बेलम गुफा जहाँ बहती है रहस्यमई पातालगंगा

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 नहीं मिला अमानती घर

ज्योतिर्लिंग दर्शन के बाद कल रात्रि मरकापुर स्टेशन से जिस ट्रेन में मैं बैठा। उसने ठीक समय पर तडिपत्रि पहुंच गया। स्टेशन पर आवाजाही है पर भीड़ नहीं। थोड़ा वीराना जरूर लग रहा है स्टेशन मगर इक्का दुक्का दुकानें तो हैं ही।

यहाँ इस गांव क्षेत्र में जो देखना आया हूँ वो है बेलम की गुफाएं जो कि यहाँ स्टेशन से तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। पर कहीं भी निकलने से पहले सोच रहा हूँ बैग यहीं स्टेशन पर रखवा दूं और मैं इत्मीनान से घूमने निकल जाऊं।

स्टेशन पर बैग रखवाने की व्यवस्था देखने में जुट गया। कुल चार कमरे दिखाई पड़ रहे हैं इस स्टेशन पर। एक स्टेशन मास्टर का दूसरा पुलिस का तीसरा समोसे वाले का और चौथे में ताला पड़ा है।

अंत में मालूम पड़ा कि इस स्टेशन पर कोई भी अमानती घर मौजूद नहीं है। स्टेशन मास्टर और पुलिस अधीक्षक के कमरे में बैग रखने की बात आई तो वो भी मना होता दिख रहा है।

अब जहाँ भी जाना होगा बैग लादकर ही आगे बढ़ना होगा। वैसे हर स्टेशन पर यह सुविधा उपलब्ध होती थी। जिसके कारण काफी सहूलियत मिल जाती थी। बैग रख कर पूरा शहर घूम आओ। मैंने अब ये स्वीकार कर लिया है की आज बैग लादे लादे घूमना होगा।

कहीं भी निकलने से पहले थोड़ी पेट पूजा हो जाए तो ऊर्जा बनी रहेगी शरीर में। बेलम तक जाने के लिए बस का सहारा लेना होगा। बस अड्डे तक जाने के लिए भी यहाँ से ऑटो।

दक्षिण भारत में इडली, डोसा से बढ़कर क्या ही स्वादिष्ट होगा। पेट भी टना टन रहता है इडली से। समोसे वाले की दुकान पर इडली भी मिलती है गरम चाय भी। मैने इडली खाना ज्यादा लाभकारी समझा। मंगवा ली। सोचा ज्यादा इडली खाऊंगा तो ज्यादा आमदनी होगी तो शायद बैग भी रखवा लें।

और इडली मंगवा ली। खाई भी और बैग रखवाने की बात भी कर डाली। कर्मचारी बैग रखवाने को तैयार हो गया। पर उसने सारा जिम्मा अपने मालिक के ऊपर डाल दिया।

मालिक का फैसला ही अंतिम फैसला होगा। मालिक से पूछा गया तो मना हो गया। क्योंकि ये हमें नहीं जानते इसलिए। नाश्ता करने के बाद भुगतान करते समय स्वयं दोबारा पूछा पर मना ही हो गया।

इडली वाले की दुकान पर बैग रखवाने की गुज़ारिश भी व्यर्थ ही गई। बैग के साथ घूमने के अलावा और कोई विकल्प भी नहीं दिख रहा है।

रेल परिसर से बस अड्डा

बैग ले कर निकल आया बाहर। सारे प्रयास विफल हुए। बाहर भी बस अड्डे जाने के लिए गिनी चुनी ऑटो। यहाँ जो कतार में खड़ी हैं वो आरक्षित हो कर जाएंगी। इन्ही महाशय ने दूसरी ऑटो से जाने को बताया।

बैग लेके इंतजार करने लगा। कुछ ही वक्त बिता है की खाली ऑटो रेलवे स्टेशन पर आ धमका। बस अड्डा बोल कर मैं बैठ गया और चालक ने भी बैठा लिया।

बस स्टैंड से बेलम तक जाने के लिए बस उपलब्ध होगी। कुछ एक सवारी भरने के बाद चालक निकल पड़ा। इस छोट से कस्बे में ज्यादा जनता जनार्दन नहीं है। जितनी भी है सब अपने काम काज में जुटे हैं। बीस मिनट के भीतर ऑटो बस अड्डे ले आया। मेरे साथ साथ और भी सवारियां यहीं उतर रही हैं।

तेज धूप के बीच पहले तो छांव में आ खड़ा हुआ। यहाँ इंक्वायरी काउंटर पर पूछने पर पता चला कि हर एक घंटे में बेलम के लिए बस रवाना होती है।

कड़ी धूप में कुछ देर खड़े होने के बाद बस का आना हुआ। अजीब चालक है। इसका बस चले तो अपना वाहन ही सवारी पर चढ़ा दे।

बस खाली ही आई है और शायद खाली ही जाएगी। सवारी भी ज्यादा नहीं है बेलम जाने के लिए। बैग ले कर आ गया मैं सबसे पिछले हिस्से में। पिछले हिस्से में कम ही लोग आते हैं जबतक आगे पूर्णतः भर ना जाए। ज्यादा देर ना रुकते हुए बस भी चल पड़ी। मैं लद के निकल पड़ा बेलम।

तड़िपत्री ना तो गांव जैसा है ना शहर वाली कोई बात है। लेकिन जरूर की हर चीज़ उपलब्ध है। कस्बे से निकलते हुए गांव के इलाके से बस का गुजरना हो रहा है।

बस की पिछली सीट पर बैठ कर पहाड़ी के नज़ारो का आनंद ले रहा हूँ। जगह जगह पवन चक्की देखने को मिली। मतलब ये है कि बिजली उत्पादन अच्छे स्तर पर होता है। जिससे गांव गांव बिजली पहुंचाई जाती होगी।

साथी घुमक्कड़ के बगल में एक अधेड़ उम्र का आदमी ऐसे सो रहा है जैसे अब उठेगा ही नहीं। बेसुध बेफिक्र। कई दफा तो वो दूसरों के कंधो पर गिर रहे हैं। जाने कैसे लोग इतनी हिलती डुलती बस में सो लेते हैं?

बेलम आगमन

बारह बजते बजते मैं बेलम आ पहुंचा। लेकिन मैं इस बात से बेखबर बैठा गाने सुन रहा हूँ। कंडक्टर ने जोर देकर आवाज़ लगाई तब ध्यान आया मुझे बेलम ही उतरना है।

वजनी बैग लेकर उतर लिया बेलम के द्वारे। बैग की समस्या अब भी है। बेलम के मुख्य द्वार के सामने बड़ा सा ढाबा दिख रहा है।

बेलम पहुंचते पहुंचते भूख भी लग आई है। विचार आया क्यों ना बैग इन्हीं के ढाबे में जमा करवा दें। अगर इनकी कुछ आमदनी करा दूंगा तो शायद ये मेरा बैग अपने ढाबे में रखवा लें।

निकल आया इसी ढाबे में। बाहर पड़ी मेज कुर्सी पर विराजमान हो गया। अभी फिलहाल चाय पी कर ही काम चला सकता हूँ। अंदर घी बना रहे मालिक को बाहर बुलाया।

चाय के बाद ढाबा मालिक से बात कर उन्हें बैग रखवाने के लिए राज़ी कर लिया। गांव के लोग वैसे भी बहुत अच्छे और भोले भाले होते हैं।

भुगतान के बाद बैग धर कर निकल पड़ा गुफाओं की ओर। सड़क पर करके मुख्य द्वार से अंदर। फिलहाल मौसम के मिजाज कुछ ठीक नहीं लग रहे। कुछ अंदर ऐसे ही पैदल रास्ता है। बाहर टिकट घर का काउंटर है पर वो भी धूल खा रहा है।

घने बादलों के बीच बुद्ध प्रतिमा

अपना छोटा बैग लेके भीतर की ओर निकलता जा रहा हूँ। मुख्य द्वार के पास भगवान बुद्ध की विशालकाय प्रतिमा दिख रही है। यहाँ कुछ लोग दावत उड़ा रहे हैं।

पैदल चलते चलते मूर्ति के पास आ पहुंचा। खड़ा निहार ही रहा हूँ कि झमाझम बारिश शुरू हो गई। मिट्टी की महक और भी अच्छी लग रही है अब। सब पेड़ की छांव में आ खड़े हुए।

पेड़ के नीचे बारिश थमने का इंतजार करने लगा। बारिश के रुकते ही निकला टिकट काउंटर की ओर। दिन का वक्त है इसलिए लोग गुफा की तरफ जाते हुए ज्यादा दिखाई दे रहे हैं।

कुछ देर की बारिश में ज्यादा कुछ ना बिगड़ पाया। बुद्ध की मूर्ति के पीछे की पहाड़ी में बड़े अक्षरों में बेलम लिखा नजर आ रहा है। मालूम पड़ता है इस जगह को प्रसिद्ध बनाने की कोशिश जारी है।

लोगों से पूछते हुए टिकट घर की ओर निकल पड़ा। जो ज्यादा दूर नहीं है। बेलम के मुख्य द्वार से आधा किलोमटर आगे गुफा में अंदर जाने का टिकट प्राप्त होता है।

गुफा

कुछ ही पल में टिकट घर के सामने आ खड़ा हुआ। भीतर जाने के लिए यहीं से हो कर गुजरना पड़ेगा। यहाँ से आगे जबरदस्त घेराबंदी है।

आगे गुफाओं में जाने का मार्ग है। जबतक मार्ग में ब्लॉक नहीं दिखा यही सोचता रहा बिना टिकट के ही देख लूं। टिकट कुछ महंगा लग रहा है।

पर फिर सोच विचार के बाद काउंटर पर टिकट ले कर प्रवेश किया। अभी तक तो इसके बारे में अंतराजाल(इंटरनेट) पर ही पढ़ा है, लेकिन तस्वीरों ने कुछ सटीक अंदाज़ा नहीं मिल पा रहा था।

टिकट ले कर कटवा कर भीतर निकल आया। गुफा में प्रवेश करना भी अपने आप में एक बेहतरीन अनुभव है। चिद्र तक तो प्राकृतिक रोशनी आ रही है उसके बाद भीतर जाने पर जगह जगह रोशनी का प्रबंध किया गया है।

 

मेघालय की गुफ़ाओं के बाद ये भारतीय उपमहाद्वीप की दूसरी सबसे बड़ी प्राकृतिक गुफ़ाएँ हैं। यह गुफाएं हैदराबाद से 350, बैंगलोर से 250 किलो और कुरनूल से 100 किलोमीटर दूर है।

यह गुफा लाखों साल पुरानी है और भूमिगत पानी के प्रवाह से स्वतः इसका निर्माण हुआ था। मूल रूप से तो सन् 1884 में एच.बी. फुटे ने खोजा था।

लेकिन दुनिया के सामने 1982 में यूरोपीय गुफ़ाविज्ञानियों की एक मंडली ने इन्हें मौजूदा स्वरूप में पेश किया। हालांकि इनका रास्ता पुरातत्त्व विभाग ने खोज निकाला था। ज्यादातर गुफाएं पहाड़ों में होती हैं,लेकिन भारत की ये गुफा एक सपाट खेत के नीचे बनी है। जो आश्चर्य की बात है।

ऊपर से नीचे गुफा तक कुएं जैसे तीन बड़े छेद बने हैं। इनमें से बीच वाले का इस्तेमाल गुफा में जाने के लिए किया जाता है।

बेलूम गुफा का प्रवेश द्वार

प्रवेश द्धार

सीढी से उतरकर नीचे आ गया। नीचे बैठने वालों के लिए बेंच पड़ी है जिसमे काफी लोग विश्राम करते दिख रहे हैं। इस गोल रोशनदान के बाद से गुफा शुरू होती है।

अंधेरे को कम करने के खातिर यहाँ रंगीन रोशनी लगाई गई है। कुछ पलों में अपना रंग बदल रही है। जितना ही अन्दर जा रहा हूँ उतना ही गहराई तक पहुंच रहा हूँ।

थोड़ा और अंदर आने पर गुफा दो दिशाओं में बट जाती है पहली सामने दूसरी दाएं। मैं औरों से अलग पहले सामने निकल आया। चलते चले जाने पर बायां मोड़ आया।

कीचड़ से भरे इस मोड़ पर आगे पैरों, जूते, चप्पलों के निशान के साथ टूटी हुई सैंडल पड़ीं हैं। थोड़ा आगे चला उसके बाद जैसे जैसे आगे बढ़ रहा हूँ वैसे वैसे कीचड़ का स्तर भी।

ऊपर से उत्पादक यंत्र की आवाज आ रही है। जिसके माध्यम से गुफा को हवादार बनाने का प्रयास है। चूंकि जैसे जैसे धरती के नीचे जाते जाएंगे वैसे वैसे ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जाएगी।

किनारे से होकर भी निकलूं तो भी कीचड़ में सनने का खतरा है। इस लिए कुछ दूर चल कर वापस निकल आया। क्योंकि कीचड़ के भी आगे क्या निकलेगा कहना मुश्किल है। बिखरी टूटी चप्पलों से हालत का अंदाजा लगाना आसान है।

वापस आकर दाएं मोड़ से अन्दर निकल गया दूसरी तरफ। इस मोड़ से असंख्य मोड़ आते गए। दीवारों पर दिशा भी निर्देशित कर रखी गई है ताकि कोई गुम ना हो।

जियोलॉजिस्ट के मुताबिक, लाखों साल पहले इस गुफा के नीचे पानी का बहाव बेहद तेज होगा, जिस कारण यह गुफा बनी। गुफा के अन्दर कई ऐसी चट्टानें मौजूद हैं, जिनमें पानी के कारण छेद बन गए हैं।

जाते जाते एक बड़ा सा चौराहा आया जहाँ से अनेक जगह के रास्ते हैं। उनमें से सबसे छोटे और सकरिले गुफा में आ गया जहाँ घोर अंधेरा और सन्नाटा पसरा है।

साधना करने की उत्तम जगह। दरअसल, इन गुफाओं में जैन और बौद्ध भिक्षुओं के रहने के अवशेष मिले थे। जिन्हें अब अनंतपुर के म्यूजियम में सुरक्षित रखा गया है। बताया जाता है कि प्राचीन समय में यह गुफा बौद्ध भिक्षुओं के बीच ध्यान केंद्र के लिए मशहूर थी।

मोबाइल की टॉर्च जला धीरे धीरे आगे बढ़ता गया। एक प्वाइंट आया जहाँ से वापस जाना बेहतर लगा। बाहर निकल कर बाकी के हिस्सों में गया।

गुफा

पातालगंगा

गुफा के एक हिस्से में नदी बह रही है जो कहा से आती है कहा को जाती है किसी को नहीं पता। इसे पातालगंगा नाम दिया गया है।

ये वही नदी है जो गुफा के मुख्य द्वार के ठीक 150 फीट नीचे बहती है, पातालगंगा। हैरान कर देने वाली बात यह है कि पातालगंगा से निकलने वाला पानी गुफा में कुछ दूरी तक जाने के बाद रहस्यमयी ढंग से गायब हो जाता है।

यहाँ कई हिस्सों में कार्य प्रगति पर है। उसी एक हिस्से में गया जो अति विशालकाय गुफा मालूम पड़ती है। पर बहुत ही डरावनी। ऐसा लग रहा है आगे गया तो किसी जंगली जानवर से ही सामना होगा।

ऑक्सीजन की कमी के कारण पसीने से लथपथ। सांस फूलने आम बात है। उमस बहुत हद्द तक है। प्रकाश ना हो तो अंधेरे में आदमी यहाँ खो जाए।

मैं कई ऐसी ऐसी जगह जा कर लौट आया हूँ जहाँ अगर मेरा कोई सामान गिर जाए तो उससे पाना नामुमकिन होगा। और ऐसी जगह भी जहाँ जाते ही सारा शोर शून्य हो जाता है।

गुफा में कुएं जितने बड़े सिंकहोल। कोई सोच भी नहीं सकता सूखे शांत जगह के नीचे इतना बड़ा खजाना होगा।

टॉर्च का प्रकाश मार कर देख पा रहा हूँ कितना खतरा है। साथी घुमक्कड़ बार बार वापस बुला रहा है। यहाँ मुझे गुफा में खाई नजर आ रही है।

मजा भी है और खतरा भी। कई लोग नंगे पैर देखे जा सकते है। किसी के कपड़े सने है तो किसी के हाथ पैर। दीवारों से भी पानी बह रहा है। मार्ग को इंसानों के द्वारा सुगम बनाया गया है।

रंग बिरंगा प्रकाश होने के कारण सब जगमगा रहा है। कई जगह पानी भी भरा है जिस पर चल कर जाना पड़ रहा है। अगर मेरे पास बीम प्रकाश होता तो खड़े खड़े दूर दूर तक देख लेता।

लगभग काफी हिस्सों तक जा चुका हूँ। बेहतर होगा अब गुफा के बाहर निकला जाए। घड़ी में चार बज रहे हैं और मैं बाहर की ओर प्रस्थान कर रहा हूँ।

अभी भी सैलानियों का आना जाना बरकरार है। गुफा के कुछ हिस्सों में जाना भी खतरनाक लग रहा था। कुछ जगह तो घोर अंधेरा था।

गुफा

हाल बेहाल

कई जगह ऐसी थी कि अगर इंसान खो जाए तो उसका भटकना तय है। एक बड़े हिस्से पर कार्य चालू है। कई हिस्से ऐसे हैं जिसपे अगर कोई आगे तक निकल भी जाए तो उसका दम घुटने या घबराहट से मौत भी हो सकती है।

लेकिन शुकर है गुफाओं की छत पर हवा के लिए कूलर लगे है जिससे सांस लेने में तकलीफ कम होती है। जगह जगह टूटी हुई चप्पलें पड़ी हुई थी।

इससे यह साफ जाहिर होता है कि इस गीली मिट्टी में चलना आसान नहीं है और अच्छे मजबूज पकड़ वाले जूते होने चाहिए पैरों में।

जितने भी लोग बाहर आ रहे थे सब के कपड़े कीचड़ से सने हुए। अच्छे जूते होने के बावजूद भी मेरे कपड़े सने तो हैं लेकिन बाकी लोगों से कम।

बाहर निकलते वक्त प्रवेश द्वार के पास की भी गुफाओं का मुआयना करने आ गया। ये सूखी है परंतु हैं उतनी ही गहरी जितनी अंदर वाली हैं।

बेंच वाली जगह पर थोड़ा खुद को खंडा किया जो अब तक पसीने से और उमस से लथपथ हो चुका था। युवाओं का एक दल हो हल्ला करने में जुट हुआ है। हुडदंग बाजी में कुछ देर तस्वीरें निकलवा कर निकल लिए।

खुले प्रवेश द्वार के नीच मैं भी तस्वीर निकलवाने लगा जब लगभग सब जा चुके हैं।

गुफा

बाहर का दृश्य

बाहर निकल कर वो कूलिंग पंखे धरातल पर लगे नजर आ रहे है। जो अन्दर गए जन समुदाय की सांस लेने में बहुत ही हितकारी साबित हो रहे हैं। बाहर  खड़े हो कर लग ही नहीं रहा की निचे कोई गुफा भी होगी

साथ ही अन्य दो प्रवेश द्वार भी। पर अब इन्हें बंद कर दिया गया है। पास में लगे झूलों पर बच्चे झूल रहे हैं। कुछ दाढ़ी वाले बच्चे भी शामिल हैं।

अंदर जितना व्यवस्थित करके रखा हुआ है बाहर उतना ही बिखरा। जंगली घास।

मुख्य द्वार से बाहर निकल कर उसी ढाबे पर आया। थोड़ा सुस्ताया और खाने का आर्डर देने लगा। लेकिन बात फस रही है भाषा की जो मैं बोल रहा हूँ वो उनको ना समझ आए ना उनकी बात मुझे।

तब जाकर संकट मोचक के रूप में एक नव युवक आया और दोनों तरफ से अनुवाद करने लगा। मैं बोलता कुछ वो समझता कुछ और समझाता कुछ, यही काम ये उधर का भी इधर कर रहा है।

जब बात समझ अाई तब आंटी जी के साथ हम सब जोर जोर से हंसने लगे। ठहाको के बीच आर्डर दिया। भोज के बाद प्रतीक्षा करने लगा बस का। पांच बजे की बस से तडिपत्रि रवाना हो गया।

ढाबे पर बैठ कर दिन का भोजन करते हुए

तडिपत्रि वापसी

ट्रेन पौने सात के लिए देरी हो चुकी है। तडिपत्रि बस अड्डे तक पहुंचते पहुंचते साढ़े छह बज चुके हैं। लग नहीं रहा है कि ट्रेन समय रहते मिलेगी। बस अड्डे पर कोई ऑटो भी ना मिल रहा।

बाहर आकर बड़ी मुश्किल से ऑटो में बैठा। ड्राइवर से गुज़ारिश कि ये ऑटो आप रॉकेट समझ के चलाए मगर शायद उन्होंने सुना कुछ उल्टा और सामान्य गति से भी धीमी रफ्तार में चलने लगे।

मैंने माथा पकड़ लिया ये सोच के की फिर से बोलूंगा तो ऑटो में धक्का मारते हुए ना जाना पड़े। खैर एप पर देखा तो ट्रेन कुछ आधा घंटा लेटलतीफ़ है।

जब तक ट्रेन अाई तब तक एक चाय की प्याली हो गई। ट्रेन में चड़ा लेकिन बैठने कि जगह कहीं दिख नहीं रही। नजर पड़ी तो एक सीट पर चार लोग बैठे हैं। मतलब कि मेरी कद काठी का एक सज्जन बैठ सकता है।

जैसे ही मैंने बैठने का प्रयास किया वो और चौंडें होकर बैठ गए। आपत्ति करने पर बिगड़ने लगे। कुछ लोगों की उम्र बीत जाती है लेकिन परिपक्वता नहीं आ पाती। खड़े खड़े कुछ स्टेशन का सफर गुजर दिया। उनके उतरते ही उसी स्थान पर बैठने को मिला। दो घंटे में मैं जगदलमादगु पहुंच गया।

लेकिन अजीब बात तब हुई जब जगदलमादगु स्टेशन पर मेरे अलावा इतनी लंबी ट्रेन से और कोई नहीं उतरा। सबसे आखिरी डब्बे से उतरा हूँ मैं।

बैग लेके बाहर के रास्ते आया तो देखा स्टेशन के आस पास कुछ भी ना है। चारों तरफ सिर्फ घोर अंधेरा। ना कोई बस ना ऑटो। ना कोई वेटिंग रूम ना ही डॉरमेट्री।

सिर्फ था तो स्टेशन मास्टर का कार्यालय। स्टेशन मास्टर के द्वार पर जा खड़ा हुआ। तीन बार दरवाज़ा ठोकने पर भी कोई ना निकला। वापस जाने लगा तब एक भाई साहब हिंदी बोलते हुए कारण पूछा।

उनको सारी व्यथा सुनाई जिसके बाद उन्होंने ने बताया कि अब इस वक़्त रात के नौ बजे ना कोई ऑटो मिलेगा ना बस। आस पास कोई होटल भी नहीं है।

होटल भी यहाँ से दस किमी दूरी पर है। छज्जे से बाहर झांका तो घोर अंधेरे के सिवाय कुछ है ही नहीं। तब मास्टर जी ने स्वयं ही सुझाव दिया कि अगर मेरे पास तम्बू हो तो आप यहीं गाड़ कर सो जाइए।

तम्बू भी कहाँ गाड़ा बंद पड़ी डोरमेट्री के सामने। बैग से चटाई, स्लीपिंग बैग और तम्बू निकल कर आज कि रात ला अस्थाई घर बनाने लगा।

लेकिन इस भीषण गर्मी में तम्बू के भीतर दो लोग ना सो सके। गर्मी मेरे बर्दास्त के बाहर है इसलिए मैं तम्बू के बाहर निकल आया और अन्दर अजय को बैग के साथ ही छोड़ दिया।

काफी देर नींद नहीं आने के कारण मैं स्टेशन पर ऐसे टेहल रहा हूँ जैसे खाना खाने के बाद लोग गली नुक्कड़ पर नजर आते हैं।

मारकपुर से तदीपात्री से बेलम से तदीपात्री से जगदलमडगु तक कुल यात्रा 480किमी

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