भारत का आखिरी अंश धनुषकोडी

तमिलनाडु | धनुषकोडी | भारत दर्शन

रामेश्वरम से रवानगी

रामेश्वरम से ठीक दो बजे धनुषकोडी के लिए निकल लिया। उसी स्थान पर आ खड़ा हुआ जहां सुबह स्टेशन से उतरा था। इंतजार करने लगा यहीं अड्डे पर।

मेरी तरह और भी जने हैं जो इंतजार में है बस के। पीछे बैठी एक बूढ़ी काकी अपने बेटे के साथ चाय पर गप मार रही हैं। घूमते हुए बस पीछे सड़क से आगे बस अड्डे पर आई।

दनादन भरने लगी पर धनुषकोडी के लिए फिर भी खाली ही है काफी गद्दियां। एक एक कर हर यात्री का टिकट बनने लगा। तब जा कर बस आगे बढ़ीं है।

व्यस्त बाजार से होते हुए रामेश्वरम के बाहर निकल आए। सूनसान सड़क पर।

मैने किसी अखबार के लेख में पढ़ा था की 22 दिसम्बर की दुर्भाग्यपूर्ण रात में धनुषकोडी में प्रवेश ‘पंबन-धनुषकोडी पैसेन्जर’ यहाँ आए एक प्रचण्ड बवंडर की बलि चढ़ गई थी।

हालांकि मौसम विभाग को इस तूफान की पहले से ही जानकारी थी। पर ये आभास नहीं था की इतनी तेज़ी से भारत के तट पर आ जाएगा। दुर्घटना वाले दिन भी जोरदार बारिश हो रही थी। लोगों के घरों में पानी भरना शुरू हो गया था।

भारतीय रेल के आंकड़ों के अनुसार उस दिन गाडी में 110 यात्रि के साथ ट्रेन की बहने की आशंका थी। पर यही आंकड़ा 180 के पार पहुंच जाता है उन लोगों को जोड़ कर जो बिना टिकट यात्रा कर रहे थे।

पंबन से आरम्भ हुआ धनुषकोडी का रेलमार्ग चक्रवात में नष्ट हो गया था। जिसकी बाद में मरम्मत हुई थी। अवशेष आज भी मिलते हैं रेल की पटरियों के, टूटी चर्च और बस्ती होने के प्रमाण। जैसा की मैं धनुषकोडी ने दाखिल होते हुए देख सकता हूँ।

ट्रेन को पुल पर ही रुकने का संकेत दिया गया था। पर चालक ने संकेत नजरंदाज करते हुए रेल पथ गामिनी आगे बढ़ाई और उसका खामियाजा भुगतना पड़ा। समुद्र की एक विशाल लहर में ट्रेन, पुल और यात्री सब बह गए।

यह चक्रवात आगे-आगे बढते हुए रामेश्‍वरमतक आ गया था। किवदंती हैं कि समुद्र की प्रचण्ड लहरों का वेग से आने वाला पानी रामेश्‍वरम के मुख्य मन्दिरके पास थम गया था।

विशेष बात यह कि सैंकडो लोगों ने रामेश्‍वरम के मन्दिर में चक्रवात से बचने के लिए आश्रय लिया था। लेकिन दुर्भाग्यवश केवल एक ही व्यक्ति इस चक्रवातमें बच पाया उसका नाम था कालियामन।

इस व्यक्ति ने समुद्र में तैरकर अपने प्राण बचाए, इसलिए प्रशाशन ने उसके नाम का गांव देकर उसका गौरव बढ़ाया। यह गांव ‘निचल कालियामन’ नामसे प्रचलित है। निचल का अर्थ है तैरनेवाला।

ऐसे ही मुझे केदारनाथ की घटना याद आती है। जब कई लोग मंदिर में प्रवेश कर गए थे अपनी जान बचाने के लिए पर बचे मुट्ठी भर लोग ही थे।

धनुष्कोडी पर पैदल यात्रा का आरम्भ करने से पहले

पैदल यात्रा अरिचल मुनई

सूनसान सड़क पर अंतरजाल पर ये कहानी पढ़ते पढ़ते तीन बजे तक आ पहुंचा। बाकी अंत तक जाने के लिए पैदल ही सफर तय करना होगा।

सड़क के दोनो ओर बाजार लगी है। हालांकि यहाँ आज भी कोई रात में नहीं रुकता। कहते हैं ये भूतिया शहर है। आज भी लोगों की आत्माएं भटकती हैं। शाम के पांच बजे के बाद यहाँ से लोग नौ दो ग्यारह हो लेते हैं।

सड़क किनारे आइस क्रीम का ठेला भी है और चाय का भी। दोनो में से मैने चाय को चुना और ढाबे में आ कर बैठ गया। दो कप चाय मंगाई।

चाय से कलेजा फूकने के बाद तय किया अब धनुषकोडी घूमने का। यहाँ पास में वो उजड़ी बस्ती भी दिख रही है और वो चर्च भी। लोग उसके आसपास नजर आ रहे हैं। पर मैं इधर जाने का इच्छुक नहीं हूँ क्योंकि समय कम है और मुझे भारत के अंतिम छोर तक पहुंचना है।

थकान लग रही है, धूप भी तेज है लेकिन अंतिम छोर तक जाने की भी प्रबल इच्छा है। इसलिए परवाह ना करते हुए आगे बढ़ निकला। बाजार में कई चीजें हैं जो लोगों के खरीद के लिए रखी हुई है।

बैग में पड़ी गीली बनियान यहीं पास के पुरानी जंग लगी पटरी में फैला दी। जनता की पहुंच से दूर। ताकि जब तक मैं वापस आऊं सूख जाए। बनियान कोई ले भी जाएगा तो भी कोई समस्या नहीं है चूंकि थोड़ी पुरानी हो चली है।

रेत पर पड़ी पटरी पर कपड़ा फैला देने के बाद वापस आ गया सड़क के रास्ते।

आखिरी बिंदु तक जाने के लिए पहले यहाँ बनी चौकी से आज्ञा मांगनी होगी तभी आगे जाने का संकेत मिलेगा। पर मैं जैसे ही पहुंचा पुलिस चौकी से मुझे आगे जाने की अनुमति नहीं मिली।

निर्देशानुसार अंतिम छोर ढाई बजे के बाद जाना वर्जित है इसलिए इसके बाद किसी को जाने की आज्ञा नहीं है। ये सुन लगा अब यहीं पर जो करना है देखना है देख लो।

आगे तो जाने से रहा। सड़क पर बैठ कुछ तस्वीरें निकलवाई। इस समय सड़क के दोनो ओर समुद्र है। अंतिम छोर पर तीनों और समुद्र रहेगा। या यूं कह लें समुद्र की बीच में छोटा टुकड़ा।

कुछ देर चौकी के पास बिताने के बाद मैं सुमद्र की ओर चल पड़ा। सोचा थोड़ा वक़्त यही बीता के वापस निकल जाऊंगा। सुमद्रा किनारे काफी जनता है।

छोर पर से ठीक से देखने लगा तो कुछ लोग अंतिम छोर को जाने के लिए समुद्र के तट से किनारे किनारे चले जा रहे हैं। तभी मेरे दिमाग में तरकीब सूझी क्यों ना मैं भी ऐसा ही करते करते पहुंच जाऊं भारत के अंतिम छोर तक।

मैं भी चल दिया पैदल। मटरगश्ती करते हुए। नंगे पांव, एक डंडे में चप्पल, कपड़े और बैग लटका कर। पर सड़क पर से गाडियां गुजर रहीं है अंतिम छोर के लिए। शायद ये वापस आ जाएं इसलिए जाने दिया गया हो इन्हे।

कुछ दिनों पहले यहाँ भी तूफान आया था जिसके कारण यहाँ घुमक्कड़ी पूर्णतः बंद करा दी गई थी। आसमान की तरफ देख कर ह्रदय कांप उठता है। जिस तरह श्रीलंका से बादल आ रहे हैं उन्हें देख कर ऐसा ही लग रहा है तूफान आ जाएगा दोबारा।

पर मौसम विभाग के द्वारा ऐसी कोई भी चेतावनी नहीं जारी की गई है। मेरे साथ साथ एक तीन सदस्य परिवार भी मौज मस्ती करते हुए चल रहा है। पर ये आधे रास्ते आने के बाद वापस लौट गए।

धूप इतनी तेज है की सिर को तौलिए से ढक लिया है ताकि कम से कम ऊर्जा की खपत हो शरीर से। आंखों में रंगीन चश्मा होने के कारण धूप कम ही नजर आती है।

यहाँ के तट बहुत ही भिन्न और साफ सुथरे हैं भारत के अन्य तटों के मुकाबले। ऐसा शायद इसलिए भी क्योंकि यहाँ मानवीय दखल नहीं है।

ये भी एक कारण ही सकता है की ये तट गहरे समुद्र से सटा हुआ है। सड़क के दूसरी ओर तट पर कई नाविक मछुआरे अपनी रोजी रोटी का इंतजाम करने में लगे हुए हैं।

बहुत ही जोर का शोर है यहाँ के तट में। जो सोचने पर मजबूर कर रहा है की कहीं ये किसी तूफान के आने का संकेत तो नहीं।

समुद्र के लहरे पास तक आ कर कपड़े भीगों जातीं। कभी दूर रह जाती कभी मुझे दूर जाने पर मजबूर कर देती।

अरिचल मुनै में बैठे लंका की तरफ निहारते हुए लेखक

अरिचल मुनई अंतिम छोर

लाठी डंडा ले कर आखिरकार डेढ़ घंटे बीत जाने के बाद मैं सात किमी की यात्रा पूरी कर पाया। पैरों में चप्पलों के बजाए जूते होते तो शायद ये दूरी और भी पहले तय हो जाती।

अंग्रेजो के काल में धनुषकोडी एक बडा नगर था। लेकिन अब यह भारत के छोर पर ऐसी वीरान जगह है जहां से श्रीलंका दिखाई पड़ता है। यहाँ से श्रीलांका जाने के लिए नौका सुविधा हुआ करती थी। इन नौकाओं द्वारा व्यापारी सामान का लेन-देन भी होता था।

अमेरिका में धर्म संसद के लिए गए स्वामी विवेकानंद श्रीलंका से भारत धनुषकोडी होते हुए आए थे। अनुनाईय के लिए यहाँ होटल, कपडों के दुकान और धर्मशालाएं थी।

उस समय धनुषकोडी में जलयान निर्माण केन्द्र, रेलवे स्टेशन, रेल अस्पताल, पोस्ट ऑफिस और मत्स्यपालन जैसे कुछ कार्यालय हुआ करते थे।

हालांकि यह जगह अब भुतहे शहरों की फेहरिस्त में शुमार है। क्योंकि इस इलाके में अंधेरा होने के बाद घूमना सख्त मना है।

यहाँ सूर्यास्त होने के बाद पूरा पंद्रह किमी का रास्‍ता सुनसान, डरावना और रहस्‍यमय हो जाता है। भारी संख्या में पर्यटक इस भुतहे शहर को देखने अक्सर आते हैं।

धनुषकोडी में भारतीय महासागर के गहरे और उथले पानी को बंगाल की खाड़ी के छिछले और भारतीय महासागर के शांत पानी से मिलते हुए देखा जा सकता हैं।

यहाँ बहुत बड़ा टावर लगा है। जिसको बांधे रस्सियां दूर दूर तक जमी हुई हैं ताकि ये टावर आंधी तूफान हर हालात में टिका रहे।

यहाँ लगे एक चेतावनी तालिका पर स्नान ना करने की सख्त चेतावनी दी गई है नगर पालिका द्वारा। हालांकि मेरा साथी इसी फिराक में था की यहाँ स्नान किया जाए। पर अफसोस।

नहाने लायक लहरें नहीं हैं यहाँ। यहाँ अंतिम छोर पर कुछ लड़के पहले से ही मौजूद हैं। जो तस्वीरें बना रहे हैं। चलचित्र ले रहे हैं। कुछ ही देर में यहाँ पुलिस की एक गाड़ी गश्त पर आ पहुंची है।

शायद ये देखने की कोई लंका तो नही निकल गया। हालांकि यहाँ से सेतु अभी भी दिखाई पड़ता है। पर तीस किमी चल कर जाना खतरे से खाली नहीं है।

सुकून से भारत के अंतिम छोर पर बैठ कर आनंद ले रहा हूँ। एक लड़का जो दीवार से उतर कर लंका की तरफ बढ़ चला है उसको पुलिसकर्मी हड़काते हुए ऊपर बुला रहा है।

क्योंकि इसने जान का खतरा है। हर साल कोई ना कोई अपनी जान गवां बैठता है यहाँ।

अरिचल मुनि के पास बनी तबाह झोपड़ी

इतिहास

हिदूं धर्मग्रथों के अनुसार विभीषण के अनुरोध पर राम ने रामसेतु पर बाण छोडकर उसे पानी में डुबाया था। इसलिए यह सेतु पानीके 2-3 फीट नीचे गया है।

इस प्रकार इसका नाम धनुषकोडी पड़ा, धनुष यानि धनुष और कोटि यानि सिरा। यह भी कहा जाता है कि राम ने अपने प्रसिद्ध धनुष के एक छोर से सेतु के लिए इस स्थान को चिह्नित किया।

साढे सतरह लाख वर्ष पूर्व लंका में प्रवेश करने के लिए प्रभु श्रीराम ने यह स्थान निश्‍चित किया था।

अब कुछ मछुआरे और दुकानदार कारोबार के लिए दिन भर के लिए जा सकते हैं। सायं काल में 7 बज ने से पहले उन्हें वहाँ से लौटना पडता है।

अब धनुषकोडी नगरपर पूूूरा बालु से ढका हुआ है। चित्रों से इस नगर की ओर देखने पर केवल बालु ही दिखाई पड़ती है। यहाँ की बालु में अवशेष दिखाई पडते हैं।

जलयाननिर्मिती केन्द्र, स्टेशन, टपाल कार्यालय, अस्पताल, पुलिस और रेल की कालोनियां, विद्यालय, मन्दिर चर्च आदि के अवशेष यहाँ स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं।

इसके पहले प्रतिदिन सायं काल में 6 बजे श्रीलंका से भारत में दूध आता था। जिससे दूसरे दिन प्रातः रामेश्‍वरम शिवलिंग पर अभिषेक किया जाता था। यह परम्परा अनेक वर्षों से थी।

भारत-श्रीलंका के सागरी सीमा विवाद के कारण वह बन्द हुई। पहले थलाइमन्नार से धनुषकोडी तक की 35 कि.मी. की यात्रा नौकासे 2 घण्टे में होती थी। अब थलाईमन्नार से कालंबो तक 500 कि.मी. की यात्रा करके जाना पडता है।

इधर लोग एक एक कर निकल रहे हैं। एक सज्जन जो दौड़ते हुए आए थे कुछ तस्वीरें लीं और दौड़ते हुए निकल भी गए। मेरे पीछे दो लड़के रह गए हैं।

अरिचल मुनि से वापस धनुष्कोडी की तरफ जाने से पहले

वापसी का हुआ गलत आंकलन

मैं सूरज ढलने से पहले निकल पड़ा। कोशिश है की बस से स्टेशन पहुंच जाऊं। आधे रास्ते आने के बाद अपना कच्छा उठा लिया जो सूखने के लिए डाला था। पूरा तो नहीं पर काफी हद्द तक सूख गया है।

सड़क के बीचों बीच हम क्या देखते हैं अमूमन घर, तालाब, गांव, खेत। पर आज मैं यहाँ सड़क के बीचों बीच से सूरज को ढलते हुए देख रहा हूँ।

जो की मैंने पहले कभी नहीं देखा था। सड़क के एक ओर घोर अंधेरा दूसरी तरफ उजाला। मैं समुंदर के बीच बनी एक सड़क पर खड़ा हुं। मेरे पीछे दो चार युवक और आ रहे हैं।

मोबाइल निकाल कर चलचित्र बना डाला। पीछे से आ रहे अंधकार विचलित कर देने लायक है। कहीं मौसम खराब हो गया और मैं यहीं फस गया तो क्या होगा।

एकाएक घोर अंधेरा होता चला गाय। इस बात से बेखबर की अंतिम बस कब जाएगी मैं मग्न अवस्था में चला जा रहा हूँ।

कुछ देर बाद थोड़ी दूर से एक छोटी गाड़ी आती हुई दिख रही है। ये लोग उन सभी लोगों को जबरदस्ती बैठाल रहे हैं जो इस सड़क पर टेहल रहे हैं। मैं गाड़ी में सवार हो कर वापस अंतिम छोर तक आया।

ये देखने की कोई और तो नहीं और उन दोनो लड़कों को भी बैठा लिया जो काफी पीछे छूट गए थे। मुस्कुराते हुए वो लड़के भी चढ़ गए।

यह हमारी सुविधा के लिए है। यह गाड़ी हमें सात किमी वापस चौकी के पास उतारेगी जहां से रामेश्वरम को जाने वाली बस मिलेगी। शुक्र है वरना रात तक मैं ऐसे ही चलता रहता इस भूतिया शहर में। क्या पता कोई मिल जाता तो कोई बड़ी बात नहीं होती।

इसी दौरान बस से कुछ दूर पहले मैं गाड़ी से उतरकर अपने गीले कपड़े उठाने को आ गया। हालांकि चालक ने रोकने में आनाकानी की पर मैंने एतराज नहीं किया।

वो कपड़े जो मैंने छोर पर जाने से पहले उस उजड़े हुए टूटी दीवाल पर डाले थे और दौड़कर वापस गाड़ी में बैठ गया।

बस ठीक उसी टूटी हुई चर्च के सामने खड़ी है। बस को देख कर आस आई है थोड़ी। बस सभी यात्रियों का इंतजार कर रही है। चालक की यही कोशिश है कि वह सभी को ले कर यहाँ से रवाना हो।

लोडर के चालक ने उतार कर किराया वसूला। जो मैने दिया भी। दौड़कर आखिरी बस में बैठ गया। जाने क्या अंजाम होता अगर ये लोग ना होते तो।

बस से लदकर निकल पड़ा स्टेशन की ओर।

पहले तो मैं इस धोखे में था कि कन्याकुमारी के लिए शुक्रवार यानी आज के दिन ट्रेन है। लेकिन जब ठीक से देखा तो ऐसा नहीं है।

डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के घर के आगे

भारत के महान वैज्ञानिक का घर

बदलाव देख कर या यूं कहें मुझसे हुई चूक देख कर यह निर्णय लिया कि रामेश्वरम से मदुरई और मदुरई से कन्याकुमारी की दूरी तय की जाएगी। बात वही पड़ेगी।

बस से स्टेशन के निकटतम अड्डे पर उतरकर रामेश्वरम पहुंच कर भारत के महान वैज्ञानिक और पूर्व राष्ट्रपति डॉ एपीजे अब्दुल कलाम के घर जाने की इच्छा जाहिर जाऊंगा। उनका घर स्टेशन के पास ही है।

पैदल सफर तय करते हुए लोगों से पूछते हुए अब्दुल कलाम के घर तक आ गया। यहाँ छोटे से मगर तीन मंजिला बने इस संग्रहालय को देखने आ गया।

भीतर आ कर देखा तो यहाँ दुकानें भी लगी हुई हैं।

वहाँ से वापस आने के बाद इडली और दूसरी दुकान पर डोसा ग्रहण करने के रात के बारह बजे निकल पड़ा कन्याकुमारी के लिए।

कराईकुडी से रामेश्वरम से धनुष्कोडी तक का कुल सफर 237किमी

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