एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव मावलेनोंग

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डारंग में सुबह

आज एशिया के सबसे साफ गांव जाने का विचार है जिसका नाम है मावलेनोंग। ये गांव लगातार एशिया के सबसे स्वच्छ गांव की श्रेणी में शुमार ही रहा है।

सुबह के साढ़े छह बज रहे हैं। रात के अंधेरे में तो सिर्फ नदी का शोर ही सुनाई पड़ रहा था पर अभी उजाले में काफी कुछ देख सकता हूँ।

तंबू के ऊपरी हिस्से में कीड़े चिपके हुए हैं। शायद रोशनी होने के कारण सब यहीं आ कर बस गए थे रात में। पर गनीमत है अन्दर एक भी नहीं हैं।

कल शाम की सड़क दुर्घटना के बाद मरहम पट्टी करी थी। जिससे कुछ हद तक फायदा तो मिला है। दर्द भी कम है और खून भी जमा हुआ है।

साथी घुमक्कड़ तंबू के बाहर पहले से ही मौजूद है। तंबू के अंदर सिर्फ मैं और दोनों बैग। बाहर झांका तो सामने बेहती नदी से काफी दूरी और ऊंचाई पर हूँ।

मोबाइल की रोशनी में इतना तो दिखा था कि एक पेड़ के नीचे मनरेगा के बोर्ड के सामने। पर अभी सब कुछ साफ़ तौर पर देखा जा सकता है।

आसपास नाव हैं खूब सारी पर नाविक एक भी नहीं। उमगोट नदी तो है पर जैसा सुना और देखा था वैसी पारदर्शी नहीं। जैसे गंगोत्री की गंगा वैसी उमगोट धूमिल।

जिसका रुख सीधे बंगलादेश की तरफ है। पर नदी का बहाव सामान्य है। पास में ही शौचालय भी है जो काफी सुविधाजनक रहेगा।

एक नाविक अपने कुछ सामान के साथ ऊपर सीढ़ियों से होते हुए घाट पर आ पहुंचा। टीले से बंधी रस्सी को खोलते हुए अपनी नाव को बालू से घसीटते हुए पानी में ले जाने लगा।

शायद ये सुबह सुबह इस तरह से मछली पकड़ने निकल पड़ा है। नाव को इस तरह से बांध कर रखना और बालू पर रखना ये शायद मैं पहली बार देख रहा हूँ।

हो सकता है यहाँ बरसात के मौसम में यहाँ पानी का बहाव उग्र रूप धारण कर लेता होगा जिस कारण ऐसा करने पर विवश हो जाते होंगे नाविक।

तभी पानी से हटा कर रेतीले जगह पर लगा देते हैं। ये जनाब तो नाव ले कर पहुंच भी गए बीच नदी में। बीच नदी तक का जाने का अनुभव रहा है मुझे।

जब अपने कॉलेज के दिनों में छुट्टियों के दौरान अपनी मंडली के साथ गंगा के तट पर गया था। पानी के बीच में ऐसा लगता है पानी तो स्थिर है पर भूमि डोल रही है।

खैर ये सब विज्ञान कि बातें हैं। जिसमे ज्यादा घुसुंगा तो समय बहुत निकल जायगा। दूरबीन तो नहीं है पर कैमरे को ज़ूम करके देखने पर नदी के उस पार तंबू गड़े दिख रहे हैं।

जो नदी से बस कुछ ही मीटर की दूरी पर हैं पर सुंदर लग रहे हैं। पर मानवीय हलचल बिल्कुल नहीं जान पड़ रही है। मेरे दाहिने हांथ पर नदी में काफी दूर भी हलचल है।

डारंग नदी भारत से बांग्लादेश

जो देखने आया था वो तो मिला ही नहीं। पर अनुभव अच्छा रहा अब तक का यहाँ तक का आने का। कभी बांग्लादेश भी भारत का हुआ करता था अर अब नहीं।

सुबह का नज़ारा शानदार है। बाएं तरफ एक जहाज बना हुआ है जिसपर खड़े हो कर तरह तरह के मुद्रा में फोटो खींची जाती होंगी।

कुछ पिकनिक जैसा भी नज़ारा है। बरसात के मौसम के कारण शायद यहाँ इसीलिए सन्नाटा पसरा हुआ है।

निकलने की तैयारी

समय की नजाकत को समझते हुए नित्य क्रिया के लिए पास के ही शौचालय में आ गया। यहाँ सारी व्यवस्था मौजूद है। भरपूर मात्रा में पानी भी है।

कल कुछ खाया पिया ज्यादा नहीं पर पेट पूरा खाली हो गया है। दांत मांजने के बाद जरूरी हो चला है पर पूजा करने की। नहीं तो शायद ही शाम तक टिक पाऊंगा।

तंबू में आते ही सारा समान समेटने में जुट गया। रात में जैसा डर था कि वो अनजान आदमी जो जबरन अपनी जगह पर सोने को बोल रहा था उसने कोई हरकत नहीं की।

इसी बात का सबसे ज्यादा भय भी था कि कहीं गुस्से में तंबू में ही ना आग लगा दे या सोते में ही जान से मार दे। क्यूंकि कल रात जैसी परिस्थितियां बन रहीं थीं उसको देख कर ऐसी ही आशंका थी।

पर ऊपरवाले के रेहेमोकराम से रात शकुशल बीत गई। नींद भी अच्छी आईं। और सीधा सुबह ही जगा ऐसी गहरी मुद्रा में सोया था मैं।

फटाफट बैग में सामान भर कर साथी घुमक्कड़ के शौचालय के आने के बाद बैग तंबू से निकाल कर बाहर रख दिए। जब तंबू निकालने की बारी आई तो उसके ऊपर ओस की मोटी बूंदे और कीड़े चिपके मिले।

तंबू को लपेटने के पहले झाड़कर बूंदे हटाई और कपड़े से उसे साफ करके सुखाया भी। ताहा कर हरे बैग में रख दिया। इधर ऊपर लकड़ी के होटल से एक नौजवान आदमी और एक महिला निकले।

जो जब नीचे आए तो मुलाकात के दौरान मालूम पड़ा की ये बांग्लादेशी हैं। जो अपने देश से यहाँ घूमने आए हैं। शायद ये भी हमारी तरह गच्चा खा गए पारदर्शी नदी देखने के मामले में।

कल रात तो बड़े आराम से सीढ़ियां उतारते हुए नीचे आ पहुंचा था। पर अब चुनौती है खाली पेट इन सीढ़ियों पर चढ़ कर ऊपर तक पहुंचने की।

नकली जहाज के पास तस्वीरें लेने की इच्छा तो हुई मगर फिर रहने दिया। वापस आया, मनरेगा के बोर्ड के पास रखे बैग को उठा कर चल पड़ा एक चढ़ाई चढ़ने।

भारी भरकम वज़न लेके चढ़ना ऐसा लग रहा है मानो माउंट एवरेस्ट की चढ़ाई के लिए निकला हूँ।

इससे पहले कभी इतने वज़न के साथ इतनी सीढ़ियां शायद ही कभी चढ़ीं हों। उद्देश्य ये है कि बिना रुके ऊपर पहूचना है। क्यूंकि कहीं भी अगर मैं रुक गया तो फिर बहुत देर के लिए रुक जाऊंगा।

पानी की एक बोतल हांथ में। छोटा बैग छाती पर ताकि बैग का लोड समांतर रहे आगे और पीछे दोनों से। कहीं पीछे की तरफ वज़न ज्यादा हुआ तो पता चला बैग सहित ही नीचे जा गीरूं।

चोट लगेगी वो अलग पर दोबारा से चढ़ाई चढ़नी पड़ेगी उसका बहुत कष्ट होगा। कुछ ऊपर तक ही सही किनारे किनारे लगी रेलिंग का सपोर्ट है।

जिसके कारण यही रेलिंग पकड़ पकड़ कर ऊपर चढ़ रहा हूँ। जिससे थकान भी कम लग रही है और मेहनत भी। सीढ़ी के दोनों ओर घना जंगल है।

जहाँ रहने वाला तो कोई नहीं नजर आ रहा पर रखवाली जरूर की जाती होगी इस जगह की। कूडादान की पेटियां जगह जगह लगी हुई हैं।

ऊपर को जाती सीढियाँ

ताकि कचरा कोई आसपास ना फेंके। सीढ़ी के किनारे सोलर लाइट भी लगी हुई हैं। जो पता नहीं सिर्फ लगी हैं या जलती भी हैं।

बारहों मास मेघालय का मौसम एक सा रहता है। ना बहुत ज्यादा गर्मी ना बहुत सर्दी। पेड़ होने के कारण हरियाली में कोई कमी नहीं है।

सीढ़ियां बड़ी बड़ी हैं और छोटी छोटी भी। हर कुछ छोटी सीढ़ी के बाद बड़ी सीढ़ी है ताकि इंसान अपनी रफ़्तार पर काबू रख सके खासतौर पर उतरते वक्त।

और चढ़ते वक्त शायद थकान दूर करने के लिए काम में आती होंगी ये सीढ़ियां। आज चेरापूंजी के लिए रवाना होना है। उससे भी पहले मावलेनोंग और भारत बांग्लादेश तमाबिल बॉर्डर।

पूरी चढ़ाई के दौरान आज भी और कल भी सिर्फ एक मात्र घर दिखा सीढ़ी के पास। जिसमे ज़िंदा लोग मौजूद हैं।

तकरीबन तीस मिनट की मशक्कत के बाद पसीने से लथपथ टीशर्ट में आखिरकार आ पहुंचा उस जगह जहाँ पर इंसान बसेरा है।

यहाँ दो तरफा मार्ग है एक ऊपर चढ़ने के लिए दूसरा नीचे उतारने के लिए। जिसे बंबू से सजाया गया है। थोड़ा आगे सड़क के ऊपर सपाट ऊपरी चढ़ाई और फिर ढाबा।

ढाबे पर खाना

आ गया ऊपर पर को सबसे पहला काम मैं करूंगा वो ये कि क्या मेरी गाड़ी खड़ी है या गायब हो गई। पर नजर पड़ी तो शुक्र मनाया की स्कूटी ठीक उसी जगह पर खड़ी है जहाँ लगा कर गया था।

कल रात जिस आदमी से पीछा छुड़ाया था वो फिर से दिखा। और दोबारा से दिमाग खराब करने की कोशिश में लग गया। खाना खाने की लालसा से सामने वाले ढाबे में आ पहुंचा।

यहाँ भी वो आदमी खाने के नाम पर छूट दिलवाने की बात कर रहा है। बैग एक किनारे रख दो थाली लगाने का ऑर्डर दे दिया। इसी बीच यहाँ काम करने वाला एक लड़का हांथ धुलवाने आ पहुंचा।

खाना आते ही लजीज खाना अन्दर किया। जीने चढ़ने के बाद शरीर इस कदर टूट चुका था कि खाने की उपयोगिता बहुत महत्वपूर्ण है चली थी।

खाना खाने के बाद शरीर में शक्ति का संचार हुआ है। भुगतान के समय भी वो आदमी पीछा छुड़ाने का नाम नहीं ले रहा है। और फिर से छूट की बात कर रहा है।

पर यहाँ भी बिना छूट लिए ज्यादा रुपए भुगतान किए ताकि इससे कोई लेनदेन रहे ही ना। चाभी ले स्कूटी लेने आ गया मैदान में जो कि भीगा हुआ सा लग रहा है।

देखने में आया यहाँ भी अच्छे खासे मकान बने हुए हैं पर कुछ खास जनजाति नहीं है। स्कूटी लेके ढाबे के सामने आ पहुंचा और बैग लाद कर निकल गया चेरापूंजी के लिए।

घना जंगल और बरसाती इलाका होने के कारण यहाँ जीव जंतु अलग अलग और नए नवेले दिखाई पड़ रहे हैं। जो अपने आप में अनोखा अनुभव है।

एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव मावलेनोंग

कच्ची सड़क से होते हुए चेरापूंजी के रास्ते मुड गया। जाना है एशिया के सबसे साफ गांव मावलेनोंग।यह गांव तब तक लोगों की पहुंच से अनभिज्ञ रहा जब तक डिस्कवरी भारत की पत्रिका 2००3 में इस गांव को एशिया का सबसे स्वच्छ गांव के नाम से सम्मानित नहीं किया गया।

मावलेनोंग का सन्तुलित पत्थर

उसके बाद तो यह सैलानियों का केंद्र बन गया और तबसे ले कर अब तक बना हुआ है। खासी आदिवासियों की लगभग सौ परिवार यहाँ बसे हुए हैं।

मावलेनोंग को भगवान का बगीचा भी कहा जाता है। इस कदर यहाँ साफ सफाई है की सड़क पर एक तिनका भी नहीं देखने को मिलेगा।

जगह जगह बंबू के कूड़ेदान लगे हुए हैं। यहाँ तक कि पेड़ की पत्तियां भी गिरती हैं तो बंबू में।

प्लास्टिक, सिगरेट पीना, कूड़ा कचरा फैलाना खासे तौर पर प्रतिबंधित है। और ये सिर्फ गांव वासियों के लिए ही नहीं बल्कि शहर से आने वाले सैलानियों के लिए भी लागू होता है।

और नियम तोड़ने पर भारी जुर्माना चुकाना पड़ता है। ना सिर्फ नौजवान या बूढ़े बल्कि बच्चे भी यहाँ की साफ सफाई के प्रति बहुत जागरूक हैं।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपने कार्यक्रम मन की बात 2015 में इस गांव का जिक्र किया था।

इसके अलावा मावलेनोंग से कुछ किमी दूर पर संतुलित पत्थर भी मौजूद है जो मामूली पत्थर पर टिका हुआ है। गांव वालों का तो यहाँ तक मानना है की साल में एक बार शार्क मछली के जबड़े के आकार का दिखने वाला ये पत्थर हवा में तैरता है।

पड़ोस के गांव रेवाई में पेड़ की टेहनी से बना पुल भी है। जिसके ऊपर एक साथ 500 लोग खड़े हो सकते हैं। और इन 500 मानवों का वज़न झेलने की क्षमता रखता है ये पुल।

इसके साथ ही यहाँ एक अच्छा खासा व्यू प्वाइंट भी है जिसे लकड़ी से निर्मित किया गया है। रुकने के लिए भी अच्छे खड़े होमस्टे मिल जाते हैं।

ये सब बातें साथी घुमक्कड़ मुझे बता ही रहा है कि रास्ते में भीषण जाम देखने को मिल रहा है। हो सकता है मावलेनोंग जाने का विचार ही त्यागना पड़े।

भारत बांग्लादेश बॉर्डर

फिलहाल इस जाम को पार करते हुए भारत बंगलादेश बॉर्डर पर हो लिया जाए उसके बाद वापसी में मावलेनोंग गांव आ जाऊंगा।

पेट्रोल और डीजल के धुएं के गुब्बार और कीचड़ वाले रास्ते और ट्रकों की कतार को भेदते हुए निकल पड़ा तामाबिल बॉर्डर की ओर।

जाम इस कदर है की कई कई बार साथी घुमक्कड़ को उतारना पड़ रहा है ठीक से गाड़ी संतुलित करने के लिए। जाम से पार पाते हुए आखिरकार आ पहुंचा बॉर्डर।

भारत बांग्लादेश बॉर्डर पर लेखक

जहाँ पंजीकरण करा कर या तो भारतीय ट्रक उस पार जा रहे हैं या फिर बांग्लादेशी ट्रक। और उधर से भी यही क्रम चालू है।

स्कूटी बॉर्डर के गेट के आगे नहीं ले जा सकता ये तो तय है पर साथी घुमक्कड़ को लगा आगे के जा सकते हैं। बंकर में बैठे बीएसएफ सिपाही से पूछा तो उसने साफ मना कर दिया और सिर्फ भारतीय झंडे तक जाने की बात कही।

सो स्कूटी एक किनारे लगाते हुए बॉर्डर का गेट लांघकर आ गया कुछ पलों के लिए बांग्लादेश। पर मुझे फर्क कुछ भी ना नजर आया।

फर्क है तो सिर्फ भाषा का बस।

डारंग से भारत बांग्लादेश सीमा 9.5किमी

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