बारहों ज्योतिर्लिंग का राजा लिंगराज

उड़ीसा | भारत | भुवनेश्वर

कलकत्ता में भागदौड़

कल रात ग्यारह बजे की ट्रेन पकड़ कर कासीमबाजार से सुबह सियालदाह आ पहुंचा। सियालदाह पहुंचने या भुभनेश्वर पहुंचने की चुनौती नहीं है।

अब जो असल चुनौती है वो है सियालदाह से हावड़ा जाने की। फिर हावड़ा से भुभनेश्वर जाने वाली ट्रेन को पकड़ने की।

भुभनेश्वर पहुंचने के लिए कोलकाता आना ही पड़ता क्यों कि मुर्शिदाबाद से भुभनेश्वर तक के लिए कोई सीधी ट्रेन नहीं है।

सियालदाह थोड़ा देर से पहुंचा। उसकी वजह राही ट्रेन। सियालदाह पर कासिमबाज़ार से आई ट्रेन देरी से पहुंची। जिसका खामियाजा भूभनेश्वर जाने वाली ट्रेन से चुकाना पड़ सकता है।

उधर हावड़ा से भुभनेश्वर जाने के लिए ट्रेन अपने निर्धारित समय पर है। दोनों स्टेशन एक दूसरे से पांच किमी की दूरी पर है।

लेकिन यहाँ करो या मरो की स्थिति हो रही है। पहले सियालदाह उतर कर अमानती घर से बैग लेना फिर हावड़ा जाने के लिए बस पकड़ना।

ट्रेन से उतरने के बाद ये सभी काम करते हुए दूसरी ट्रेन लपकनी है। रात की ट्रेन से आते हुए बैठने के लिए सीट आराम से मिल गई थी।

जिस वजह से झपकी भी अच्छी खासी ले ली थी। इसलिए थोड़ी ऊर्जा शरीर में बनी है। ट्रेन छोड़ कर फौरन भागा अमानती घर की ओर।

परसो रात खोई हुई पर्ची की दूसरी रसीद निकलवाने का आज लाभ मिल रहा है। अन्यथा जो पुलिस स्टेशन के चक्कर परसो रात में लगाए थे वो अभी लगाने पड़ते।

परसो तो घंटा भर का समय लग गया था पर्ची पाने की प्रक्रिया में। नकल पर्ची दिखा कर अमानती घर से दोनो बैग निकलवाए।

बैग ले कर अब सीधा हावड़ा स्टेशन भागना है। सियालदाह स्टेशन से बाहर निकलते ही स्थानीय लोगों से पूछने पर पता चला की बस की सुविधा चालू हो गई है।

बस सुबह छह बजे से रात्रि के नौ बजे तक चालू रहती है। अभी छह बज रहे है इस वजह से बस सुविधा उपलब्ध है।

सत्रह प्लेटफार्म वाला होरह स्टेशन

बस में बैठते ही दिलासा मिली पहुंचने की। कंडक्टर के मुताबिक कुल बीस मिनट में हावड़ा पहुंच जाएगी बस।

पर गली कुंचो से गुजरते हुए जो मछली कारोबारी है उनके अथक प्रयास से ऐसा मुमकिन नहीं लग रहा।

बस के यहाँ फसने से अच्छी खासी देर हो सकती है पहुंचने में। दूसरी तरफ कुछ स्टॉप पर डालिया में ताज़ी मछली लिए पहले एक सज्जन चढ़े।

मछलियों की गंध पूरी बस में फेल चुकी है। ड्राइवर कंडक्टर और रोजमर्रा की सवारियां भले ही इस गंध की आदि हो सकती हैं। मेरे लिए दुर्गंध से कम नहीं।

नहले पर दहला तब हुआ जब एक और जनाब मछली से भरी डालिया ले कर चढ़ गए। अब गंध दो गुना बढ़ गई है। बस में बैठना दूभर हो गया है।

हॉर्न बजाते हुए बस आगे बढ़ रही है। सड़क किनारे लगी टोटियों से पानी भर रहे मुल्लाजी ने दिन की शुरुआत ऐसे की। सवारियों के भी चढ़ने उतरने का सिलसिला जारी है।

हावड़ा जाने वाली ये दिन की पहली बस है। हावड़ा ब्रिज पार करते बस आ धमकी है हावड़ा। सुबह सवेरे इतनी भीड़ की उम्मीद नहीं थी।

जिस गति से बस यहाँ तक का सफर तय करते हुए आई है उससे समय पर पहुंचने की उम्मीद कम ही थी। जिसे पूरा करे हुए समय के भीतर मैं आ पहुंचा।

चूंकि सियालदाह से हावड़ा मात्र बीस मिनट की दूरी पर है परन्तु जो सुबह सुबह मच्छी का कारोबार होता है उसमे जाम में फंस कर देर हो सकती है। होने वाला कुछ ऐसा ही था लेकिन बच गया की कहीं भी जाम देखने को नहीं मिला।

सियालदह स्टेशन से हावड़ा स्टेशन जाते समय हावड़ा ब्रिज पर भीड़

सुबह के सातबज रहे हैं। बैग ले कर बस अड्डे से निकलते हुए हावड़ा स्टेशन की ओर बढ़ा। जांच के बाद अंदर दाखिल हुआ।

सूचना बोर्ड पर देखने पर पाया की ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर सत्रह पर खड़ी है। मैं यह सुन कर ही अपना सर खुजाने लगा। प्लेटफार्म संख्या सत्रह!

शायद मैं ही गलत स्टेशन पर आ खड़ा हूँ। पर ऐसा नहीं है। भारत में हावड़ा स्टेशन पर ही सबसे ज्यादा प्लेटफॉर्म है जिसमें सत्रह प्लेटफॉर्म हैं।

दूर देखने पर दो प्लेटफार्म का निर्माण और होता नजर आ रहा है। स्टेशन पर तैनात पुलिसकर्मी की सहायता से पता चला प्लेटफार्म किस ओर है।

बैग के साथ भागते भागते परेशान हूँ। ऐसा लग रहा है मानो कोई रेस में हिस्सा ले रहा हूँ। प्लेटफार्म खतम होने का नाम ही नहीं ले रहे।

मुझे एक नंबर से सत्रह नंबर तक जाने में कुल पांच मिनट लगे। अच्छी दौड़ हो गई सुबह सुबह।

ट्रेन को प्लेटफार्म पर खड़ा पाया तो राहत मिली। अपने डिब्बे की तरफ बढ़ते हुए आरक्षित जगह पर पहुंच गया।

भुभनेश्वर तक पहुंचते हुए सोने की योजना बना रहा हूँ। कुछ ही क्षणों में ट्रेन चल पड़ी। सुबह से अबतक की गई जद्दोजहद पर सफलता हांथ लगी।

नौ बजे तक खड़कपुर पहुंचा तो यहाँ फुरसत में सुबह की चाय की चुस्की ली।

खड़कपुर रेलवे स्टेशन ना सिर्फ भारत का बल्कि दुनिया का सबसे लंबा प्लेटफॉर्म है। प्लेटफॉर्म नंबर एक और दो पर एक साथ दो छब्बीस बोगी वाली ट्रेने खड़ी हो सकती हैं।

भुभनेश्वर रवानगी

ट्रेन के निकलते ही मोबाइल में अलारमगा कर सो गया। दोपहर के दो बजे तक भुभनेश्वर पहुंच गया।

ट्रेन रुकी और शायद पूरे डब्बे से मेरे सिवाय कोई नहीं उतरा। सामने बैठे अंकल मुझे ऐसे देख रहे थे जैसे सबसे पहले चढ़ कर सबसे पहले उतर कर पाप का भागीदार बन रहा हूँ।

तपती धूप में ट्रेन से बाहर बैग ले कर ऐसे खड़ा हूँ जैसे पता ही नहीं है की आगे क्या करना है। यहाँ की उमस और गर्मी दोनों ही बर्दाश्त के बाहर हैं।

वाकई में नहीं पता है की क्या करूं अब। भुभनेश्वर आ तो गया हूँ पर यात्रा समुदाय से भी विशेष प्रतिक्रिया नहीं मिली है।

क्या जुगाड निकाला जाए? साथी घुमक्कड़ अपने किसी परिचित से बात करते हुए व्यवस्था का इंतजाम करने में लगा है।

जो भी बातचीत में हुआ उसमे ये पता चला की अनिल भाई जिनसे साथी घुमक्कड़ की सिक्किम में मुलाकात हुई थी। उनके एक मित्र यहाँ पर रहते हैं।

अनिल ने प्रशांत का मोबाइल नंबर भेजा। जो फिलहाल दफ्तर में हैं।

भुभनेश्वर निवासी प्रशांत जी से बात हुई तो उन्होंने लिंगराज मंदिर और संग्रहालय घूमने का सुझाव दिया।

शाम तक का समय मांगा है। शाम तक जब उन्हें फुरसत मिलेगी तो वह मुलाकात करने स्टेशन आयंगे।

तब तक के लिए आसपास की जगह घूमने निकल जाना बेहतर रहेगा। एक लिहाज से उनके लिए भी अच्छा है और मेरे लिए भी।

समय व्यर्थ ना करते हुए भोजन की तलाश में स्टेशन परिसर में बने भोजनालय में भोजन करने के लिए आ गया।

पर यहाँ निराशा ही हाथ लगी। उच्चतम दर्जे का भोजन यहाँ तो ना मिल सकेगा।

देर ना करते हुए अमानती घर की तलाश करने लगा। तभी टीटी ने पकड़ लिया और टिकट दिखाने की मांग करने लगे।

उनकी ख्वाइश भी पूरी करते हुए मोबाइल में दर्ज टिकट दिखाया। लगे हाथ इन्ही से पूछ बैठा अमानती घर के बारे में। इनसे बेहतर स्टेशन को कौन जानता होगा।

मालूम पड़ा स्टेशन के बाहर जांच केंद्र के पास अमानती घर है। दाईं ओर अंधेरी गली में अमानती घर में खड़ा हो गया बैग जमा कराने।

बैग से जरूरी सामान निकाल कर छोटे बैग में डाल लिया। पर्ची कटवा कर निकल पड़ा लिंगराज मंदिर।

भुवनेश्वर स्टेशन के प्लेटफार्म संख्या एक पर

लिंगराज मंदिर स्टेशन के उस तरफ है। उस तरफ जाने के लिए वापस से स्टेशन में दाखिल होना ही पड़ेगा। दिक्कत वाली कोई बात नही है।

जब टिकट साथ में है। जो चार घंटे तक मान्य रहता है। वापस घुसते हुए पैदल पुल पर चल कर इस तरफ आ गया।

यहाँ से बाहर निकलने पर कुछ अच्छे होटल दिखाई पड़ रहे हैं। पर अत्यधिक गर्मी के कारण यहाँ भोजन ना करना ही बेहतर लगा।

स्टेशन परिसर के पास भोजनालय चलते तो खूब हैं पर सफाई के नाम पर धब्बा होते हैं। मुख्य सड़क पर आने के बाद लिंगराज मंदिर की तरफ जाते हुए बाईं ओर एक रेस्त्रां में आ गया।

यहाँ भोजन करना उचित रहेगा। सादा खाना पर भीषण गर्मी के बीच भोजन करना भी दूभर हो गया है।

खुद रेस्त्रां के मालिक पंखा ले कर डुलाने आ गए ताकि ग्राहक चैन से खाना खा सकें।

भोजन ज्यादा खास नहीं है लेकिन शरीर में ऊर्जा आ गई है। भुगतान कर के निकल पड़ा अपनी मंजिल की ओर।

तेज धूप और उमस में कुछ दूर तक पैदल ही चला। लिंगराज मंदिर तक पैदल चलने का कोई विचार नहीं है। बस टेंपो नही मिल रहा था जो अब अशोक नगर चौराहे से मिल गया है।

ज्योतिर्लिंग का राजा लिंगराज

टेंपो में बैठे बैठे रास्ते में संग्रहालय भी देखा। वापसी में संग्रहालय भी आ जाऊंगा। कुछ क्षणों में लिंगराज मंदिर आ पहुंचा।

लिंगराज मंदिर भुवनेश्वर का मुख्य मन्दिर है। ये इस शहर के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है।

यह भगवान त्रिभुवनेश्वर को समर्पित है। इसके कुछ हिस्से 1400 साल से भी ज्यादा पुराने हैं। इस मंदिर का वर्णन छठी शताब्दी के लेखों में भी आता है।

धार्मिक कथा है कि ‘लिट्टी’ तथा ‘वसा’ नाम के दो राक्षसों का वध देवी पार्वती ने यहीं पर किया था। संग्राम के बाद उन्हें प्यास लगी, तो शिवजी ने कूप बनाकर सभी पवित्र नदियों को योगदान के लिए बुलाया।

यहीं पर बिन्दुसागर सरोवर है तथा उसके निकट ही लिंगराज का विशालकाय मन्दिर है। कहते हैं कि मध्ययुग में यहाँ सात हजार से अधिक मन्दिर और पूजास्थल हुआ करते थे।

जिनमें से अब लगभग पाँच सौ ही शेष बचे हैं। टेंपो स्टैंड पर उतर कर पैदल ही मंदिर की ओर चल पड़ा।

मंदिर में भक्तो से ज्यादा सुरक्षाकर्मी मौजूद हैं। मंदिर में प्रवेश करने लगा तो पता चला की में मोबाइल फोन तक ले जाना प्रतिबंधित है।

इधर उधर कहीं जमा करने से बेहतर है बारी बारी से दर्शन करने मंदिर में दाखिल हों।

मैं खुद यहाँ रुक गया और पहले साथी घुमक्कड़ को अंदर भेज दिया। बाहर वातावरण स्वच्छ तो है पर सफाई कम ही नजर आ रही है।

साथी घुमक्कड़ के बाहर आने की प्रतीक्षा करते करते मैं थक गया हूँ। जाने क्या कर रहा है अंदर। सो तो नही गया।

कभी स्कूटी पर बैठता तो कभी जूते ले कर एक किनारे खड़ा रहता। थक कर दूर पेड़ के नीचे आ कर खड़ा हो गया।

यहाँ से द्वार पर निगाहें टिका कर खड़ा हूँ। जब साथी घुमक्कड़ निकले तो उसे मुझे ढूढना ना पड़े।

करीब आधे घंटे के लंबे इंतजार के बाद साथी घुमक्कड़ निकास द्वार सेबहार निकला।

उसने अच्छा समय बिताया और मुझे तय समय से अतिरिक्त बाहर बैठना पड़ा।

देरी का कारण पूछे जाने पर उत्तर मिला कि मंदिर परिसर में इतना अच्छा लग रहा था कि थोड़ा और बैठने को जी चाह रहा था।

 लिंगराज  मंदिर परिसर

खैर मंदिर है ही इतना प्राचीन। किसी का भी अंदर रुकने का मन करेगा।

मोबाइल, घड़ी, जूते सब साथी घुमक्कड़ को थमा कर भक्तिभाव से मंदिर में दाखिल होने से पहले सुरक्षाकर्मी तरीके से जांच कर रहा है।

अंदर आते ही मंदिर से एक रास्ता दाईं तरफ को जाता है और दूसरा बाईं। बाकियों की तरह मैं भी बाईं ओर निकल आया।

परिसर में एक मुख्य मंदिर है जो आसपास छोटे छोटे मंदिरों से घिरा हुआ है।

किसी मंदिर में गणेश जी विराजे हैं, किसी में पार्वती, विष्णु, कामदेव, मां दुर्गा, मां लक्ष्मी, मां सरस्वती और भी अन्य। हर छोटे मंदिर में एक पुजारी अवश्य बैठे दिख रहे हैं।

पहले सारे छोटे मंदिरों में दर्शन करने के बाद मुख्य मंदिर में आया। जो खुद काफी विशाल है।

भीड़ कम है इस वजह से दूर दूर तक साफ साफ दिखाई पड़ रहा है। मंदिर के गर्भ गृह में शिव जी की एक विशाल शिवलिंग स्थापित है। जिसकी सफाई पुजारी स्वयं कर रहे हैं।

मैं हांथ जोड़े आगे बढ़ रहा हूँ। रेलिंग के पास आ कर खड़ा हो गया जहाँ अनेकों पंडित पहले से खड़े हुए हैं।

जानकारी के लिहाज से पास में खड़े पंडित जी से पूछने पर बोले की यह लिंग सभी ज्योतिर्लिंगों का राजा है इसलिए लिंगराज है।

इतना बोलते ही उन्होंने दक्षिणा के लिए हांथ आगे बढ़ा दिए। अचानक हुई इस घटना को मुझे समझने में समय लगा। पर जब समझ आया तो खुद को छात्र के रूप में अवगत कराया।

दक्षिणा खतम तो नहीं हुई पर पहले से कम हो गई। उल्टा मैं प्रशाद मांगने लगा तो पंडित जी ही नदारद हो लिए।

दर्शन करके बाहर निकल आया। शिवलिंग को नहाता देख एक अच्छा एहसास है। मन कर रहा है दोबारा जाऊं और घंटों यही घटना देखता रहूँ।

लिंगराज मंदिर के बाहर बनी सीढ़ियों से दिखता भव्य मंदिर

बाहर अब कुछ अंधेरा होने लगा है। सूरज डूब चुका है। मंदिर के बाईं ओर के छोटे मंदिरों में दर्शन करने के बाद अब दाईं ओर आ गया।

यहाँ भी पंडित जी हर मंदिर में विराजमान हैं। शायद हर मंदिर कुछ पंडित को निर्धारित कर दिया गया है।

अपना अपना मंदिर संभाल रहे है ये सब। अंधेरा होने के कारण अब निकलना ही पड़ेगा। परिसर का चक्कर लगाकर मैं बाहर आया।

बाहर साथी घुमक्कड़ को उसी पेड़ के नीचे पाया जहाँ छोड़ कर आया था। जूते पहन कर सारा सामान वापस लिया और चल पड़ा स्टेशन की ओर।

पैदल ही आ पहुंचा टेंपो स्टैंड से स्टेशन रवाना होने के लिए।

टेंपो स्टैंड के पीछे पास में बने एक चढ़ाई घर पर एक लड़के को चढ़ते देख मैं भी यहाँ आ पहुंचा।

उसके नीचे उतरने के बाद जब मैं ऊपर चढ़ा तो बड़ा ही अद्भुत नजारा देखने में आया। यहाँ से मंदिर साफ दिखाई पड़ रहा है।

यहाँ से मंदिर को निहारना भी बहुत ही अच्छा अनुभव है। कुछ देर बाद कुछ कोरियन नागरिक भी अपनी टोली के साथ आए।

इनका हुलिया देख इनकी उम्र बता पाना मुश्किल है। इतने चुस्त दुरुस्त। इनके हाव भाव से जान पड़ रहा है की इनकी मंदिर में कितनी रुचि है।

इनके साथ एक गाइड भी है जो मंदिर की बनावट से ले कर इतिहास तक समझा रहा है उन्ही की भाषा में।

पूरा दल मेरे सामने ही आया और थोड़ी देर में ये निकल भी लिए। मैं भी कुछ अद्भुत तस्वीरें लेने के बाद स्टेशन की ओर रवाना हो चला।

टेंपो स्टैंड पर एक टेंपो खाली खड़ा है। इसी में लदकर चल पड़ा। टेंपो वाला भी मस्त मौला। अन्य कोई सवारी लिए बिना ही निकला।

प्रशांत से मुलाकात

लिंगराज मंदिर में तो दर्शन हो गए पर आज संग्रहालय ना जा सका। न्यूनतम समय को देखते हुए एक ही जगह अच्छे से देखना ज्यादा लाभकारी है।

लिंगराज से सीधा स्टेशन पर ही आ धमका। पैसे पकड़ाए और एक नंबर प्लेटफार्म की ओर रवाना हो गया। पैदल पुल फिर अमानती घर।

मैं अमानती घर में सा गया पर्ची ले कर। अब यहाँ दूसरा आदमी बैठा है बैग की देखी करने के लिए।

उधर प्रशांत ने फोन कर के खबर दी कि वो हमारा स्टेशन परिसर में ही इंतजार कर रहे हैं। उनका ये दूसरी दफा फोन आया है दफ्तर छूटने के बाद से।

प्रशांत जी भी आ गए हैं अपने कार्यालय से। अमानती घर से बैग ले कर उमस भरे मौसम में गाड़ी पार्किंग वाले इलाके में पहुंचा। यहाँ फोन के द्वारा प्रशांत से मुलाकात हुई।

तकनीक भी कहाँ से कहाँ पहुंच गई है। जिस शख्स से कभी मुलाकात या जान पहचान तक नहीं कहीं दूर दूसरे शहर में किसी तीसरे आदमी के जरिए मिलना हो रहा है।

शायद आने वाले भविष्य में तकनीक इसका भी विकराल रूप धारण कर ले। फोन घूमते ही उस जगह पर पहुंच जाना जहाँ से दूसरा आदमी बात कर रहा है।

प्रशांत अपने साथ अपने मित्र को भी लाए हैं। इनकी योजना के अनुसार हम सभी सत्संग विहार जा रहे हैं।

पार्किंग से गाड़ी निकलवाने के बाद प्रशांत की गाड़ी में साथी घुमक्कड़ बैठ गया और दूसरी गाड़ी में मैं अपना बैग ले कर बैठ गया। चल पड़े झूमते हुए मंजिल की ओर।

दो दुपहिया वाहन पर चार सवारी।

सत्संग विहार एक आश्रम है। इसके बारे में दिन में इंटरनेट पर पड़ा था। अगर कहीं ठिकाना ना होता तो यहीं आ कर गुजर बसर करता।

सत्संग विहार आश्रम

मुख्य द्वार के बाहर आ कर हम सभी खड़े हो गए। प्रशांत जी अंदर गए और उनके मित्र अपने घर।

दूसरे द्वार से प्रशांत गाड़ी ले कर अंदर आए। यहाँ मैं बैग ले कर अंदर घुसा। समझने की कोशिश कर रहा हूँ की आखिर हो क्या रहा है।

आश्रम में प्रशांत जी महाराज के कमरे में बातचीत करते नजर आए। बैग बाहर रख मैं ये सब देख रहा था। अचानक उन्होंने हमें अंदर कमरे में बुलाया।

जूते उतार के कमरे में पहुंचा तो सामने एक महाराज के रूप में मैनेजर को पाया। जो तरह तरह के सवाल पूछने लगे।

साथ ही आश्रम में रहने के नियम भी बताने लगे। इस आश्रम का यह नियम है कि रात में ठहरने से पहले यहाँ के सिद्ध महात्मा पुरुष के प्रवचन सुनने अनिवार्य हैं।

उनकी सभी शर्तों को स्वीकारते हुए एक रात के लिए ही सही मैं रुकने को तैयार हो गया। प्रशांत जी ने हमारी रुकने की व्यवस्था कराई।

खैर इन सब के बीच प्रशांत जी ने हमसे अलविदा लिया। जाते जाते अपनी गाड़ी हमें दे गए। ताकि अच्छे से शहर के दर्शन हो सकें।

बैग और जूते इन्ही के कमरे में जमा करवा कर एक दूसरे महाराज हमें आश्रम के दूसरे कमरे में ले जाने लगे।

जहाँ नियम के अनुसार प्रवचन सुनना होगा। जिनके नाम पर ये आश्रम बना है वो अपने योग के द्वारा समस्त ब्रह्माण्ड के दर्शन कर चुके हैं।

ये सुनने में भले ही मजाक लगता हो पर सनातन धर्म में इस तरह का भ्रमण साधु संत करते रहते हैं। दूसरे को भी प्रोत्साहित करते हैं ऐसा करने को।

काश मेरा भी ऐसा कोई गुरु होता जो सीखा सकता की ब्रम्हांड का भ्रमण कैसे किया जा सकता है।

कमरे में जाने से पहले तमाम मंदिर में सजी मूर्तियों के दर्शन कराए। कमरे में प्रवचन से पहले योग किया। कुछ देर का योग मन को शांत कर देने योग्य है।

प्रवचन में भी महाराज ने काफी बातें बताई जिनमे कुछ तो समझ आईं कुछ नहीं।

थोड़ी देर के प्रवचन के बाद मैं अपने कक्ष की ओर चल पड़ा। मैनेजर के कमरे से बैग और जूते उठाए और कमरे में ले आया।

अभी भी उमस कि वजह से पूरा शरीर तर बतर हो रहा है। मैं बैग से कपड़े निकाल खुद को तर करने के लिए नहाने चल पड़ा।

उधर साथी घुमक्कड़ बैग से जरूरी सामान निकाल कर बिस्तर पर बिखेर रहा है। स्नान के बाद बहुत ही हल्का महसूस हो रहा है।

तीसरी मंज़िल पर रात्रि भोज

उमस कम नहीं हुई है पर मुझे थोड़ी राहत तो मिली है।

मालूम पड़ा की नौ बजे आश्रम की ही दूसरी इमारत भोजन ग्रहण किया जाता है।

पहले साथी घुमक्कड़ को भेज कर इधर मैं अपना बैग संभालने लगा। उतनी देर में अपना बिस्तर लगाया। मोबाइल, पावर बैंक जैसे अन्य जरूरी बिजली के उपकरणों को चार्जिंग पर लगा दिया।

ताकि सुबह जैसे भी हालात बने मेरी तैयारी पूरी होनी चाहिए। इधर साथी घुमक्कड़ के भोजन करने के बाद मैं चल पड़ा उस इमारत में रात्रि भोज के लिए।

सीढियां चढ़ते हुए तीसरी मंजिल पर पहुंचा जहाँ भोजन परोसा जा रहा है।

यहाँ के माहौल को देख कर यही लग रहा है की भोजन या तो समाप्त हो चुका है या समाप्ति की ओर है।

मैं में के ऊपर रखी थाली ले कर खाना लेने रसोई में पहुंच गया। यहाँ बावर्ची ने रखा हुआ खाना खुद ही परोसने की सलाह दी।

ना बावर्ची को मेरी भाषा समझ आ रही है और ना ही मुझे। मैं इशारों इशारों में उन्हें अपनी बात समझाने का प्रयत्न कर रहा हूँ

सबसे आखिर में आने के कारण मुझे बावर्ची और रसोइए के बाकी लोगों के साथ खाना ग्रहण करने का मौका मिल रहा है। भोजन अत्यंत स्वादिष्ट बना है।

भोजन के बाद मैं अपने कक्ष की ओर निकल पड़ा सोने। आज का दिन मुर्शिदाबाद से शुरू होते हुए यहाँ आश्रम में भोजन करने से खत्म हो रहा है।

जीवन भी कितना अनिश्चिताओं से भरा है। कहाँ कब क्या होगा किसी को नहीं पता।

इस भीषण उमस में सोना भी अपने आप में एक चुनौती है।

मुर्शिदाबाद से कोलकाता होते हुए बहुभानेश्वर तक की कुल यात्रा 659km

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