगी अपने साथ वापस लाए।

कुछ लोग झरने के शुरू में ही स्नान करने में जुटे हैं। तकरीबन एक घंटा फोटु और वीडियो बनाने के बाद वापस बिक्री भंडार की ओर चल पड़ा।

चित्रकूट जलप्रपात की गर्जना के समीप कुछ इस तरह ख़ामोशी का अनुभव

कहानी किस्से

बैग लेके पास बनी ढाबे की ओर चल पड़ा। उसी ढाबे में जहाँ कल रात समय बिताया था।

ढाबे पर सुबह सुबह बच्चे खिलखिलाते नजर आ रहे। नाश्ते में पोहा ही मंगवा लिया। 

दुकान का मालिक बताने लगा कि कैसे यहाँ पिछले बरस एक लड़का आत्महत्या के इरादे से कूदा था।

चट्टान से टकरा कर अपने प्राणों की बलि चढ़ा दी। इस झरने को भी खोजें हुए ज्यादा वर्ष नहीं बीते हैं।

ऐसे ही कई लोग मरने की उम्मीद से आ चुके हैं। एक का तो किस्सा ही अलग था।

आया था कूदने विचार बदला वापस जाने का पर फिसल कर गिर पड़ा।

पर जीवन रक्षकों ने उसे बचा लिया था। कई ऐसे भी रहे जिनको नहीं बचाया जा सका।

हाल फिलहाल में इस झरने को भारतीय सर्वेक्षण विभाग ने खोज निकाला है।

जिसके कारण यहाँ प्रचुर मात्रा में भीड़ आने लगी है और इनका रोजगार भी इसी भीड़ से है।

जैसे जैसे लोगों को यहाँ के बारे में ज्ञात होगा वो अपने साथ भीड़ लाते जायेंगे। साथ ही गंदगी भी।

ढाबे वाले भैया काफी जानकारी मुहैया करा रहे हैं।

दुकानदार ने बताया की जुलाई के महीने में ये जलप्रपात अपने शबाब पर होता है।

जलस्तर इतना बढ़ जाता है की पानी इनके ढाबे तक आ जाता है। जिसकी वजह से इन लोगों को यहाँ से पलायन करना पड़ता है।

चित्रकूट जलप्रपात के ऊपर उड़ते पक्षी

नाश्ते में डबल पोहा

इतनी देर में पोहा और चाय की आ गई। सामने टीवी पर अस्सी के दशक की मार धाड वाली फिल्म चल रही है।

बस्तर से अनुपमा चौक के लिए पहली जीप आठ बजे ही मिलती है। दूसरी गाड़ी दस बजे।

इतना लंबा अंतराल क्यों? मेरे पूछने पर दुकानदार बोला कि सुबह सुबह बस्तर से ना तो जाने वाला कोई होता है और ना ही बस्तर आने वाला।

अभी सात बज चुके हैं। पास में बैठे चाय की चुस्की ले रहे सज्जन बोले “उस जीप का ड्राइवर मैं ही हुं तुम मेरे साथ चल सकते हो, आठ बजे जीप के समीप आ जाना।” 

मैंने साथ चलने की हामी भर दी। यह महाशय बस्तर से अनुपमा चौक के रास्ते रोजाना ऐसे ही अपनी जीप दौड़ाते हैं।

पास में बने मंदिर में जाने की इच्छा जाहिर की और आश्वस्त होकर बैग दुकान पर रख दिया।

मंदिर में शिवलिंग स्थापित है और सामने है नंदी बाबा। जिनकी विशालकाय मूर्ति है।

पूजा पाठ करने बहुत लोग आ रहे हैं। शायद जो झरने के पास नहा रहे हैं वो गांव के ही निवासी मालूम पड़ते हैं।

यहाँ स्नान करना भी सही है। चाहें तो मैं भी कर सकता हूँ पर समय की कमी के कारण छोड़ दिया।

कैमरा हांथ में ही है इसलिए झरने के पास आ कर कुछ और तस्वीरें निकली। इसमें इंद्रधनुष कैद कर लिया है।

मंदिर के बाहर से ही दर्शन कर के वापस आ गया ढाबे पर।

पोहा इतना स्वादिष्ट है की एक प्लेट और मांगा लिया।

किसी ने कहा था की आप किसी के कहे हुए शब्दों को भूल सकते हैं पर वो आपके साथ किए गए बरताव को नहीं।

कुछ ऐसा ही ढाबे के मालिक भी हैं। इतने सरल और खुशहाल की इतना बरताव भी याद रहेगा।

पहले के नाश्ते के तो पैसे ले लिए पर दूसरी प्लेट के नहीं। मेरे बहुत देने के बाद भी नहीं। बोलने लगे अपनी तरफ से।

आठ बज चुके हैं और जीप का हॉर्न बज पड़ा है। ढाबे से बैग उठा कर अलविदा कहा ढाबे के मालिक और उनके सुखी परिवार से।

बैग जीप के पिछले हिस्से में रख दिए और अगली सीट पर बैठ गया। ताकि सारा नजारा देख सकूं।

सवारी के इंतजार में कुछ देर और चालक साहब ने रुकना सही समझा।

साढ़े आठ बजे जीप चल पड़ी, झरने से अलविदा ले के चल दिया जगदलपुर की ओर।

जगदलपुर स्टेशन से बस्तर के चित्रकूट जलप्रपात से इंद्रावती नदी तक का कुल सफर 55km

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