टैगोर हिल पर बचाई महिला की जान

झारखण्ड | भारत | रांची

घूमने पर चर्चा

कल रात्रि एक बजे तक सोने के कारण सुबह नींद देर से खुली। कादिर के कार्यालय निकलने से पहले ही मैं उठ गया।

यहाँ ऐसा कोई दिन नहीं बीता, जब रांची झमाझम पानी से तरस गया हो। सूर्य देव तो मानो छुट्टी पर निकल गए हैं।

अपने इलेक्ट्रिक भगउने में हरी चाय(ग्रीन टी) के लिए पानी उबालते हुए कादिर भौंहे उठाते हुए पूछने लगा “तो फिर आज की क्या योजना है?”

एक प्याला मेरी तरफ आया। चाय की प्याली हाथ में लेते ही मैं बोल पड़ा जहाँ बारिश ना मिले वहां चलते हैं।

जवाब सुन कादिर ने जोर का ठहाका मारा। ये बारिश देख कर यही खयाल आता है कहीं मैं चेरापूंजी तो नहीं आ गया। कादिर ने बताया शायद ही कोई ऐसा दिन हो जब बारिश ना होती हो।

उत्तर प्रदेश निवासी कादिर को भी बिना सूर्य के दर्शन किए दिन रास नहीं आता। बारिश से छक गया है। पर यहाँ के लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बन गई है ये बारिश। 

कादिर का क्वार्टर भी इतने पेड़ों से घिरा है कि जब भी फाटक खोलता हूँ यही लगता है कि जंगल में कुछ दिन व्यतीत करने आया हूँ। सांसारिक मोह माया छोड़ छाड़ कर। भ्रमण पर हूँ या वनवास काटने निकला हूँ!

आज शनिवार के दिन हम साथ में घूमने पर मंत्रना कर रहे हैं। कादिर भी चलेगा। आज उसका आधे दिन का ही काम है।  कहाँ इसका फैसला होना बाकी है।

कादिर ने कुछ जगह जाने का सुझाव दिया। जैसे यहाँ आसपास शहर के बाहर कई झरने, झील हैं।

ये झरने एक दूसरे से इतनी दूरी पर है कि एक बार में एक ही झील/झरना देखा जाना संभव है।

या तो एक ऑटो आरक्षित करवा कर पूरे शहर के चक्कर काटते रहो। और ये झरने निपटाओ। रोज़ रोज़ की बारिश से मेरी किसी भी झरने को देखने की बिल्कुल भी इच्छा नहीं है।

इंटरनेट पर खोजने पर चित्र के मार्फत झरने कुछ खास नहीं निकले। पांचों झरने उन झरनों के सामने कुछ भी नहीं है जिन्हे मैं मेघालय में देखने मिलों पैदल चला था।

टैगोर हिल जाने की तैयारी

ये सुनकर कादिर ने एक और जगह जाने का सुझाव दिया। जो शहर के भीतर ही है, टैगोर हिल। टैगोर हिल? टाइगर हिल तो सुना है लेकिन ये टैगोर हिल क्या है?

कादिर ने इसके बारे में कुछ जानकारी दी, और बताते हुए निकल गया अपने कार्यालय। जाते जाते हमसे दो बजे तक तैयार हों जाने जो कहा।

बोरिया बिस्तर समेटने के बाद मैं लग गया तैयारी करने में। उसके कहे अनुसार हम समय से पहले तैयार हो गए। काम धंधा निपटा के कादिर बारह बजने से पहले ही वापस क्वार्टर आ गया।

मैं पहले से ही तैयार बैठा हूँ बस देरी है तो साथी घुमक्कड़ को तैयार होने में। ये गीले कपड़े कहाँ सुखाऊं। धूप तो शर्म के मारे नहीं निकलती।

बारह बज रहे है। निकलने का उपयुक्त समय है। सारा सामान अंदर किया ताला डाला और चल दिया। अभी भी बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही।

काफी महीनो से यहाँ कादिर की पोस्टिंग है। उसे सब जानकारी है कहाँ से क्या मिलेगा। कैंप से बाहर, दूर पैदल चल कर सड़क पार, हजारीबाग तक का ऑटो मिल गया।

हजारीबाग से टैगोर हिल नजदीक है। खाली ऑटो में पानी से बचने के लिए जितना अन्दर घुस के बैठूं मेरी यही कोशिश है।

ताकि कम से कम भिगुं। पर ये बारिश भीगा कर ही दम लेगी। बातों में आधे घंटे में हम हजारीबाग आ धमके। जाम कहीं भी देखने को नहीं मिला।

यहाँ से टैगोर हिल ज्यादा दूर नहीं है लेकिन इस बात से अनभिज्ञ हमने कुछ दूरी के लिए ऑटो करना सहूलियत लगा। जरा दूर का रास्ता जरा देर में तय हो गया। पैदल भी ज्यादा समय ना लगता।

ठीक टैगोर हिल को जाने वाली मोड़ पर ऑटो वाले ने उतारा। पूछने पर ऑटो वाले ने बताया कुछ एक किमी चलने पर मुख्य द्वार आयेगा। जो टैगोर हिल है। लेकिन यहाँ से चढ़ाई बहुत चढ़नी होगी। इतनी बातें बोलकर ऑटो आगे बढ़ा निकल लिया।

वाकई चढ़ाई तो कमर तोड़ है। चढ़ते चढ़ते द्वार तो नहीं एक पान की गुमटी तक आया। टैगोर हिल जाने का रास्ता सुनिश्चित करने लगा।

इनके मुताबिक दूर नहीं रह गया है। चूंकि चढ़ाई इतनी है, की आगे का कुछ दिख ही नहीं रहा। लाल रंग के बड़े से द्वार को देखकर समझ आ रहा है की यही टैगोर हिल होगा।

टैगोर हिल

तैनात सुरक्षाकर्मी को देख कर ये पुष्टि भी हो गई। प्रवेश शुल्क नाममात्र का भी नहीं है। इस जगह का नाम महान कवि एवं लेखक रविन्द्र नाथ टैगोर  के  भाई जतीन्द्रनाथ नाम पर पड़ा है।

साथी घुमक्कड़ के साथ लेखक

प्रवेश द्वार से फिर से चढ़ाई करनी होगी। वर्षा रुकने का नाम ही नहीं ले रही है।

रुक रुक कर निरंतर वर्षा हो रही है। मानों हांथ धो कर पीछे पड़ गई हो। टैगोर हिल सैर सपाटा कम कपल सपाटा ज्यादा मालूम पड़ रहा है।

जगह जगह पर मानस रूपी हंस के जोड़े नजर आ रहे हैं। रास्ते में कुछ एक खंडहर कमरे भी है। गनीमत है खाली ही हैं।

ना जाने किसके लिए उपलब्ध हैं ये कमरे! शायद मैं अभी टैगोर हिल के पिछले हिस्से में हूँ। वीरान, हरा भरा। रास्ता सकरिला और कठिन है।

चढ़ते वक्त सामान्य लग रहा था। पर अब पथरीला रास्ता है। 

बड़े बड़े पत्थरों पर फिसलने का खतरा ज्यादा होता है फिर भी आगे बढ़ते रहा हूँ। एक बार के लिए विचार आया कि शायद गलत रास्ता चुन लिया है।

फँसा कादिर

चट्टान दर चट्टान के आगे एक बड़ी सी चट्टान है। बारिश में इस चट्टान पर चढ़ना जान लेवा साबित हो सकता है। पर चढ़ना तो है ही। यहाँ से पूरे शहर का नजारा दिखेगा। चढ़कर आगे बढ़ना।

जूतों की पकड़ अच्छी होने के कारण मै एक बार में ही चट्टान पर चढ़ने में कामयाब रहा। साथी घुमक्कड़ भी कोशिश करते हुए ऊपर पहुंच गया।

कादिर नीचे ही फंसा है। उसके खेल के जूते उतने ही ज्यादा फिसल रहे हैं जितना वो चढ़ने की कोशिश कर रहा है। यहाँ विज्ञान से पंगा लेना सही नहीं होगा। साथी घुमक्कड़ वापस उतर कर उसे ऊपर चढ़ाने की कोशिश करने लगा।

कादिर को नीचे से ऊपर धकेलते हुए। ऊपर से मैं उसे हांथ देके अपनी तरफ घसीटते हुए ऊपर चढ़ा लिया।

कम वजनी होने के कारण एक बार तो मुझे यही लगा कादिर को ऊपर खिचने के चक्कर में कहीं मैं ना नीचे पहुंच जाऊं।

ऊंचाई पर पहुंच कर शहर भर की तस्वीरें कैद की। आगे की चट्टान के कोने वाले हिस्से में खड़े होने की कोशिश कर रहा हूँ। जो खतरनाक है।

कादिर के साथ लेखक रांची शहर का नजारा देखते हुए

पहाड़ी से नीचे घर कितने बड़े खतरे के नजदीक हैं। इनमे से कोई भी चट्टान अपनी पकड़ खो दे, नीचे जा गिरे तो एक बार में ना जाने कितनी जिंदगियां और आशियाने तबाह हो जाएंगी। खतरा तो है लेकिन ये दशकों से ऐसी ही टिकी हैं। 

और आगे रास्ता नहीं है। इसलिए टैगोर हिल के सामने वाले हिस्से की तरफ जाने के लिए दाहिने मुड़ना होगा।

बन आई जान पर

पहाड़ी के अगले हिस्से पर जाते समय देखता हु की एक असहाय कन्या जो कमजोरी की वजह से कांप रही है। 

उससे हिला भी नहीं जा रहा है। निरंतर रोए जा रही है। बारिश की वजह से उसे बुखार भी चढ़ने लगा। उसके साथ उसका भाई भी उसे उठाने की निरंतर नाकाम प्रयास कर रहा है परन्तु इतनी बारिश में इस कन्या की हिम्मत जवाब दे रही है। 

कुछ एक दो लड़के इसी रास्ते से नीचे जा रहे थे। वो भी यह कृत्य देख कर रुक गए। हम सब को मिलकर मोहतरमा को किसी सूखे स्थान पर ले जाना होगा।

कन्या के भाई और साथी घुमक्कड़ ने हांथ पकड़ा उन दो अनजान लड़कों ने पैर। मैं पथ प्रदर्शित करने में माहिर सो आगे आगे चल कर ये देखने लगा किस चट्टान पर से लाना सही रहेगा जो सकरा ना हो।

पता चला कन्या के साथ उसे कंधा दिए चार लड़के नीचे पहुंच जाए। कादिर हाथों में सामान लादे पीछे पीछे चल के जयजा ले रहा है।

जैसे तैसे किसी तरह कन्या को उस जगह से निकाल कर पहाड़ी के सामने वाले हिस्से तक ले आए। आराम से बेंच पर बैठा दिया। पानी पिलाने के बाद कुछ होश आया।  अब वो थोड़ी सहज लग रही है।

टैगोर हिल के सामने

हम पक्के रास्ते को पार करके दूसरी चट्टान की तरफ आ गए। इधर नीचे प्रवेश द्वार से आए सुरक्षा कर्मी अपनी ड्यूटी करते करते पास बने मंदिर तक आ गया।

सबको वापस लौटाने के लिए। वो जनता को लेने ऊपर बने मंदिर तक पहुंच गए। हमें नहीं देख पाया। शायद उसकी नजर ही नहीं पड़ी।

इसका फायदा उठाते हुए मैं धड़ाधड़ तस्वीरें लेने लगा। कभी मैं छात्र के ऊपर खड़े हो कर कभी साथी घुमक्कड़ या कादिर।

जब लगभग सब नीचे उतरते चले गए तब हम सीढी चढ़ कर मंदिर पहुंचे। जहाँ इक्का दुक्का लोग अभी भी हैं। हर कोई तरह तरह के मूह बना कर फोटु खिचवा रहा है। लेकिन यहाँ सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम है।

किसी ने हांथ ऊपर कर रखा है तो किसी ने टांग। कुछ इस लिहाज में तस्वीरें ले रहे बालक।

ये रांची की सबसे ऊंची चोटी है। समय हो चला है वापसी का। रास्ते में देखा कि सुरक्षाकर्मी की मदद से उसका भाई अपनी बहन को नीचे तक ले जा रहा है। वही कन्या जिसको सुरक्षित स्थान पर हम ले कर गए थे।

पांच बजते ही हम टैगोर हिल के मुख्य द्वार से बाहर निकल आए। प्रवेश द्वार से उतरते हुए मुख्य सड़क तक आने में समय नहीं लगा। क्योंकि अबकी चढ़ाई के बदले उतराई है।

अभी तक जो बूंदाबांदी हो रही है वो अब हल्की तेज़ बारिश में परिवर्तित हो गई। शरीर में पानी की कोई कमी नहीं है लेकिन ये बारिश ये समझ ही नहीं रहीं।

सड़क किनारे ऑटो वालों से चौराहे तक चलने को पूछते की इससे पहले जाम लग गया। पैदल ही हजारीबाग तक निकल आए।

न्यूक्लियस मॉल

रास्ते में योजना बनी न्यूक्लियस मॉल जाने की। हजारीबाग से ही पैदल चलने की ठानी।

सड़क पर भारी भरकम जाम और बारिश से हाल बेहाल है। रास्ते में बाई तरफ जलेबी की दुकान देख कादिर खुद को रोक ना सका। 

जलेबी बेहद स्वादिष्ट हैं। बारिश में और भी ज्यादा लग रही हैं। भुगतान के बाद वापसी अपनी मंजिल। कभी दो कारों के बीच से तो कभी तो ऑटो के बीच से। 

कादिर हमें रांची के सबसे बड़े मॉल में ले आया। कादिर ने बताया की यहाँ कुछ लोग जिंदगी से हार कर आत्महत्या करने का भी प्रयास कर चुके हैं।

आया तो घूमने के है लिहाज से ही था। जब कुछ मन को नहीं भाया तो वापस भी निकलने लगा। बातों बातों में दोबारा चक्कर लगा।

दूसरे चक्कर में एक दुकान से दूसरी दुकान समान लेते ही गए। टोकरी कम पड़ गई कपड़े भरने के लिए। मैंने अपने लिए दो वहीं साथी घुमक्कड़ ने एक टीशर्ट और कुछ कपड़े कादिर ने लिए। पटना की तरह इस बार साथी घुमक्कड़ हमें कपड़े लेने से ना रोक पाया।

कैंप वापसी

बाहर निकलने पर बारिश रुकने का नाम ही नहीं ले रही। ये रांची का अभिन्य अंग है।

लगभग सभी रेस्तरां बंद हो चुके हैं। भूख जोरों की लगी है। चौराहे पर एक ठेला वाला दिख रहा है। जो किसी बस में दुकान लगाए है। 

उसी में पकाना उसके बाहर खाना। रात्रि भोज तो मिलने से रहा इसलिए नूडल्स ही सही।

मुझे लगा कुछ देर बाद ठेले के मालिक बस जैसे दिखने वाली गाड़ी को यहाँ से लेके निकल पड़ेंगे। कुछ दूरी तक ही सही हम छोड़ देंगे। 

पर ऐसा नहीं है उसके तो चारों टायर पंचर हैं। मालिक बोल पड़े सिर्फ खाना बनाने के लिए है। शहर घूमने के लिए नहीं।

महीनों से ये ठेला गाड़ी यहाँ से हिली भी नहीं और स्वतः ही दहाड़ मार के हसने लगा। 

कुछ देर के लिए बारिश रूकी लेकिन अब समस्या है दीपाटोली जाने के लिए साधन नदारद हैं। अंधेरी सूनसान सड़के पानी से भीगी हुई अलग ही खौफ पैदा कर रही हैं।

जहाँ से कुछ घंटो पहले इतनी हलचल थी अब घोर सन्नाटा। चलते चलते हजारीबाग तक पैदल आते समय झमाझम बारिश से हम भीग चुके हैं।

यहाँ प्रयास कर रहे हैं कोई साधन मिल जाए लेकिन कोई नहीं उपलब्ध है। रेंटल ऑटो बुक करने का प्रयास किया लेकिन वो भी विफल रहा।

तभी एक ऑटो वाले पर नजर पड़ी जो पेट्रोल पंप के सामने खड़ा है। इससे पहले कि वो भागे उससे दीपाटोली तक जाने की बात की। 

मनमाने दाम बताने पर हमने मना कर दिया। जब हम कुछ दूर तक पैदल चल लिए तब वो खुद बखुद हमारा रास्ता रोक उचित दाम पर दीपाटोली के लिए रवाना हुआ। दीपाटोली तक आते आते बारिश थम गई है और हम भी।

रांची में हुई कुल 22km की यात्रा

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2 Comments

  1. bahut badhiya ho gyi h aapki writing skill, Hindi me aisa likhne waale blogs bahut kam h, Detailing bahut Shi h, Kaam bahut badhiya h, Thoda sa proverb use kar liya karo kabhi kabhi, pehle se bahut improvement h

  2. भाई इतनी विशुद्ध हिंदी करने वाले ब्लॉग्स ज्यादा नहीं है लेकिन आप हिंदी को एक अलग उचाई तक ले जा रहे हैं आप महान है।

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