अनोखी 360° सिरोलसर झील

जलोरी | ट्रैकिंग और हाईकिंग | भारत | हिमाचल प्रदेश

निकलने की तैयारी

रात को भले ही देरी से सोया लेकिन जल्दी उठने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बस पकड़ने के लिए मैं समय पर उठ गया। मोबाइल में समय देखा तो अभी चार बज रहे हैं। हिमाचल में एक दफा बस छूटी तो समझो पूरा दिन बर्बाद।

ये तीन चार घंटे की नींद ले कर खुद को तसल्ली दी। उठ जा ऐश्वर्य, हम बस में सो लेंगे। मन ने बात भी बड़ी जल्दी मान ली। मैट पर से उठ ही रहा हूँ कि तभी अलार्म बज उठा।

अलार्म बजने से पहले उठना आज की पीढ़ी के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं। अलार्म बजा तो लगा मानो बम फटा हो। नींद ना खुली हो होश आया हो।

बस छूटने और दिन की बर्बादी से बचने के लिए नींद भंग करना बहुत जरूरी है। इस विचार मात्र से पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई हो। फटाफट बोरिया बिस्तर समेट कर बैग में डाला। रातभर ऊनी मोजे टोपा सब बाहरी ही पड़ा रहा। मैट, चादर सब लपेट कर बैग में एडजस्ट कर दिया।

बैग टांगा और चल दिया गेट की तरफ। अंधेरी रात में जीना उतर कर गेट पर पहुंचा तो देखा यहाँ तो ताला लटका है। याद आया चाभी तो रिसेप्शन वाले गमछाधारी अंकल के पास ही मिलेगी।

अब गेट खुलवाना है तो चाभी लेने तो जाना ही होगा। बैग सहित ऊपर आ पहुंचा। रिसेप्शन पर देखा तो एक एक कर सब लड़के ढेर पड़े हैं।

उन्हीं में से एक लड़के को हिलाते हुए जगाने की कोशिश की। लड़का इतनी कच्ची नींद में है की मेरा हाँथ लगाना हुआ और ये उठ खड़ा हुआ। शुक्र है नींद में से जगा तो सही। शायद वो खुद बखुद समझ गया है उसे क्यों जगाया है।

फिर भी उससे मैंने ताला खोलने को कहा। आंखें मीचते हुए दीवार पर लटक रही चाभी निकाली और शर्ट पहनते हुए चल दिया मेरे साथ नीचे।

अंधेरे में टॉर्च जला कर इस लड़के को ताला दिखाया। वरना अंधेरे में ना जाने कहाँ का ताला खोल दे? लड़के ने ऊपर हाँथ मारा और गैलरी में लगा बल्ब लुपलूपाया।

चाभी फसाई और कट्ट से ताला खुलते ही मानो लगा मैं आज़ाद हो गया।

बस अड्डे पर मचा कोहराम!

गेस्ट हाउस से बस अड्डे की दूरी मेहेज़ चंद कदमों की है। फिलहाल बस अड्डे पर सन्नाटा पसरा है। हम दो प्राणियों के सिवा कोई नहीं दिख रहा है।

मन के साथ पेट भी हल्का करना है। गेस्ट हाउस में कहीं इंतजाम दिखा ही नहीं। या जल्दबाजी में मैंने भी पूछने की जहमत नहीं उठाई। फिलहाल तो अब बस अड्डे पर बने दुसलखाने के खुलने का इंतजार है।

दक्षिण भाग से मेरे अलावा दो और अभागे आते दिखे। सीधे दुसलखाने के दरवाज़े पर आ खड़े हुए। दरवाज़ा बंद होने पर थोड़ा विचलित जरूर हुए पर उन्होंने इंतजार करना जरूरी समझा।

कहीं से सुना कि पौने पांच बजे तक ये दुसलखना खुल जाता है। सुगबुगाहट हुई कि जिसके पास चाभी है वो तो आया ही नहीं अब तक। इधर लोग तड़प रहे हल्के होने को। पर चाभी मेन गायब है।

अब आलम ये है कि लोग दुसलखाने की जाली के पास खड़े हो कर गुहार लगाने लगे हैं। की शायद चाभी वाला अन्दर सो रहा हो। पर कोई जवाब ना आया।

कुछ का बस चले तो ये जाली भी तोड़ दें। साढ़े चार बजे से महाशय का इंतजार हो रहा है। लोग आज़ादी कि गुहार लगा रहे हैं। आज़ादी भारी पेट से।

पांच बज रहे हैं पर भाई साहब का कोई अता पता नहीं मिला। कुछ लोग चाभी मेन को ढूंढने निकल पड़े। आपातकालीन के हालात आ पहुंचे हैं कुछ लोगो के। पता नहीं कहाँ रह गया है। यहाँ लोगों का हाल बेहाल हुआ पड़ा है।

कुछ और वक़्त गुज़रा तो ज़लज़ला आने में देर नहीं लगेगी। थोड़ी देर में एक भाई साहब दातून करते हुए जाली के पास आकर खड़े हुए।

अपनी लुंगी से चाभी निकाली और खोल दिया शटर। फिर तो मानो लोग टूट पड़े हो दुसलखाने की ओर। मुझे लगा चाभी मेन के ऊपर लोगों का गुस्सा फूटेगा। पर ऐसा कुछ भी ना हुआ।

शुरू हुई बसें आना

बस अड्डे पर काफी सवारियां इक्कठी हो चुकी हैं। कोई दफ्तर जा रहा है तो कोई स्कूल। सब अपने अपने काम के लिए निकल पड़े हैं। फिलहाल बस अड्डे पर एक भी बस नहीं खड़ी है।

बस अड्डे के बाहर मनाली कि रास्ते किनारे चाय वाले ने भी अपना ठेला जमा रखा है। काफी देर बस के इंतजार में मैंने आखिर चचा से पूछ ही लिया। “बस तो नहीं निकल गई।”

मुंडी हिलाते हुए बोले अभी नहीं बबुआ बस आने ही वाली है। उनके बोलने की देरी थी और दनादन बसें आने लगी। लेकिन इनमें से मंडी के लिए कोई भी नहीं है। हर बार चचा की तरफ देखता तो मुंडी हिला कर मना कर देते।

एक खाली बस सीधे चाय के ठेले के सामने रूकी जैसे यही अड्डा हो। बस की रुकने की देरी थी कि कुछ सवारी लपक कर उस पर चढ़ने लगीं। कंडक्टर नीचे उतरा और सबको आराम से चढ़ने का मौका दिया।

लेकिन ये वो बस नहीं है जिसमे मुझे जाना है। ठीक इसके पीछे एक और बस आ खड़ी हुई। चचा ने खुद बाखुद बोल पड़े यही बस जाएगी मंडी।

पीछे वाली बस हॉर्न पे हॉर्न पेले पड़ी है। आगे वाली बस का दम निकल गया। मजबूरन उसे बस अड्डे में जाना पड़ा। मंडी जाने वाली बस को आगे आने का मौका मिला।

शायद अधिकतर सवारियां इसी बस का इंतजार कर रही थी। सब दनादन सामान लेे कर चढ़ने लगीं। इतनी भी सवारियां नहीं है कि सीट खाली ना बचे।

कुल्लू से मनाली तक का इन हरी भरी पहाड़ियों में सफर

इसलिए मैं इत्मीनान से पीछे खड़ा हो सबके अन्दर घुसने का इंतजार करने लगा। मैं शायद अंतिम सवारी हूँ। गनीमत ये रही की

बैठने को सीट आराम से मिल गई। सीट पर बैग पटकते हुए अपना आधिपत्य जमाया।

शुरू हुआ सफर

चूंकि बस की रवानगी साढ़े पांच बजे है उस लिहाज से कुछ मिनट तो हैं ही बस को चलने में। क्यों ना सुबह की चाय हो जाए। थी सोच कर बस से उतरकर ठेले वाले चचा को एक कप चाय बोल दी।

इधर चाय छन कर कप में गिरी ही है कि पता नहीं ड्राइवर को क्या सूझी की बस स्टार्ट करके चल पड़े। ना आव देखा ना ताव ये भारतीय होने की निशानी बिल्कुल भी नहीं है। समय से चल देना। यहाँ तो ट्रेनें तीन तीन दिन देरी से आती हैं।

इधर जिद्दी बस ड्राइवर बस रोकने को तैयार नहीं उधर मैं भागता हुआ कप लेे कर जैसे तैसे बस में चढ़ा। कप में से कुछ चाय धरती माता की भेंट चड़ गई।

दरवाज़े के पास चाय खतम करके पीछे वापस अपनी सीट पर बैठ गया। दो बड़े बड़े बैग के साथ एक साथ बैठने में थोड़ी मशक्क्त तो करनी पड़ेगी। ऊपर से दो सीटों के बीच की दूरी भी बहुत कम।

जैसे तैसे एक बैग सीट में फसा लिया और एक बाहर ही रखना पड़ा। चाय हाँथ पर गिरने से बुरी तरह जल गया है। बस ने अपनी राह पकड़ ली। और मैंने कुल्लू से अलविदा लिया। ऐसे पहाड़ी इलाकों में रोजमर्रा के कस्टमर सुनियोजित हो जाते हैं।

जो हर एक मील की दूरी पर बस का इंतजार कर रहे होते हैं। मुझे मैकलोडगंज की याद आ गई जहाँ कुछ इसी अंदाज में सवारियां उठाते हुए बस आगे बढ रही थी।

शायद इसी वजह से स्टार्टिंग प्वाइंट से समय से निकलना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। जो अब समझ आ रहा है। सवारियां चढ़ती गई बस चलती गई।

जीभी और जलोरी में कश्मकश

इधर कंडक्टर महाशय सबका टिकट काटते काटते मेरी सीट तक आ पहुंचे। उन्होंने मुझसे किस जगह का टिकट कटवाना है ये पूछा।

हालांकि दो जगहों को लेे कर कश्मकश रही जिभी और जलोरी जठ। इससे पहले मैं जिभी बोलता एक बार गूगल नक्शे पर देखने लगा कौन सी जगह ज्यादा दूरी पर है।

क्योंकि जितनी ज्यादा दूरी उतनी देर तक का आराम मिल जाएगा। जीभी के बाद जहाँ टूरिस्ट जाते है वो है जरोली। सो जालोरी जठ तक की टिकट कटवा ली।

हालांकि जीभी और जालोरी में घंटे भर के सफर का फर्क है मुश्किल से। इसी बहाने रात की बची कुची थकान भी मिट जाएगी। कंडक्टर बाबू से टिकट लेके सुस्ताने लगा।

अब तक बस में अच्छी खासी भीड़ हो चुकी है। इतनी की सीट छोड़ कर अगर खड़ा हो जाऊं तो बैठने को दस जना तैयार हैं।

पहाड़ों पर बस चालकों को भी सलाम ठोकते तो बनता है। वो जिस दुर्गम परिस्थिति में सड़कों पर बस दौडाते हैं वैसे करना बहुत ही असाधारण बात है।

पहाड़ों के किस्से

मोड़ पर पूरी गणित लगा कर बस काटते हैं। दाएं बाएं आगे पीछे कर के उस प्रक्रिया के दौरान जिया धड़क धड़क होने लगता है। एक छोटी सी चूक और पूरी बस खाई में।

खतरनाक पहाड़ियों के खतरनाक किस्से

इसी मुद्दे पर चर्चा हो ही रही थी कि बगल में बैठे दद्दू बोल पड़े। सालाना कोई ना कोई फिरंगी दुपहिया वाहन लेके नीचे जाता है। जहाँ गाड़ी की रफ्तार 10किमी प्रति घंटा की रफ्तार से चलनी चाहिए वहाँ ये 40किमी प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ाते हैं और खाई में जाते हैं।

पिछले साल की बात है बुलेट पर सवार ७-८ फिरंगी इसी कारण पहाड़ से उतरते वक्त खाई में गिर कर मर गए थे। जिनका कोई अता पता नहीं मिला।

ये सब बातें चल ही रही हैं और बस एक बेहद पतली सी सड़क पर चढ़ाई चढ़ने लगी। मैंने अभी तक के सफर में इतनी खतरनाक चढ़ाई का सामना नहीं किया और वो भी बस में बैठ कर।

देख कर लग रहा है बस के निकलने का कोई चांस ही नहीं है। पर ड्राइवर की कुशलता पर संदेह करना गलत होगा। और इस बस के चालक ने भी बड़ी सूझ बूझ के साथ बस निकाल दी पहाड़ की इस पतली सी सड़क पर।

इस तरह की परिस्थितियां दो चार बार उत्पन्न हो चुकी हैं अभी तक के सफर में।

हर बार ड्राइवर साहब सूझबूझ और कुशलतापूर्वक बस उस पर निकाल ले जाते हैं। जब सामने से कोई आ रहा होता और बस मोड़ पर होती तो मजबूरन वो गाड़ी पीछे ले जाते ताकि सामने वाला मोड़ से मुड कर नीचे निकल जाए और बस ऊपर।

पहाड़ों में सड़क का दो चालकों के बीच तालमेल होना बहुत जरूरी है वरना या तो दोनों खड़े रहेंगे या फिर दोनों खाई में। इसलिए पहाड़ी चालकों में समुद्र से तिनके से पानी निकालने के सामान धीरज होता है।

रोजमर्रा की सवारियां चड़ी तो कंडक्टर बाबू उन्हीं में मशगूल हो गए। ऐसे खो गए मानो बिछड़े यार मिल गए हों।

औत में ठहराव

बस नौ बजे तक बस औत जिले में आ पहुंची। बस रूकी और एक एक कर सब यात्री उतरते गए। सिवाय कंडक्टर बाबू और उनकी सहेली के।

यहाँ सभी यात्रियों को दस मिनट का समय दिया गया अंगड़ाई लेने का। मैं भी उतरा और बड़े बड़े बैग छोटे बालक के सहारे छोड़ सड़क किनारे बने ढाबे पर निकल आया।

ठंड इतनी है कि कुछ लोग आग तापने लगे। वाकई में मई के इस महीने में इतनी ठंड महसूस कर रहा हूँ जिसका कोई जवाब नहीं।

ढाबे पर एक आंटी जी और अंकल जुटे पड़े हैं यात्रियों के आव भगत में। मैं भी आ खड़ा हुआ पर कुछ भी खाने की इच्छा ही नहीं हो रही है।

फिर भी साथी भूखा है इसलिए अन्दर आना पड़ा। ढाबे में दो जगहों पर सीटें पड़ी हैं एक तो अन्दर दूसरे पीछे बरामदे में जहाँ से उम्मीद हैं पहाड़ियां के नज़ारे देखने को मिले!

मैं बरामदे में निकल आया जो छोटा सा है बस बल्ली के ऊपर लकड़ी का बना हुआ टिका खड़ा है। जिसका एक पाया भी अगर निकाल दिया जाए तो शायद पूरा पिछला हिस्सा खाई में जा गिरे।

जगह खतरनाक है फिर भी मैं बैठ गया। पर यहाँ से जो हरी भरी पहाड़ियों का नज़ारा देखने को मिल रहा है। ऐसा शानदार और जंगली नज़ारा शायद ही पहले कहीं देखा हो।

ढाबे के अंदर आंगन से मनमोहक नज़ारा

बेहद खूबसूरत और प्यारा। मगर कोई इंसान इसमें खो जाए तो उसके वापस मिलने की उम्मीद लगभग ना के बराबर ही है।

साथी घुमक्कड़ ने सब्ज़ी पराठे का ऑर्डर दिया था सो प्रस्तुत हो गया। किनारे से ज़ोर ज़ोर से गणित के पहाड़ा याद करने की आवाज़ आ रही है। नज़रे पड़ी तो एक छात्रा एग्जाम की तैयारी के मद्देनजर रटने में जुटी है।

उसकी लगन देख कर यही लग रहा है आज उसका इम्तिहान है। मैं साथी घुमक्कड़ से इन पहाड़ियों की गहराई के बारे में चर्चा कर रहा था तभी उस सामने वाली पहाड़ी पर एक परिंदा उड़ कर दूसरी पहाड़ी पर बड़ी आसानी से बैठ गया।

हम इंसानों को एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर जाने में घंटों का समय लग जाता है। और कईयों को जान जोखिम में डाल कर ये काम करते हैं। और ये पंछी एक पल में इधर से उधर।

इधर साथी घुमक्कड़ ने नाश्ता पूरा कर लिया और मैं ढाबे के बाहर निकल आया। बस को खड़ा देख और किसी प्रकार की कोई गतिविधि की आशंका के बीच मैंने एक कप चाय का आर्डर दे डाला।

बस के लिए भागम भाग

चाय खौल के ग्लास में छन के मेरे हाथों में आई ही है कि बस का हॉर्न बजने लगा। गरमा गरम चाय मैंने गटागट पी और जबतक मेरी बारी आई बस में चढ़ने की तब तक सभी सवारियां बस में लद चुकीं थीं। पूरी बस सिर्फ मेरे इंतजार में खड़ी है। मैं आखिरी था।

सीट पर बैग की वजह से बैठने में हो रही परेशानी को मद्देनजर रखते हुए कंडक्टर बाबू ने बड़े बड़े बैग को अगले स्टॉप पर पीछे बनी डिक्की में डालने को कहा।

कुछ पांच दस मिनट में बस का रुकना हुआ। और इधर कंडक्टर साहब बस से उतरकर बैग रखने पहुंच गए। पीछे पीछे मैं भी बैग लेे कर खड़ा हो गया रखवाने। बस में अब कम से कम दो लोगो के ठीक से खड़े होने की जगह बन गई है।

बस चल पड़ी और हम एक विशालकाय नदी को पार करने लगे। नदी पार कर ही रहे हैं कि बगल में बैठे छोरे ने बताया कि कैसे दो साल पहले यात्रियों से भरी बस इस नदी में समा गई थी और खोजने पर भी नहीं मिली थी। चालक समेत सभी सवारियों की मौत हो गई। इसकी गहराई का अंदाज़ा लगा पाना मुश्किल है।

इतना गहरा है इस नदी का पानी। एक पल के लिए तो में भी सिहिर उठा और सोच में पड़ गया। जितने खूबसूरत ये वादियां दिखती हैं उतने ही डरावने किस्से और खतरनाक रास्ते हैं। कुदरत की शक्तियों की कल्पना भी हम इंसानों की समझ से परे है।

धमन ब्रिज पार करते समय व्यास नदी का रौद्र रूप देखने को मिला। बस ऐसे गिरी की फिर कभी उसका अता पता ना चला। अब तो चचा और ये स्कूली छात्र मिल कर डरा रहे हैं।

कभी एक पहाड़ी से दूसरी पहाड़ी पर घने जंगलों से गुजरते हुए बस चलती चली गई। सवारियां उतर कम रहीं है और चढ़ती ही का रही हैं।

पहुंचा जालोरी

आखिरकार एक बजे तक जलोरी जठ तक बस आ पहुंची। बस से नीचे उतर ही की अन्दर से कोई आवाज़ लगाते हुए बोल पड़ा “भाईसाहब आपका मोबाइल यहाँ रह गया है”।

जेब टटोली तो वाकई मोबाइल गायब है। वो तो शुक्र है इनकी ईमानदारी का जिन्होंने आवाज़ लगा कर बता दिया। वैसे पहाड़ियों पर लोग ईमानदार है मिलते हैं।

बस रूकी और फिर चलने को आतुर दिखी। लेकिन शुक्र है कंडक्टर साहब को याद है कि हमारे साथ दो बैग भी है।

कंडक्टर बाबू नीचे उतरे, डिक्की खोली और फटाफट बैग निकाल वहीं सड़क पर पटक दिए। बस चल पड़ी। बैग सड़क पर ऐसे पड़े हैं जैसे सब इनका कोई काम नहीं।

कंडक्टर बाबू बस को बढ़ाने के चक्कर में जल्दबाजी में ऐसा काम करके निकल लिए

लो भई स्वागत है जारोली जठ में। दिन के डेढ़ बज रहे हैं। धूप अपने चरम पार है लेकिन ठंड भी टक्कर की है। इतनी की हाल फिलहाल में खरीदी हुई जैकेट उतारते नहीं बन रहा है। ये महसूस हो रहा है कि काफी ऊंचाई पर खड़ा हुआ हूँ मैं।

बैग उठकर सामने बनी झोपड़ी जैसी दुकान के आगे पड़ी बेंच पर बैठ कर सुस्ताने लगा। इसी दुकान में घुमक्कड़ों का एक झुंड हिसाब किताब करने में लगा हुआ है, जो वेशभूषा से बाइकर्स मालूम पड़ रहे हैं।

ठंड इतनी जोरदार है जिसका कोई जवाब नहीं। सर्दियों के मौसम में भी शायद कभी ऐसी ठंड का सामना करना पड़ा हो मुझे। बैग लेे कर बगल वाली दुकान में आ गया। जहाँ दो कप चाय बोली।

चाय-नाश्ता

बिना चाय के दिमाग काम नहीं करेगा। बातचीत में अंकल ने बताया इतनी ऊंचाई पर गाय या भैंस का दूध मिलना बहुत मुश्किल है। ना वो ऊपर आ सकती हैं, ना उनका दूध ऊपर लाने वाला कोई है।

सो बकरी के दूध की चाय बना बना कर पिलाते आए हैं अबतक। तो आज बकरी के दूध की चाय नसीब होगी मुझे। एक कप चाय सल्टाई तब जा कर कहीं दिमाग काम पे लगा।

बैग यहीं दुकान पर छोड़ कर आस पास का नज़ारा देखने लगा। नज़ारा बेहद कमाल का और शानदार है, सूनसान भी। थोड़ा सा नीचे मतलब पूरा का पूरा नीचे।

बस की तरफ वाली दिशा में आगे जा कर देखा तो कुछ एक गाडियां नजर आईं। मुझे तो लगा था सिर्फ मैं ही यहाँ हूँ पर आते जाते रहते हैं लोग।

महाकाली मंदिर जलोरी जात

दुकान के ठीक सामने पराठे बना रहे भैय्या को पराठे का ऑर्डर दिया और कुर्सी में विराजमान हो गया। पेट की पूजा का भी समय हो चला है और अभी जालोरी झील तक की लंबी यात्रा तय करनी है।

थोड़ी ऊर्जा बरकरार रहे तो बेहतर है। सुबह, उठने के बाद से ये मेरा पहला निवाला होने जा रहा है। आस पास गाड़ियों का तांता लगा हुआ है। इससे मालूम पड़ता है सैलानियों का भारी जत्था आया हुआ है।

जब एक पराठे से पेट ना भरा तब एक और ऑर्डर कर दिया। मगर दूसरे से भी भूख शांत ना हुई और तीसरा पराठा खाने की हिम्मत ना पड़ी।

पेट पूजा करने के बाद बैग लेकर चल पड़ा सिरोलसर झील देखने। आज की रात इन जंगलों में ही कटेगी।

शुरू हुई ट्रैकिंग

ट्रैकिंग शुरू करने से पहले रोड पर ही महाकाली के दर्शन के लिए हुए। चूंकि पीठ की चोंट का दर्द रह रह कर उभर रहा है। पिछले कुछ दिनों का बुखार और थकान के कारण शरीर चूर हो चुका है इसलिए देवी मां से प्रार्थना में शक्ति मांगी।

भारी भरकम वजन के साथ मंदिर के बाहर से निकल पड़ा साढ़े सात किमी का सफर पैदल तय करने। स्कूली छात्राओं का एक भारी दल साथ में चल रहा है जिसका मोर्चा एक बुज़ुर्ग संभाले हुए हैं।

एयर फोर्स की जैकेट से कुछ आभास हुआ की शायद हो सकता है ये सज्जन भारतीय डिफेंस में सेवा दे चुके हों। लम्बी कद काठी ,सफेद दाढ़ी में अंकल जी से भेंट हुई। फला फला रैंक बताकर उन्होंने अपना परिचय दिया।

जालोरी पास ट्रैकिंग

डिफेंस का कोई भी सैनिक क्यों ना हो हमेशा जोश से लबरेज रहता है। अगले माह मेरा इंडियन आर्मी का ऑफिसर रैंक की एसएसबी है जिसको मद्देनजर रखते हुए मैंने उनसे टिप्स लेता रहा।

उनके सुझाव में एसएसबी कोई एक्टिंग और अलग से गतिविधि करने की जरूरत नहीं है। जैसे हो वैसे रहो सलेक्शन पक्का है। कुछ दूरी तक का साथ रहा और उसके बाद वो अपने जत्थे कि लेकर कुछ समझाने लगे और मैं आगे निकल आया।

घना जंगल और शांति के बीच चलता चला जा रहा हूँ। शायद ही कभी इतना घोर जंगल कहीं देखा होगा चारो और पेड़ ही पेड़। रास्ता पत्तियों और पतझड़ से घिरा हुआ।

भारी भरकम बैग लादे लादे हालत खराब हो चली है। पानी की बोतल में इलेक्ट्रोल भरा हुआ है। जो एनर्जी ड्रिंक का काम कर रही है। जब भी लगता अब आगे बढ़ना मुश्किल है तो दो घूंट मार लेता।

फिलहाल तो कोई आता जाता नहीं दिख रहा। पीछे से दनदनाते हुए एक अंग्रेज़ गुज़रा कीप अप बडी बोल कर निकल गया। इनके घूमने का तरीका एक दम निराला होता है।

ना हम भारतीय की तरह ज्यादा बोझ लादते हैं ना ज्यादा खरीददारी। ये भी बिना बैग के ही निकल गया।

रास्ते को सगम बनाने के लिए भी जगह जगह मजदूर लगे दिख रहे हैं। जो पत्थर काट कर सजग रास्ता बनाने में जुटे हैं। कुछ कुछ जगह तो इतना सकरा और पतला रास्ता है कि अगर पैर ठीक जगह पर नहीं रखा तो सीधे नीचे जंगलों में। किसी जंगली जानवर की भेंट।

कुछ जगह चाय की टपरी या यूं कह लो मिनी ढाबा जैसा बना दिख रहा है। फिलहाल तो बिल्कुल खंडहर पड़ा है। देख कर तो यही लगता है इसका इस्तेमाल कर छोड़ दिया गया हो।

अब तक आधा रास्ता तय हो चुका है। इसी खंडहर पड़े ढाबे के पास एक टीला आया जिसके ऊपर मैंने चढ़ने की इच्छा जताई। बैग यहीं नीचे रख ऊपर की ओर जाने लगा। ऊपर पहुंच कर जो अद्भुत दृश्य देखने को मिला उसे शब्दों में कैसे लिखूं समझ नहीं आ रहा।

जालोरी से दिखाई पड़ता चीन

रस्ते में दिखा चीन

बहुत सारे बर्फीले पहाड़, जितनी दूर नज़र पहुंच सके। सभी बर्फ की चादर से ढके हुए हैं। यहाँ से खड़े खड़े चीन को देखा जा सकता है। मैं अपना बैग तो नीचे ही रख आया हूँ, नीचे खड़े साथी घुमक्कड़ को भी ऊपर बुला लिया।

पहले तो वो ऊपर आने का इच्छुक नहीं था पर जब वो ऊपर आया तो उसकी भी वही भी प्रतिक्रिया रही जो मेरी है। ऐसा नज़ारा ना मैंने कहीं देखा है और ना ही शायद कहीं देखने को मिले। कुछ वक़्त तो गुजरना बनता है यहाँ।

बीच बीच में नीचे भी झांक के बैग के होने की पुष्टि कर लेे रहा हूँ। जहाँ खड़ा हूँ उसके ठीक नीचे तो नहीं बल्कि नीचे उतर कर थोड़ा आगे चल कर खाई है जहाँ कोई नहीं जाना पसंद करेगा।

तीन लोगों का एक दल सामने से आ रहा है जिसमें से एक को मैंने लपका और उसको अपना कैमरा पकड़ा कर फोटो खींचवाई। पंद्रह मिनट बीतने के बाद मैं नीचे उतर आया।

नीचे उतरते वक्त राह से गुजर रहे प्रोफेशनल ट्रेक्कर से मुलाकात हुई। इससे पहले वो कुछ बोलते मैंने उनको एक दफा ऊपर जाकर देखने का सुझाव दिया। खुद का परिचय देते हुए बोले कि उत्तर भारत के वो लगभग अधिकांश हिस्से में जा चुके हैं।

जो अपने आप में उपलब्धि है। इसी तरह विचारों का आदान प्रदान होता रहा और थोड़ी देर में हम अपने अपने रास्ते निकल लिए। मैं सिरोलसर और वो ऊपर। ऊपर से मेरा तात्पर्य है पहाड़ी की चोटी देखने।

सिरोल्सार झील अब ज्यादा दूर नहीं रह गई है। रास्ता भी उतना दुर्गम नहीं है जितना पीछे था। कुछ चड़ाई के बाद फिर कुछ दुकानें लेकिन ये खंडहर नहीं है।

ये चालू दिख रहे हैं और खाने पीने के अलावा टेंट की भी व्यवस्था कर रखी है। अब यहाँ से आधे किमी की दूरी पर वो झील है। ऐसा दुकान के मालिक ने बताया।

अंगड़ाई लेते लेखक

360° सिरोलसर झील

बिना रुके लेकिन थके आखिरकार झील तक आ ही पहुंचा। दूर से ही देखने पर कमाल की लग रही थी पास से तो और शानदार। इसकी बनावट को लेे कर इसे ३६०° झील भी कहा जाता है।

ऐसी 360° झील शायद ही कहीं देखने को मिले। इस झील की ये भी मान्यता है कि इसमें अगर किसी पेड़ की पत्ती गिरती है तो उसे चिड़िया अपनी चोंच से बाहर ले जाती हैं।

अब ये कितना सत्य है ये तो यहाँ के गांव वाले ही जाने। झील के किनारे मोटी पतली जाली लगी हुई है ताकि कोई नाहा ना सके। मेरा हाल वाकई काफी बुरा है। पसीने से लथपथ।

शरीर चकना चूर हो चुका है। किसी तरह कोई जगह ढूंढनी है जहाँ पर जा कर मैं तंबू गाड़ सकु। कुछ देर सुस्ता सकूं।

झील देखने कई लोग आए हुए है। बाईं झील के पास ही बुढ़ी नागिन का मंदिर है जिसमें बाहरी तत्वों का प्रवेश वर्जित है। ऐसा नियम झील के लिए भी जहाँ कोई कूद कर स्नान नहीं कर सकता। काफी सख्ती है यहाँ झील को लेे कर।

360° सिरोलसर झील जालोरी।

तम्बू गाड़ने की व्यवस्था

सुंदर झील को जी भर कर देखने के बाद जगह तलाश करने लगा सुस्ताने की। किनारे किनारे निकल कर झील को पार करते हुए आगे बढ़ गया। और एक ऊंचे टीले पर आ पहुंचा।

टीले पर तो उच्यतम दर्जे की हवा चल रही है। ऊंचाई को मद्देनजर रखते हुए सोचा यही टेंट लगाना ठीक होगा।

थका हुआ शरीर कुछ भी करने की इजाजत नहीं दे रहा। पर काम तो करना पड़ेगा। अगर टिकना है तो। बैग धरा धरातल पर और उससे टेंट निकालने लगा।

बुखार और पीठ पर लगी चोट के कारण मेरी हालत बहुत खराब है। इसलिए साथी घुमक्कड़ ने है सारा टेंट खुद से लगा दिया। टेंट लग जाने के बाद बाहर पड़े बैग घसीट कर अन्दर लेे आया और मैं वहीं ढेर हो गया।

सिरोलसर झील के पास गाडा तम्बू

पानी की समस्या

पानी की कमी से हालत बुरी होती जा रही है। यहाँ कहीं भी ऐसा कोई स्थान नहीं जा साफ पानी मिले। पानी का एक मात्र स्त्रोत वो झील है।

सो बोतल लें कर बढ़ने लगा झील की ओर। झील के पास काफी लोग इक्कठा हैं। अधिकतर यही से पानी भर रहे हैं। पर मैं थोड़ा शासंकित हूँ पानी को लेे कर। क्या पता कितना साफ होगा ये पानी?

मेरी मन की स्तिथि को समझते हुए स्थानीय लोगों ने बताया झील का पानी ही गटकते हैं हम सारे। ये शुद्ध है और देवी मां की कृपा है इसे पीने के बाद कुछ नहीं होगा। ना आजतक किसी को कुछ हुआ।

भगवान का नाम लेे मैंने बोतल डुबा दी झील में। मैंने बोतल तो भर ली लेकिन खुद पानी पीने की हिम्मत नहीं हुई। चल पड़ा टेंट की तरफ।

साथी घुमक्कड़ की प्यासी आत्मा को देख मुझसे रहा नहीं गया और उसको ये शुद्ध पानी पिला दिया। शायद अगर ये बता देता तो भी एक बार हिचकता पानी पीने से!

टेंट के अंदर सारा समान एक किनारे कब आंख लग गई मालूम ही नहीं पड़ा। तकरीबन एक घंटा जमकर सोया। लोगों के बाहर आने जाने की आहट मिल रही है। इसी बीच कई बार नींद भी टूटी।

सूरज ढल रहा है, इससे पहले पूरा डूबे आस पास की जगह खंगालने का एक्सप्लोर करना बेहतर रहेगा। मोबाइल का नेटवर्क शून्य के बराबर है।

सिरोलसर की हवा

मैं टेंट से बाहर निकला और झील के पिछले वाले हिस्से में खूब धमाचौकड़ी मचाई।

कभी किसी चट्टान के ऊपर चढ़ कर ऊपर तक पहुंच जाता कभी कहीं। मेरे अलावा भी कई और लोग हैं जो अपना तम्बू गाड़कर यहाँ मौज करने आए हैं। एक तम्बू के पास से गुजरने में चीखम चिल्ली की आवाज़ें बाहर तक आ रही हैं मानो किसी की जमकर कुटाई हो रही हो।

आवाज़ से लगता है 5-6 लड़के अन्दर पत्ते खेल रहे हैं। मैं और आगे बढ़ा और बढ़ता ही चला जा रहा हूँ। यहाँ आकर देखने को मिलता है कि अलग ही मार्केट सजी हुई है। जहाँ मैंने तम्बू गाड़ रखा है उसके आस पास कोई भी नहीं है।

यहाँ ठीक उसका उल्टा। काफी टेंट गड़े रखे है यहाँ। एक छोटा सा ढाबा भी दिख रहा है। मैं भागता हुआ वापस अपने टेंट में आया और साथी घुमक्कड़ को समझाया कि ऊंचाई पर तम्बू उड़ने का भी खतरा रहेगा।

और अकेला पा कर कोई जंगली जानवर भी हमला कर सकता है। ऊंचाई पर रुकने के नुक़सान ज्यादा है और वहाँ चलने के क्या फायदे हैं।

सिरोलसर झील के पास का माहौल।

फ़ौरन सारा सामान टेंट सहित पैक किया और कोशिश की अंधेरा होने से पहले तक वहाँ पहुंच जाऊं और टेंट लगा लू। हालांकि ज्यादा दूर नहीं है पर ऊच नीच इतनी है कि समय लग जाएगा वहाँ तक पहुंचने में। फिर भारी भरकम बैग के साथ और भी।

रास्ते भर जोर लगा कर आगे बढ़ता रहा। कभी किसी ऊंचाई पर कभी कहीं। पर सोचता रहा सुबह उठ कर ये सब जगहों को उजाले में देखूंगा।

जबतक वापस इस जगह पर आया तब तक काफी अंधेरा हो चुका है। जैसे जैसे अंधेरा हो रहा है वैसे वैसे आसमान में तारे टिमटिमा रहे हैं। अब तक काफी अंधेरा हो चुका है और बिना हेड टॉर्च के तम्बू लगाना संभव भी नहीं है।

आकाश में असंख्य तारे

सिर पर टॉर्च बांध कर टेंट सही जगह देख कर गाड़ दिया। टेंट गाड़ के वापस पलटा और आसमान में नज़र पड़ी तब मूह खुला का खुला रह गया। असंख्य तारे मानो पूरा ब्रम्हांड प्रस्तुत हो गया हो।

रात जैसे जैसे प्रगाढ़ हो रही है वैसे वैसे इनकी संख्या भी बढ़ रही है। छुटपन में जब बत्ती चली जया करती थी तब भाई बहनों के साथ आंगन में चारपाई पर लेटे लेटे यही तो एक काम आता था तारे गिनना।

लेकिन इनकी संख्या उन दिनों के मुकाबले आज बहुत ज्यादा देखने को मिल रही है। पर तारे देखने से पेट तो भरेगा नहीं।

भंडारे में की भूख शांत

भूख भी जोरों की लगी है और ठंड भी गजब की हो रही है। किसी के माध्यम से पता चला कि बूढ़ी नागिन मंदिर में आज भोजन का आयोजन हो रहा है।

टेंट में बड़े बैग रखकर मैं निकल गया मंदिर की ओर छोटे बैग में कीमती सामान ले कर। मंदिर में जैसे हमारा ही इंतजार हो रहा हो। देखा तो पता चला कि सिर्फ दो लोगों के हिस्से का खाना बचा है।

मैंने वहाँ उनको बताया कि हमें भोजन करना है। तुरंत हमें भी भोजन परसा गया। यहाँ भी घोर अंधेरा। बिजली का तो कोई नामो निशान नहीं है। किसी की भी शक्ल सूरत नहीं दिखाई पड़ रही। और

ठंड इतनी जिसका कोई हिसाब नहीं। इस समय पूरी घाटी में अंधेरा छाया हुआ है। दूर दूर तक कहीं भी रोशनी की कोई किरण नहीं दिखाई पड़ रही है।

जो लोग खा पी चुके हैं वो पास में लकड़ी जलाकर आग में हाँथ पैर की सिकाई का मज़ा ले रहे हैं। मैं भी भोजन समापन के बाद वहीं पहुंच गया हालांकि मैं भूखा जरूर रह गया हूँ लेकिन ना मिलने से अच्छा है कुछ तो गया पेट में।

मई जून की ठण्ड में आग तपने का मज़ा लेते हुए

यहाँ आग ताप रहे लोगों ने जगह बनाई और मैं भी आग की तपिश का मज़ा लेने लगा। ठंड इस चरम पर है कि मनाली से जितना सामान लिया था लगभग सब चढ़ा रखा है फिर भी शरीर कांप रहा है।

खुले आसमान के नीचे ठंड का केहर बर्दास्त के बाहर है। मंदिर के पास से अलविदा लिया और चल पड़ा तम्बू की ओर। ऐसे तम्बू को अपने हाल पर छोड़ के जाना भी खतरनाक है।

पता नहीं कब किसकी नजर पड़ जाए और सामान गायब करने में भी ना हिचके। समय रहते में टेंट के पास आ पहुंचा।

उपद्रवी लड़के

आसपास ही बहुत सारे टेंट लगे हुए हैं। जिनमे से एक 8 लोगों वाला टेंट भी है। ये कॉलेज के छात्र मालूम पड़ते हैं। जो अत्यंत हुड़ दंग मचा रहे हैं।

साथ में उनके टूर गाइड या ऑपरेटर भी है। जो शांति से खाना बना रहा है। ये लड़के साथ में गाना बजाना भी लाए हुए हैं। जिसकी आवाज़ से पूरी घाटी हिल चुकी है।

लकड़ी के सहारे आग पर खाना पका ही रहे है टूर गाइड की अचानक से उस जत्थे में से एक लड़का गया और लड़की में मिट्टी का तेल डाल आया।

वो जोर का आग का भभका उठा जो ऊपर टीले तक गया। मौज मस्ती में इसकी ये करतूत कितनी भारी पड़ सकती थी इस बात का इल्म भी नहीं है इन्हे। क्या पता घाटी में आग लग जाती?

बेचारा गाइड इन बिगड़ी औलादों को कुछ के भी ना सका और दूसरे मिट्टी के तेल का डब्बा लेे खिसक लिया। मैं दूर खड़ा ये सब तमाशा देख रहा हूँ।

पर जब आसमान में नजर पड़ी तो सब भूल गया। पहले से आसमान में तारों की गिनती और बढ़ गई है। ये दृश्य मानो आंखो में सदा के लिए समा गया हो।

कुल्लू से जालोरी से सिरोलसर झील 88km

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