भारत का दूसरा सबसे बड़ा गोलकोण्डा किला

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत | हैदराबाद

एक सिरे से दूसरे सिरे तक

पवन जी आज भोर में ही मुंबई के लिए उड़ान भर चुके हैं। उनके जाने के बाद उनकी पत्नी भी निकल गईं। लेकिन आज मेरी इनमे से किसी से भी मुलाकात ना हो सकी।

सुबह भनक तक ना लगी इनके निकलने की। दरवाजा खोल कर देखा तो एक कामवाली बाई जरूर काम कर रही थीं। इसी बीच मैं स्नान ध्यान करके तैयार हो गया।

घड़ी में नौ बज रहे हैं। बैग ले कर बाहर आया तो अब दूसरी कामवाली बाई को काम करते पाया। शायद एक खाना बनाने वाली जॉन और दूसरी साफ सफाई वाली।

कुछ देर में मैं निकल पड़ा कमरे और फ्लैट के बाहर। मेरे बाहर आते ही बाई भी ताला लगा कर निकल चली दूसरे घर की ओर।

याद आए केदारनाथ के साथी

मैं अब कन्हैया लाल जी से मिलने जा रहा हूँउनके आमंत्रण पर। कन्हैया जी किसी घुमक्कड़ी समुदाय से नहीं जुड़े हैं।

अपितु यह तब की बात है जब मैं गंगोत्री से केदारनाथ की ओर जा रहा था। एक के बाद एक सब गाडियां एक के पीछे एक खड़ी हो गई जिसके कारण उस पहाड़ पर भारी भरकम जाम लग गया।

इसकी वजह थी एक ट्रक वाला ओवरटेक करने के चक्कर में, आगे की ओर फिसला। ऐसा करते ही पिछले हिस्से का दायां टायर हवा में लटक गया।

उस ट्रक को निकलने में वक़्त लगा। लेकिन जब तक नहीं निकला तब तक के लिए सभी यात्री अपनी अपनी गाड़ियों से बाहर निकल आए और आस पास घूमने लगे।

चूंकि पहाड़ी इलाका था, मैं भी निकला बाहर, घूमते घूमते निचले भाग में पहुंचा जहाँपहाड़ी पेड़ों पर फल लटके हुए थे। कुछ ज़मीन पर पड़े थे।

मेरे मित्र ने थोड़ा और नीचे जाने पर देखा तो एक मोबाइल फोन पड़ा मिला। मैंने इर्द गिर्द देखा तो ऐसा कोई भी विचलित प्राणी नजर नहीं आ रहा था जो अपना यंत्र ढूंढ़ रहा हो।

अचानक खोए हुए फोन की घंटी बजी। घबराई हुई आवाज़ में उन्होंने विनती पूर्वक अंदाज़ में मोबाइल मांगा। मैं ऊपर खड़ा हो कर ये सब देख रहा था।

मेरी दृष्टि एक सफेद कमीज़ वाले आदमी पर पड़ी जो थोड़ा परेशान, पसीने से लथ पथ दिख रहा है। वो नीचे की तरफ देखते हुए आगे बढ़ते गए और मेरा घुमक्कड़ साथी ऊपर आने लगा।

उनके नजदीक आते ही साथी ने उनका मोबाइल उनको थमा दिया। जाम खुल गया था और सबको अपने अपने वाहन में बैठ जाना चाहिए।

अपना मोबाइल पाकर वह इतने प्रसन्न और संतुष्ट दिखे की उन्होंने मुझे अपना व्यवसायिक कार्ड पकड़ा कर मुझे हैदराबाद उनके घर आने का न्योता दिया।

पता नहीं था सफर सफलतापूर्वक इतना दूर खींचा चला आएगा। आज पांच महीने बाद मौका मिल रहा है कन्हैया जी से दोबारा भेंट का।

पवन जी के घर से निकलने के बाद पास के मेट्रो स्टेशन से ओसमानिया मेडिकल कॉलेज मेट्रो स्टेशन हल्की बूंदाबांदी के बीच उतरा। हैदराबाद मेट्रो सेवा बहुत ही शानदार और जबरदस्त है। मेट्रो से पैदल चलते हुए कशिगंज आ गया।

यह मोहल्ला कारोबारियों का लग रहा है। गूगल नक्शा अब बौराने लगा है, हाथ खड़े कर दिए। नक्शे के मुताबिक मैं सही जगह खड़ा हूं, लेकिन मेरे मुताबिक नहीं।

मोबाइल जेब में डालकर आस पास लोगों से पता पूछा जो गूगल नक्शे से ज्यादा सटीक है। एक मजदूर ने इशारा करते हुए सामने वाली इमारत में जाने को कहा।

मैं आ तो गया लेकिन गलत इमारत में। इस इमारत में मिले एक सज्जन ने बताया कि ये ठीक बगल वाली इमारत है।

मुलाकत और स्वादिष्ट भोजन

जब हम कन्हैया जी के दिए हुए पते पर पहुंचे तो वह हमें देखकर अति प्रसन्न हुए। अपने कार्यालय में भव्य स्वागत किया। चूंकि अक्टूबर महीना उनके व्यवसाय का सबसे प्रमुख समय है।

फिर भी वह अपना बेशकीमती समय हमें प्रदान कर रहे हैं। अपने कार्य में मशगूल भी हैं और हमसे बाते भी करते जा रहे हैं। साथ में बैठे उनके बड़े बेटे से उन्होंने हमारा परिचय कराया। उन्होंने इशारा करके पूछा आप ही थे वो जिन्होंने खोया हुआ यंत्र ला कर दिया। मैंने सर हिला कर हामी भरी।

कन्हैया जी ने घर पर फोन मिला कर मारवाड़ी भाषा में कुछ खाने से संबंधित बोला, मुझे टूटा फूटा ही समझ आयी। थोडी देर में उन्होंने अपने तीसरे बेटे को बुलवा कर हमसे भेंट करवाई।

चाय पानी के बाद अपने छोटे बेटे विष्णु के साथ हमें घर की ओर विदा कर दिया। कार्यालय से घर थोड़ा नजदीक है। कार में सवार हो कर घर पहुंचा। यहाँ दीवाली की सफाई चल रही है, इधर उधर सामान बिखरा हुआ है।

मुख्य हाल में कन्हैया अंकल की माता जी के दर्शन हुए। विष्णु जी हमें अन्दर के कक्ष में ले आए। उनके घर पर एक परिवार रहता है जो आज के समय में अमूमन देखने को नहीं मिलता।

एक एक कर के उनकी माता जी पकवान ला रहीं हैं। भोजन पर आमंत्रित मैंने इतना स्वादिष्ट भोजन पिछले कुछ दिनों में शायद ही गृहण किया हो। सम्पूर्ण थाली व्यंजनों से सजी हुई है।

टनाटन भर जाने के बाद अब बारी है मिष्ठान की। मैंने जब इसका विरोध किया तब माईं ने परंपरा बोल के पुरी प्लेट खाली करने को कहा। घर का खाना आखिर घर का ही होता है फिर चांहे वो घर कोई सा भी हो किसी भी शहर में हो!

भोजन के बाद भरी दोपहरी में विष्णु के साथ हम निकले भारत के दूसरे सबसे बड़े किले गोलकोंडा फोर्ट। कार में सवार हो कर हाईवे से होते हुए तेज धूप में हम किले पहुंच गए।

कार पार्किंग में लगा कर टिकट काउंटर के सामने आ कर खड़ा हो गया। हैदराबाद के जन्मे विष्णु आज से पहले कभी इस किले में नहीं आए थे।

ऐसा अक्सर होता है जो अपने शहर में होती है चलते फिरते जिसे देखा जाता हो उसमें रुचि कम हो जाती है। सो इस लिहाज यह हम तीनों का पहला अवसर है।

क़िले के बगीचे में लेखक

भारत का दूसरा सबसे बड़ा किला

किले के फतेह द्वार से होते हुए अन्दर आ गया। यहाँ एक बहुत ही बड़ा बगीचा है जो किले की शोभा बड़ा रहा है। यहाँ से किले का मुख देखने को मिल रहा है।

400 फीट ऊंची पहाड़ी पर बने इस किले में आठ दरवाजे और 87 गढ़ हैं।

किला अभी तक संरक्षित किया हुआ है। इसलिए काफी इमारतें खड़ी हैं। बगीचे में आम नागरिक नहीं जा सकता, इसीलिए रस्सी से बांध रखा है। बैठकी का कमरा भी है जहाँशायद दरबार लगता हो लोगों की समस्या सुनने को।

देख कर मालूम पड़ रहा है वाकई बहुत बड़ा किला है। यहाँ आज भीड़ जमकर है। परिवार जनों के साथ आए बच्चे हों या नौजवान।

बाहर ही पत्थर पर किले का विवरण दिया हुआ है। जिसमे लिखा है की गोल्ला और कोंडा तेलुगु शब्द है जिसका अर्थ है चरवाहों की पहाड़ी।

काकतीय साम्राज्य से बहमनीय साम्राज्य। उनके बाद कुतुब शाही ने इसे अपनी राजधानी घोषित कर दी। अंत में औरंगजेब ने इसे अपने साम्राज्य में शामिल कर लिया।

ठीक बगल में किले का नक्शा भी मौजूद है। जिसमे विस्तार से हर जगह का विवरण दिया हुआ है। किले के बड़े से कमरे से गुजरते हुए पिछले हिस्से में आ गया। हर जगह कुछ ना कुछ तस्वीरें लेता जा रहा हूं। खंडहर पड़े इस हिस्से में भी।

जो खुले कमरे लग रहे हैं वो हकीकत में कुछ और ही हैं। शायद आने जाने का रास्ता। या कैदखाना या फिर किसी जमाने में घोड़ों का अस्तबल। अंधेरे में सराबोर।

देख सकता ही टूटे हुए महल के बाहर टूटे फव्वारे, इमारत और खंबे। कमरों की टूटी अलमारियां जो पुराने काल की निर्मित हैं। कुछ ऐसी ही लखनऊ में भी हस करती हैं आज घरों में।

ऐसा लग रहा है मानो द्वितीय विश्व युद्ध में भरी श्रृति पहुंची हो। ऐसा जर्जर। बाहर जितना संरक्षित अंदर उतना ही जर्जर। किले के काफी हिस्से में घास फूस के अलावा कुछ नहीं।

दीवारें इतनी कमजोर की तबियत से कोई एक मुक्का मार भर से तो दीवार ढह जाए। किले के ऊपरी हिस्से में रखे पत्थर और भी डराने का काम कर रहे हैं। हो सकता हो तूफान में ये पत्थर गिरने से ही आज किले की ये दुर्दशा हो।

एक विशाल बहुत चौड़ी दीवार के बीच में एक सिरा लाजवाब है। प्रकाश और ध्वनि शो के स्टेज से गुजरते हुए किले पर चढ़ाई प्रारंभ कि।

किले में कुछ जगह सरंक्षित हैं कुछ ध्वस्त। किला इतना बड़ा और इतना फैला हुआ है कि रास्ता भटकने पर मानुष दूसरी जगह को आ पहुंचेगा। शुरुआत में यह मिट्टी का किला हुआ करता था। ये किला खुद में एक पूरा शहर था।

ग्रैनाइट की एक पहाड़ी पर बना है। यहाँ के महलों, मस्जिदों के खंडहर अपने कहानी बयां कर रहे हैं। आंध्र प्रदेश सरकार तनिक भी ध्यान दे अपने पर्यटन पर तो क्या बात हो जाएगी।

सीढ़ियों की भी हालत कुछ खास अच्छी नहीं। चढ़ाई करते समय एक जगह तो सीढियां इतनी भ्रमित कर देने वाली थीं की कुछ लोग गलत दिशा में चल पड़े थे। वो सीढियां भी टूटी फूटी और डरा देने वाली खंडहर जगह की ओर जाने वाली हैं।

सीढ़ी चढ़ते चढ़ते हालत पस्ट हो गई है। पर ऊंचाई पर आ कर अच्छा लग रहा है। तेज हवा के बीच और ढलते सूरज को देखना भी अच्छा है।

चढ़ते चढ़ते भी सीढ़ियों पर तस्वीर लेते चल रहा हूं। लोग सीढ़ी फांद कर पत्थरों पर बैठ रहे हैं। जो की जानलेवा भी साबित हो सकता है।

ऊंचाई से कुछ ऐसा दिखा किला

दरबान हॉल और प्राचीन मंदिर

एक हजार सीढी चढ़ने में कुल पंद्रह मिनट लगे। प्रवेश करते बला हिसार में आ खड़े हुए, जिसे दरबान हॉल कहा कहाँ जाता है। ये किले जा सबसे ऊपरी भाग है। यहाँ से क्या नज़ारा दिखाई दे रहा है हैदराबाद का। मज़ा आ रहा है।

सामने खाली पड़ी मैदान। सबसे अचरज की बात ये है की आखिरकार इतनी ऊंचाई पर इतनी सारी तोपें आईं कैसे होंगी।

इतनी तेज़ हवा में कहीं मैं उड़ने ना लगुं! महल से बाहर आकर दीवान ए ख़ास के सामने एक छोटा सा बगीचा है जिसके ठीक पीछे एक भारी भरकम चट्टान है।

उपर से किला का हर हिस्सा आराम से देखा जा सकता है। कहाँ क्या हो रहा है। इतनी ऊंचाई से दुश्मनों पर आराम से नजर रखी जा सकती है।

दरबान हॉल

पूरा हैदराबाद दूर दूर तक देख पा रहा हूं। पुती हुई सफेद इमारतें दूर से चमक रही हैं। काफी हिस्सा आम नागरिकों के लिए इसीलिए बंद है क्योंकि वो जर्जर है। दीवार बोल उठी है टूटी पड़ी हैं।

ऊंचाई से कोई गिरे तो शायद उसका सिर फटना तय है। बगीचे के पीछे काली माता का छोटा सा मंदिर है जो सदियों पुराना है। सामने से कुछ लोगों को आता देख पा रहा हूँजो कच्चे रास्ते से आ रहे हैं।

महल से निकलने के बाद मैं भी कच्चे रास्ते से होते हुए मंदिर की ओर निकल पड़ा। रास्ता थोड़ा खतरनाक है। हालांकि इस रास्ते से पहाड़ी के दूसरी तरफ का नजारा दिख रहा है। वहाँ कई नवयुवक हिलोरे मरते देखे जा सकते हैं।

मैं इस उधेड़बुन में हूँ आखिर ये इतनी तादाद में वहाँ तक किस रास्ते से पहुंचे होंगे। मुझे आखिरकार रास्ता बदलना पड़ रहा है। सीढ़ी से नीचे उतरते हुए झाड़ियों के रास्ते मंदिर के पिछले हिस्से में आ गया।

भारी भरकम चट्टान को पार करना थोड़ा मुश्किल है पर हमने बारी बारी से ऐसा कर ही लिया। मंदिर के सामने तक पहुंच गया। इस प्राचीन मंदिर की कुछ कहानी भी है।

मंदिर में पुजारी बैठे हुए पूजा पाठ कर रहे है। बाहर जाते भक्तों को प्रशाद वितरण। दर्शन के बाद मैं निकल पड़ा आगे। यहाँ लावारिस तोप पड़ी हुई है।

मैं यही अनुमान लगा रहा हूँकि इतनी ऊंचाई तक तोप लाते लाते इनको कितना समय लग जाता होगा। अगर लाते वक़्त चूक हो गई तो कितने अपनी जान गंवा बैठते होंगे।

कई कई महीने ऊपर रहने वाले सैनिक शायद ही कभी नीचे जाते हों। यहाँ से शहर में दूर दराज तक फैली किले की दीवारों को देखा जा सकता है। सूरज ढल चुका है और मौसम भी सर्द बना हुआ है।
बेहतर यही रहेगा की हम सब नीचे उतर जाएं।

सूरज ढलते ही वापसी

ऊंचाई पर चढ़ना हमेशा आसान होता है उतरना थोड़ा मुश्किल। वैसे ही यहाँ भी उतरते वक्त है। भले ही सीढियां मौजूद हैं पर नजर हटी दुर्घटना घटी।

बमुश्किल ही कोई अब ऊपर जा रहा है। मेरी तरह सभी नीचे की ओर रवाना हो रहे हैं। किनारे पड़े बड़े से पत्थर पर अभी भी अठखेलियां करते हुए कुछ नौजवान खतरा मोल ले रहे हैं।

अंततः उतरते हुए द्वार पर आ गए। बड़े टूटे कमरे के इस तरफ से एक महिला अपनी सहेली के साथ न जाने क्या खेल खेल रही हैं। वो इस तरफ से हाथ डाल कर जाने क्या निकलना चाह रही हैं।

टूटे महल का नज़ारा

थोड़ा इस खंडहर में भी चहलकदमी कर लेता हूँक्या पता कुछ नया ही देखने को मिल जाए। पर सिवाय घास और खंडहर के कुछ भी नहीं। कहीं पानी भरा है कहीं लावारिस तोपें पड़ी हैं।

दूसरा रास्ता पकड़ते हुए किले के उस हिस्से में निकल पड़ा जहाँजाने से वांछित रह गया हूं। किला है ही इतना बड़ा। कुल चार मस्जिदें है। पिछले हिस्से में असलाह खाना, बाउली और कुआं भी।

मोती महल, रानी महल, दाद महल किले के बाएं हिस्से में है जबकि नगीना बाघ और अक्कान्ना मदन्ना कार्यालय दाईं तरफ। मतलब रहने खाने के इंतजाम बाईं और किले से संबंधित कार्य दाईं ओर।

मुख्य द्वार से अब निकलने का समय है। यहाँ लगे एक बोर्ड पर नजर पड़ी तो मालूम पड़ा कि किले के प्रवेश द्वार पर बजायी गयी ताली को आसानी से किले के बाला हिसार रंगमंच में सुना जा सकता है।

यह दो चीजो को दर्शाता है – या तो घुसपैठिया अन्दर आ गया, या फिर कोई आपातकालीन स्थिति आ गयी। ये पढ़कर मैंने तली बजा के देखी जो वाकई काफी ध्वनि के साथ गूंजी।

कुछ ही देर में बचा कुचा हिस्सा देख कर मैं निकल गया बिरला मंदिर। किला वाकई बहुत ही बड़ा है। इसे तबियत से देखने के लिए तकरीबन तीन घंटे का समय तो चाहिए ही चाहिए।

बिरला मंदिर

बिरला मंदिर जाने से पहले विष्णु हमें रास्ते में पड़े एक पार्क में ले आए। शायद उन्हें कुछ जरूरी काम है। इसलिए वो हमें यहां छोड़ कर अपना कोई जरूरी काम निपटाने गए हुए हैं।

भीतर आ कर देखा तो यहां बच्चो के लिए झूले और बड़ों के लिए तलब किनारे कुर्सी मेज पड़ी हुई हैं।

कुछ देर ही बैठना हो पाया था की विष्णु अपना काम काज निपटा कर आ गए बिरला मंदिर जाने के लिए।

पार्क में बच्चों के लिए झूला

रात से पहले मंदिर आ गया। एक बड़े से पहाड़ी पर बना यह मंदिर अत्यंत ही भव्य है। कार से चढ़ाई करने में दिक्कत ज्यादा नहीं हुई।

विष्णु ने कार किनारे खाली मैदान में लगा दी। घड़ी, जूते, कैमरा, मोबाइल सब कार में रख कर सुरक्षा जांच कराते हुए मंदिर की सीढ़ियों तक आ गया।

मंदिर में फोटो लेना सख्त मना है। इसीलिए मोबाइल, कैमरा इत्यादि कार में छोड़ने के बजाए मंदिर में ही जमा कराना उचित समझा।

यहां तक कि फूल माला, नारियल तक नहीं ले जाने दे रहे। यहीं डोलची में उलटा दिया जा रहा है।

जैसे कि बिरला मंदिर होते हैं ठीक वैसे ही यह मंदिर भी बहुत सुन्दर और भव्य है। कुछ विदेशी पर्यटक भी दिख रहे हैं जो हिन्दू धर्म में रुचि रखते हैं। दर्शन करने के बाद हम आखिरकार घर को निकले।

वापस घर आया तब अंकल घर पर ही मिले अपनी नवासियों के साथ समय व्यतीत कर रहे हैं। मुलाकात के दौरान वह मुझे अपनी गौशाला ले आए जहाँउन्होंने दो गाय, एक बैल और एक बछड़ा पाला है।

कन्हैया जी की गौशाला में प्यारी गाय

यह गौशाला पड़ोस के है मोहल्ले में बनाया है बाकायदा एक खाली प्लॉट में जो सिर्फ जानवरों के रहने योग्य है। भोजन कर सोने का इंतजाम अंकल जी ने कार्यालय के पास वाली इमारत में करा दिया। जाते जाते सुबह जल्दी तैयार होने का आग्रह किया।

अब कल की योजना के अनुसार मैं चारमीनार और सलारजंग संग्रहालय जाऊंगा।

हाईटेक सिटी से मेडिकल कॉलेज से फोर्ट से पार्क से बिड़ला मंदिर से घर तक का कुल सफर 56 किमी

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