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भारत का आखिरी गांव माना

अब माना जायेंगे

अब जब बद्री विशाल के दर्शन हो चुके हैं तो थोड़ी पेट पूजा हो जाए। इसी बात का ध्यान रखते हुए सबसे पहले तो बढ़ चला जहां चप्पल उठाने।

उसके बाद ही पुल पार करके होटल की ओर प्रस्थान। चप्पल वाली जगह मंदिर के कपाट से थोड़ी दूरी पर है। दर्शन के लिए लगी कतार के समांतर चलते हुए पुल के दाहिनी तरफ आ गया।

यहाँ कुछ पुजारी पहले की तरह अपनी टीकाकरण की दुकान खोले हुए हैं। मुझे भी बुलाने लगी। माथे की तरफ इशारा करते हुए आगे बढ़ गया।

जब मैं हनुमान मंदिर से टिका लगवा कर आया हूँ तो तुमसे दोबारा क्यों लगवाऊंगा। किनारे ही रखी चप्पल पांव में डाली और चल पड़ा पुल की ओर।

गजेन्द्र भाई इच्छा है उसी रेस्त्रां में भोजन करने की जिसे सुबह देख कर आए थे होटल के बगल में। बाकी लोग भी राजी हो गए।

पुल पार करने के बाद दो चार दुकानें छोड़ कर हम आ पहुंचे इस दुकान में। पर यहाँ मजे भी भीड़ है। इतने बड़े रेस्त्रां में भी बैठने की कहीं जगह नजर नहीं आ रही है।

मेनू कार्ड में भी उच्च कोटि के दाम में खाना मिल रहा है। बेहतर यही रहेगा या तो इंतजार कर लिया जाए या थोड़ी देर के लिए मार्केट घूम लिया जाए।

वापस से होटल में आ कर कुछ देर ही रुके होंगे हम सब। सबने अपने गरम कपड़े उतार दिए सिवाय अजय को छोड़ कर। बाकी धूप इतनी तेज़ है की गरम कपड़े लादने का कोई मतलब नहीं है।

तरोताजा हो जाने के बाद छोटे बैग में पॉवर बैंक और कैमरा रखा और निकल पड़े। यहाँ का बाज़ार भी काफी चर्चा का विषय बना हुआ है।

तय हुआ कि कुछ सामान देख लिया जाए फिर निकला जाए माना गांव के लिए। शुरुआत होती रुद्राक्ष की माला से कि पता नहीं कहां से अजय को लगा उसे धार्मिक कपड़े खरीद लेने चाहिए।

किनारे ही एक दुकान में हम सब इसी के चलते आ गए। काफी देर वक्त बीतने और अलग अलग तरीके के धार्मिक कपड़े देखने के बाद भी किसी को कुछ रास ना आया।

लगातार गेरुआ रंग के कपड़े देख कर लगने लगा एक धुलाई में ही सारा रंग निकल जाएगा। कपड़े की दुकान छोड़ सामने दुख रही रुद्राक्ष की दुकान में आ धमके हम सब। जिसकी कीमत ₹5०० से लेकर ₹5००० तक है।

अलग अलग मुखी के रुद्राक्ष अलग अलग दामों में। हर दुकान में अलग अलग रेट। कोई साक्षात रुद्राक्ष दिए से रहा है तो कोई चांदी या सोने की अंगूठी में।

ये तो जनाब बेचने का तरीका है। चना चाहें सोने के बर्तन में बेंचो या प्लास्टिक के चना तो नहीं बदलेगा ना। वैसा ही हाल कुछ इस बाज़ार का है।

थोड़ी ही देर में गजेन्द्र भाई आ अटके एक माला की दुकान पर। जहां उन्हें माला तो पसंद आईं पर दुकानदार से वापसी में माला खरीदने का वायदा करके निकल पड़े।

जितना गजेन्द्र भाई उतावले हैं सामान खरीदने को ले कर उसके ठीक उलट हंसमुख भाई एक किनारे शांति से सिर्फ चीज़ों को निहार रहे हैं।

रुद्राक्ष के बाद सबसे अधिक सामग्री की बिक्री यहाँ शिलाजीत की है। जो पहाड़ों मे ही पाया जाता है। और जिसको निकालने का तरीका भी सबसे अनोखा ही होता है।

तकरीबन एक किमी का पैदल रास्ता उसके बाद बस स्टैंड। जहां से वाहन में बैठ कर माना तक का सफर तय करना रहेगा। रास्ते में वो स्थान भी पड़ा जहां कल मैं तंबू गाड़ने वाला था।

भारत आख्रिरी गांव माना

साधन

बातों में कब सफर बीत गया पता ही नहीं चला। सुबह के पौने बारह बज रहे हैं और यहाँ बस स्टैंड पर आ खड़ा हुआ हूँ। पूछताछ के दरमियान पता चला कि माना गांव के लिए कोई बस तो नहीं जाएगी!

जाएगी माना तक तो चार पहिया गाड़ी। जिसमे सवारी चाहें एक बैठे या पांच दाम तय हैं। ये भी पता चल गया गाड़ी मिलेगी तो कहां से।

घूम फिर कर वापस उसी गली के सामने आना पड़ा जहां से निकला था। भारी तादाद में यहाँ टैक्सी खड़ी हुई हैं। ऐसी ही एक टैक्सी हमने भी बुक कर ली।

जो उसी मूल्य पर राजी हो गया जिसके बारे में कुछ देर पहले ज्ञात हुआ था। माना तक जाने का और बद्रीनाथ तक वापस आने का भी।

जबतक हम घूमेंगे तब तक ये साहब हमारा इंतजार करेंगे। ये भी ठीक रहेगा। सो चार पहिया वाहन बुक करा कर हम निकल पड़े भारत के आखिरी गांव माना के लिए।

माना कि ओर जाते हुए पहाड़ियों पर जमी बर्फ देखने को मिल रही है। पहाड़ियां और भी ऊंची और सुंदर जान पड़ रही हैं। चार किमी के इस छोटे से सफर को पैदल भी पूरा किया जा सकता है।

रास्ते में कई लोग ऐसा करते भी दिख रहे हैं। शायद गजेन्द्र और हंसमुख भाई ना होते तो हम भी पैदल यात्रा ही करते। मगर बिना जूतों के ये मुमकिन नहीं।

जूतों में थोड़ी सह मिल जाती है पैरों को और कोई कष्ट भी नहीं होता। चप्पलों में तो हालत खराब हो जाती है। रास्ता पक्का बिल्कुल भी नहीं है।

अधिकतर जगह कच्चा ही है। पर गाड़ी धूल का गुब्बार उड़ाते हुए आगे बढ़ रही है। जगह जगह सेना के कैंप भी देखे जा सकते हैं।

जो अभी आए हैं। कई जगह पहले से लगे हुए हैं कई जगह जवान लगा रहे हैं। जो लोग गाड़ी का भुगतान नहीं कर सकते वो हांथ या सिर पर गठरी लादे चले जा रहे हैं।

ऐसी चार पहिया वाहन खूब देखने को मिल रहे हैं। लेकिन इन सब से परे हरी भरी पहाड़ियां कश्मीर की पीर पिंजल पहाड़ियों की भांति दिख रही हैं।

नुकीली और कुछ जगह हरी भरी। जिन पर चढ़ाई करने का बहुत मन कर रहा है। पर यहाँ तैनात सेना ऐसा करने ना देगी। पास में सटे चीन बॉर्डर के चलते यहाँ भारी तादाद में फोर्स रहती है।

बड़े बड़े जीप और सारे सामान के साथ पूरी ठंड की तैयारी के साथ आए हुए हैं। खाली मैदान के पास बह रही तेज़ धारा में सरस्वती का वेग देखने लायक है।

ये सरस्वती नदी ही है जो जीवंत कर रही है इस गांव को। तेज़ धूप और कच्ची सड़क से पार पाते हुए हम आ गए माना गांव। पर ये क्या ड्राइवर साहब ने गांव के द्वार से बहुत पहले ही छोड़ दिया।

पूछा तो बोले अन्दर जाने पर जवान रोक देते हैं इसलिए सिर्फ यहीं तक सेवा हो पाएगी। जाते जाते हमें तीन बजे तक आ जाने का समी दिया।

भारत का आखिरी गांव माना

अभी हो चला है दिन के सवा बारह, शायद दो घंटे में गणेश गुफा, वेद व्यास गुफा, भीम पुल और बाकी जगह हो जानी चाहिए।

सामने गड़े सफेद बोर्ड पर नजर पड़ी जिसमे लिखा है समुद्र तल से माना गांव की ऊंचाई 3118 मीटर है। इससे भी ऊंचाई पर मैं जा चुका हूँ वो है स्पीति। जिसकी ऊंचाई 3800 मीटर है।

तकरीबन एक किमी चलने के बाद गांव के भीतर आ पाया हूँ। ड्राइवर साहब ने तो बहुत ही पहले उतर दिया। कहते हैं ये वही माना गांव है जिसको पार करने के लिए भीम ने भारी भरकम पत्थर को उठाकर रास्ता बनाया था।

जिसे भीम पुल के नाम से जानते हैं। वैसे तो हम सभी जानते है कि महाभारत को रचना वेद व्यास ने कि थी और उसे लिखा गणेश जी ने था।

पर गजेन्द्र भाई के मुख से आज मुझे मालूम पड़ा कि जिस जगह पर महाभारत गड़ी गई थी वो माना ही है। और आज भी वो किताब पोथी के रूप में यहाँ रखी हुई है।

इतनी अद्भुत जानकारी पा कर तो मैं गदगद हो गया। गांव काफी वीरान और पुराने काल का मालूम पड़ रहा है। क्यूंकि अन्य गांव की तरह यहाँ ज्यादा बदलाव नहीं किए गए हैं।

भीम पुल जाते वक़्त की तस्वीर में हंसमुख, गजेन्द्र, ऐश्वर्या

इस कारण से भी ये सदियों पुराना लग रहा है। पर गांव में इतना सन्नाटा क्यों पसरा हुआ है। इसका कारण नहीं पता चल पा रहा। है ना हो कोई पूजा पाठ का कार्यक्रम हो या फिर किसी के घर दावत का।

इस गांव को देख कर बिल्कुल उस गांव की याद आ रही है जहां सिर्फ महिलाएं रहती हैं। पर यहाँ तो लग ही नहीं रहा कोई रहता भी है।

गली कुंचो से होते हुए कभी किसी के घर में आंगन में आ जाता कभी चाबूतरे पर। पर इस बार किसी ने मुझे बाहर निकालने में मदद की।

गांव की कुछ महिलाएं किसी कार्यक्रम में हिस्सा लेने के लिए भागती हुई नजर आ रही हैं। अब कहीं दूर से भोंपू की भी आवाज़ सुनाई पड़ रही है।

आवाज़ सुनते सुनते आवाज़ के करीब पहुंचा। पाया एक छोटे से मैदान में गांव का कोई कार्यक्रम का आयोजन होता दिख रहा है। जिसमे सिर्फ गांव के लोग ही हिस्सा ले रहे हैं। बाहरी कोई भी नहीं।

अगर ये लोग मेरे साथ ना होते तो ज़रूर मैं बात करता इनसे। पर एक बार लौटते वक्त बात मालूमात करने की कोशिश करूंगा कि आखिर आयोजन किस चीज़ का है।

माना गांव में देश के विभिन्न हिस्सों से लोग आए हुए हैं। चाहें फिर वो महाराष्ट्र से हों या तमिलनाडु से। मैदान से हट कर अब पक्की सड़क पर चलने लगा हूँ।

अच्छा हुआ मैं अपने साथ कोई गरम कपड़ा या जैकेट नहीं लेके आया। वरना इतनी भीषण गर्मी में लादे लादे फिरता। वैसे इस मौसम में ज्यादातर लोग टीशर्ट में ही दिखाई पड़ रहे हैं।

पर दुकानों में स्वेटर की बिक्री चालू है। इस तरह की कई दुकानें यहाँ देखी जा सकती हैं। अधिकतर स्वेटर घर के बने हुए ही लग रहे हैं। और लोग भी अपने घर के बाहर के चबूतरे में इसकी बिक्री कर रहे हैं।

सिर्फ कपड़ों की ही बिक्री नहीं यहाँ जगह जगह चाय कॉफी की भी दुकान हैं। हम चारों को ही जोरदार भूख लगी है। ऐसी ही एक दुकान के सामने विचार विमर्श होने लगा। की नाश्ता किया जाए या नहीं।

बात नहीं बनी और ये हुआ कि वापसी में या फिर बद्रीनाथ में ही नाश्ता किया जाएगा। और हम सभी चल पड़े वेद व्यास गुफा की ओर।

भीड़ खूब है यात्री और टूरिस्ट की संख्या ज्यादा है। गांव के वासी को भाषा का प्रयोग कर रहे हैं वो बिल्कुल समझ के परे है। शायद पहाड़ी भाषा हो या फिर इसी गांव की!

सबसे पहले तो गणेश गुफा की ओर चलना होगा क्योंकि वो महज 100 मीटर की दूरी पर है। वेद व्यास गुफा यहाँ मार्केट से दो किमी दूर दिखा रहा है।

कुछ मीटर की दूरी तय करके आ गया गणेश मंदिर। सीढ़ी की चढ़ाई के बाद इस मंदिर में प्रवेश किया जिसमे सिर्फ एक छोटी सी गुफा है।

गणेश जी की प्रतिमा यहाँ रखी हुई है और फूल माला। कहा जाता है कि इसी स्थान पर बैठ कर गणेश जी ने महाभारत की रचना लिखी थी।

मंदिर की गुफा बहुत ही पुरानी है। जिस कारण इसका महत्व और बढ़ जाता है। दर्शन करने के बाद निकल पड़ा वेद व्यास गुफा की ओर। जो थोड़ी दूरी पर है।

वेद व्यास गुफा

दो किमी की चढ़ाई चढ़ते चढ़ते हालत पस्त होने वाली है। ऊपर से ये तेज़ धूप और भी बड़ी चुनौती है।मुझे वैसे अब तक माना गांव में एक भी वाहन नजर नहीं आया है।

जो भी दुपहिया या चार पहिया वाहन आए भी थे उन्हे गांव के बाहर ही रोक दिया गया। मैं और अजय तो आगे आगे चल रहे है पर शायद गजेन्द्र भाई और हंसमुख काफी पीछे छूट गए हैं।

पर जल्द ही मुलाकात हो जाएगी। भीम पुल तीन किमी है और उसके भी आगे है वसुंधरा झरना। जो काफी दूर है। अगर ड्राइवर साहब समय सीमा ना प्रदान किए होते तो ये और पांच किमी जा सफ़र तय करता।

वेद व्यास गुफा

पर समय बाध्य होने के कारण भीम पुल तक ही खुद को रोकना होगा। कुछ ही मिनटों में हम सभी वेद व्यास गुफा में आ गए। और जगह की तरह यहाँ भी भीड़ है।

बाहर दीवार पर बैठे बूढ़े बाबा के पास ही चप्पल उतार कर अन्दर चला आया। मंदिर में फौजी भाई भी हैं जो वर्दी में अपने बंधुओं के साथ आए हुए हैं दर्शन करने।

हम भी बारी बारी से अन्दर गए। गुफा बहुत ही छोटी पर अन्दर वेद व्यास जी की मूर्ति और अन्य देवी देवताओं की भी। पंडित जी के लिए बत्ती पंखा सब लगाया गया है।

ताकि उनका यहाँ दम ना घुंटे। माथे पर टीका लगवाया और बाहर निकल आया। अन्दर गए अब गजेन्द्र और हंसमुख। गुफा के बाहर का समी भी लिखा हुआ है जो कि 5326 साल पुरानी है।

भीम पुल

अब सिर्फ भीम पुल ही बचा हुआ है। वसुंधरा तो जाने का समी है नहीं। सुना है वसुंधरा झरने का पानी उनके ऊपर नहीं पड़ता जो पापी होते हैं।

अगर ऐसा है तो जरूर जाना चाहूँगा पर ना तो समय इतना है और ना ही शरीर में शक्ति। इन दोनों ने भी वेद व्यास गुफा के दर्शन कर लिए।

अब बारी है भीम पुल की। जो हमारा आखिरी पड़ाव है। उसके बाद वापसी। महज एक किमी की दूरी पर है भीम पुल। वेद व्यास की गुफा से बाहर निकलते ही चप्पल पहनी और चल पड़े।

स्वर्ग की ओर जाते वक्त कुन्ती पुत्र और द्रौपदी इसी मार्ग से स्वर्ग की सीढ़ियां चढ़ कर थे। पक्के मार्ग से मैं भी चलने लगा। यहाँ से भीम पुल तो नहीं पर वहाँ को जाने वाले मार्ग को देखा जा सकता है।

रास्ता काफी लंबा है पर पहुंच तो जाना है। सो पहुंच भी गया। भीड़ का आना जाना बरकरार है। पास में से भीषण पानी की गर्जना साफ सुनी जा सकती है।

ये सरस्वती नदी का उद्गम है जो यहाँ से ही रहा है। समीप पहुंच कर देखा तो बड़े बड़े पत्थरों से टकराते हुए पानी आगे की ओर इस तेज़ी से बढ़ रहा है जिसका कोई हिसाब नहीं।

यमनोत्री में जिस फोटो को राजेश भाई भीम पुल बता रहे थे असल में वो आगे का पत्थर है। भीम पुल तो वो है जिसके ऊपर से फिलहाल लोगों की आवाजाही हो रही है।

आगे वाला पुल तो बड़ा है ही ये उससे भी बड़ा है। आगे जाने से पहले मुझे एक छोटी सी गुफा में बैठे मिले एक बाबा। जिनके साथ हर कोई उतावला है फोटो खींचने को।

शकल से बेहद ही खतरनाक लगे रहे बाबा से पार पाते हुए आ खड़ा हुआ पुल पर। इस बड़े से पुल के ऊपर खड़े हो कर निहार रहा हूँ सरस्वती के तेज़ उद्गम को।

जिसका तेज़ देखने लायक है और ना कोई और इसके आगे टिकने की हिम्मत दिखा सकता है। यहाँ जगह जगह दुकानें हैं और हर दुकान पर भारत की आखिरी दुकान का नारा लगा हुआ है।

एक जनाब ने तो हद तब कर दी जब छोटी पर जा कर दुकान खोल डाली। खैर यहाँ मज़ा बहुत ही आने वाला है। दिन के दो भी बज चुके हैं।

समय रहते माना के शुरुआती छोर तक भी पहुचना है।

भीम पुल

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नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

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  1. Hansmukh says:

    Bahot Badhiya bhai

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