एरिज़ोना का अंश गांडिकोटा घाटी

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | गांडिकोटा | भारत

रेल परिसर

शोर शराबे में नींद टूटी। आंख खुली तो पाया स्टेशन पर आए यात्री मुझे टकटकी बांधे देख रहे हैं और मैं खुद को। स्टेशन पर काफी हलचल है।

जो कोई भी आ रहा है वो तम्बू को ऐसे देख रहा है जैसे अंधो में काना राजा। मैं बाहर ही सो रहा हूँ। ये सब देख कर अपनी चादर से अपना शरीर ढकते हुए तम्बू के अन्दर आ गया। अंदर तंबूके सिरहाने बैठे बैठे अपनी चटाई खीच ली।

अंदर साथी घुमक्कड़ को उठाया जो सोने में तो और भी धाकड़। बस, ट्रेन, बैल गाड़ी जहाँ जगह मिली वहाँ सो जाते हैं। बदन पर कुछ वस्त्र वापस चढ़ाएं और बोरिया बिस्तर समेटने लगा।

सब कुछ समेट कर बैग में भर लिया। सोच रहा हूँ यहीं बैग जमा करा कर निकल जाऊं और शाम को निकलते वक्त यहीं से रेलगाड़ी में बैठ कर निकल जाऊं।

अफसोस अमानती घर यहाँ भी नजर नहीं आ रहा है। आज भी कल की तरह झोला ले कर ही घूमने जाना पड़ेगा। यहाँ स्टेशन मास्टर के सिवाय और कोई भी नहीं है।

स्टेशन इतनी ऊंचाई पर है की कस्बे की तरफ झांकने पर लगता है की घर की छत में लगी पानी की टंकी के ऊपर खड़ा हूँ। अंतरजाल में देखने पर पता चला की यहाँ जगदलमदगु स्टेशन पर दिन में सिर्फ दो बार ट्रेन आती है। पहली सुबह और अंतिम शाम को। उसके बाद सिर्फ सन्नाटा पसरा रहता है।

स्टेशन पर कुछ मिनटों में रेलगाड़ी भी आ गई। कल रात के मुकाबले सवारियां भी उतरी और चढ़ी भी ज्यादा। अन्यथा कल मेरे अलावा कोई उतरा ही नहीं था।

रेलगाड़ी के आने के समय यहाँ खूब ऑटो खड़ी थीं। मैं समान, तंबू, कपड़े समेटता रह गया। उधर झांका तो देखा सारे ऑटो सवारी ले कर गायब।

ट्रेन के समयानुसार ऑटो चालक भी ट्रेन आने के आधे घंटे के भीतर लापता हो जाते है। बाकी समय यहाँ सन्नाटा पसरा रहता है। आप चाहें तो कोई भी खेल प्लेटफार्म पर खेल सकते हैं बिना किसी बाधा के।

स्टेशन का निचला हिस्सा बंद पड़ा है। मेरे परिसर से बाहर निकलने से पहले एक ट्रेन कुछ ही देर पहले जा चुकी है। इससे पहले ऑटो वाले भाग जाए मुझे निकल लेना चाहिए था।

रेल परिसर में तम्बू लगा कर सोना हुआ

रवानगी

आराम से पूरे स्टेशन का नज़ारा लेते हुए जबतक बाहर आया सब ऑटो वाले जा चुके हैं सिवाय एक को छोड़ कर। इन ना जाने वाले चालक ने बिना पूछे ही गांडिकोटा जाने का भाड़ा तो ऐसे बताया जैसे चांद पर जाने को बोल दिया हो!

बैग ले कर किनारे खड़ा हो गया। नजर पड़ी एक सज्जन पुरुष पर। जो अपने दुपहिया वाहन से किसी को स्टेशन पर छोड़ने आए हुए हैं।

अनजान और शहर में नया समझकर ये जनाब मेरा हालचाल लेने लगे। पूछने पर मैंने उन्हें बताया कि मुझे कंहा तक जाना है। वो देख कर ही समझ गए हैं कि मुझे कहाँ तक जाना है।

काफी मददगार साबित हुए ये भाईसाहब, गाड़ी घुमाई और एक बैग अपनी बाइक के ऊपर और दूसरा बैग मैं टांगकर बैठ गया। साथी घुमक्कड़ को बीच में सैंडविच बना बैठ गया।

तब तक जबतक पहुंच ना गया। रास्ता भी वीरान और सन्नाटा। रात में शायद इसीलिए एक भी बत्ती नजर नहीं आ रही थी। जब कोई रहेगा नहीं तो प्रकाश कहाँ से होगा।

दूर दूर तक सिर्फ सूखे मैदान। मौसम इतना शानदार हो रखा है जिसकी कोई सीमा नहीं। जरा सी भी धूप नजर नहीं आ रही। आज घूमने में बहुत आनंद आएगा।

आंध्रप्रदेश खजाना है ऐसी गुमसुम जगहों का। भाईसाहब ने हमें बैग सहित बस स्टैंड पर उतरी दिया। जाते जाते ये भी बताते जा रहे हैं की गांडिकोटा जाने के लिए नौ बजे बस आयेगी। मुझे बस पैर जमा कर यहीं खड़े रहना है।

बैग ले कर पास के ठेले और सिनेमा थिएटर के सामने खड़ा हो गया। बस आने में अभी एक घंटे का समय है। समय का सद्पयोग करने के लिए चाय पीने की सोची।

चाय इतनी अच्छी लग रही है की कुछ देर बाद दोबारा चाय का ऑर्डर दे डाला।

मेरे अलावा और भी जनता जनार्दन प्रतीक्षा में है। जब भी कोई बस आती मुझे लगता यही ले के जाएगी। हर बार चाय वाला इशारा करता ठहरने का।

सामने बने सिनेमा हॉल के बाहर नई बॉलीवुड फिल्म वॉर का पोस्टर लगा है। एक अधेड़ उम्र का आदमी पोस्टर में बने अभिनेताओं को ऐसे घूर रहा है जैसे अभी दो दो हाथ हो जायेंगे। या तो ये पोस्टर फाड़ देंगे या दीवार तोड़ देंगे। पर दस मिनट बीत जाने के बाद भी ऐसा कुछ ना हुआ और चुपचाप खामोशी से ये महाशय निकल लिए।

दो कप चाय पीने का असर अब पेट पर पड़ता महसूस हो रहा है। जब लग रहा है किसी स्नानघर में जा कर हल्का हो जाऊं। इसी मंशा से सड़क पार कर सिनेमा हॉल की तरफ बढ़ा।

सिनेमा में आते ही उचित जगह ढूढने लगा। पर यहाँ तो हर जगह ताला पड़ा हुआ है। तभी साथी घुमक्कड़ का बुलावा आया जिससे पता चला की बस का आगमन हो चुका है। पर वो ये बस ना है।

ठीक नौ बजे बस अाई, इस बार मैं हिला ही नहीं मुझे लगा होगी कहीं जाने वाली, तब चाय वाले ने हाथ हिलाते हुए बताया इसी में जाना है। झोला झंडा ले के लद गया बस में।

अनंत सड़क पर चलती बस

सुनसान सड़क पर सिर्फ दो चार गाडियां। कस्बे से बाहर निकलते ही ये संख्या और भी कम हो गई। सन्नाटा पा कर मवेशी भी अपनी भेड़ बकरी सड़क पर ले आए हैं।

रास्ते में बस रुक रुक कर सवारियां भी भर रही है। किनारे गिट्टी मौरंग देख कर लग रहा है कुछ कार्य होना संभव है।

सन्नाटे रास्तों से गुजरते हुए गांडिकोटा आ पहुंचा। घड़ी में दस बज रहे हैं। बस से तब तक नहीं उतरा जब तक कंडक्टर ने खुद आकर नहीं बताया कि आपको यहीं पर उतरना पड़ेगा आगे जाकर बस मुड जाएगी। और मैं सोच रहा था किले के भीतर भी जाएगी बस। पर ऐसा कुछ नहीं हुआ।

बैग की समस्या अभी भी जान पड़ रही है। कैसे इसे लादकर घूमूंगा। भूख जोरों की लगी है। कोने पर दो तीन दुकानें हैं। सन्नाटा पसरा देख मैं आगे वाली दुकान पर आ गया।

यहाँ एक महिला बड़े से तवे पर डोसा बना रही है। मैंने भी दो का ऑर्डर दिया और सीमेंट की बनी मेज़ कुर्सी पर झोला पटकते हुए बैठ गया।

याद आया आज हड़बड़ी में तो मंजन करना ही भूल गया। इसी बीच आंटी जी ने झटपट दो डोसे बना भी दिए और मैं मंजन करता रह गया।

यहीं दुसलखाने में कुल्ला करने के बाद नाश्ता करने आ पहुंचा। डोसा का स्वाद इतना उम्दा है कि मुझसे रहा ना गया। आंटी को ऑर्डर दिया एक और बनाने का।

किसी गांव में इतना स्वादिष्ट डोसा वो भी इतने कम दाम में शायद ही कहीं मिले! नाश्ता करने के बाद छोटे बैग में जरूरी सामान रख लिया। गांडिकोटा किला निकलने से पहले बैग इन्हीं की दुकान में रखवा कर बेफिक्र निकल पड़ा।

गांडिकोटा किला

किले में किसी भी प्रकार का कोई प्रवेश शुल्क नहीं है। पर लोगों से पता चला की पहले हुआ करता था। किले का द्वार बड़ा टेड़ा मेड़ा है। शायद सुरक्षा को ध्यान में रख कर ऐसा निर्माण किया हो।

किला अभी भी काफी हिस्से से क्षतिगस्त है लेकिन इसकी बाहरी दीवारें अभी भी सलामत है। ये दीवारें बिल्कुल नई दिखाई पड़ रही हैं।

वाहन के जरिए भी लोग अन्दर से शहर की ओर जाते दिख रहे हैं। शायद अन्दर कोई गांव बसता होगा। दो तीन मुख्य द्वार पर करके आखिरकार किले के अंदर आ गया।

सबसे पहली जिस पर दृष्टि पड़ रही है वो है पाठशाला। लगता है लंच विराम हुआ है तभी बच्चे इधर उधर मंडरा रहे हैं या फिर शिक्षक कि अनुपस्थिति में हो सकता है ये मौज करने निकल गए।

मस्ती की पाठशाला के आगे कैदखाना बना हुआ है जहाँ महाराजाओं के समय में अपराधियों को कैद करके रखा जाता था।

वीरान पड़े इस क्षेत्र में कभी राजाओं की सभा लगा करती थी। विभिन्न राजवंशों के लिए शक्ति का केंद्र रहा है। 300 वर्ष तो सिर्फ पम्मासनी नायक की राजधानी रही।

पम्मासनी रामलिंग नायक ने किले के भीतर 101 मीनारों का निर्माण कराया था। जिसमें मुगल शासकों ने अपने काल में अनेक परिवर्तन किए।

मजेदार बात ये है की 1123 में नदी किनारे मिट्टी का किला बनाया गया था। काकतिया शासकों के बाद तुगलक फिर पम्मासनी रामलिंग नायक का अधिपत्य रहा।

कुतुब के हमले को पम्मासनी झेल ना सके और सत्ता से हाथ धो बैठे। हाल ही में यहां तांबे की तस्तरी मिली है जिसे 16वीं शताब्दी का बतलाया गया है।

सरकार द्वारा गांडिकोटा को विश्व धरोहर दिलाने का हर संभव प्रयास जारी है।

गांडिकोटा किला

झुग्गी बस्ती से होते हुए आ पहुंचा एक मस्जिद के समकक्ष। जिसमे कुछ धर्म के अनुनाई अपनी दिनचर्या व्यापन कर रहे हैं। सूर्य देवता से किसी कृपा की उम्मीद कम ही दिख रही है। सर पर अंगौछा लपेटे मैं ग्रैंड केन्यॉन की ओर बढ़ा जिसके लिए गांडिकोटा प्रसिद्ध है।

ऊंचे नीचे रास्ते से गुजरते हुए उछल कूद मचाते हुए आगे निकल आया। रोचक ये देखने को मिल रहा है कि यहाँ लोग अपने परिवार जनों के साथ आए है।

जिसे मैं बिल्कुल भी सुझाव नहीं दूंगा। क्योंकि उम्रदराज और अस्वस्थ लोगों के लिए ये चट्टाने किसी खतरे से कम नहीं है। मैं बहुत आगे निकल आया हूँ साथी घुमक्कड़ काफी पीछे रह गया।

पथरिले छोटी चट्टानों को पार करते हुए चोटी पर चढ़ने की कोशिश करने लगा तो देखा मेरे स्वागत के लिए बंदरों का झुंड तैनात है। ये देखने में इतने मरीयल और सूखे लग रहे हैं जिन्हें देख के लगता है इन्हे दशकों से खाने को नहीं मिला।

उपर चढ़ते ही मेरी घेराबंदी हो गई। मैंने हाथ खड़े कर दिए हैं। हमले की फिराक में खड़े ये बांदर एक एक कर घूरते हुए निकल रहे हैं।

इनमे में से एक नी हिमाकत भी की। जब मुझे लगा मैं बुरी तरह से घिर चुका हूँ और यहाँ गतिविधि करने से जान पे भी आ सकती है। तब मैं यहाँ से धीरे धीरे सरकने लगा।

खतरे से बाहर आ गया। अगर यहाँ बंदर आत्मरक्षा में हमला करते तो शायद मैं उनके हमले से बचने के चक्कर में खुद को बचाते बचाते खाई में भी गिर सकता था।

द ग्रेट ग्रैंड कैनियन

पेन्नार नदी एर्रामला पहाड़ियों से होकर गुजरती है और इसी नदी से बने एक शानदार मोड़ के लिए भी गांडीकोटा जाना जाता है। मैं ठीक उसी जगह खड़ा हूँ। ये एक छोटा सा नमूना है। अमेरिका में तो ऐसी ही घाटी 400किमी तक फैली है। घुमक्कड़ी के क्षेत्र में भारत में हर चीज उपलब्ध है।

प्रकृति की वास्तुकला के इस सुंदर टुकड़े को भारत के छिपे हुए ग्रैंड कैन्यन के रूप में जाना जाता है और इसे जो भी देखता है वो इसकी सुंदरता की तारीफ किए बिना नहीं रह पाता।

कहा जाए तो ग्रैंड कैनियन का भारतीय वर्ज़न है, जो एरिज़ोना कैनियन को टक्कर देता है। काफी दूर नजर पड़ी तो देखा बादलों का एक बहुत बड़ा समूह आसमान लो घेरे बरसते हुए इधर की ओर चले आ रहे हैं।

बरसते हुए बादलों को इतनी दूरी से देखने का ये दृश्य अत्यंत ही मनमोहक और लुभावना है। मैं इंतजार करने लगा इनके करीब आने का। जमकर तस्वीरें निकल ली।

दूर से आती बारिश का नज़ारा

तब तक के लिए अंग्रेजी गाने सुनता रहा। आधे घंटे बाद हल्की बूंदाबांदी के साथ पास तो आए लेकिन ज्याातर हिस्सा ग्रैंड केन्यॉन से दूर ही है। हवा इतनी तेज चाल रही है की लग रहा है की कुछ देर में हवाई यात्रा पर निकल जाऊंगा।

तेज हवा और गरजते हुए बादलों के नजदीक आने से पहले ही सारी जनता यहाँ से पहले ही निकल ली है। बारिश तेज होने के साथ मैं भी निकलने लगा। पास ही छोटी सी गुफा जैसा पत्थर का बना हुआ है जिसकी आढ में बैठ कर बारिश रुकने का इंतजार करने लगा।

बारिश बंद होते ही फिर बाहर आ गया। सोच रहा हूँ कुछ तस्वीरें और चलचित्र बना लिया जाए। जनता की गैर मौजूदगी में ये आसान है।

कुछ नवयुवक नीचे खड़ी चट्टान को फतह करने की जद्दोजहद कर रहे हैं। जो की घातक साबित हो सकता है। आखिर इन लडको को यहाँ तक जाने का रास्ता कहाँ से प्राप्त हुआ।

नीचे नजर दौड़ाने पर किले की दीवार नजर आ रही हैं। हो सकता है को दुश्मन नदी के रास्ते आ कर हमला करने की फिराक में रहते होंगे। वो भी दो दीवार। एक नीचे फिर दूसरी पचास फीट ऊपर।

अब फिर से भीड़ आ रही है। मैंने एकांत में यहाँ काफी वक्त गुजर लिया है। घड़ी में तीन बज रहे हैं। वापस मुड़ते हुए उसी रास्ते से यहाँ पर बने कैदखाने की ओर बढ़ने लगा।

सब कुछ देखने के बाद ढाबे की ओर निकल पड़ा। बादलों का यूं आना जाना मन को मोह लेने वाला दृश्य था। पर्यावरण को इतने करीब से देखना आनंदमय है।

बारिश में चट्टान की आड़ में बैठे लेखक और साथी घुमक्कड

यहाँ पर्यटकों का शोर, लोगों की भीड़ नहीं मिलेगी। अच्छी बात ये भी है कि यहाँ जगह-जगह कूड़ा बिखरा हुआ नहीं दिखाई दे रहा है।

बाहर निकल कर ढाबे से बैग उठाए और बस का इंतजार करने लगा। जब तक बस नहीं अाई तब तक किले कि कुछ बाहरी तस्वीरें लेने लगा।

तस्वीर लेने के लिए थोड़ा आगे बढ़ा की तभी बस आ गई। बस से रवाना हो गया जगदलमदगु बस अड्डे। बस से वापस जाते शांत पर्यावरण का आनंद लेते हुए देर शाम तक पहुंच गया। ट्रेन एप से पता चल गया कि तिरुपति बालाजी जाने के लिए तड़िपत्रि से रात्रि ग्यारह बजे ट्रेन निकलेगी।

अब मेरा अगला स्थान है तिरुपति बालाजी। वहाँ जाने के लिए तड़ीपत्रि से ही ट्रेन पकड़नी पड़ेगी सो गंडिकोटा से तड़ीपत्रि रवाना हो रहा हूँ।

जमालम्मदगगु से गांडिकोटा से तड़ीपत्रि तक का कुल सफ़र 131 किमि

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *