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भाग्सु नाग वाटरफॉल धर्मकोट

पर्यटन स्थल का चुनाव

सुबह सवेरे उठना तो जल्दी ही था लेकिन आंख खुली बहुत ही देर से जो कल रात में देर से सोने का परिणाम है। यहाँ तक कि मुझे जगाने भी प्रयेश ही आया, वरना ना जाने और कितनी देर ही सोता रहता।

मौसम आज सुहाना नहीं होगा ये खिली खिली धूप देख कर आभास हो रहा है। सोच में पड़ गया कहाँ को घूमने निकला जाए। त्रिउंड जाऊं या फिर धर्मशाला स्टेडियम या यहाँ से 30 किमी दूरी पर स्थित करेरी झील या भाग्सु नाग वाटरफॉल है उसे निहारने वहाँ।

विकल्प बहुत हैं साथ ही है भ्रम का बवंडर। इसी मुद्दे पर प्रयेश की राय जाननी चाही। उसने बताया बीती रात त्रिउंड में भारी बारिश और भयंकर तूफान आया है जिसके कारण वहां गड़े सैकड़ों तम्बू उखड़ कर उड़ गए।

कोई किसी पहाड़ी पर गिरा तो दूजा कहीं और ही। हालांकि जान कि हताहत नहीं हुई सिर्फ माल का ही नुक़सान हुआ। जो त्रिउंड की चोटी पर ठहरे हुए थे उन्हें खाली हांथ वापस लौटना पड़ा।

त्रिउंड जाना और ट्रैकिंग करने का विचार खुदबखुद दिमाग से उतर गया। किसी पहाड़ की चोटी से रतोंरात हवा में तो नहीं उड़ना चाहूँगा।

धर्मशाला स्टेडियम में कुछ खास ना होने की बात कही और वहां ना ही जाने की नसीहत दी। इन सबके अलावा प्रयेश ने भाग्सु नाग झरना और मंदिर जाने पर जोर दिया।

मशहूर स्थल है और लोगों का जमावड़ा भी रहता है और आसपास ही है। जा कर आने में भी कठिनाई भी नहीं होगी। इससे पहले कि और समय गुजरता मैं फटाफट तैयार होने लगा।

बैग में सारा सामान भर के उसे एक किनारे रख दिया। अजय भी बिना देरी किए तैयार हो गया।

वाटरफॉल जाने की तैयारी

प्रयेश से अलविदा ले सुबह के ग्यारह बजे तक मैं निकल पड़ा भाग्सु नाग झरने के रास्ते। मैकलोडगंज से पैदल चलते हुए मुझे उस पंच दिशा वाले चौराहे पर पहुंचना होगा।

जहाँ से भाग्सु नाग के लिए किसी ना किसी रास्ते की तरफ तो मुड़ना ही है ये तय है। खैर मार्ग तो मार्केट आते आते किसी ना किसी से पूछ ही लिया जाएगा।

नीचे की ओर जाने वाले रस्ते में अक्सर कोई ना कोई टैक्सी ऊपर जाते हुए जरूर दिखती। या तो सवारी लादे के जाती या फिर कोई लोडर सामान ढोते हुए दिखता।

भागसू नाग झरने के रास्ते का नज़ारा

पैदल चलने वाले भी हैं और दुपहिया वाहन चालक भी। उतरने में ज्यादा थकान नहीं होती जितना चढ़ाई चढ़ने में है। चलते चलते दस मिनट में मैं चौराहे की मार्केट तक पहुंच गया।

धर्मशाला मार्केट काफी बड़ी और सैलानियों से भरी हुई है। मेरे दाहिने हांथ पर बौद्ध मंदिर भी है। जाने की तो बहुत इच्छा है लेकिन अजय ने किसी कारण रोक दिया।

जिस लय बध्यता के साथ आगे बढ़ रहा हूँ उससे यही लग रहा है ज्यादा से ज्यादा आधे घंटे में पहुंच जाऊंगा। चलते चलते थक कर चूर हो चुका हूँ।

अभी तक सुबह से अन्न का निवाला भी नहीं गया है। झरने के रास्ते जाते हुए एक छोटी सी घर जैसी दुकान दिखीं।

चाय की चुस्की

जहाँ अंकल जी बाहर चाय बना रहे है और बेहद ही छोटे से कमरे में बैठने की व्यवस्था है। चाय की टपरी में एक एक प्याली चाय का आर्डर दिया।

घुमक्कड़ी में अक्सर एक चाय की प्याली एनर्जी ड्रिंक्स का काम करती है। बहुत ही कारगर साबित होती है। भारत आकर विदेशी भी चाय के दीवाने हो जाते हैं, मैं इस बात से थोड़ा हैरान हूँ।

चाय बिस्कुट ये अमूमन चलता है घुमक्कड़ी के दरमियान। मसालेदार चाय ने पूरा मूड ही बदल दिया।

चाय की चुस्की।

अब शरीर में वापस ऊर्जा का संचार होने लगा है। चाय के बाद वापस निकल पड़ा भाग्सु नाग के मार्ग पर। भाग्सु नाग काफी बहुचर्चित है। ना केवल झरने के लिए, बाकायदा मंदिर भी निर्मित है।

रास्ते में मंदिर भी पड़ा जहाँ ज्यादा भीड़ तो नहीं लेकिन हलचल और मंदिर के घंटियों की आवाज़ जरूर सुनाई दे रही है। सोचा पहले झरने तक हो आऊं और वापसी में मंदिर के दर्शन भी करता चलूंगा।

वापसी से स्मरण हुआ आज पठानकोट के लिए भी निकलना है जहाँ से जम्मू से वैष्णो देवी जाने की योजना है। भाग्सु नाग की प्रसिद्ध कहानी है।

भाग्सु राक्षस और नाग देवता के बीच पानी के लिए महायुद्ध हुए और युद्ध के दौरान ही इस झरने का इजात हुआ। पानी की लड़ाई सदियों से चली आ रही है और आने वाले दिनों में युद्ध भी पानी के लिए ही लड़े जाएंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं अगर हम मानव ठीक समय पर ना जागे तो हालत भयावह रूप ले लेंगे।

ट्रैकिंग

रास्ते में मेरे संग संग कई टूरिस्ट जुड़ चुके हैं जो शायद मेरी तरह झरने को देखने जा रहे हैं। इसमें परिवार लेके चलने वालों के बाद नवविवाहित शादी शुदा जोड़े ज्यादा हैं।

शिमला, मनाली के बाद अब धर्मशाला भी बड़ा हनीमून केंद्र बन गया है। ताजुब तो तब हुआ जब मैंने एक विदेशी परिवार को अपने बच्चों सहित देखा। हम अमूमन इन्हे ऐसी बनावटी या भीड़ भाड़ वाली जगह कम ही पाते हैं।

विदेशी सैलानी कम भीड़ वाली जगह, एकांत शांतचित जगहों पर वक़्त गुजारना ज्यादा पसंद करते हैं। धूप इतनी तेज़ है की गर्मी के कारण मुझे हाथो पर से ग्लव्स उतारने पड़ रहे हैं।

चलते चलते पसीना छोड़ दिया। जो मैंने रास्ते भर ध्यान देने वाली बात रही वो ये कि इन पहाड़ियों पर कई जगह प्लास्टिक की बोतलें, पॉलीथीन, चिप्स के पैकेट जैसे तमाम गंदगी धंसी नजर आ रही है।

पर्यटक की जिम्मेदारी

स्वच्छता का ध्यान ज्यादा रखे

ये बेहद ही संवेदनशील है और शर्मनाक है, आज मौसम अनुकूल है लेकिन कल यही घाटियां हमारी घटिया हरकतों का शिकार बन धूं धूं कर जलती नजर आयंगी।

हम घूमने तो जाते हैं है लेकिन अपना कचरा साथ वापस ना ले जा कर प्रकृति के हवाले कर देते हैं बदले में प्रकृति से जितना हो सके निचोड़ लेते हैं।

चलते चलते रास्ते में लगे एक बोर्ड पर नजर पड़ी। जिसमे कड़े शब्दों में लिखा है कि असली मर्द कचरा फैलाते नहीं उसे सही जगह पहुंचाते हैं। ये ध्यान देने वाला बिंदु है।

अब बस कुछ मीटर की दूरी पर हूँ झरने से जहाँ से इसका सिरहाना बड़े आराम से देखा जा सकता है। जगह जगह बोर्ड के माध्यम से चेताया भी गया है कि झरने में नहाना सख्त मना है।

इसको ताक पर रख कर कुछ युवक झरने के बहाव के पास तेज़ डीजे बजा कर नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। ये नज़ारा अभी झरने से काफी दूर है।

मेरे साथ साथ एक उत्साहित विदेशी सैलानी अपने बच्चों के साथ उसी दिशा में बढ़ रहा है, बच्चों की मां थोड़ी आलसी जान पड़ती है जो काफी पीछे छूट गई हैं।

भाग्सु नाग वाटरफॉल

ढेढ़ किमी चलने के बाद जो झरना देखा वो बेहद ही छोटा और भीड़ भाड़ वाला क्षेत्र नजर आ रहा है। कम जगह में बहुत ज्यादा भीड़। भरी तादाद में लोग झरने के पास पड़ी चट्टानों पर जमावड़ा लगा कर बैठे आनंद ले रहे हैं।

कुछ इनसे भी एक कदम आगे हैं वो झरने के बहाव के साथ और नीचे जा उतरे। इनमें बहुतों के मस्ती सवार है। अर्ध नग्न अवस्था में तोंद निकाले भैया जी लग तो युवा पीढ़ी रही है पर पेट पर जाऊं तो काफी उम्रदराज हो चले हैं।

आधा शरीर पानी में आधा हवा में उठाए अपने परिवार जनों से भी डुबकी लगाने की गुहार लगा रहे हैं।

यहाँ नवविवाहित दंपति मात्रा में अधिक हैं। कुछ यहीं गांव की स्कूली लड़कियां भी ठिठोली करती दिखीं। झरने के किनारे कुछ दुकानें भी बनी हैं।

भागसू नाग झरने पर भारी भरकम भीड़

मौका देख सही जगह कब्ज़ा कर दुकानें लगा रखी हैं। लेकिन दुकानों में पसरा सन्नाटा कुछ और ही बयां कर रहा है। इसका कारण भी जल्द पता चला। दुकानों में सामान का रेट बाहर बोर्ड पर ही लटका दिख रहा है।

इतना मंहगा जिसकी कोई सीमा नहीं। ये मुख्य बाज़ार से सामान ला कर यहाँ दुगने तीगुने दाम पर बेचते हैं। झरने के पास बने पत्थर पर बैठने की होड़ मची।

इसी होड़ में मैं भी शामिल हो गया और अपनी बारी का इंतजार करने लगा। सरदार जी उठे तब मैं झट से सकरे पत्थर पर बैठ गया।

जलभराव के एक सीमा के बाद रस्सी बांध दी गई है जिसे पार करना मतलब खतरे की घंटी। जरा सी चूक और आप झरने के झलभराव में।

वो जल भराव इतना गहरा है इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है की पास में टंगे एक बोर्ड में इसमें ना जाने की सलाह दी गई है, जहाँ बीते वर्षों में कुछ लोग डूबकर अपनी जान गवां बैठे हैं।

इसी बात से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है भले ही ये छोटा हो लेकिन गहरा बहुत है। कुछ एक तस्वीर लेने के बाद मैं चट्टान से नीचे उतर आया। आस पास से गुजरते हुए दुकान के पास वाली जगह पहुंचा।

यहाँ अजय ने अपने GoPro कैमरे को पानी में डुबोते हुए खतरा मोड़ लिया। इसी के साथ इसकी परख भी ही गई।

मैं चढ़ कर दुकान के चबूतरे पर जा खड़ा हुआ। इस उम्मीद से एक दुकानदार मेरे पास मेनू कार्ड लिए दौड़ा चला आया कि शायद ये कस्टमर हो।

पर मैं तो झरने को और पास से देखने और उसकी गहराई भापने की मंशा से आया हूँ। मेरा यहाँ भीड़ भड़क्के में मन कम ही लग रहा है। ना तो झरना उतना खास जितनी उम्मीद थी और ना ही जनता।

आने जाने का दौर जारी है। इसी बीच मैंने भी जाने का मन बना लिया।

जाने तो लगा लेकिन अजय के मन में ना नहाने की टीस रह गई है। अगर ये बोर्ड ना लगा होता तो अजय की तरह ना जाने कितने कूद पड़ते इस झरने के पानी में।

उसी इकलौते रास्ते से वापस आने लगा। चढ़ाई में जितना समय लगा था उसका आधा भी नहीं लगा उतरते समय। योजना बनी भाग्सु नाग मंदिर जाने की लेकिन समय के अभाव के चलते मैंने बाहर से ही हाथ जोड़े और चल पड़ा।

भागसू नाग झरने

स्विमिंग पूल में डुबकी

लेकिन अजय को दिखा एक स्विमिंग पूल जो ठीक मंदिर के सामने बना है। इसमें बेहता पानी भी झरने का ही है। पहले तो काफी देर बहस छिड़ी रही की नहीं नहाना है।

लेकिन अजय ने मेरी एक ना सुनी सामने बने पानी के पूल के सामने आ खड़ा हुआ। छोटे बालकों की भांति जिद्द पर अड गया। मुझे अपना बैग पकड़ाया, निर्वस्त्र हो मेरे लाख मना करने के बाद भी कूद पडा।

ये बेहद गैर जिममेदाराना रवैया है। एक तरफ जहाँ आज जम्मू के लिए निकलना है वहीं अजय यहाँ समय की खपत कुछ इस तरह कर रहा है। जब तक वो पूल में है तो मैं बाहर बैठे सामान ताक रहा हूँ।

आसपास कई लोग पूल में कूद रहे हैं कुछ बाहर निकल रहे हैं। इसमें अधिकांश आदमी ही हैं। पूल के पानी के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं जो साफ दिख रहा हो।

अजय जब खुद पानी से बाहर निकल आया, पास में बने बदली कक्ष में अपने कपड़े ले निकल गया। वापस आने के बाद मुझसे भी इसी पूल में एक दो डुबकी लगाने की सलाह दी।

मुझे थोड़ा विचित्र लग रहा इस तरह सामाजिक पूल में सैकड़ों के बीच नहाने में। वो पानी कितनों के शरीर को छूता हुआ पूल में है।

हालांकि सिरहाने से झरने का पानी निरंतर पूल में भर रहा है और उसके निचले हिस्से से निरंतर निकल भी रहा है।

नहाना पड़ा भारी

ठीक है मैं कूदने को राज़ी हो गया। मैं मगरमच्छ की तरह पानी में कूद पड़ा। पानी बेहद ही ठंडा है। मेरी आत्मा मानो जम गई हो। कूदते समय मेरी नाक में पानी भर गया। ये मुझे आने वाले दिनों में बीमार बना सकता है।

सात फीट के पूल में एक मर्तबा मैं डूबते भी बचा। पहले तो अजय खूब हस हस के लोट पोट हुआ पर जब मुझे डूबता देखा तो अजय के हांथ पांव फूल गए, वो पास के लोगों से मदद की गुहार लगाने लगा।

स्विमिंग पूल में नहाना पड़ा भारी

लेकिन इससे पहले को कोई मेरे तक पहुंचता, जैसे तैसे हांथ पैर मार कर मैं किनारे तक आ गया और बाहर निकल आया।

लंबी सांस ली और एक किनारे बैठ नाक में भरे पानी को निकालने की जद्दोजहद करने लगा। कुछ सेकंड पूल के किनारे बैठ मैं धूप की ओर निहारने लगा।

अब कुछ देर के लिए ही सही धूप अच्छी लग रही है। बदली घर में जा कर मैं भी कपड़े बदल आया। पूल का जो पानी आगे के रास्ते से निकल रहा है उसकी धारा इतनी तेज़ है की कोई लपेटे में आए तो लपिट जाए।

मैकलोडगंज के लिए वापसी

दोनों बैग में सामान ठूस कर के बैग पैक किए, जूते पहने और यहाँ से निकलने कि तैयारी करने लगा। इतनी हिम्मत नहीं पड़ रही है कि सामने बने भाग्सु नाग मंदिर में दोबारा जूते उतार कर दर्शन के लिए जाऊं।

बाहर से ही नमन कर मन ही मन भाग्सु नाग को याद किया और मैकलोडगंज की ओर मुड़ गया।

अभी लंबी यात्रा तय करनी है, यहाँ से पहले पंच चौराहे तक फिर वहां से मैकलोडगंज माउंटेन एयरींग इंस्टीट्यूट। यात्रा शुरू की और देर शाम तक पहुंच गया मैकलोडगंज।

इस मंशा से की आज धर्मशाला से बस पकड़ कर शाम तक पठानकोट के लिए रवाना होना ही है और फिर वहां से ट्रेन में बैठ जम्मू। सबकुछ सुनियोजित है। दौड़ते भागते इंस्टीट्यूट पहुंचा।

माउंटेन एयरींग इंस्टीट्यूट

कंपाउंड में हलचल ज़रा भी नहीं है, अपने कक्ष में आया तो यहाँ मौजूद मुझे प्रयेष के जेष्ठ भ्राता पीयूष से मुलाकात हुई, जिनका जिक्र कल रात प्रयेष ने हमसे किया ही था।

कैसे दोनों भाई मिलजुल कर ट्रैवल और ट्रैकिंग कंपनी का संचालन करते थे लेकिन अब जबसे बड़े भाई ने अपने दोस्त को सम्मिलित किया है छोटे भ्राता ने अलग होने का फैसला ले लिया है।

पीयूष ने बताया कि प्रयेष घर पर नहीं है। बाते हुई और मैं धर्मशाला से निकलने के लिए आखिरी बस के अलावा और भी कुछ जानना चाहा।

पीयूष ने बड़े ही सरलता से हर प्रश्न का उत्तर दिया। और जल्दी ही निकलने का सुझाव दिया। जब पीयूष को पता चला कि मैं भारत भ्रमण पर निकला हूँ तब उनकी प्रतिक्रिया बिल्कुल अलग ही रही।

उन्होंने अपना मत रखते हुए कहा कि अगर घूमना है तो ऐसी जगह घूमो जहाँ विरला ही कोई जाता है। मैं उनकी बात से सत प्रतिशत सेहमत हूँ।

सहसा मन में सबसे पहला विचार यही आया जहाँ सब घूमते हैं पहले वो घूम लूं फिर जहाँ कोई नहीं घूमता वहां भी घूम लूंगा।

जाने अंजाने में बोले गए अपने इस वाक्य से मैं खुद का कायल हो गया। पठानकोट जाने के लिए तो अब शायद ही कोई बस उपलब्ध हो! ये बोल पीयूष लैपटॉप पर काम करने लगा।

उनके साथ बैठा उनका मित्र बेहद ही शांतचित और सरल स्वभाव का मालूम पड़ता है। हाल फिलहाल में दोनों जहाँ जहाँ घूम कर आए वहां बीती घटनाओं का वर्णन करने लगे।

किन किन जटिल परिस्थितियों से उन्हें गुजरना पड़ता है। कभी कभी ऐसे हालात बन जाते हैं जहाँ मानव दिखाई ही नहीं पड़ता और वो घंटो साधन का इंतजार करते रह जाते हैं।

लंबे दौरे पर बस दो लोग एक दूसरे की शक्ल देख कर बोर हो जाते हैं। कैसे उन्होंने कई दफा लोगों की जान जंगली जानवरों से बचाई और कई बार इन कंधो पर मृत शरीर टांग कर उन्हें घर तक पहुंचाया।

ये पहाड़ शांत दिखते जरूर हैं लेकिन उनकी कहानियां शोर मचाती है। इसलिए उन्होंने बड़ी मेहत्वपूर्न नसीहत दी कि कभी भी पहाड़ियों या वादियों में इनकी सुंदरता में अपने आप को अकेले ना भेजना।

जंगली जानवर के लिए अवसर और खुद के लिए आपदा ना खड़ी करना ही समझदारी है।

भूलचूक

बैग पैक करते समय अजय ने बताया कि उसका पावर बैंक कल रात बाबा की कुटिया में ही छूट गया है। ये एक बड़ी समस्या खड़ी होती नजर आ रही है, और शायद योजना भी बदलनी पड़े।

अब वापस उन्हीं की कुटिया में जा कर पावर बैंक लाने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। ये लापरवाही भारी पड़ सकती है। पावर बैंक जैसा जरूरी उपकरण छोड़ा भी नहीं जा सकता। एक तो कीमती दूसरा मोबाइल को ज़िंदा रखने में उपयोगी।

हालांकि कल अंधेरे में जाने के बावजूद भी मुझे कुछ कुछ रास्ता याद है। बैग को यहीं पैक करके मैं अजय को ले निकल पड़ा बाबा की कुटिया की।

इसी उम्मीद में कि अभी भी कोई ना कोई बस पकड़ी जा सकती है कुटिया से वापस आ कर। कुछ रास्ता मुझे याद है कुछ अजय को।

महादेव भक्त एंटोनियो

फिजी से महादेव भक्त एंटोनियो के संग।

रास्ते में मुझे एक मनमौजी गोरा मिला जिससे कल रात ही कुटिया जाते समय भेंट हुई थी। खुद को महादेव का भक्त बताकर जगह जगह गुदवाए टैटू दिखने लगा।

नशे में चूर खुद को फिजी देश का निवासी बताया लेकिन खुद पिछले तीन साल से धर्मशाला में है।

सिर्फ एंटोनियो ही नहीं बाबत ऐसे कई विदेशी हैं जो यहाँ सालों से टिके हुए है और मुख्य कारण है चरस गांजा की सरल आपूर्ति।

कुछ देर की मुलाकात में एंटोनियो का बुरा हाल जानने को मिला। वो यहाँ खुश भी है, अपने देश वापस जाने के प्रश्न पर उसका जवाब डगमगा गया।

मैं वापस पावर बैंक और कुटिया की खोज में निकल गया। खुली दुकानें रास्ता ढूंढने में सहायता कर रही हैं जिनकी मदद से स्मृतिपटल पर जोर डाल याद करते हुए आगे बड़ रहा हूँ।

कुटिया तक का सफर

पहाड़ी दर पहाड़ी आगे चलता चला जा रहा हूँ। कभी देसी तो कभी विदेशी बच्चे खेलते हुए दिखाई पड़े। रास्ते में मुझे टोनी स्टार्क का हमशक्ल भी मिला।

उन्हें रोका और मैंने उनसे बात की और ये प्रश्न भी किया कि आप को बहुत लोग बोल चुके होंगे अबतक उनका जवाब आया “भतेरे लोग यार”, और ये उन्हें खुशी भी देता है कि वो रॉबर्ट डाउने जूनियर की तरह दिखना।

जल्दीबाजी में उनके साथ फोटो लेना रह ही गया। खैर अलविदा किया और अपने मार्ग की तरफ चल दिया। कभी किसी यात्रियों से बाबा की कुटिया पूछता कभी विदेशी से।

पार्क में खेलते बच्चे

अब तक जो रास्ता याद है उसमे थोड़ा भटकाव आया जब मैं रास्ता समझ किसी की बगिया में जा घुसा।

बागं में जो महिला काम कर रही उन्होंने में आने का कारण पूछा। तब जा मैंने उन्हें सारा घटनाक्रम सुनाया। उन्हें बाबा की कुटिया पता है कहाँ है और किधर को जाना है ठीक उसी दिशा में उन्होंने मार्गदर्शन किया।

बताए हुई दिशा में चल ही रहा था कि प्रयेश ने हमें आते हुए देखा और आने का कारण पूछा। पावर बैंक बाबा की कुटिया ये वाक्य बोला ही की उसने हाथ लहराते हुए पावर बैंक दिखाया और मुझे थमा दिया।

इंस्टीट्यूट वापसी

मैं वापस मुड़ा जाने के लिए तभी उसने साथ चलने की बात कही। सूरज ढल चुका है और धीरे धीरे अंधेरा भी हो रहा है। चांद चम चमाने लगा है आसमान में। ये तो तय रहा की आज धर्मशाला के बाहर निकलना तो नहीं हो पाएगा।

इसी सिलसिले में प्रयेश से एक रात और यहीं रुकने का आग्रह किया पर उसने भाई का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। लेकिन दूसरी जगह जहाँ उसका कैंप है वहां हमारे लिए व्यवस्था करा दी।

वो जगह मैकलोडगंज से तकरीबन 7 किमी दूरी पर है। प्रयेश घर तक तो नहीं आया बीच में ही उसने उस जगह की लोकेशन और केयर टेकर का नंबर इत्यादि सभी मोबाइल पर भेज दिया।

मैं घर पहुंचा बैग उठाया और निकल पड़ा हीरू गांव जहाँ आज की रात तम्बू गड़ेगा।

दो अमरिकी

पीठ पर बैग टांग सफर की शुरुआत हुई। नीचे जाते समय कुछ विदेशी भी साथ साथ चले जा रहे हैं जो मेरी ही तरह कंधो पर ट्रैवल बैग लादे चल रहे हैं। आगे आगे महिला और पीछे पुरुष।

मैंने जिज्ञासावश वार्ता शुरू की जिसके बाद एक दूसरे से परिचित हुए।

ये मूल रूप अमेरिकी हैं जो पिछले कुछ महीनों से भारत में हैं, फिलहाल वो धर्मशाला से दिल्ली के लिए रवाना हो रहे हैं जहाँ से वो अपने अगले गंतव्य फ्रांस के लिए निकलना होगा।

ये जनाब अपनी पत्नी के साथ पिछले दस दिन से धर्मशाला में ही गुज़ार दिए। मुझे लगा ही था कि जो महिला आगे आगे भाग रही है उनसे इनका नाता होगा।

मैंने भी उनको इक्तला किया कि अमेरिका की मोबाइल नेटवर्क कंपनी स्प्रिंट के लिए नोएडा से काफी समय तक सेवाएं दी। अब सब छोड़ घूमने निकला हूँ।

जिज्ञासावश मैंने कुछ भारतीय सेलेब्रिटी के नाम लिए ये जानने के लिए की हम अमेरिका में कितने चर्चित हैं। कुछ को जानते थे कुछ के बारे में कभी सुना नहीं।

अन्य देशों के मुकाबले भारतीय मुद्रा के कमजोर होने के कारण विदेशियों को खर्चों में काफी सहूलियत मिल जाती है भारत में।

बातों बातों में रास्ता कब गुजर गया पता ही नहीं चला। ये जनाब अपनी पत्नी के साथ कुछ खरीददारी के लिहाज से धर्मशाला की मार्केट में सामान तलाशने निकल गए और मैं हीरू गांव कि ओर रवाना हो गया।

सोचा इतनी दूर कैंप जाने से बेहतर है क्यों ना यहीं किसी होटल में ठहरा जाए! विचार भी अच्छा है। इसी बहाने कई होटल में खाली कमरे की बात की पर हर होटल में शायद ही कोई कमरा खाली हो।

धर्मशाला मार्किट

रात का ठिकाना हीरू गांव

मतलब सोने के लिए कड़ी मशक्कत तो करनी ही पड़ेगी। होटल के किसी कमरे में आराम करना आज नसीब में नहीं। पूछते पूछते उस मोड़ से मुड गया जहाँ से हीरू गांव की ओर जाना है।

सूर्य की किरणे अब नाम मात्र ही रह गई हैं। मैं पसीने से तर बतर हो गया हूँ। ऐसा लग रहा है मानो किसी ने टोंटी खोल दी हो हो झरने की तरह मेरे सिर से पानी बह रहा हो।

गूगल नक्शे द्वारा निर्देशित रास्ते पर चलते हुए मैं आगे बढ़ता जा रहा हूँ। अंधेरा इतना घोर है कि कभी किसी इंट पर पैर पड़ता तो कभी बेहत हुए पानी पर। ना कुछ दिखाई पड़ रहा है ना सुनाई, बस नीचे की ओर उतरता जा रहा हूँ।

बैग से अब सिर में बांधने वाली टॉर्च को निकालने का समय आ गया है। एक किनारे बैग रखा और टॉर्च निकाल सिर पर बांध ली और अजय को इस अंधेरे में साथ रहने की जरूरत समझाया।

धक्के खाते हुए कभी घोड़ों कभी कच्चरों से टकराते हुए गली कूंचो से होते हुए आगे निकला। बैग के वजन लादे लादे बुरा हाल है, मानों किसी मिलिट्री ट्रेनिंग पर निकला हूँ।

अब तो यही लग रहा है कब आयेगी मंज़िल? जिस तरह शरीर से पसीना बेह रहा है वो अच्छे संकेत नहीं है। चारो और अंधेरा, गली मोहल्ले में कहीं भी बत्ती नाम की कोई चीज ही नहीं है।

काफी देर चलने के बाद एक दुकान दिखीं जहाँ बल्ब लुप लुपा रहा है। घूम कर आया तो देखा ठीक उस दुकान के पीछे कैंप है।

यहाँ पहुंचते ही फाटक खटकाया और प्रयेश ने भेजा है ये कह कर अन्दर आ गया। केयर टेकर भी समझ गया और उसने स्वागत किया।

अपने यहाँ पहले से ही गड़े तम्बू दिखाने लगे और किसी एक में तम्बू में रात गुजारने का निवेदन किया। ये गांव पहाड़ियों के बीचों बीच गहराई में नीचे की ओर है।

मशक्कत तो कल होगी जब बैग ले कर वापस चढ़ाई करनी पड़ेगी। आने में ही नींबू निचुड गए, जाने में ना जाने क्या हाल होगा।

कई तंबुओं में से नीचे लगे तम्बू में मैं गया। बैग सहित खुद को अन्दर धकेला। बैग से चटाई निकाली, बिछाई और लगभग सोने की तैयारी भी कर ली लेकिन धूल मिट्टी होने के कारण वापस बाहर निकल आया।

ऐसी गंदे टेंट में तो नींद आने से रही। यही सहमती बनी की अपना टेंट निकाल कर क्यों ना उस गाड़ा जाए। बैग से खुद का तम्बू निकाला और बीस मिनट में लगा कर गाड़ भी दिया।

सोने के लिए टेंट लगाते हुए

रात्रि भोज

सोने की तो व्यवस्था हो गई अब बारी है पेट की। जोरों कि भूख को देखते हुए मैंने अपना बैग केयर टेकर के घर में ही रखवा दिया जो पास में ही बना है।

बाग रखवा उसी रास्ते से निकल पड़ा पंच दिशा चौराहे इन अंधेरी गलियों से। अब तो रास्ता भी याद हो गया है। पंच चौराहे पहुंचा तो देखा लगभग सभी बड़े होटल और रेस्तरां बंद हो चुके हैं।

लेकिन अभी भी एक छोटा सा भोजनालय चालू है।

खुराक को ध्यान में रखते हुए यहाँ इस छोटे भोजनालय में खाने का फैसला किया। रेस्तरां हो, ढाबा, होटल या भोजनालय अन्न तो आखिर अन्न होता है।

खुराक से कुछ कम भोजन किया, छोटे से भोजनालय में भी अति स्वादिष्ट खाना। अगर मेरे परिचय का कोई धर्मशाला आयेगा तो उसे यहाँ जरूर भेजूंगा। बिल का भुगतान किया और यही वाक्य संचालक से कहे।

सैर सपाटा

भोजन के बाद बाज़ार में घूमने निकला लेकिन अधिकतर दुकानें या तो बंद हो चुकी हैं या बंद हो रही हैं। सब अपनी अपनी दुकान समेटने में लगे हुए हैं। हर गली हर सड़क पर शटर गिर रहे हैं।

एक दूसरी गली में सड़क किनारे एक आदमी अपना वाद्य यंत्र लिए मधुर संगीत की उत्पत्ति किए जा रहा है। एक टुक उसके संगीत को खड़े हो कर देर तक सुनने को जी चाह रहा है। परन्तु समय की कमी को देखते हुए मैं आगे बढ़ता चला गया।

कोने की दुकान से आईस क्रीम खरीदी और ठंड में ठंडी ठंडी आईस क्रीम खाने का मजा लेने लगा। नवविवाहित जोड़े रात के अंधेरे में भी यहाँ घूमते पाए गए। कईयों का थी तीर्थ हो जाता है।

कुछ ही देर में वापस चल दिया हीरू गांव। ये सफर की पहली रात है जो तम्बू में गुजरेगी। गांव पहुंचा और सोने की तैयारी कर है रहा था कि आसमान में देखने को मिले असंख्य तारे।

हालांकि चौतरफा पहाड़ों से घिरे होने के कारण ये कम ही हैं।

2 Comments

  1. George says:

    I still stick to my words that I prefer reading your Hindi than your English.

  2. Sakina says:

    So much of details.. And so much of hard work Aish! So precise.. So proud of you.

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