रावण द्वारा स्थापित बाबा बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

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चाय पर चर्चा

देर रात रांची पहूँंचने में दिक्कत परेशानी जैसी कोई बात ही नहीं रही। पर ये सब कादिर के लिए अचानक ही था जब फोन करके उसे आने की सूचना दी। आर्मी कैंप के क्वार्टर में रात भी अच्छी कटी। 

खाने पर कादिर ने मटर पनीर मंगा लिया था, जोरदार स्वागत में। देर रात तक तो बातें ही होती रहीं। जमीन पर ही अपनी अंग्रेजी चटाई बिछा कर सो गया था।

सुबह सबसे पहले कादिर ही उठा उसके बाद खिटपिट में मैं। शीशे के सामने तैयार होते हूँए कादिर ने चाय की पेशकश की। अंग्रेजी वाली हरी चाय(ग्रीन टी)।

घोड़ा बेंच के साथी घुमक्कड़ को मैं ऐसे सोया नहीं देख सकता जो बेड के नीचे घुस गया है। उसे उठाकर नींद तो हराम करनी बनती है। अब तीन कप चाय बनेगी।

सुबह की चाय पे यह चर्चा हो रही है की आज निकलना कहाँ के लिए है। देवघर गिरीडीह ज्योतिर्लिंग या रांची में वॉटरफॉल। पहले अपने तय प्रोग्राम के मुताबिक रांची में घूमकर मैं देवघर होते हूँए विक्रमशिला विश्वविद्यालय जाना चाह रहा था।

गूगल नक्शे में देखने पर पता चला की विक्रमशिला में भयंकर भाढ़ से पूरा इलाका ग्रसित होने के कारण जाना संभव नहीं दिख रहा है। उत्तर से बंगाल में घुसने का विचार त्यागना पड़ेगा। इससे कई जगहों को घूमने वाली सूची से हटाना भी पड़ा।

देवघर की तैयारी

कादिर अपने कार्यालय के लिए निकल चुका था। मुझे निकलने से पहले ताला लगाकर चाभी बाहर ही कहीं छुपा देनी थी। तो निष्कर्ष यह निकला कि सुबह या दिन की ट्रेन से देवघर के लिए रवाना होना ही उचित रहेगा।

अभी ज्यादा समय नहीं बीता है। ट्रेन संचालित एप पर देखा की अभी भी एक ट्रेन देवघर जाने के लिए रांची से निकलनी बाकी है। बस फिर क्या था ये देख कर आंखे चमक गई और उम्मीद बढ़ गई।

फटाफट स्नान ध्यान के बाद दोनो बड़े बैग से जरूरी सामान निकाल कर छोटे बैग में भर लिया। ज्योतिर्लिंग दर्शन के लिए जूते पहन जाना उचित नहीं समझा। जूते भी क्वार्टर में रख दिए, क्योंकि मंदिर के बाहर जूते चोरी होना आम बात है। इतने महंगे जूते चोरी होने देर नहीं लगती। एहतियातन चप्पल में जाना उचित रहेगा।

जब श्रोता ये सुनता है तो सांत्वना के लिए भी बोल पड़ता है मंदिर के बाहर से जूते चोरी होना अच्छी बात है। जैसा कि केदारनाथ में मैं भुगत चुका हूँ। 

छोटा बैग में कैमरा और स्लीपिंग बैग ले कर निकल रहा हूँ। कम से कम अपना बिस्तर रहेगा तो किसी भी जगह सोने में कोई गुरेज नहीं है। साथ ही कैमरा भी खूबसूरत पलों को कैमरे में कैद करने के लिए।

कमरे में ताला डाल कर कादिर द्वारा बताई हूँई जगह पर चाभी छुपा दी। कैंप से निकल पड़ा। फोन पर कादिर ने सुझाव दिया कि झारखंड के ज्यादातर इलाकों में ट्रेनें खाली ही चलती हैं अतः हमलोग जनरल डिब्बे से भी अवा जाहि कर सकते हैं।

उसके बताने पे मुझे पता चला कि भारत सरकार द्वारा चलाई गई UTS एप से स्टेशन के 5km के दायरे में जनरल टिकट बुक कर सकते हैं।

ये बात स्टेशन पर पहूँंचने तक के लिए बचा कर रखी। ऑटो से स्टेशन के लिए रवाना हो गया। परन्तु ऑटो वाला भी कछुए की रफ्तार से गाड़ी चला रहा है। इस चाल से लग नहीं रहा की मैं पहूँंच पाऊंगा।

कभी किसी चौराहे पर कभी किसी मोड़ पर। शुकर है की स्टेशन तक जाने के लिए एक और सवारी आ गई। अब तीन तरफ से दबाव पड़ने पर गाड़ी भी सही चल रही है। हालांकि अंतिम समय पर ही मेरा यहाँ पहूँंचना हो रहा है।

बिना टिकट रेल यात्रा

एक तरफ मुझे मोबाइल से टिकट आरक्षित करना है दूसरी तरफ ऑटो वाले को पैसे दे कर चलत करना है। आरक्षण करने वाला काम मैंने पकड़ लिया और किराया देने का काम साथी घुमक्कड़ के मत्थे।

नौसिखिया होने के कारण हूँआ कुछ उल्टा। स्टेशन पर टिकट बुक करने का प्रयास बार बार विफल रहा। क्योंकि ऐप तो बार बार दायरे के बाहर जाने का पॉप उप दिखा रहा था। ये परेशानी का सबब ना बन जाए।

ऑनलाइन आरक्षण छोड़ काउंटर पर पहूँंच गया। जो सही रहेगा पर काउंटर पर भारी संख्या में लोगों का जमावड़ा देख कर कुछ सूझ नहीं रहा था।

लाइन में अगर मैं खड़ा भी होता हूँ तो शायद ट्रेन छूट जाएगी। बिना टिकट यात्रा करना भी अनुचित है। समय के अनुसार ट्रेन निकलने ही वाली है।

टिकट अभी भी हांथ में नहीं है। साथी घुमक्कड़ से विमर्श करके ये तय किया की टीटी की नजर से बचते हूँए ट्रेन में बैठ लिया जाएगा, क्योंकि ये अंतिम ट्रेन है। अगर आज नहीं जाता हूँ तो पूरा दिन व्यर्थ चौपट हो जाएगा।

जिस भी स्टेशन पर रेलगाड़ी रुकेगी वहीं खिड़की पर टिकट ले लूंगा। इसी पर अमल करते हूँए स्टेशन में दाखिल हूँआ। सीढी उतर कर प्लेटफार्म की तरफ बढ़ा। यहाँ आसपास कोई टीटी नहीं है।

पर टीटी भी अदृश्य हवा में घूमते रहते हैं। पता नहीं अचानक से किस दिशा से प्रकट हो जाए कुछ कहा नहीं जा सकता। पर यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं हूँआ। कादिर की कही हूँई बात सही निकली। ट्रेन पूरी खाली है। चढ़ते ही हॉर्न बजा पड़ा और  ट्रेन चल पड़ी।

मैं बिना टिकट ट्रेन में चढ़ गया। मौसम भी सुहाना है और दिल भी धक धक कर रहा है। यदि कोई टीटी आ गया तो क्या होगा। बारिश बरसात के बीच जो सफर अभी चला रहा है उसमे बाहर का नजारा बहूँत ही प्यारा है।

एक घंटे का सफर तय करने के बाद अगले स्टेशन पर जैसे ही ट्रेन रुकी मैं ट्रेन से उतरकर स्टेशन परिसर के बाहर गया एप से टिकट बुक करने के लिए।

लेकिन तब भी यही झमेला। यहाँ भी निराशा ही हांथ लगी। दो तीन दफा यही किया परंतु हूँआ कुछ भी नहीं। तुरंत वहाँ के काउंटर से देवघर तक जाने का टिकट ले लिया। काउंटर पर भी भीड़ ना के बराबर थी। नहीं तो शायद फिर अगले स्टेशन तक के लिए बिना टिकट यात्रा होती।

किस्मत से ट्रेन भी कुछ देर तक रुकी रही। अब हाथ में टिकट के होने चैन कि नींद सोऊंगा।

ट्रैन में जमकर सोये लेखक

जसीडीह निकटतम

नौ घंटे के सफर करने के बाद रात दस बज चुके हैं। मैं जमकर सोया। ट्रेन स्टेशन दर स्टेशन रुकती गई। पर टीटी टिकट चेक करने आए ही नहीं। खैर टिकट लेना मेरा फर्ज था।

ट्रेन के अंदर से घोर अंधेरे में कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा है। जसीडीह स्टेशन आने वाला है। ट्रेन में सवार यात्रियों से ज्योतिर्लिंग जाने के लिए मार्ग पूछने पर यहीं जसीडीह स्टेशन उतर जाने को सुविधापूर्वक बताया।

सो अब यही करूंगा। क्योंकि इन यात्रियों के मुताबिक देवघर स्टेशन से घूम कर ज्योतिर्लिंग को जाना पड़ेगा जिसमे काफी समय व्यर्थ होगा।

जसीडीह पर ट्रेन के रुकते ही मेरा भी सफर रुक गया। नक्शे पर देखने पर स्टेशन से ज्योतिर्लिंग का मार्ग दस किलोमीटर की दूरी पर दिखला रहा है।

स्टेशन पर ही लगे ऑटो में बैठ गया जो जयोतिर्लिंग के निकट उतार देगा। ऑटो पूरा भरा है, रास्ते भर सवारियां उतरती गई। हालांकि की जब मेरे उतरने का नंबर आया तब ऑटो काफी आगे निकल आया है ज्योतिर्लिंग से।

ऑटो वाला सज्जन निकला जो उसने अपना वाहन घुमा कर मुझे निकटम मार्ग पर छोड़ने आया। पैसे दे कर चलता किया। देर रात साथी घुमक्कड़ को भूख लग आई।

गली से गुजरने पर बाजार बंद दिख रहा है। खुले हैं तो रेस्त्रां या फिर मिठाई की दुकानें। ऐसे ही एक रेस्त्रां में मैने प्रवेश किया। मुझे भूख नहीं है फिर भी रेस्त्रां में आ गया। बाहर बैठ कर भी क्या ही करता।

साथी घुमक्कड़ ने अपने लिए खाना मंगवा लिया है। रेस्त्रां में एक महाशय बड़ी जोर जोर से गरज रहे हैं। जिनको मालिक ने शांत कराया। इधर साथी घुमक्कड़ का खाना भी आ गाया है। बैठे बैठे मुझे भी भूख लग आई या फिर यूं कहें कि साथी घुमक्कड़ को खाता देख कर।

मैने भी अपने लिए एक थाली मंगवा ही ली। काफी रात हो चुकी है। खाने के बाद अब आश्रय ही ढूढना होगा। क्योंकि इतनी रात दर्शन तो होने से रहे।

खाना पीना कर भुगतान किया। होटल के मालिक ने रास्ता ठीक से समझा दिया है मंदिर तक का। रेस्त्रां से बाहर निकल कर सामने राबड़ी की दुकान देख साथी घुमक्कड़ की लार टपकाने लगी। खैर हमने दुकान से राबड़ी भी खरीदी। चलते फिरते खाते हूँए मंदिर की ओर निकल पड़ा।

आश्रय की तलाश

अंधेरी गलियों में कहीं छुट्टा सांड घूम रहे है या मानव जो की ना के बराबर। मंदिर भी आ पहूँंचा। परिसर में प्रवेश किया पर यहाँ सन्नाटा पसरा है। किसी छोटे मंदिर में भजन कीर्तन चालू है।

प्रमुख गेट बंद करने का सिलसिला शुरू हो गया है। मैने उत्तर दिशा से प्रवेश करते हूँए दक्षिण गेट से बाहर निकला। सोने के लिए आश्रम या धर्मशाला या होटल की तलाश में मिले एक सज्जन ने होटल तो नहीं पर एक हॉल बताया जहाँ अन्य भक्तों की तरह हम भी सो सकते हैं। लेकिन रात्रि के बारह बजे सभी धर्मशाला बंद हो चुके हैं।

प्रांगण से निकलने के बाद मंदिर के दक्षिण भाग में एक धर्मशाला है। दो चार गलियां पार करके जब इस हॉल को देखा तो थोड़ा दंग रह गया। प्राप्त जानकारी के अनुसार मालूम पड़ा यहाँ कमरे उपलब्ध नहीं हैं। 

भीड़ तो काफी है और सोने के लिए भी जगह बनानी पड़ेगी। 

आंगन से दाहिने हांथ पर सीढी उतरते उतरते नीचे ही बरामदा दिखा। यहाँ गैरेज में थोड़ी सी जगह है आप सोने लायक नहीं। वापस ऊपर आंगन में आया जहाँ पहले से ही काफी जनता है।

यहीं पर दू वृद्ध राजनीति पर गहरी चर्चा कर रहे हैं। कुछ देर पहले हल्की बारिश हूँई है। जिससे हल्का गीला है। सिर के खाली बैग और बैग का सारा सामान स्लीपिंग बैग में डाल कर सोने की कोशिश करने लगा।

सुबह का था इंतज़ार

चहलकदमी की आवाज से सुबह नींद टूटी। कुछ देर और सोने के आलस में सोता ही रहा। आलस और अधूरी नींद उठने नहीं दे रही है। खयाल आया की जितनी जल्दी उठना होगा उतनी जल्दी दर्शन भी होंगे। कतार में उतना आगे लगने को मिलेगा। दर्शन करके वापस रांची के लिए भी निकलना है।

नींद में इतना तो पता चल रहा है की लोग जल्दी उठ उठ कर जा रहे हैं। जबतक मैं उठा तब तक आधे लोग स्नान करके दर्शन के लिए निकल भी पड़े हैं।

फ़ौरन बिना देरी किए बोरिया बिस्तर समेट कर बारी बारी से दुसलखाने में नित्य कर्म के लिए गए। दैनिक दिनचर्या के बाद बैग लेके भागा मंदिर की ओर।

इस मंशा से कि कतार में आगे लग सकूं। जितना विलम्ब उतना पीछे, उतनी देरी से दर्शन। मैं पहूँंच गया मंदिर। मंदिर में भारी संख्या में भक्तो का तांता लगा हूँआ है।

काफी तादाद में कावड़िए भी आए हूँए हैं। मंदिर की डामरडोर व्यवस्था देख के मैं अपने बैग के साथ ही प्रांगण में चला गया। लेकिन अन्दर सुरक्षा कर्मी तैनात है। मेरे अंदर प्रवेश करते ही पुलिस कर्मी ने इसे बाहर ही रखने को कहा। 

जाली में बंद कतार में भक्त

मंदिर के बाहर निकलने पर कुछ सूझ नहीं आ रहा है ये छोटा बैग कहा जमा करना है। मंदिर प्रांगण के बाहर कई दुकानें हैं जो खुल चुकी हैं।

यहाँ एक पेडे वाले की दुकान में बैग और चप्पल रखवा दिया। अब निश्चिंत हो कर मंदिर की ओर प्रस्थान कर गया। प्रांगण में सुरक्षा के ढीले इंतजाम दिख रहे हैं। बैग जमा करने के उपरांत हाथ पैर धोकर मंदिर परिसर में प्रवेश करके कतार में चलने लगा।

जो कतार पहले छोटी थी अब वही लंबी हो चली है। मंदिर के अंदर चार दिवारी में कतार में आगे लगने की दौड़ में कुछ फुर्तीले युवक रेलिंग पार करके आगे जा रहे हैं। बस गनीमत है दौड़ भाग नहीं मची है ना उसके लिए जगह है।

महिलाएं ऐसा नहीं कर सकती इसलिए वह रेलिंग के नीचे से निकल रही हैं। मैं भी दो चार रेलिंग फांद कर आगे निकल आया। मंदिर के कपाट भोर पांच बजे खुलेंगे। अभी उसमे आधा घंटा बाकी है।

बैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग बनने की वजह

मेरे आगे एक सिद्ध साधु महाराज खड़े हैं, मैंने इच्छा वश उनसे इस ज्योतिर्लिंग की कथा बताने का आग्रह किया। अपनी लड़खड़ाती आवाज़ में उन्होंने कथा का वर्णन कुछ इस प्रकार आरंभ किया।

” इस जगह को लोग बाबा बैजनाथ धाम के नाम से भी जानते हैं। पुराणों के अनुसार रावण महादेव को प्रसन्न करने के लिए हिमालय पर तप कर रहा था। वह एक-एक करके अपने सिर काटकर शिवलिंग पर चढ़ा रहा था। नौ सिर चढ़ाने के बाद जब रावण दसवां सिर काटने वाला था तो भोलेनाथ ने प्रसन्न होकर उसे दर्शन दिए और उससे मनचाहा वर मांगने को कहा। तब रावण ने ‘कामना लिंग’ को ही लंका ले जाने का वरदान मांग लिया।”

चश्मा ऊपर सरकाते हूँए बाबा बोले “रावण के पास सोने की लंका के अलावा तीनों लोकों में शासन करने की शक्ति तो थी ही साथ ही उसने कई देवता, यक्ष और गंधर्वो को कैद कर के भी लंका में रखा हूँआ था। इस वजह से रावण ने ये इच्छा जताई कि भगवान शिव कैलाश को छोड़ लंका में रहें। महादेव ने उसकी इस मनोकामना को पूरा तो किया पर साथ ही यह शर्त भी रखी अगर शिवलिंग को रास्ते में कही भी रखा तो वह लिंग वहीं विराजमान हो जाएगा।”

इस दौरान मैंने देखा कि कतार में कुछ लोग थक कर जहाँ के तहां बैठ गए और जो मेरे आस पास खड़े हैं वो भी बाबा के मुख से कथा का आनंद ले रहे हैं।

“इधर भगवान शिव की कैलाश छोड़ने की बात सुनते ही सभी देवता चिंतित हो गए। इस समस्या के समाधान के लिए जब सभी भगवान विष्णु के पास गए तो विष्णु जी ने वरुण देव को आचमन के जरिए रावण के पेट में घुसने को कहा।

इसलिए जब रावण आचमन करके शिवलिंग को लेकर श्रीलंका की ओर चला तो देवघर के पास उसे लघुशंका लगी। ऐसे में रावण एक ग्वाले को शिवलिंग देकर लघुशंका करने चला गया। कहते हैं उस बैजू नाम के ग्वाले के रूप में भगवान विष्णु थे। 

इस वहज से भी यह तीर्थ स्थान बैजनाथ धाम और रावणेश्वर धाम दोनों नामों से विख्यात है। पौराणिक ग्रंथों के मुताबिक रावण कई घंटो तक लघुशंका करता रहा जो आज भी एक तालाब के रूप में देवघर में है। इधर बैजू ने शिवलिंग धरती पर रखकर को स्थापित कर दिया।” पांच बज चुके हैं, कतार थोड़ी थोड़ी आगे बढ़ने लगी। सब हर हर महादेव का जयकारा लगा रहे हैं।

इसी शोर में बाबा ने बताया “जब रावण लौट कर आया तो लाख कोशिश के बाद भी शिवलिंग को उठा ना सका। वो क्रोधित हो कर शिवलिंग पर अपना अंगूठा गढ़ाकर चला गया। उसके बाद ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं ने आकर उस शिवलिंग की पूजा की। शिवजी का दर्शन होते ही सभी देवी देवताओं ने शिवलिंग को उसी स्थान पर स्थापना कर दिया और शिव-स्तुति करके वापस स्वर्ग को चले गए।” 

कतार अब तेजी से आगे बढ़ने लगी और धक्का मुक्की में बाबा गिरते गिरते बचे। इसी बीच कुछ लोग चालाकी में आगे निकलने का प्रयत्न कर रहे हैं। मैंने बाहें फैला कर दोनों ओर रोड पकड़ ली ताकि कोई आगे ना निकल पाए। अरे भाई बैजू बाबा कहीं भागे नहीं जा रहे हैं। फिर इतनी जल्दी किस बात की।

बाबा के दर्शन

धक्का मुक्की में किसी के लोटे से दूध गिरा तो किसी का बेलपत्र। अब कतार निरंतर बढ़ रही है और बिना कहीं रुके शिवलिंग के द्वार पर मैं भी पहूँंच गया। मैंने प्रांगड़ में प्रवेश किया और दर्शन करने के लिए शिवलिंग के इर्द गिर्द घूमने लगा। जैसा बाबा ने बताया था वैसा ही देखने को मिला कि शिवलिंग धरती में धसी हूँई है।

दर्शन करते समय एक अधेड़ व्यक्ति शिवलिंग पर माथा टिका कर सो गया। इसे देख पंडित जी के हिलाने पर भी वह नहीं उठा। क्रोध में आकर पंडित जी ने घमाघम चार घूंसे उसकी पीठ पर जड़ दिए। घूंसा खाते ही वो उठकर दुम दबा कर भागा। ये देख कर अजब सा सन्नाटा तो छाया साथ ही कोई आगे आने की हिमाकत भी नहीं कर रहा है। 

फिर अचानक से सब कूद पड़े। इतनी भीड़ में मेरे हाथ शिवलिंग तक नहीं पहूँंच रहे हैं, फिर भी मैं शिवलिंग के आसपास की धरती को छूकर ही मन को संतुष्टि दी। पुलिस चप्पे चप्पे पर तैनात है।

यहाँ लोगो को अंदर करना और अंदर से बाहर निकलने का काम भी बखूबी हो रहा है। मैं बाहर निकल आया। आधे घंटे के भीतर दर्शन भी हो गए। भला हो बाबा का जिन्होंने दर्शन के पहले इतनी अच्छी कथा सुनाई। ये सुन कर मैं धन्य हो गया।

लेकिन पंडित जी ने जो मुक्के बरसाए वो सोच सोच के ही हसी आ रही है। यहाँ महादेव के मंदिर के ठीक सामने माता पार्वती का मंदिर है। मैं इस मंदिर में भी आया माता के दर्शन करने।

यहाँ से दर्शन करके बाहर आया तो देखने को मिला एक मानुष तागा लेके मंदिर की चोटी पर चढ़ रहा है। चोटी पर पहूँंच कर झंडा लगा रहा है। उस झंडे के धागे को उसने जाकर पार्वती मंदिर से बांधा है।

सुबह सुबह ही मैंने घर पर फोन घुमा दिया। ये सोच कर की हर ज्योतिर्लिंग में घरवालों को भी दर्शन करा दूंगा। वीडियो कॉल के जरिए मंदिर भी दिखाया। कुछ देर में कमजोर नेटवर्क के कारण सेवाएं बाध्य हो गईं।

मैं आस पास के सभी मंदिर में दर्शन करके कुछ समय मंदिर में व्यतीत करने के पश्चात वहाँ से दर्शन करके रवाना होने लगा। पेडें वाले की दुकान से सामान समेटने आ गया। साथी घुमक्कड़ बोलने लगा मंदिर के प्रांगण में तस्वीर एक भी नहीं कैद की।

अब जनाब की ये फरमाइश भी पूरी करने के लिए मैं यहीं कुछ देर तक इंतजार करने लगा। मैं भी फोटो खिंचवाने अंदर गया। वापसी में जिस दुकान में पेड़े रखे थे वहाँ से कुछ किलो पेड़ा ले लिए।

यहाँ से निकल गया रांची जाने के लिए। रास्ते में साथी घुमक्कड़ ने बताया कि उसके पूर्व सहकर्मी ने बोकारो आने के के लिए आमंत्रण दिया है। स्टेशन पहूँंचते हूँए यही चर्चा चल रही है।

स्टेशन पर पहूँंच कर लगा सुबह का नाश्ता भी कर लेना चाहिए। स्टेशन किनारे लगी दुकान पर चाय फिर जलेबी का नाश्ता किया। स्टेशन के बाहर चाय की चुस्की के बाद ये मत बना की आसनसोल तक चलते हैं वहाँ से रांची जाएंगे या बोकारो ये वहीं तय करेंगे। आठ बजे की ट्रेन से निकल गया आसनसोल इस विचार से कि रांची पहूँंचना है।

रांची से देओघर तक की कुल यात्रा 340km

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One Comment

  1. Aishwarya you have the skills of being an author. 👍👍
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