बस अड्डे में किया कब्ज़ा

रेकोंग पियो | भारत | हिमाचल प्रदेश

जल्दी उठने से तौबा

आंख खुली मगर उठने का मन नहीं हो रहा है। साथी घुमक्कड़ ने भी उठाने की कोशिश की पर मैंने उठने से इंकार कर दिया। कल रात में जो तय हुआ वो पूरा ना हो सका।

सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय(सनराइज) देखना। आखिरकार छह बजे आंख खुली। देखा तो टेंट में बैग और मेरे अलावा कोई भी नहीं है।

सूर्योदय तो हो चुका है। शरीर में जकड़न और थकान दोनों है। टेंट के बाहर निकला तो देखा वो उपद्रवी लड़के अभी भी टेंट के अंदर सो रहे हैं। जिनकी कल रात पूरी घाटी में आग लगाने की योजना थी।

आज शाम तक हर हालात में रेकोंग पियो पहुंचना है। टीले पर नजर पड़ी तो देखा वहाँ साथी घुमक्कड़ वहाँ ऊपर वीडियो बना रहा है। पांच बजे उठ कर कुछ फोटो और वीडियो बनाने निकल गया था।

अभी घाटी में लगभग काफी लोग टेंट के अंदर ही सो रहे हैं। शायद कुछ का रुकने का विचार हो पर मेरा नहीं।

साथी घुमक्कड़ के नीचे आते ही सारा सामान समेटने लगा। मूह धोने के लिए भी पानी नहीं है। तम्बू में से सारा समान निकाल कर बाहर रखा। तम्बू को छोड़ कर सब बैग में लपेट कर रख दिया है।

तम्बू को उतारा और फोल्ड करके उसे भी बैग में रख दिया। जहाँ रात में भीषण ठंड पड़ रही थी। वहीं अब चुभन वाली गर्मी से पसीना निकलने लगा है।

मजबूरन वो ऊनी जैकेट उठा कर बैग में रख दिया। फिलहाल इसका कोई काम नहीं। फ़ालतू का एक लादना हो जाएगा। अबतक इतना करते करते सात बज चुके हैं। जो जैकेट भोर में जरूरतमंद थी अब वही बोझ लग रही है।

प्यासा मन

सुबह के सात बज रहे हैं और मैं अब इस जगह से अलविदा लेे रहा हूँ। उन उपद्रवी दल में से एक लड़के की शक्ल जाते जाते दिख है गई। जैसे जैसे सूरज ऊपर चढ़ रहा है वैसे वैसे तपन बढ़ती ही जा रही है।

सिरोलसर नदी के पास का मंदिर

कल की थकान बुखार हावी हो इससे पहले फटाफट जालोरी जठ पहुंच जाना है। प्यास से बुरा हाल है। ये आलम है कि मैंने कल दिन से पानी की एक बूंद भी गले के नीचे नहीं उतारी है।

पानी की खोज में भारी भरकम बैग लेके सिरोल्सार झील आ पहुंचा। झील पर इतनी सुबह काफी स्थानीय लोग मौजूद हैं। पानी की खोज शायद यहीं आकर खत्म होगी।

मैं इस झील का पानी पीने से थोड़ा कतरा जरूर रहा हूँ। मेरा कतराना भी लाजमी है। शहर का निवासी होने के नाते पता नहीं ये पानी कितना सूट करे मुझे।

हालांकि कल यही पानी साथी घुमक्कड़ को तो पिला दिया था पर खुद पीने का जोखिम नहीं उठाया था। पास खड़े स्थानीय लोगों ने आश्वासन दिया।

“भाईसाब कुछ नी होना पी जाओ ये पानी, देवी मां की कृपा है। प्रसाद समझ कर हम रोज़ इसी पानी का उपयोग करते हैं।”

झील का पानी स्थानीय लोगों की मान्यता के अनुसार तो साफ है लेकिन जब बोतल भरी तो उसमे अशुद्धता साफ दिख रही है। मजबूरी भी है और शरीर की जरूरत को देखते हुए बोतल में रुमाल लगा कर थोड़ा पानी पिया।

प्यास बुझाने के लिए बोतल में साफ रुमाल लगा पानी छान कर गटक गया। हुआ तो कुछ भी नहीं आगे भी यही उम्मीद है कुछ ना होने की।

ये पानी रास्ते में कुछ तो काम ही आएगा। मैंने साफ पानी की उपलब्धता के चलते पिछले एक दिन से पानी की एक बूंद नहीं गले के नीचे नहीं उतारी।

घने जंगल

बोतल भरी और निकल पड़ा। तबीयत थोड़ी नासाज जरूर है लेकिन कहीं भी रुकना मंहगा पड़ सकता है। हर हालत में नौ बजे वाली बस तो पकड़नी ही है।

बस की समय सारिणी कल ही पता चल गई थी जालोरी जठ के बस स्टॉप पर। जब चाय की दुकान पर चुस्की लेे रहा था। तब चाय वाले अंकल ने अवगत कराया था।

जालोरी के रस्ते जंगल

ये काफी सहायक है। और इसी समय को मद्देनजर रखते हुए मैं झील से अलविदा लेे लिया। पीछे मुड़ कर देखा तो वाकई ये ३६०° वाली झील शायद कहीं और देखने को मिले!

उचे नीचे टीले से गुजर उस जगह पर आ पहुंचा जहाँ कल दुकानें जीवंत थी। टेंट की सुविधा भी दे रहे थे। पर अभी सुबह सब बंद पड़ा है।

डेढ़ घंटे में जालोरी जठ पहुंचना कठिन है पर ये भारी भरकम बैग ना हो तो शायद ये सफर और सरल बन जाए। तेज़ तर्रार धूप भी शरीर का कचुमड़ निकालने को तैयार है।

सूनसान जंगलों में अभी कोई हलचल नहीं है। ना कोई जालोरी से आता हुआ दिख रहा है ना सिरोलार से जालोरी की तरफ कोई जाता हुआ। इन जंगलों में सिर्फ मैं ही हूँ अकेला फिलहाल।

पसीने से तर बतर हो रहा हूँ। हालत बहुत खराब है। जबकि अभी आधे रास्ते भी नहीं पहुंचा ही तब ये हाल है। इतना सन्नाटे भरा जंगल में मैं कभी नहीं आया।

माना और भी घने और बदनाम जंगल हैं इस दुनिया में जहाँ में जना चाहूँगा। पर ये भी है खतरनाक जंगल कम नहीं। कोई अगर यहाँ रास्ता भटक जाए या को जाए खो जाए तो उसका मिलना मुश्किल ही होगा।

रास्ते के नीचे की तरफ के जंगल में जाने की बहुत इच्छा हो रही है। कुछ ही पल के लिए ही सही पर ये भारी भरकम और समय बाध्यता नहीं जाने देगा।

पतझड़ के इस रास्ते को देख लग रहा है मानो पुरानी किसी खोई हुई दुनिया में आ गया हूँ। ना शहर का शोर शराबा, ना गंदगी ना धूल धक्कड़। पर ऐसा नहीं है लोगों ने यहाँ कूड़ा नहीं फैलाया।

यहाँ भी लोग पानी की बोतलें फेकने से बाज नहीं आए। रास्ते के नीचे जंगलों में कई बोतलें देखने को मिली जो काफी दुखदाई है। ऐसा जिम्मेदार नागरिक होने के नाते मैं तो कभी ना करूं और ना आप करें।

साढ़े आठ बज रहे हैं आधे घंटे में आधा सफर तय करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है मुझे। रफ्तार में थोड़ी गति प्रदान की। और तेज़ क़दमों से जालोरी बस अड्डे की तरफ बढ़ने लगा।

कल रास्तेभर जो मजदूर मजदूरी करते नजर आ रहे थे आज वो भी नदारद हैं। पसीना से शरीर तर बतार है। थकान और बुखार का जबरदस्त कॉम्बो लेे कर जो घूम रहा हूँ वो भी मैकलोडगंज से।

अब लगभग जब आधे किमी का सफर रह गया है तब इशारों इशारों में साथी घुमक्कड़ से इस बात की रेस लग गई की अड्डे पर पहले कौन पहुंचेगा।

बैग, बुखार और थकान को लेे कर तेज़ तेज कदमों से चलने लगा। यहाँ तक पहुंच आया जहाँ पर व्यावसायिक तम्बू लगे हुए हैं। हालांकि मुझे ये समझ नहीं आ रहा सफर के इस शुरआती दौर में टेंट का व्यापार क्यों?

अगर तम्बू की सुविधा देनी ही है तो कहीं सीरोलसर झील के पास लगाओ जा कर भाई। इतने में साथी घुमक्कड़ दौड़ता हुआ मुझसे आगे निकल गया और अब तक तो बस अड्डे पहुंच भी गया होगा।

बस अड्डे पर इंतज़ार

चलो अच्छा ही है पहले पहुंच कर बस रुकवा लेगा। मुझे लगा अभी शायद बस नहीं आई होगी लेकिन यहाँ मैं गलत साबित हुआ। बैग लेे के जब मैं बस अड्डे पहुंचा तो अंकल से मालूम पड़ा बस तो साढ़े आठ पर ही निकल गई और अभी समय नौ बीस हो रहा है।

जालोरी के रस्ते से दीखते पहाड़

हिमाचल प्रदेश परिवहन अपने समय से ना ऊपर चलती है ना नीचे और ये एक बार फिर साबित हो गया। मुझे लगा अब तो पूरा दिन बर्बाद, लेकिन अंकल जी ने बताया डेढ़ घंटे में एक और बस आयेगी आप उसमे सवार हो कर जा सकते हैं। ये तसल्ली देने वाली खबर है।

वापसी में उतना समय नहीं लगा जितना जालोरी से सिरोलसर जाने में लगा था। कभी धीरे तो कभी तेज़ तो कभी दौड़ना भी पड़ा।

चाय पर चर्चा के बाद बैग इन्हीं की दुकान में रख कर आस टहलने लगा और बस का इंतजार करने लगा। मेरी नज़रें उस रोड पर टिकीं है जहाँ से बस आनी है। एक टक टकटकी बांधे देख रहा हूँ कि कब बस आए और मैं नए सफर पर निकलूं।

बस अड्डे के पास की अब तक सभी दुकानें खुल चुकी हैं। अधिकतर दुकानदार रात में इसी दुकान में सोते हैं तो सुबह जल्दी उठ कर दुकान खोलने में इन्हे भी सहूलियत हो जाती है।

अब जब बस देर से जानी है तो सुबह का नाश्ता कर के दिनभर की यात्रा करने के लिए खुद को तैयार करना भी ठीक रहेगा। सबसे पहले तो दो कप चाय मंगाई गई।

चाय वाले अंकल ने तो ग्यारह बजे का समय बताया है। अभी अड्डे पर एक बस अाई। मुझे लगा यही बस है जो रामपुर बुशहर जाएगी। बेंच पर रखे बैग लेने के लिए लपका तो तुरंत अंकल जी ने टोकते हुए कहा “ये वो बस नहीं है जिसमें आपको जाना है। मैं इशारा कर दूंगा जब आयेगी।”

उनकी कहीं हुई बात से तसल्ली मिली। बैग वापस वहीं रख दिया। निकल गया इधर उधर नज़ारा देखने। रोड के इस तरफ सामने पड़ी कुर्सी पर बैठ कर बस का इंतजार करने लगा।

आज मौसम गर्म है कल के मुकाबले। जहाँ कल कड़ाके की ठंड पड़ी थी आज तेज़ धूप से हाल बेहाल है। अचानक एक बस गुजरी। फिर एक और बस। पर दोनों में से किसी बस के लिए अंकल जी का कोई रेस्पॉन्स नहीं मिला।

मतलब साफ है इन दोनों बसों में नहीं जाना था। शायद अब को बस आए वही पकड़नी हो। इतनी सुबह अभी टूरिस्ट भी नहीं आ रहे हैं। कल दिन में तो फिर भी कुछ भीड़ थी पर अभी नहीं। शायद सुबह का वक़्त जो इसलिए भी।

कुछ एक इक्का दुक्का स्थानीय निवासियों के सिवाय ज्यादा कोई नहीं दिख रहा। ग्यारह बजने से कुछ मिनट पहले तीसरी बस आई।

जब तीसरी बस अाई तो मुझे लगा अब तक कोई बस रामपुर बुशहर के लिए नहीं जा रही तो ये क्या जाएगी! तभी सामने दुकान से चिल्लाते हुए अंकल बोले यही है बस चढ़ जाओ।

बसें समय पर आती हैं वो तो ठीक है, लेकिन ज्यादा देर खड़ी भी नहीं रहती। इधर मैं कुर्सी छोड़ भागा बस की तरफ और ये बस चल पड़ी।

तभी किसी ने आवाज़ लगाकर बस रुकवाई। सामने दुकान की बेंच पर पड़े बैग को उठा कर भागा बस की तरफ। लपक कर ना चढ़ गया। बैठने को जगह भी आराम से मिल गई।

जालोरी बस अड्डे के सामने चाय की दूकान।

नया दिन नया सफर

और कुछ इस अंदाज़ में जालोरी से अलविदा लिया। शायद अगली दफा आऊं तो क्या पता कुदरत की ये अनोखी झील देखने को मिले या नहीं?

कल जब कुल्लू से जालोरी की तरफ आ रहा था तब बस पहाड़ी चढ़ रहे थी। आज जालोरी से रामपुर बुशहर जाते हुए बस पहाड़ी से उतर रही है।

इधर बस का पिकअप एंड ड्रॉप का सफर जारी है। सवारियों का आना जाना बरकरार है। एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी। गर्मी से हाल पंचर है।

मेरे बगल में बैठा एकदम नियायती लीचड़ आदमी अपनी हरकतों से थोड़ा बहुत तंग माहौल बना रहा है। कभी उसके कान में खुजली होती कभी उसे खिड़की से बाहर मसाला थूकना होता है।

ये मसाला चबाने वाले अलग ही श्रेणी में आते हैं। पहले तो ये रुके हुए अड्डे पर चुन कर वो जगह ढूंढेंगे जहाँ से मसाला मिलेगा। फिर भर कर पैकेट साथ में लेके आयेंगे। ऐसा लगेगा मानो पूरी बस ने प्रसाद वितरण करना हो।

फिर पूरे रास्ते अगल बगल बैठी सवारियों के ऊपर चढ़ कर खिड़की से बाहर थूकना जारी रहेगा। कर भी क्या सकते हैं ऐसे प्राणियों का सिवाय झेलने के। मैं भी अभी इसी दौर से गुजर रहा हूँ फिलहाल।

कुछ घंटों में हम काफी दूर आ चुके हैं। कंडक्टर बाबू ने बताया कि थोड़ी ही देर में अन्नी पहुंच जाएंगे। ब्रो ब्रिज पार करने के कुछ दूर पर बस अड्डा आयेगा।

बस हुई धराशाई

सब कुछ अच्छा चल ही रहा है। बस भी अगले बस अड्डे पर पहुंचने वाली है। की अचानक पुल पार करते ही बस का एक टायर दग गया। ये ज़ोर की आवाज़ अाई की कुछ समझ ना आया आखिर हुआ क्या?

कंडक्टर ने बताया बस का एक टायर पंचर हो गया। जैसे तैसे रेंगते हुए बस को अड्डे तक पहुंचाया। अन्नी बस अड्डे पर सभी सवारियों को कुछ समय दिया गया।

तब तक ड्राइवर साहब जुट गए ट्रक का पिछला टायर बदलने में। बस अड्डे पर काफी तपिश है। बस से उतरने को भी जी नहीं चाह रहा।

कुछ देर तक तो इसी कड़ी धूप की वजह से मैं बस से नीचे उतरा ही नहीं। जैसे ही उतरकर पानी की बोतल लेने जाने लगा। उतनी देर में बस का टायर बदल गया।

कंडक्टर ने आवाज़ लगा कर सबको अन्दर बैठने को बोला। इधर हाँथ में बोतल लेके भागा मैं बस की तरफ। ड्राइवर साहब ने गाड़ी स्टार्ट की और बस निकल पड़ी रामपुर बुशर की ओर।

इधर मेरे बगल में बैठे वो पान मसाले की दुकान अब धुएं की फैक्ट्री खोलने जा रहे हैं। ना जांचा ना परखा बगल में रखी बोतल उठाई और करने लगे कुल्ला।

अरे मियां अगर पूछ लेते तो क्या चला जाता तुम्हरा। खैर पानी तो पी गए। ना अब मसाला है ना बीड़ी तो सोचा क्यों ना बातो से इस लड़के का बातों से सिर खाया जाए। शुरू हो गए बड़ बड़ करना।

मैं सोच रहा हूँ कब इस आदमी से छुटकारा मिलेगा। जेब से इयरफोन लगा गाने सुनने लगा। फिर भी इस आदमी की आवाज़ गानों से तेज़ ही आ रही है कान में।

पहाड़ियों का नज़ारा

उफ़ ये गर्मी

तेज़ धूप से हाल बुरा है सो इस आदमी से भी। मजबूरन मुझे उठ कर दूसरी जगह बैठना पडा।

शुक्र है अगल बस अड्डे पर ये मसाला मेन उतर गया। अब सुकून से सफर कटेगा। स्टॉप दार स्टॉप बस खाली ही हो रही है। रामपुर बुशायर से कुछ दूरी पर बस को फिर एक झटका लगा और जहाँ की तहाँ खड़ी हो गई।

ड्राइवर साहब ने उतर कर देखा तो इंजन के किसी पुर्जे में कमी आ गई है। सुकून की बात ये है कि यहाँ सन्नाटे में नहीं रूकी है बस। आसपास कुछ दुकानें तो हैं ही।

अब नाम मात्र की सवारियां है बस में। जहाँ मर्ज़ी वहाँ बैठो। पास में एक जनरल स्टोर है। कुछ ना कुछ तो खाने पीने का आइटम मिल ही जाएगा।

ड्राइवर साहब की यहाँ अच्छी जान पहचान है। फटाफट कुछ जुगाड कर लिया और ठीक करने में जुट गए बस। कंडक्टर बाबू मुझसे पूछने लगे कहाँ तक जाओगे। जब उनको बताया रामपुर बुशेर से रेकोंग पियो तक तो पता नहीं क्यों बड़ी चैन की सांस ली।

मरम्मत का समय पूछने पर ज्यादा समय ना लेने का हवाला दिया ड्राइवर साहब ने। मैं आहिस्ते बस से उतरकर पहुंचा जनरल स्टोर की दुकान में।

यहाँ ऐसा तो कुछ भी ठोस नहीं दिख रहा खाने को पर बिस्कुट नमकीन जरूर हैं। वो जो पंजाबी तड़का है उसे खा कर है आत्मा तृप्त हो जाती है।

मैंने तीन चार पैकेट भर लिए बैग में। इतने में ड्राइवर साहब बुलाने लगे। चलो भाई अब निकालने का समय हो रहा है। मरम्मत हो चुकी है बस की, अब निकालने को तैयार है।

इधर कुछ सफर तय किया है और कुछ दूर चल कर मुझे स्कूली बच्चे नजर आए। कुछ स्कूल बस में कुछ पैदल तो कुछ आम साधन से। परन्तु जो एक बात है गौर करने लायक वो ये यहाँ पड़ रही भीषण गर्मी।

आज जिस हिसाब की गर्मी पड़ रही है वो भी गर्मी के मौसम में कभी इन्हीं महीनों में सर्द हवाएं चला करती थीं। जिसका आनंद लेने आते थे लोग। अब किस बात के लिए आयेंगे।

बस बदलने के लिए भगदड़

इतने में झटके और हिचकोले खाते खाते मैं रामपुर बुशायर के बस अड्डे के करीब पहुंच गया। ड्राइवर साहब को याद है कि मुझे रैकोंग पियो निकलना है। सो उन्हें बस की समय सारिणी भी पता है।

रस्ते पहाड़ और नदियां

बस अड्डे के अन्दर पहुंचता की बाहर की ओर आ रही बस को देख ड्राइवर साहब चिल्ला पड़े “अरे यही बस जाएगी रेक्कोंग पियो, तुम लोग इसी में बैठ जाओ”

मैं कुछ खा ही रहा था कि सब कुछ छोड़ कर सामान समेटा और बैग लेे कर भगा बस की तरफ। वो तो शुक्रगुजार है चालक का बुद्धि कुशलता का की उन्हें ध्यान था। और सजगता के चलते बस रुकवा दिए।

वरना पता नहीं कितनी देर इतंजार करना पड़ता बस अड्डे पर। दौड़ते भागते आज की दूसरी बस पकड़ी। लगभग भारी हुई है ये बस। फिर भी बैठने को जगह मिल गई।

पिछली बस जिस रास्ते से आई है कुछ देर उसी रास्ते पर चलती रही ये बस फिर मोड़ से मुड़कर निकल पड़ी रेकोंग पियो।

ये आधी खाली आधी भरी बस अभी कई जगह रुकेगी ऐसा प्रतीत हो रहा है मुझे।

बस अब शहरी इलाके से निकल कर हाईवे पर आ पहुंची है। मौसम में भी हल्की नमी आ गई है। चालक ने बढ़िया बढ़िया हिमाचली गाने चला दिए।

मैं इन पहाड़ियों पर रहने वाले लोगों से थोड़ा हतप्रभ हूँ। कैसे महीनों महीनों ये ऊपर टिके रहते हैं। या भारी भरकम सामान ढो कर ऊपर तक लेे जाना।

एक जगह कई घर हैं और वो ज्यादा ऊपर नहीं हैं। मगर कुछ घर तो और भी ऊपर हैं और एकदम अकेले। एक मात्र घर इतने सन्नाटे में वो भी सूनसान इलाके में।

कई लोग अपने घर पहाड़ियों में सुविधानुसार अपने खेतों के पास ही बना लेते हैं। बगल में बैठे एक पहाड़ी सज्जन ने पहाड़ी लोगों की जीवनशैली के बारे में काफी बाते बताई।

बस कुछ ही देर में वांगटू पहुंच जाएगी।

बस भी भरने लगी है अब। लेकिन खचाखाच नहीं भरी है अभी भी। वांगटू में कुछ देर के लिए आ रूकी बस। बस में बैठे चुनिंदा यात्रियों को भूख लग आई है।

सफ़र का मज़ा लेते हुए

तकरीबन आधे घंटे की रुकाव के बाद चल पड़ी। बस में इतनी सीटें खाली हैं कि जहाँ चाहो वहाँ बैठो। मैं कभी आगे तो कभी पीछे खाली पड़ी खिड़की वाली सीट पर।

शरीर से हम चांहे कितने भी बड़े क्यों ना हो जाएं पर खिड़की वाली सीट पर बैठने के लिए मन बच्चा हो जाता है। फिर चाहे वो ट्रेन, बस या हवाई जहाज क्यों ना हो।

खिड़की के पास बैठने से अलग ही दर्जे का आनंद प्राप्त होता है। और बाहर का नज़ारा अगर पहाड़ी हो तो चार चांद। उसपे भी अगर कान में आपका पसंदीदा संगीत बज रहा हो तो क्या ही कहने!

स्वर्ग में होने की अनुभूति। मेरे बगल में बैठी आंटी ने कुछ टोंका तो मैंने कान से इयरफोन हटा कर ठीक से सुना। रास्ता गुजरता गया बातें होती गई।

कल्पा की और जाते वक्त दीखते पहाड़

आंटी जी से इतना घुल मिल गया हूँ की उन्होंने होटल में व्यवस्था ना होने पर घर पर आने का आमंत्रण तक दे डाला। अंधेरा हो चला है और हल्की हल्की ठंड भी लग रही है।

इस अंधेरे में बस की रफ्तार से मालूम पड़ रहा है कि किसी एक पहाड़ी पर बस ऊपर की ओर चढ़ रहीं है और गोल गोल मोड़ पर से घूम रही है।

ये सिलसिला काफी देर चलता रहा। और आखिरकार इस अंधेरी रात में बस रेक्लोंग पियो आ पहुंची। आंटी जी बीच रस्ते में ही कहीं उतर गई और जाते जाते अपना फोन नंबर भी से गईं।

रुकने की व्यवस्था

अगर कहीं व्यवस्था ना हो तो उनको जरूर याद कर लूं एक बार। हालांकि की हर बार की तरह मैंने यहाँ भी कोई होटल या हॉस्टल बुक नहीं कराया है।

ना ही कोई काउच्सुरफिंग या एयर बीएनबी से किसी भी बंदे से संपर्क हो पाया है। हालांकि एक लडके ने जरूर कल्पा से संपर्क साधा था पर वो फिलहाल नदारद है।

सुबह नौ बजे शुरू हुआ सफर देर रात आठ बजे ख़त्म होने को आया। अब जब बस सकुशल पहुंची है। अभी पूरी तरह से अंधेरा नहीं हुआ है इसलिए सामने सीना तान खड़ा पहाड़ की सुंदरता तो देखने लायक है।

कमी है सूरज की किरणों की, जिससे ये सोने के जैसा चमकेगा। बस से उतर और सामने पड़ी बेंच पर बैग पटका। आसपास का नज़ारा काफी मंत्रमुग्ध करने वाला है।

सुबह जहाँ भीषण गर्मी पड़ रही थी वहीं अब कड़ाके कि ठंड है। बैग से जैकेट निकाल कर ओढ़ना जरूरतमंद है। जैकेट पहेनेने के बाद काफी आराम है वरना बस से उतरने के बाद तो ऐसा लग रहा था मानो किसी ने फ्रिज का दरवाज़ा खोल दिया हो।

और मुझे जबरन फ्रिज के अंदर बैठाला दिया गया हो। अब बात छिड़ी है रुकने की, व्यवस्था तो होटल में ही हो सकेगी। सिलसिला शुरू हुआ होटल ढूंढने का।

बस अड्डे के सामने एक होटल बना हुआ है जिसके पहली मंजिला पर कुछ लड़के हुड़दंग करते दिखाई दे रहे हैं। किसी और होटल में जाने से पहले क्यों ना यही पूछताछ करी जाए।

बैग उठकर चल पड़ा। होटल के नीचे जमीनी स्तर पर एक समोसे की दुकान मिली। पड़ताल की तो मालूम पड़ा ये होटल इन्हीं के द्वारा संचालित है लेकिन कमरा एक भी खाली नहीं है।

कढ़ाई में तल रहे समोसे को खाने की साथी घुमक्कड़ ने इच्छा जाहिर की। वैसे मैं यात्रा के दौरान तो ना के बराबर ही तैली पदार्थों का सेवन करना पसंद करता हूँ।

दैनिक जीवन में भी यही नियम है। और यात्रा में जितना कम इन चीज़ों का सेवन उतनी कम कठिनाइयां। भूख को देखते हुए मैंने आखिरकार एक समोसा ले ही लिया।

कल्पा जाने की तैयारी

अब जब यहाँ कोई भी कमरा खाली नहीं है तो रुकना बेकार है। इसलिए सड़क मार्ग की तरफ बढ़ने लगा इस उम्मीद से की शायद कल्पा जाने के लिए कोई वाहन मिल जाए और यहाँ रुकने का विचार त्याग दिया।

बिना ये सोचे की इतनी रात में कल्पा में क्या व्यवस्था होगी। पर अभी तो रोड पर खड़े होकर लिफ्ट मांगने की तैयारी है। एक गाड़ी गुजरी फिर दूसरी तीसरी लेकिन कोई भी ना रुका।

बमुश्किल एक लारी वाला रुका लेकिन वो कुछ दूरी तक ही जा रहा है मगर कल्पा नहीं। किसी को लगा सहायता मांग रहा हूँ। तो किसी ने हाल भी पूछना मुनासिफ नहीं समझा।

स्थानीय लोगों ने इकतला किया कि इस घोर अंधेरे में तो कोई बस नहीं जाएगी और शायद ही कोई वाहन जाए। और ठीक ऐसा ही हुआ कोई भी वाहन ना जा रहा है।

और जो गुजर रहे हैं वो रुके भी नहीं। नौ बजने के बाद तक तो कोई भी गाड़ी सड़क पर नहीं दिख रही है और आस पास की दुकानें भी बंद हो चलीं हैं।

अब ये सहमती बनी की यहीं कहीं होटल ले कर ठहरने का प्रबंध किया जाए जो ज्यादा बेहतर विकल्प है। इसी बीच साथी घुमक्कड़ से तनातनी हो चली जिसके चलते हम यहाँ अलग हो गए और मैं अपने रास्ते और वो अपने रास्ते। रुकने कि व्यवस्था अभी तक कहीं नहीं हो सकी। मैं अपना बाग के कर सड़क किनारे बहुत आगे निकल गया।

कुछ देर में साथी घुमक्कड़ का फोन आया लेकिन मैंने उठाया नहीं। चलते चलते मैं काफी आगे निकल आया हूँ। सन्नाटे और अंधेरे में भय का माहौल बना हुआ है।

स्थिति को भांपते हुए मैं वापस उस जगह की ओर चलने लगा जहाँ साथ छोड़ा था। रास्ते में सभी दुकानें रेस्तरां बंद हैं सिवाय एक को छोड़ कर। भूख मिटाने मैं वहाँ पहुंचा। लगभग सब कछ बंद होने की कगार पर है।

मैं आज का आखिरी कस्टमर हूँ। उनके इस छोटे से कमरे में मैं बैग के साथ जाना सम्भव तो नहीं लग रहा है, इसलिए या तो मुझे या फिर बैग को बाहर रहना पड़ेगा। बैग बाहर ही रख बाकी कस्टमर के बाहर आने का इंतजार करने लगा।

सब जाने खा पी कर उठ रहे हैं और अब सेवकों के खाने का वक़्त है। फिर भी मालिक ने अपने आखिरी कस्टमर के लिए थाली लगवाई और दोबारा चूल्हा जलवा कर गरमागरम रोटियां भी सिकवाई। ये यहाँ की आओ भगत है जो शहरों में अब देखने को नहीं मिलती।

बस अड्डे पर गुज़री रात

रुकने कि व्यवस्था तो कहीं नहीं हुई इसलिए मैंने सोचा क्यों ना बस अड्डे पहुंचा जाए। बस अड्डे पर एक कमरा खाली पड़ा हुआ है जिसमें तीन बेंच पड़ी हैं उनमें से एक में साथी घुमक्कड़ सो रहा है दूसरी में अज्ञात आदमी और तीसरी में बैग रखा हुआ है।

बैग हटा कर अपने सोने की जगह बनाई। स्थितियां हर बार अनुकूल नहीं होती है अनेकों दफा समझौता भी करना पड़ता है। आज की रात ने ये सीखा दिया मुझे समायोजन।

जल्दी से अन्नी से रेकोंग पीओ तक की कुल यात्रा 215km

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