बरसाने वाले राधे

उत्तर प्रदेश | बरसाना | भारत

वानर ने चुराया चश्मा

यौजनानुसार निकल रहा हूँ बरसाना। हालांकि मथुरा और वृंदावन के बाद भरतपुर जाने की योजना थी। पर सोच रहा हूँ बरसाने के इतने निकट होने के बाद भी ना जाऊं तो अपने साथ नाइंसाफी होगी।

घर से साढ़े सात बजे तक हर हाल में निकल गया। गलियों में पैदल अट्टाला तक जहाँ से छटीकरा के लिए वाहन मिल जाएगा। कालीदेह से ज्यादा दूर नहीं आया था बतियाते हुए इस्कॉन से दूर निकल आया हूँ।

इधर खराब पड़े दुपहिया वाहन के पास जो छह महीने से इसी हालत में पड़ा है। इसी कर चर्चा हो रही थी की कंधे पर धक्का लगा और चेहरे से चश्मा ऐसे गायब हुआ जैसे पेशेवर ने चश्मा निकाला हो।

मोटे बंदर ने मेरी आंख से चश्मा निकाल लिया है। ले कर फरार हो गया। जबतक कुछ समझ पाता तब तक खेल हो चुका था। शुक्र इस बात का है की मेरी खाल नहीं उधड़ी। कई लोगो का चेहरा बिगड़ चुका है।

जो सुना था वो मेरे साथ हो रहा है। अब मुझे फ्रूटी देनी पड़ेगी। पड़ोस के घर में चाय पी रहे अंकल जी अपने घर से सेब ले कर उसे देने लगे।

उनके बगल के घर में पहली मंजिल पर बैठे बंदर ने सेब तो ले लिया पर चश्मा नहीं दिया। इधर मैं उसके हाथ से चश्मा फेकने का इंतजार कर रहा हूँ।

पर बंदर बिना फ्रूटी के नहीं देने वाला चश्मा ये तो तय हो चला है। इधर एक महाशय मुस्कराते हुए साइकिल से आए और दावा करने लगे चश्मा दिलाने का। पर इसका मूल्य चुकाना होगा मुझे।

मैने हामी भर दी क्योंकि सुना था की किसी ने कई फ्रूटी देने के बाद उसको बंदर के द्वारा चश्मा प्राप्त नहीं हुआ था। कुछ फ्रूटी के और बाकी अपने शुल्क के तौर पर ये पैसे रख लेंगे।

हामी भरने के बाद इन महाशय ने जेब से फ्रूटी निकाल कर बंदर को ललचाना शुरू किया। उधर घर के मालिक ने घर की छत से हाथ में बंदूक ताने एक गोली दागी। उनके इस कृत्य से बंदर दरकार भाग खड़ा हुआ पूछे की ओर।

बंदर अब नजर नहीं आ रहा और वो पीछे कहीं निकल चुका है। इधर ये फ्रूटी वाले भाईसाहब अभी भी डटे हैं इस उम्मीद में की बंदर आएगा।

पुचकार पुचकार कर बुलाने पर बहुत देर बाद बंदर आ गया। पर और बंदर भी इस लालच में हैं की ये फ्रूटी उनको मिल जाए। इधर बंदर लगातार मेरा चश्मा मूह में दबाए जिम्मेदारी के साथ बैठा है।

ये बिना बोले ही समझौता है तुम मुझे फ्रूटी दो मैं तुम्हे तुम्हारा सामान वापस दूंगा। दो तीन दफा फ्रूटी पहली मंजिला तक उछालने पर और बंदर भी करीब आ गए।

दूसरे वानरों को पत्थर मारकर भगाते हुए पहली वानर की ओर फ्रूटी उछाली गई। फ्रूटी हाथ में आते ही उसने चश्मा छोड़ा और चलता बना। मैं इसे देख कर आश्चर्यचकित हूँ।

कई दफा दो तीन फ्रूटी कर भी चश्मा नहीं मिलता। कुछ इस तरह ये सारा खेल चला। इन भाईसाहब से अपना चश्मा लिया और वदेरके अनुसार पैसा थमाया। आज चश्मा पहन कर गलती कर दी! चश्मे को बैग में डालना पड़ रहा है।

छटीकरा पहुँचते पहुँचते लगा ऑटो से ही निकलना चाहिए वही बेहतर रहेगा। बरसाना यहाँ से काफी दूर भी है। दो ऑटो बदलने के बाद करीब घंटेभर के सफर में आ पहुँचा बरसाना।

राधा रानी के गांव में। यहाँ से सात किमी दूर नंदगांव है। मौका लगा तो वहाँ भी जरूर जाऊंगा। घड़ी में साढ़े दस हो चला है। फिलहाल तो जोर की भूख लगी है। उससे पहले ये पता करना होगा की यहाँ पर मंदिर कितने बजे तक खुले रहते हैं?

डोसा और लस्सी का स्वाद लेते हुए

दुकान के मालिक से पूछने पर ज्ञात हुआ की दिन के दो बजे तक यहाँ पर अधिकांश मंदिर खुले रहते हैं। अभी समय काफी है। नाश्ता किया जा सकता है। इन्हीं महाशय के बगल वाली दुकान में बैठ गया नाश्ता करने।

डोसा और लस्सी का आदेश कर इंतजार करने लगा। सामने लगे बोर्ड पर गीतासार की कुछ पंक्तियां लिखी हैं। जिसने मेरी आंखे ही खोल दी।

“तुम्हारा क्या है जो तुम रोते हो, तुम क्या लाए थे जो तुमने खो दिया, तुमने क्या पैदा किया जो नष्ट हो गया, तुमने जो लिया यहीं से लिया जो दिया यहीं दिया। जो आज तुम्हारा है कल किसी और का था, कल किसी और का होगा। खाली हाथ आए थे खाली हाथ जाओगे। जो इसे अपना समझ कर मग्न हो….

इसे पढ़ने के बाद जैसे अबतक खर्च हुआ पैसा यही लगने लगा फिर कमा लिया जाएगा। डोसा और लस्सी भी इतनी देर में आ गई।

इत्मीनान से खाने के बाद भुगतान किया और निकल पड़ा। सामने कीर्ति मंदिर ही सबसे निकट है सो यहीं चलता हूँ पहले। सड़क पार कर मंदिर के बाहर बने काउंटर पर बोरी मिली। जिसमे जूते भर कर जमा कर फाटक की ओर निकल पड़ा। फाटक के आसपास सुरक्षाकर्मी मौजूद हैं। जांच करा भीतर निकल आया।

कीर्ति मंदिर

कीर्ति मंदिर बिलकुल वृंदावन के प्रेम मंदिर की तर्ज पर बना है। उसी शैली और कला में। भव्य फाटक से ले कर भव्य मंदिर तक। एक किनारे मंदिर बना है बाकी का क्षेत्र खाली पड़ा है।

संगमरमर की फर्श पर धूप पड़ने के कारण ठीक से आंखे भी नही खुल रही हैं। प्रतिबिंब और अपवर्तन की वजह से पूर्णतः आंखे खोल पाना मुश्किल हो रहा है।

अपना धूप का चश्मा याद आ रहा है। कड़ी धूप में कुछ तस्वीर लेने के बाद मंदिर के भीतर आ गया। सामने राधा कृष्ण के दर्शन के बाद दाहिने ओर से बाहर आ गया। जिसके सामने सिर्फ बहुत बड़ा चबूतरा है।

कुछ देर यहीं मंदिर की सीढ़ियों पर बैठने का मन हो रहा है पर यहाँ सुरक्षाकर्मी किसी को ज्यादा देर टिकने नहीं दे रहे हैं। पर फिर भी कुछ पल के लिए बैठ गया।

सुरक्षाकर्मी की तिरछी नजरों ने ज्यादा देर बैठने ना दिया। आखिरकार उठना ही पड़ा मुझे। यहाँ से पास में लगी डिजिटल झांकी जिसमे राधा कृष्ण का जिक्र है।

मंदिर के ठीक सामने एक और झांकी है जिसमे एक में गोपियां नाचती हुई बनी हैं। दूसरे में राधा कृष्ण झूले पर साथ बैठे दिख रहे। हर ओर बस संगमरमर पत्थर है। जिसके प्रतिबिंब से आंखों में चुभन हो रही है।

फर्श भी बहुत गरम है। ज्यादा देर खड़ा नहीं हुआ जा रहा। तस्वीर निकालते हुए निकल पड़ा मंदिर से। काउंटर से जूते बटोर कर राधा रानी मंदिर के लिए निकल पड़ा।

प्यास मुझे खींच लाई पानी के नलके के पास। गूगल नक्शे के मुताबिक राधारानी मंदिर यहाँ से एक किमी दूर ढाई सौ मीटर ऊंची पहाड़ी पर बसा है। लोगों से पूछने पर भी यही उत्तर और दूरी सुनिश्चित हुई। पैदल सड़क से होते हुए गलियों में आ गया। यहाँ बहुत बड़ा बाजार है।

लाडली मंदिर

बाजार से बाईं ओर मुड़ कर सीढियां प्रारंभ होती दिख रही हैं। दस मिनट की चढ़ाई में मंदिर पहुँच गया। चढ़ाई को आसान बनाने के लिए प्रशासन ने सीढियां बना दी हैं। ऊपर भी फूल माला और खाने पीने की वस्तुएं हैं।

तेजी से चढ़ने के कारण धड़कन तेजी से धड़क रही है। छोटे से मंडी के चबूतरे पर बैठ कर सुस्ताने लगा। ज्यादा देर ना हो इसलिए जूते उतार कर राधा रानी मंदिर की ओर आ गया। यहाँ भंडारा चल रहा है जो कुछ ही समय में खतम होने की कगार पर है।

सुबह किए नाश्ते से लग ही नहीं रहा कुछ गया है पेट में। भंडारा खाने की इच्छा को मारकर आगे बढ़ गया। कुछ हो ना हो मिट्टी के बने मोर जरूर बिक रहे हैं जो पर्यटकों को लुभा रहे हैं। मंदिर में जाने से पहले छतरी की छांव के नीचे आ कर बैठ गया।

जाने क्यों आज तबियत कुछ ठीक नहीं लग रही। छतरी तक पहुँचने के बाद पैर ऊपर कर खंबे से सटा कर लेट गया। लेटने से काफी आराम है। शायद ठीक से ना खाने का नतीजा है ये।

यहाँ गाइड के द्वारा तस्वीर लेने की होड़ है। कुछ ही समय बिता है की एक गाइड अपने ग्राहक को ले कर आया। छतरी पर तस्वीर लेने की जिद्द ने मुझे वापस सामान्य मुद्रा में बैठना पड़ रहा है। जिससे उसने अलग अलग मुद्रा में खड़ा करा कर तस्वीर ले रहा है।

लाडली मंदिर

अब जब कुछ तबियत सही हुई है तो बरामदे से होते हुए मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने लगा। यहाँ अब तक भंडारा भी खतम हो चुका है। सब सफाचट।

राधा रानी मंदिर की बहुत मान्यता है। राधारानी महल और बरसाने की लाडली के नाम से भी प्रसिद्ध है ये मंदिर। 1675 में राजा वीर सिंह द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया था।

राधाष्टमी के दिन इस मंदिर को फूलों से सजाया जाता है। छप्पन प्रकार का भोग लगाया जाता है जिसे सर्व प्रथम मोर को खिलाया जाता है।

वृंदावन से बरसाना के लिए ऑटो में बैठे एक व्यक्ति ने मेले का भी जिक्र किया था। जो शुक्ल अष्टमी में होता है। गाना बजाना कर राधा रानी के जन्मदिन को धूमधाम से मनाया जाता है।

प्रवेश द्वार के सामने किनारे लगे नलके में हाथ धो कर मंदिर की चौखट में प्रवेश कर गया। सफेद काली फर्श पर भक्तजन भजन कर रहे हैं। उधर मुख्य कपाट पर भी श्रद्धालुओं की कतार लगी है।

बाहर आंगन है जहाँ लोग जमकर तस्वीरबाजी कर रहे हैं। मैं आंगन और मंदिर के मध्य बनी सीढ़ी पर बैठ राधा रानी की मूरत को निहार रहा हूँ। मन कर रहा है यहीं बैठा रहूँ कहीं ना जाऊं।

संसार मोह है असली आनंद तो भक्ति में है। अचानक उठ रहे इन खयालों का बखान करना मुश्किल हो रहा है। इसे यहीं राधारानी मंदिर पर आ कर आभास किया जा सकता है।

कुछ वक्त मंदिर में बिता ही पाया हूँ की उद्घोषणा हो चली की जो लोग ज्यादा समय में परिसर में बैठे हैं वो अब जा सकते हैं। भजन कीर्तन कर रहे युवाओं को विशेष तौर पर बोला गया जो जगह घेरकर बैठे हुए हैं।

जाने का मन तो नहीं है पड़ जाना पड़ रहा है। मंदिर की बाहर से एक तस्वीर लेना रह गया। बाद में आ कर ले लूंगा। फिलहाल बाहर निकल आया। परिसर में आ कर जूते पहने और निकल पड़ा राधा कुशलबिहारी मंदिर।

राधा कुशलबिहारी मंदिर

पीछे के मार्ग से। पर यहाँ बंदर बैठे हैं जिनसे खतरा है काफी। इनसे पर पाते हुए कच्चे रास्ते पर निकलते हुए कुशलबिहारी मंदिर पहुँच गया।

इस मंदिर में लोग दूर दराज से अपने चार पहिया वाहन में सवार हो कर आए हैं। लाडली मंदिर से यहाँ तक कुछ लोग पैदल नंगे पांव भी आए हैं। दोनो ही रास्ते भिन्न हैं और दोनो जनों की भक्तिभावना भी।

गाड़ियों के निकलने के इंतजार में पैदल यात्रियों को खड़ा रहना पड़ रहा है। फाटक इतना सकरा है की एक बार में एक ही गाड़ी निकल सकती है। गाड़ियों के निकल जाने के बाद ऊंचे विशाल फाटक से मंदिर के परिसर में प्रवेश किया।

बाहर गाड़ियों का हुजूम है। भीतर मुख्य स्थल पर प्रवेश करने कर मालूम पड़ा की मंदिर बंद हो चुका है जो सांयकाल में खुलेगा। अब यहाँ तक आया हूँ तो मंदिर ही निहार लूं। मंदिर के परिसर में ही जूते उतार कर घूमने लगा।

यहाँ वास्तुकला और चितकारी का नमूना दीवारों पर देख पा रहा हूँकुछ लोग भी मंदिर परिसर में हैं। इन्हीं लोगों ने मंदिर के कमरों में कब्जा कर लिया है।

राधा कुशलबिहारी मंदिर

कहा जाता है की यहाँ के राजा के सपने में बांके बिहारी आए थे जिन्होंने इसी स्थल पर मंदिर बनवाने का आदेश दिया था। मुगलों के आक्रमण के बाद यह मंदिर कई दफा टूटा।

मुगल की शैली के खंबे और स्तंभ देखे जा सकते हैं। मंदिर का चक्कर लगा कर बाहर आ गया। जूते पहने और पेड़ की छाया में बैठ गया।

कुछ तस्वीरबाजी के बाद निकल पड़ा मान मंदिर। पर यहाँ स्थानीय लोगों ने सचेत किया मान मंदिर तक जाने के लिए। क्योंकि रास्ते में खूंखार बंदर मिलेंगे जिनसे जान का खतरा अधिक है।

दान बिहारी मंदिर

फिर भी बातों को ध्यान में रखते हुए आगे से छड़ी ले लूंगा। कुशलबिहारी मंदिर के दाहिने रास्ते से निकल पड़ा। कुछ आगे निकला ही था की दान बिहारी मंदिर दिखने लगा।

कहा जाता है की एक गरीब को अपने बेटी की शादी करनी थी पर कर नही सकता था पैसों के अभाव के कारण। तब कहीं श्रीकृष्ण ने अपने इस भक्त की मदद के रूप में राधा जी के वजन के बराबर की संपति इक्कठा कर ली थी।

इस घटना के बाद दान बिहारी मंदिर की स्थापना हुई। दो खंबे के बीच में सूली है जिसमे ये देखा जा सकता है। सामने मंदिर बना है छोटा सा। यहाँ आ कर दर्शन करने लगा।

पास के ही घर में एक परिवार रह रहा है जो शायद इस मंदिर का रखरखाव करता है। मंदिर के पिछवाड़े तक हो कर आ गया। मान मंदिर के लिए हर ओर से मार्ग है। दाहिने तरफ गांव दिख रहा है। सूखे पेड़ की टहनी को तोड़कर छड़ी बना ली जो बंदरों से निपटने के काम आएगी।

पर कौन से मार्ग पर जाना है इस पर संशय है। फिर भी दाहिने हाथ पर उतरते हुए सामने से आते हुए सज्जन से पूछने पर पता चला सही मार्ग पर जा रहा हूँ।

दो साधु पीछे से ही आ रहे हैं अब इनके साथ ही मान मंदिर निकल पड़ा। यहाँ इस पठार से भी मान मंदिर देखा जा सकता है। सूखे खेत भी दिख रहे हैं।

कच्चे पक्के रास्ते से होते हुए मान मंदिर आ पहुँचा। दीवार के खंबे पर जो संदेश सबसे पहले पढ़ने में आ रहा है वो ये की यहाँ बंदरों से बच कर रहना होगा। जो बहुत ज्यादा खूंखार हैं।

दान बिहारी मंदिर

मान मंदिर

मतलब मुझे एक भी वानर नहीं मिला ये मेरी खुशकिस्मती है। भूख अब जोर की लगी है। दिन के दो बजने वाले हैं। मान मंदिर में भोजन की व्यवस्था पूछने पर मालूम पड़ा की पास के रसोईघर में जाना होगा।

जो यहाँ से कुछ दूर है। मान मंदिर के भी भोजन मिलता है या नहीं ये सुनश्चित करने घूमते हुए दूसरे द्वार से परिसर से मंदिर के भीतर आ गया। एक किनारे चप्पल उतारी और व्यवस्था देखने लगा।

मंदिर के कपाट बंद हैं। यहाँ दूर दराज से लोग अपने समान के साथ रुकने आए हुए हैं। खाना पीना, बिस्तर ले कर भारत के अलग अलग राज्य जैसे ओडिसा, बंगाल, बिहार।

मान मंदिर की मान्यता है की जब राधा जी कृष्ण से रूठ जाया करती थीं तब कृष्ण जी उन्हें इसी स्थान पर मनाने आते थे। उनके पैरों में गिर जाते थे।

पर अभी तो यहाँ गिरने रूठने वाला कोई है नहीं। कपाट बंद हैं इसलिए मैं दूसरे बल्कि प्रमुख द्वार बाहर की ओर चल पड़ा। साधु रूपी एक नौजवान से खाने की उस रसोई का पता पूछने पर सूचना मिली की नीचे रसोईघर में ही जाना होगा जहाँ इस समय भोजन मिलेगा।

चल पड़ा सीढ़ी के रास्ते से। यहाँ अधेड़ अमर की महिलाएं वजनी बोरी सिर पर ले कर मंदिर की ओर बढ़ रही है। ये इनकी भक्ति इनसे ये काम करवा रही है। इन्हीं में एक माता जी ने आग्रह करते हुए ऊपर तक बोरी पहुँचाने को कहा।

उनसे बोरी ले कर सिर के ऊपर उठाते हुए एक चौथाई जीना उतरने के बाद मैं फटाफट एक सांस में बोरी ऊपर रख कर तो आ गया पर अब हालत पतली हो रही है। धड़कने तेज। भूख और तेज हो चली है।

मान मंदिर

तेजी से चलते हुए रसोईघर में आ गया। यहाँ खड़े पुलिसवाले से कुछ बातचीत के बाद किनारे लगी खाना खाने के लिए थाली उठाई और बिछी हुई दरी पर विराजमान हो गया।

अब यहाँ सिर्फ गिने चुने चार लोग हैं। कक्ष में सन्नाटा है। भोजन करने वाले कर के जा चुके हैं। पतली दाल, रोटी, चावल का भोजन कर रहा हूँ।

भोजन के बाद थाली भी यहाँ खुद धोनी होगी जो अच्छी बात है। जैसे पुलिसवाले को मीठा हलुआ दिया गया वैसे ही अपने लिए उम्मीद कर रहा हूँ। पर इंतजार करने के बाद भी मुझे ना मिला।

सुनने को मिला की ऐसा कुछ है ही नहीं। भारत में मीठा लिए बिना खाना नही पूरा होता। अपने बर्तन धोने के बाद कक्ष बाहर निकल कर पेड़ की छांव में आ गया खाना पचाने।

अभी धूप तेज है। कहीं जाने से बेहतर है यहीं वक्त गुजार दूं। अधिकांश जगह तो घूम ही आया हूँ सिवाय इस्कॉन मंदिर के जो की हर शहर में होता है।

यहाँ सामने के उद्यान में वानर ही वानर हैं। जो शायद इसी कारण से बंद भी पड़ा है। इनकी लड़ाई देख कर मालूम पड़ रहा है की ये बंदर कितने खूंखार हैं। एक दूसरे को बर्बरता से नोचने और काटने में पीछे नहीं छूटते।

ऐसे ही एक वानर ने दूसरे को उद्यान से होते सड़क तक ऐसा दौड़ता जैसे काट कर ही दम लेगा। इधर दुकान पर कुछ लोगों की जुबानी जंग चल रही है। हिंदी तो बोलते नहीं दिख रहे।

काफी देर सुनने के बाद मालूम पड़ा की चोरी के विषय पर बहस छिड़ी है। जिसमे दो चार लोग और कूद पड़े हैं।

संकरी खोल

बरसाना में लगभग सभी मुख्य मंदिर हो आया हूँ। अब सोच रहा हूँ अगर समय बचा तो नंदगांव भी हो आता हूँ। पंचायत से निकल कर गांव से बाहर निकलने लगा।

गली से बाहर दाहिने मुड़ा तो संकरी खोल आ पहुँचा। संकरी खोल एक काली पहाड़ी है। कहते है कान्हा यहाँ बैठा करते थे इसलिए ये पहाड़ी काली है। जहाँ राधा बैठा करती थी वो पहाड़ी गोरी है।

कान्हा यहाँ गोपियों से दही, माखन चुराया करते थे। यहाँ एक मंदिर भी है जिसमे संकरी खोर का जिक्र है। गांव से बाहर निकल बाजार आ पहुँचा जहाँ से राधा रानी मंदिर की चढ़ाई शुरू करी थी।

चलते चलते बरसाना की मुख्य सड़क पर आ गया। चाय की दुकान पर तय हुआ की समय पर्याप्त है नंदगांव जाने के लिए सो निकल लिया जाए। वरना वापसी करना मुश्किल हो जाएगा।

काली पहाड़ी संकरी खोल

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