स्टोरीज ऑफ इंडिया, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश
Leave a comment

एशिया का सबसे ऊंचा पुल

चिचम गांव से निकलने की तैयारी

कल रात के जबरदस्त स्वागत के बाद आज वापस निकलने की बारी है। सवेरा हो चुका है। पर पता नहीं कैसे सुबह चार बजे एक बार आंख खुली थी। फिर तब से हल्की हल्की टूटी नींद आ रही है।

बिस्तर के बगल में लगी खिड़की से छन कर उजाला आ रहा है। जिसके कारण नींद टूट चुकी है। घड़ी में देखा तो छह बज रहे हैं। बस के निकलने का समय आठ बजे है।

अभी दो घंटे हैं लेकिन फिर भी मैं उठ कर निकल आया बाहर घाटी और गांव देखने। गांव तो ज्यादा बड़ा नहीं है पर बर्फीली घाटी देखने लायक है।

सामने देखता हूँ तो पहाड़ी चोटी जिसे फतेह करने का जी चाह रहा है। पीछे देखता हूँ तो भी वही हाल है। मन कर रहा है दिन तक या शाम तक यहीं रुक जाऊं।

पर यहाँ बस सुबह ही निकल जाती है। फिर पता नहीं इस गांव से शाम को जाने का कोई साधन मिलेगा भी या नहीं। इसी के चलते सुबह निकलना बेहतर रहेगा। शाम के भरोसे रहा तो क्या पता एक रात और गुजारनी पड़ जाए।

ठंड अभी भी जोरदार है। वही घर से कुछ मीटर की दूरी पर बने दुसालखाने में नित्य क्रिया के बाद आ गया घर वापस। बैग थोड़ा अस्त व्यस्त हो गया है। जो उठाने पर और वजनी लगता है।

बैग से सारे कपड़े और सामान निकाल कर वापस से व्यवस्थित करने लगा। बगल की चैन में हाँथ पड़ा तो पाया कोई क्रीम बेह गई है।

बगल वाली झोली में रखा सारा समान बर्बाद हो गया। हर एक सामान में वो क्रीम लिपटी हुई है। बारी बारी से सारा सामान धो कर किनारे रखने लगा।

यही करने में काफी समय गुजर रहा है। झोली भी साफ करनी पड़ रही है सो अलग। जिसकी सफाई किए बगैर काम ना चलेगा। घड़ी में सात बज चुके हैं।

दुनिया के सबसे ऊंचाई पर बने। चिचम पुल को भी देखने जाना है। इसी विचार को ध्यान में रखते हुए फटाफट हाँथ चलने लगे।

पूरा बैग व्यवस्थित हो जाने के बाद और वो झोली भी जिसमे क्रीम चुपड़ गई थी। उसकी सफाई के बाद बैग आखिरकार कमरे के बाहर रखे।

तेंजिंग भाई को आवाज़ लगाई ही की वो फटाक से हाज़िर हो गए। सारा सामान लेकर बाहर आ गया। यहाँ उनके घर के निर्माण हेतु मजदूर सुबह छह बजे ही आ गए थे।

तेनज़िंग भाई का घर।

हमारे यहाँ मजदूर तो देर से आए, और हड़बड़ी में काम निपटा कर निकलने में उस्ताद।

मेरे साथ तेनजिंग भी बाहर आ निकले। और ठीक उसी गाय के पास आ खड़े हुए जिसे कल रात में मैं भेड़ समझ रहा था। इधर तेनजिंग भाई को उनके घर रात बीतने के पैसे दिए और चल पड़ा।

पता नहीं मुझे ऐसा क्यों लगा कि उनकी और पैसे लेने की आस थी। इतने से संतुष्ट नहीं दिखे। अगर ऐसा है तो कभी दोबारा आया तो उनका ये मन भी भर दूंगा।

फिलहाल तो बस पकड़नी है। ध्यान आया कि कुछ समान तेनजिंग के घर पर ही छूट गया। बैग यहीं सड़क पर रख भाग कर लेने निकला।

घर के कमरे में पहुंचा तो देखा जहाँ का तहाँ सामान रखा पाया। तेनजिंग भाई मिले और उनको इस विषय में बताया। सामान उठा कर चल पड़ा वापस।

ठंड इतनी गजब कि पड़ रही है कि अचानक नाक से खून बहने लगा। हालांकि ज्यादा नहीं है। शुक्र है ज्यादा धारा नहीं नहीं और अभी बहाव नियंत्रण में आ गया।

यहाँ लगभग हर मकान में निर्माण कार्य जारी है। कोई आधा अधूरा पड़ा है तो किसी की बनने की शुरुआत हुई है। पर यहाँ ईंट के बजाए पत्थर के घर बने हुए हैं।

लेकिन ये घर चिचम ब्रिज बनने के बाद ही शुरू हुए होंगे उससे पहले तो यहाँ इतना सामान लाना भी असंभव होता होगा। कुछ पुराने मिट्टी के घर भी दिखाई पड़ रहे हैं। उनको देख पुरानी कला की अनुभूति हो रही है।

खैर मैं बैग उठा बस की तरफ आ गया हूँ। एक कुत्ता आ कर मेरे बैग के पास लेट गया। यहाँ पर कुत्ते भी भालू की भांति दिख रहे हैं। इनका भालू होना भी जरूरी है अन्यथा ये यहाँ को आबो हवा में गुज़रा नहीं कर पाएंगे।

जहाँ कल रात में ड्राइवर साहब ने बस लगाई थी वहीं की वहीं बस खड़ी है। अपने ठहराव के सवाल पर चालक साहब ने चुप्पी तोड़ते हुए बताया था कि वो और कंडक्टर बाबू इसी बस में अक्सर रात गुजरते हैं। ये अमूमन आम बात है उनके लिए।

ब्रिज देखने का जुनून

बस तो आठ बजे निकलेगी और अभी सात बीस ही हुआ है। सोचा बस में ही बैग रख कर निकल जाऊं। पर ड्राइवर साहब ने बिना किसी जिम्मेदारी के बैग रखने को मना कर दिया।

उनका कहना भी सही है आखिरकार इतने बड़े बैग का मामला है। अनेकों सवारियां बैठेंगी वो गाड़ी चलाएंगे या बैग की निगरानी करेंगे।

मैं बैग लेे कर है चल पड़ा चिचम ब्रिज की तरफ। अगर सड़क के रास्ते से जाऊंगा तो शायद बहुत समय लग जाए। इसलिए सोच रहा हूँ इधर पहाड़ी के रास्ते से निकला जाए।

चूंकि बैग लेे कर पहाड़ी के रास्ते से निकलना घातक भी हो सकता है। अगर कहीं किसी मोड़ पर पैर फिसला या बलैंस बिगड़ा तो पूरी पहाड़ी एक बार में पार होगी।

 

ड्राइवर साहब को आगे मिलने का वयदा किया और निकल पड़ा पहाड़ी के रास्ते भारी भरकम बैग लेे कर चमचमाती धूप में।

कच्ची सड़क को छोड़ पहाड़ी के रास्ते कितने सहूलियत से जाना होगा या नहीं! ये तो अभी पता चल जाएगा। पहाड़ी पर बजरी पर से होके गुजरने में खतरा तो है ही।

मगर ये खतरा भी मोल लेना पड़ेगा अगर ब्रिज तक जल्दी पहुंचना है। ये पथरीले पहाड़ों से सामने की बर्फीली पहाड़ी का नज़ारा अलग ही नज़र आ रहा है।

रास्ते से अब पहाड़ों में आ चुका हूँ। वाकई बहुत सकरा है। हल्की चूक और सीधा नीचे। आहिस्ता आहिस्ता आगे बढ़ने लगा।

अब लग रहा है गलत रास्ते पर आ चुका हूँ। पहले जहाँ पहाड़ी में इतनी भी ढलान भी थी अब अगर जल्दबाजी दिखाई तो एक बार में नीचे। ऊपर से ये भारी बैग नीचे जाने के काम को और आसान बना देगा।

इसलिए अभी फूंक फूंक कर कदम रखने में ही समझदारी है भले ही थोड़ी देर ही सही। खैर खुद के वजन और बैग के वजन का बैलेंस बना धीरे धीरे नीचे उतर ही आया।

उतरते ही मुझे किसी जानवर का कंकाल दिखा। जो मन को भयभीत कर देने वाला है। कंकाल के ढांचे से मालूम पड़ता है किसी गाय का है।

अब ये कंकाल देखने के बाद मन में अशांति सी छाने लगी है। लग रहा है जितना जल्दी हो सके उतना जल्दी यहाँ से निकलो। क्या मालूम आसपास कोई जंगली जानवर हुआ तो जैसे कि बर्फीला चीता!

पहाड़ी उतारने के बाद क़दमों में रफ्तार भरते हुए आगे बढ़ने लगा। एक के बाद एक अगली पहाड़ी पार की। अब सड़क दिखाई देने लगी है। पीछे रोड पर नजर पड़ी तो देखा डोलते हुए बस चली आ रही है इधर की ही ओर।

एशिया का सबसे ऊंचा पुल।

सारी योजना धरी की धरी रह गई। अब बस से पहले पहुंचना है चिचम ब्रिज की तरफ। उधर दूसरी पहाड़ी पर अजय को इस बात का इल्म भी नहीं है कि बस आ चुकी है।

मैंने चिल्लाते हुए अजय को चेताया। शुक्र है मेरी आवाज़ तो पहुंची। तुरंत उसे भागते हुए बस रुकवाने को कहाँ। चूंकि मैं ऊंचाई पर हूँ इसलिए आराम से बस को देख पा रहा हूँ।

उधर अजय ने रफ्तार पकड़ी और भागा बस की तरफ। इधर मैं भी तेज़ क़दमों के साथ करीब आता जा रहा हूँ सड़क के। मेरे दाईं तरफ नज़र पड़ी उस खाई पर जिसे लांघने के लिए पुल का निर्माण हुआ है।

पर शायद इधर से नीचे जाने को रास्ता है। अब वो कितना नीचे जाता है वो तो वहाँ जा कर है पता चलेगा। जिसका अभी वक़्त नहीं है। फिर किसी और साल।

सड़क के पास भी और ब्रिज के पास भी आ गया मैं दौड़ते हुए। इधर बस भी आ खड़ी हुई ब्रिज के पहले। उधर मेरा फोटो खीचना हुआ और इधर चिचाम से रवानगी।

ब्रिज बनने के पहले का काल

पहले यहाँ के निवासी किब्बर से चिचम झूले से आया जाया करते थे। जो अपने आप में काफी खतरा मोल लेने वाला हुआ करता था। ये अहम जानकारी कल रात मुझे तेनजिंग के भाई द्वारा प्राप्त हुई थी।

सोचो एक तरफ से वो झूले से छोड़े गए हों और बीच गहरी खाई में झूला रुक जाए। कमजोर दिल वाले का तो दिल ही थम जाए ऐसी परिस्थिति में। बहुत घातक।

झूले के दोनों तरफ एक एक आदमी हुआ करते थे। जिनमे से एक धक्का लगता था और दूसरी तरफ से दूसरा आदमी उसे खींचता। कई बार तो झूला रुक भी जाता।

इस तरह के झूले दुनिया के और हिस्सों में भी हैं। ऐसा मैंने नेट जिओ पर देखा था। कई दफा रस्सी टूटने के कारण लोग मर भी जाते हैं।

ड्राइवर साहब भी उतावले हो रहे हैं किब्बर जाने के लिए। कुछ देर का सबर नहीं है। आखिरकार बोल ही पड़े जल्दी करो ये सब और बस में चढ़ो।

जैसे मेरा रोज़ का आना है इस ब्रिज पर!

चिचम ब्रिज पर फोटो खींची नहीं की उधर बस का हॉर्न बजने लगा। भागते हुए बस में आ गया। पर मन भर फोटो ना खींच पाने की टीस मन में रह गई। और ब्रिज के ऊपर खड़े हो कर नीचे झांकने की भी।

बैठ गया बीच की सीट पर। बस भी चल पड़ी। ड्राइवर साहब का तो रोज़ ही यहां आना जाना है। और बाकी गांव वालों का भी। बस जब सड़क से पुल पर अाई तो जैसे हांथ पैर ठंडे पड़ गए हों।  

चलती बस से जब खाई में झांका तो मानो हवा टाईट हो गई हो। इतना गहरा की अगर शायद मैं खड़े हो कर भी फोटो खींचने की कोशिश करता तो शायद मेरा मोबाइल ही नीचे गिर जाता। बस से अन्दर से ही जितनी हो सकीं खाई कि गहराई की फोटो लेने की कोशिश कर रहा हूं।

पुल पर बस की चेहलकदमी से खटर पटर की आवाज़ और भी डरावनी है। दोनों तरफ से मोटे मोटे लोहे के रस्से बांधे हुए हैं। हैरानी इस बात की है कि कैसे इस पुल का निर्माण किया गया होगा। क्या इंजिनियरिंग रही होगी कि इतनी ऊंचाई पर पुल बना डाला बिना किसी ज़मीनी सहारे के।

फोटो खीचने से फुर्सत मिली तो बस की अगली सीट पर तेनजिंग भाई बैठे मिले। जिनके घर पूरी रात गुजरी।

Filed under: स्टोरीज ऑफ इंडिया, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश

by

नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *