एशिया का सबसे बड़ा बोकारो स्टील प्लांट

झारखण्ड | बोकारो | भारत

बोकारो का आमंत्रण

साथी घुमक्कड़ के मित्र शाहरुख खान के आमंत्रण पर बोकारो के लिए जसीडीह स्टेशन से निकल रवाना हो रहा हूँ। आज मौसम बहुत ही आशिकाना लग रहा है। ट्रेन आने का ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ रहा है।

कुछ ही देर में आ जाएगी जैसा मोबाइल में दिख रहा है। स्टेशन परिसर की जमकर सफाई हो रही है मानो शहर के दामाद पधारने वाले हों।

आधे घंटे के भीतर पहले ही प्लेटफार्म पर ट्रेन धीरे धीरे अंगड़ाई लेते हुए आ गई। ये ट्रेन लोकल ट्रेन जान पड़ती है। भीड़ ज्यादा नहीं है। बैठने के लिए इतनी जगह है की पैर पसार कर यात्रा करी जा सकती है।

मूंगफली वाले से ले कर समोसे वाले तक ने ट्रेन में अपनी दुकान खोल ली है। लोकल ट्रेन हैं इसलिए समय से चल पड़ी। चलती ट्रेन में धंधा।

मैं खिड़की किनारे बैठ कर मौसम का मजा ले रहा हूँ। बारिश के भी आसार लग रहे हैं।

कॉलेज, स्कूली छात्र छात्राएं, ऑफिस के लिए झुंड में निकले कर्मचारी अपने निर्धारित स्टेशन उतर रहे हैं। जान पड़ता है कोई इम्तिहान है।

बच्चे किताबें का निचोड़ पीते दिख रहे हैं। कुछ जोर ज़ोर से बोलकर पढ़ रहे हैं, कुछ मन ही मन रट्टा मार रहे हैं। मुझे ये सब देख अपने बचपन के दिन याद आ गए।

सिलेबस में बीस चैप्टर होते थे, पढ़ता पंद्रह था, समझ में आते दस थे, लिख के आता था अगड़म बगड़म। फिर टीचर करते थे जादू का तिकड़म।

दस बज रहे हैं और मैं आसनसोल पहुंच चुका हूँ। ट्रेन से उतर कर पुल पार करते स्कमे साथी घुमक्कड़ से चर्चा छिड़ गई की अब करना क्या है?

बोकारो जाने का मेरा कोई खास विचार नहीं है। यहाँ से रांची लौट जाने का विचार भी आ रहा है। अलग होना भी ठीक नहीं है।

आसनसोल बंगाल में स्तिथ है। यह वही जगह है जहाँ से प्रसिद्ध घुमक्कड़ वरुण वागीश संबंध रखते हैं।

आसनसोल में कश्मकश

तय हुआ बोकारो साथ चलने का। स्टेशन से बाहर निकलते ही बसें हर जगह को जाने को तैयार खड़ी हैं। सड़क पार करके मैं मुख्य बस अड्डे पर निकल पड़ा।

बाबा आजम जमाने की बस देख कर लग रहा है मैं अस्सी के दशक में पहुंच गया हूँ। इधर उधर सब ठेठ बंगाली बोलते हुए नज़र आ रहे हैं।

भाषा समझने की कोशिश तो कोर रहा हूँ, पोर कुश समझ नहीं आ रहा। ऐसा लगता मानो मूह में पान दबाकर बोल रहे हों।

बस वाले ने अड्डे से कुछ किमी पहले ही उतर दिया। अब बाकी की दूरी यहाँ से पैदल ही तय करनी होगी

तेज धूप में शरीर से पसीना पानी की तरह बेह रहा है। इस पानी को बंद करने के वास्ते जरा देर छांव में खड़ा हो गया। जूस की दुकान देख साथी घुमक्कड़ को प्यास लग आई।

दुकानदार से पूछने पर पता चला कि बस अड्डा ज्यादा दूर नहीं है। बंगाली बोली भाषा, वेश भूषा देखने को मिल रही है।

लेकिन अभी बंगाल में अच्छे से समय बिताने वाला समय अगले कुछ दिनों में अयगा।

ममता बनर्जी की अव्यवस्थित बंगाल की खस्ता हालत जगह जगह देखने को मिली।

साथी घुमक्कड़ के जूस गटकने के बाद आंगौछे की छांव में निकला। भीड़ बहुत है। हर जगह जिधर देखो उधर जनता।

बस अड्डे पहुंचना ही हुआ की सनसनाती हुई बस आई। कंडक्टर बोकारो चिल्लाते हुए सवारियां भरने लगा। बोकारो जाने वालीं सब सवारियां ऐसे टूट पड़ी की अब कोई और बस नहीं है जाने के लिए।

दरवाज़ा तो मानो जाम ही कर दिया है। ना अन्दर से कोई बाहर आ सकता है ना बाहर से कोई अन्दर।

मौके को भांप कर मैंने एक सीट पर अपना छोटा बैग रख कर वो सीट अपने नाम अंकित कर ली।

भारत में ये आम बात है। अगर अपने किसी सीट पर रुमाल, आंगौछा, बैग, झोला कुछ भी रख दिया तो फिर कोई दूसरा माई का लाल उस जगह को छूता भी नहीं है।

आखिरकार कंडक्टर बाबू को बीच में आना ही पड़ा। भीड़ हटी सब एक एक कर अन्दर गए। मैं भी।

मैं इतमीनन से बैठ गया, कुछ सवारियों के साथ बस निकल पड़ी बोकारो।  

तशरीफ रखते ही पता लगा सीट बहुत गीली है। बैठने लायक ही नहीं है।

ये क्या माजरा है, इतनी तेज़ धूप में इतनी गीली सीट। हो सकता है ये बस किसी बरसाती क्षेत्र से आई हो।

बगल वाली सीट पर बैठा वो भी गीली। अबकी हांथ रख कर दूसरी सीट पर बैठा वो सूखी मिली। बस ज्यादा समय ना लेते हुए चल दी।

बस में कुछ उपद्रवी बालक बैठ गए सबसे पिछले हिस्से में। मुझे याद है जब मैं कॉलेज जाया करता था। तब कैसे हम सब बस की पिछली सीट पर कब्ज़ा कर लिया करते थे। 

शाहरुख खान

साथी घुमक्कड़ ने बताया कि प्रतीक को उसके मित्र शाहरुख खान के नाम से जानते हैं। क्योंकि वह अभिनेता शाहरुख खान का बहुत बड़ा प्रशंसक है।

वह कुछ कुछ दिखता भी शाहरुख जैसा है। ऐसे तो बोकारो में घूमने लायक तो कुछ भी नहीं है।

सिर्फ आमंत्रण का मान रखने ही जा रहा हूँ। वैसे बोकारो में एशिया की सबसे बड़ी उत्पादन फैक्ट्री है।

बोकारो के मार्ग में अनेक प्रकार की कोयले कि फैक्ट्रियां दिखीं। जिनमे काम पर लगे खून पसीना एक करते हुए मजदूरों को देखने योग्य है।

वह किस लगन के साथ अपना फ़र्ज़ निभा रहे हैं। देश की अर्थव्यवस्था की नींव गड़ते हैं। धनबाद आते आते मौसम बिगड़ चुका है।

धनबाद से चढ़े कुछ एक फैजल खान। बस में घुसते ही तमक पड़े। उनके मुताबिक जिस सीट पर मैं बैठा हूँ वो उन्होंने आरक्षित कराई है।

मुझे लगा ये बंदूक निकाल कर गोली ही मार देंगे। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं। 

धनबाद में स्वागत बेहेस के साथ हुआ

मैं उठ तो गया पर ये जता दिया की मेहमान के साथ बरताव करने का सलीका धनबाद के मानुष को नहीं है।

ये सुनते ही वो और उसके साथी शर्मसार हो गए। बाकी का रास्ता पिछली सीट पर बैठ कर गुजरा।

अभी तक रास्ता बढ़िया था पर अब रास्ता उबड़ खाबड़ है। ढोलती बस में नानी याद आ गई। कभी इधर सिर टकराता कभी उधर।

कुछ घंटो में धनबाद के रास्ते बोकारो पहुंच गया। सीधा बस अड्डे पर ही उतरा। फोन पर शारूख खान से संवाद जारी है।

शाहरुख खान दिल्ली की किसी कंपनी में कार्यरत है। अपनी अनुपस्थिति में फ़ौरन अपने खास मित्रों को दुपहिया वाहन के साथ बस अड्डे पर भेज दिया।

बस अड्डे पर मैं साथी घुमक्कड़ के साथ उनका इंतजार कर रहे हैं। वक़्त कुछ ऐसा है कि कुछ ही घंटो में सूरज ढलने को है।  

कुछ वक्त में शाहरुख खान के मित्र आ धमके। उनकी गैर मौजूदगी में भी उनके मित्रों ने स्वागत में किसी प्रकार की कमी नहीं होने दी।

दो वाहन अपने साथ लाए हैं। एक पर मैं बैठा दूसरे पर साथी घुमक्कड़। बस अड्डे से दूर चौराहे पर ढाबे में दोनो जाने हमें ले आए।

चाय की चुस्की पर चर्चा होने लगी की हम शाहरुख खान को किस तरह से या कितने समय से जानते हैं।

अब बचा कुचा समय यहीं तो बिताना नहीं है। भुगतान के बाद दोनो मित्र हमें बोकारो दर्शन के लिए ले कर निकल पड़े।

बोकारो स्टील फैक्ट्री

शाम के पांच बज रहे हैं और हम बोकारो स्टील फैक्ट्री के सामने खड़े हैं। बस कुछ देर में यहाँ छुट्टी का घंटा बजेगा।

मित्र ने बताया की छुट्टी के बाद वाहन की सेना का नज़ारा देखने लायक है। अभी सारे वाहन गेट के उस तरफ घंटा बजने का इंतजार कर रहे हैं।

तब तक मैं तस्वीर निकलवा लेता हूँ। आ कर खड़ा होना था की छुट्टी हो गई। वाहनों का दल सड़क पर ऐसे टूटा है जैसे किसी युद्ध के लिए निकले हों।

इतनी तादाद में भीड़ छूटी मानो युद्ध में किसी राजा के आदेश पर दुश्मन सेना पर आक्रमण को निकले हों।

भीड़ को अपनी ओर आता देख बीच सड़क से किनारे जाने तक का तब तक मौका नहीं मिला। जब तक संख्या कुछ कम ना हो गई तब तक।

इस कृत्य को देखने के बाद हम निकले बोकारो के प्रमुख तालाब। कहाँ जाना है ये सब ये दोनो मित्र ही फैसला कर रहे हैं।

गाड़ी स्टार्ट हुई और भीड़ में हम भी चलने लगे। तालाब को जाने वाला रास्ता बेहद ही जंगली और डरावना है। घने पेड़ और झाड़ियां।

अंकित ने बताया कि उद्योग का जितना भी कचरा है वह सब इसी तालाब में इक्कठा होता है।

दुपहिया वाहन एक किनारे लगा कर इतनमीनान से बातें होने लगीं। यहाँ पहले से ही कुछ लौंडे लपाड़े मौजूद हैं। ये जगह नक्शे पर ऐसा दिखा रहा है जैसे लग रहा है की तलब में ही खड़ा हूँ।

अंकित ने बताया की ये इतना जहरीला है की इसमें कोई जंतु गिर भर जाए तो शायद उसकी हड्डियां भी नहीं बचेंगी। गहराई का तो अंदाजा ही नहीं लगाया जा सकता।

बोकारो स्टील फैक्ट्री के पास का तालाब जिसमें पड़ा है टनो का मलबा

तालाब के आसपास शराब की बोतले और कुछ अलग कचरा जमा हुआ है। वैसे इन नव युवकों ने बोकारो का इतिहास भी बताना शुरू किया।

कैसे गैंग्स ऑफ वासेपुर फिल्म एक सच्ची घटना पर आधारित फिल्म है। इस बारे में मुझे बिल्कुल भी जानकारी नहीं थी इनके बताने से पहले।

कैसे यहाँ के मामूली मजदूर लोहा बेंच बेंच कर सेठ बन गए। फैक्ट्री की बत्तियां चालू कर दी गई हैं। शाम के समय तालाब के बीचों बीच से बादलों में सूर्यास्त का तरकश नजारा देखने को मिल रहा है। 

समय रहते हमने यहाँ से निकलने का फैसला किया। अंधेरा होने से पहले ही हम बस अड्डे आ पहुंचे। बोकारो से अलविदा लेने का समय आ गया है।

जोरो की भूंख लगी है वापस शहर में आकर समोसे पेट में डाले। वैसे मैं घुमक्कड़ी में ये सब खाने से परहेज़ करता रहा हूँ लेकिन आज मजबूरी वश ही सही।

रांची वापसी

मेरे विचार से ट्रेन से निकल जाना बेहतर रहेगा। क्योंकि अभी रांची के लिए एक ट्रेन है। जिसमे बैठ कर पहुंच सकते हैं।

अंकित ने बताया कि बस अड्डे से रेलवे स्टेशन काफी दूर है। वहाँ पहुंचते पहुंचते ट्रेन निकल जाएगी बेहतर यही रहेगा बस से निकल जाऊं।

इसी पर अमल करते हुए मैं इन्तज़ार करने लगा रांची की ओर जाने वाली बस का। आसपास खिड़की पर पता किया तो मालूम पड़ा रात्रि आठ बजे एक बस है। 

तब तक के लिए बस अड्डे के अंदर आ गया। अब यहीं से बस पर नजर बनाए रखूंगा।

उधर शाहरुख खान के ये मित्रों को अलविदा कहने का समय आ गया है। वो दोनो अपने अपने वाहन से घर की ओर रुखसत कर गए।

पहले एक फिर दूजी फिर जब तीसरी बस आई। उनसे सारी जानकारी ली तब पता चला ये बस रांची जायेगी। बस सड़क पार करके खड़ी हो गई।

हमें सोने के लिए सबसे ऊपर वाली सीट मिली जिसमे पैर पसाड कर लेट गया। कब आंख लग गई पता ही नहीं लगा।

इस चार घंटे के सफर में बस जब रांची पहुंची। मेरी आंख खुली तो लगा ये इलाका कुछ जाना पहचाना सा क्यूं लग रहा है?

जोर देकर ध्यान दिया तो याद आया ये तो वही मिलिट्री कैंप है जहाँ उतरना है दीपाटोली। आनन फानन में मैं उठा साथी घुमक्कड़ को धक्के मार कर उठाया। 

जब तब बस के दरवाजे तक पहुंचा एक किमी आगे आ चुका हूँ। ड्राइवर को रोकने को बोलने पर भी बस रोक ही नहीं रहा।

जब कंडक्टर के नंगे पैर की अंगुली पर जोर कि लात पड़ी। दर्द से कराहते हुए उसकी चीख से ड्राइवर ने गाड़ी रोकी। मैं फाटक से नीचे उतर गया। 

वापस एक किमी चल कर मिलिट्री कैंप पैदल आया जहाँ उतरना था। सही समय पर बस रुक जाती तो खामखा इतना कष्ट ना देना पड़ता पैरो को।

कल शनिवार है और कादिर भी मेरे साथ घूमने जा सकता है ऐसे संकेत मिल रहे हैं। कैंप के फाटक पर कादिर हमें लेने आ पहुंचा। 

कादिर ने पहले से ही कैंटीन से भोजन की व्यवस्था कर रखी है। हम सब भोजन करके कुछ देर कैंप में ही चहल कदमी करने लगे। 

जहाँ कादिर सब रेजिमेंट की वीरता और शौर्य गाथा बताता जा रहा है जो रोंगटे खड़े कर देने योग्य हैं।

जसीडीह से आसनसोल से बोकारो से रांची 350km

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