अंग्रेजी हुकूमत की संसद विक्टोरिया मेमोरियल

कोलकाता | पश्चिम बंगाल | भारत

कलकत्ता आगमन

तय समय के मुताबिक सुबह छह बजे ट्रेन पहुंच जानी चाहिए। मगर दो घंटे की देरी से ये ट्रेन कलकत्ते पहुंची। यह देरी आज की दिनचर्या में होनी तय है।

आठ बज रहे हैं। ट्रेन हावड़ा स्टेशन पर पहुंच चुकी है।

हर सवारी बस उतरने को लालायित है। इन सबके लालसा देख कर मैंने सोचा सबसे आखिर में उतरना ही बेहतर है।

ट्रेन से उतरने के बाद सारा सामान उतारा और निकल पड़ा भीड़ के बीच। मैं आगे आगे साथी घुमक्कड़ ना जाने कितने पीछे।

स्टेशन पर बड़े बड़े बोरे पड़े है। शायद किसी ट्रेन से निकाले गए हों या किसी ट्रेन में ठूसने हों। स्टेशन पर साफ सफाई कुछ खास नहीं है। अलग ही किस्म की महक आ रही है।

लग रहा है जितनी जल्दी यहाँ से निकला जाए उतना उचित। निकलने की जगह ही नहीं। ऊपर से कुली की भीड़ अलग।

आज यहाँ कलकत्ता आ कर पता चल रहा है की हावड़ा और सियालदाह कलकत्ता के प्रमुख। बहुत पुराने एवं बहुत व्यस्त स्टेशन हैं।

अन्यथा अब तक जो ट्रेन में हावड़ा और सियालदाह लिखा देखा करता था उससे यही लगता रहा की कोई अलग ही शहर होंगे। 

हावड़ा जंक्शन, हावड़ा नदी के इस तरफ है। दूसरा सियालदाह जंक्शन नदी के उस तरफ। 

कोलकाता के आउटर पर पटरी किनारे भीषण गंदगी देखने को मिली। जैसा सुना था कोलकाता की गंदगी के बारे में आज देख भी लिया।

प्लेटफार्म पार करके बीचों बीच खड़े होने के बाद अब समझ ही नहीं आ रहा है जाऊं तो जाऊं किधर। हावड़ा जंक्शन पर जबरदस्त भीड़ है।

इतने बड़े स्टेशन में कोई इधर से धक्का मरता तो कोई उधर से। दीवारों पर “चोरों से सावधान” की पट्टी पढ़ने के बाद बटुआ और मोबाइल और कस कर दबा लिए हैं।

मंज़िल सोनारपुर

यात्रा(घुमक्कड़ी) समुदाय से जुड़े राहुल सेन के आमंत्रण पर हावड़ा से लोकल ट्रेन से सोनारपुर के लिए निकलना है।

राहुल के अलावा घुमक्कड़ी समुदाय में किसी और ने अपने घर में प्रवेश को अनुमति नहीं दी दुर्गा पूजा के चलते।

राहुल सेन ने व्हाट्सएप पर अपने घर का पता भेज दिया है। साथ में कई महत्वपूर्ण जानकारी भी। ताकि मैं भटक ना जाऊं। जैसे सोनारपुर सबसे अंतिम स्टेशन है।

सोनारपुर के लिए खिड़की से टिकट लेना पड़ेगा। पर खिड़की कहाँ है नजर ही नहीं आ रही। एक पुलिसकर्मी की सहायता से टिकट घर तक पहुंचा।

यहाँ भी भीड़ अच्छी खासी है। जब तक टिकट घर से टिकट लूंगा तब तक ट्रेन निकल जाएगी। ऑनलाइन टिकट आरक्षित करना ही ज्यादा बेहतर है।

पर लोकल ट्राई  के लिए ऑनलाइन आरक्षण की सुविधा उपलब्ध नहीं है। लोकल के लिए ट्रेन पता किया तो एक महिला ने दाहिने तरफ इशारा करके वहाँ जाने को बोला।

भीड़ को अपनी तरफ आता देख समझ गया यहीं से लोकल ट्रेन मिलेगी। छोटा सा अलग से स्टेशन जिस पर ट्रेनों की आवाजाही है।

टिकट ले कर पीठ पर बैग लादे हुए भागने लगा लोकल पकड़ने। किसी ने कहा ये आखिरी है और रफ्तार खुदबखुद तेज हो गई।

स्टेशन पर आते ही एक ट्रेन आ कर खड़ी ही हुई है। कोशिश है जितनी आगे डब्बे में बैठने को मिलेगा उतना पास सोनारपुर स्टेशन के पास पहुंचूंगा। उतनी ही सहूलियत।

डब्बे में मछलियां, छात्र वर्ग के अलावा बूढ़ा जवान वर्ग भी है। इसे देख कर मुझे “मिले सुर मेरा तुम्हारा गीत याद आ रहा है”। जिसमे ऐसे ही लोग ट्रेन से उतरते दिखाई पड़ते हैं।

कोलकाता की को दुर्दशा हो रखी है वो लोकल ट्रेन से और नजदीक से देखा जा सकती है। पटरी किनारे झुग्गी झोपड़ी बनाकर रह रहे लोग।

कुल आधे घंटे में मैं सोनारपुर पहुंच गया। पर अभी भी राहुल के घर जाने का रास्ता समझ नहीं आया है। इसलिए एक दफा और फोन करके सुनिश्चित करना बेहतर होगा।

स्टेशन के बाहर निकल कर उल्टी दिशा में निकल पड़ा। ऑटो वालों और दुकानदारों से पूछने के बाद पता लगा दूसरी तरफ से ऑटो मिलेगा।

गनीमत ये है की सही तरफ पर उतरा हूँ। जैसा राहुल ने अवगत कराया था। चाय की दुकान पर “चाय हो जाए” कहते हुए साथी घुमक्कड़ ने इधर ही रुक कर चाय मांगा ली।

फीकी चाय के बाद स्वाद और बिगड़ गया। पेट और भारी हो गया। तपती धूप में आगे बढ़ने लगा।

कतार वाली सभ्यता

सोनारपुर रेलवे स्टेशन से बाहर एक विचित्र ही दृश्य देखने को मिल रहा है।

यहाँ जनता ऑटो में बैठने के लिए कतार में खड़ी है और अपनी बारी का इंतजार कर रही है। भारत के अन्य हिस्सों में तो चलती ऑटो में बैठने को परंपरा है।

इतनी सभ्यता तो यूपी या भारत के किसी अन्य राज्य में भी नहीं है। कतार में खड़े हो कर अपनी बारी का इंतजार करे। अच्छी शिष्टता है।

धूप में काफी देर तक कतार में लगने के कारण तेज धूप से बचने के लिए कई लोगों के हांथ में छाता भी नजर आ रहा है।

लेकिन भैया हम तो ठहरे यूपी के भाईया इन सब की आदत कहाँ। अगर इतना बोझा ले कर घूमने निकला होता तो हो चुका होता कल्याण।

पहले तो मुझे ये कतार वाला हिसाब समझ ही नहीं आया। बैग लेके सीधा पहुंच गया ऑटोवाले के पास।

ऑटोवाले ने भी कतार में लगने की सलाह दी। तभी ऑटो से जाने को मिलेगा अन्यथा खड़े रहो ऐसे ही।

शरीर को कष्ट देकर लगना पड़ा कतार में। अपनी बारी का इंतजार करते करते दिमाग का दही हुआ जा रहा है।

आखिरकार ज्यादा समय ना लेते हुए मेरे आगे खड़ी सवारियां झटपट अपनी मंजिल की ओर जाने वाली ऑटो में बैठती गईं। कतार वाला हिसाब एक तरह से सही भी है।

ऑटोवालों को भी सहूलियत और सवारियों को भी। यहाँ सवारियों की छीना झपटी नहीं होती है। यूपी में तो सवारी दो ऑटो चालकों के बीच झूल कर रह जाती है।

कभी कभी ये तीन या चार ऑटोवालों में बंट जाती है।

मेरी बारी आने पर ना ऑटो वाले को समझ आया जगह का नाम न मुझे समझाने में।

हलचल मच गई कुछ देर के लिए। आगे खड़ी ऑटो में ‘आरके पुरम’ बोल कर बैठ गया। ऑटो चालू हुआ और चल पड़ा। अब ये महाशय मंजिल के कितना नजदीक छोड़ेंगे ये देखने वाली बात होगी।

सुन कर तो यही लग रहा था की सिर्फ कुछ चुनिंदा ऑटोवाले ही आरके पुरम से परिचित हैं। इन जनाब को भी किसी दूसरे ऑटोवाले ने रास्ता समझाया।

चालक थपड़ियाया गया

कुछ दूर तक ऑटो पहुंचा होगा कि तंग गलियों में ऑटोवाले ने साइकिल चालक को टक्कर मार दी। साइकिल वाला औंधे मुंह ज़मीन पर लेट गया।

पहले तो साइकिल वाले ने मामला रफा दफा करना चाहा। जब उसने देखा की ऑटो वाला बड़बड़ाए जा रहा है तो उसने मामला अपने हांथ में लिया।

साइकिल जस की तस जमीन पर पड़ी रही। साइकिल वाला घूमते हुए दाईं तरफ आया और ऑटोवाले को भन्नाटेदार जबड़ा हिला देने वाले चार तमाचे रसीदने लगा।

मैं उसके बगल में बैठ कर उसके मारे गए कंटाप का कंपन महसूस कर सकता हूँ। मुझे तो डर है की कहीं मुझसे ही ना पंगा ले बैठे साइकिल वाला।

पर वो अपने होशो हवास में जमकर ऑटोवाले पर बरसा। शायद नानी याद दिला दी। सड़क सही से ऑटो चलाने की नसीहत भी देता गया।

इधर मार खाते खाते ऑटो भी बंद हो गया है। ऑटो चालू करने के बाद चला। क्रोध के आवेश में आकर कुछ दूर चल कर ऑटो चालक ने सबको नीचे उतार दिया। 

बाकी का मार्ग पद यात्रा करके ही पूरा करना पड़ेगा। गूगल नक्शे के सहारे अभी तो आरके पुरम करीब डेढ़ किमी है। पर मैं गलत ही मार्ग पर निकल आया हूँ।

ये काफी देर बाद पता चला जब आगे एक तालाब मिला। जिसके पार ही आरके पुरम है। अगल बगल में रास्ता पूछ कर वापस मुड़ चला सही रास्ते पर।

बल्कि ऑटोवाला भी हमें गलत ही रास्ते पर ले आया था मार खाने से पहले ही। ऑटो कम ही निकल रहे हैं इस मार्ग से।

आरके पुरम

पैदल तपती धूप में काफी लंबा सफर चल रहा हूँ। पर रास्ता भटकने के कारण राहुल को फोन लगा कर सही रास्ते पर आया।

फोन लिए खड़े अपनी इमारत के बाहर इंतजार कर रहे राहुल सेन ने जोरदार स्वागत किया। इमारत में दाखिल होने से पहले रजिस्टर में नाम दर्ज कर हम आगे बढ़े।

सुरक्षा के लिहाज से नाम दर्ज करना सही है। अपने को एसबीआई बैंक का कर्मचारी बताया। यहाँ बंगाल में दुर्गा पूजा के चलते हफ्ते भर छुट्टी रहती है।

तीसरी मंजिल पर राहुल निवास करते हैं। सीढियां चढ़ते हुए और बाते करते हुए दरवाजे के सामने आ खड़ा हुआ। अलमारी वाले कमरे में राहुल ने हमारे बैग रखवा दिए।

राहुल ने बताया की हमारे इंतजार में उन्होंने दिन का खाना पका कर रखा हुआ है। मुझे आने में थोड़ा विलम्ब हुआ। जहाँ सुबह ही आ जाना चाहिए दिन में आ रहा हूँ।

नहाने धोने के पहले कुछ कपड़े भी लगे हांथ दो डाले। पर इन इमारतों में कपड़े फैलाने की जगह ही नहीं होती है। ये सारे कपड़े बाल्टी में भर कर छत पर फैला दिए।

शुद्धिकरण के बाद हम सब एक साथ भोज करने बैठ गए। जिसमे उन्होंने मेरी पसंदीदा खिचड़ी बनाई है। भोजन पर छिड़ी की आज के दिन घूमने लायक कौनसी जगह नजदीक पड़ेगी।

कालीघाट मंदिर काफी दूर है और हावड़ा ब्रिज भी। राहुल ने विक्टोरिया मेमोरियल जाने की सलाह दी समय के अनुसार।

भोजन के बाद राहुल को अवगत करा कर मैं ढाई बजे तक निकल गया विक्टोरिया मेमोरियल के लिए।

विक्टोरिया मेमरियल जो किसी जमाने में अंग्रेजो का मुख्य कार्यालय हुआ करता था। जिसे अब आम जनता के लिए काफी सालों से संग्रहालय के तौर पर खोल रखा है।

कोलकाता मेट्रो का खाका

 

मेट्रो

ऑटो से कवि नजरुल पहुचनें के बाद यहाँ के मेट्रो स्टेशन में प्रवेश किया। दिल्ली की तुलना में यहाँ की मेट्रो में वो भीड़ देखने को नहीं मिली।

दिल्ली वाली मेट्रो का कार्ड दिखाया पर ये किसी काम का नहीं है यहाँ। कतार में लग कर टोकन लेना ही पड़ेगा।

टोकन लेने के बाद नीचे उतर कर दो नंबर की तरफ भागा। कुछ देर में मेट्रो का आगमन होगा।

दिल्ली मेट्रो में तो एक ही रॉड के सहारे चार चार लोग खड़े हो जाया करते हैं। यहाँ कोलकाता में टीन के डिब्बे जैसे चालीस साल पुरानी मेट्रो का संचालन अभी भी हो रहा है।

जैसा राहुल ने बताया था ठीक वैसा ही कर रहा हूँ। वैसे किसी पराए शहर में सलाह कारगर साबित होती है।

कालीघाट मेट्रो तक का टोकन ले लिया है। सफर ज्यादा लंबा नहीं है। कालीघाट ही विक्टोरिया मेमोरियल के सबसे निकटतम स्टेशन है।

कोलकाता मेट्रो देश की सबसे पुरानी मेट्रो है। कालीघाट पर पहुंचते ही बाहर की तरफ को निकल रहा था की सामने दीवार पर मेट्रो का नक्शा छपा है।

साथी घुमक्कड़ ने मेरा मोबाइल मांग और मेट्रो के नक्शे की तस्वीर खींचने लगा। तभी एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति आंख बड़ी करते हुए बोला। 

ये मत करो सुरक्षाकर्मी तुम्हारा फोन जब्त कर लेंगे। साथी घुमक्कड़ के हांथ से मोबाइल छीन कर जेब में डाल कर मैं बाहर आ गया। 

जब कुछ शहर भारतीय रेलवे से वंचित थे तब 1980 में मेट्रो कोलकाता की पटरी पर दौड़ने लगी थी। 

कोलकाता भारतवर्ष का इकलौता ऐसा शहर है जहाँ मेट्रो, ट्राम, बस और फैरी इस समय भी उपयोग में है। आगमन की यह सभी सेवाएं किसी और शहर में देखने को नहीं मिलेगी। 

मेट्रो के बाहर ताजी हवा का आनंद लेते हुए गूगल नक्शे पर विक्टोरिया मेमोरियल जाने की रह तलाशने लगा। इधर आसपास लोगों से पूछने पर भी दक्षिण की ओर बढ़ने की सलाह मिली।

विक्टोरिया मेमोरियल

पैदल रास्ता काफी लंबा है। करीब एक किमी का सफर तय करने के बाद यहाँ पहुंचता हूँ तो मिलती है भीड़। गेट के बाहर ही आइस क्रीम और अन्य खाने पीने की समान की बिक्री हो रही है।

टिकट घर में दो टिकट कटाए और अंदर निकल गया। विक्टोरिया मेमोरियल के सामने सड़क के उस पार बड़ा मैदान अलग ही चार चांद लगा रहा है।

सफेद संगमरमर से बनी ये इमारत वाकई बहुत ही लुभावनी है। ताज महल के बाद मैंने इतनी आकर्षक और मनमोहक इमारत नहीं देखी।

मेमोरियल में दाखिल होने के लिए आगे का दरवाजा बंद कर रखा गया है। शायद पहले कभी खुला रहता होगा। अत्यधिक भीड़ के कारण प्रशासन को ये निर्णय लेना पड़ा होगा।

बाईं तरफ मुड़ते हुए मैं भी पीछे रास्ते से जाने के लिए निकल पड़ा। मेमोरियल को चाहें किसी भी तरफ से देखो वो एक जैसा समान ही दिखता है।

बाहर तो भीड़ कम ही दिखाई पड़ रही है। अंदर का जाने क्या हाल होगा। सुरक्षा जांच के बाद टिकट दिखाते हुए मैं अंदर आ गया।

मेमोरियल में एक शानदार संग्रहालय है। छोटी छोटी तोपों द्वारा हमारा स्वागत हुआ। हालांकि ये चलती नहीं हैं।

हॉल में आ खड़ा हुआ। यहाँ से दाहिने कमरे में दाखिल हुआ तो पूर्व काल की राजा महाराजों के सामने खड़े अग्रेजों की तस्वीरें हैं।

तमाम तरह की चित्रकारी रखी हुई हैं। जिसे कांच अंदर संजोया गया है।

1921 में निर्मित यह स्मारक रानी विक्टोरिया को समर्पित है। इस स्मारक में शिल्पकला का सुंदर मिश्रण है। जहाँ रानी के पियानो और स्टडी-डेस्क सहित ३००० से अधिक वस्तुएं प्रदर्शित की गई हैं।

विक्टोरिया मेमोरियल का पिछला हिस्सा

हॉल से बाईं तरफ मुड़ने के बाद अंदर कमरे में इतिहास को दर्शाया गया है। कैसे पुराने समाज में लोगों का उठना बैठना हुआ करता था।

कैसे अमीर और अय्याश लोगों की तूती बोलती थी और गरीब भूखा मरता था। पुराने जमाने का रहन सहन कपड़े लत्ते। सबका प्रदर्शन किया गया है। यहाँ तक कि उस जमाने के घर का भी।

हालांकि मेमोरियल का ऊपरी हिस्सा बंद पड़ा है। जनता के लिए सिर्फ निचला हिस्सा ही खोल रखा है। ऊपरी हिस्से पर पड़े समान में जमती धूल इस बात की गवाही दे रही है।

मेमोरियल वाकई बहुत लुभावना है। इसकी बनावट अद्भुत है। बाहर निकलने के बाद दाईं ओर मुड़ते हुए बैठ कर साथी घुमक्कड़ का इंतजार करने लगा।

सिलसिला तस्वीर का

कुछ विदेशी सैलानी मौज मस्ती करते दिख रहे हैं। साथी घुमक्कड़ के आते ही मैं चल पड़ा यहाँ से मेमोरियल के पिछले हिस्से के सामने तस्वीर खिंचाने।

तस्वीर ऐसी होनी चाहिए की मेमोरियल के सामने सिर्फ मैं ही आऊं ऐसी कोशिश है। अभी जगह भी खाली है तो मौका भी बढ़िया है।

ऐसे ही बारी बारी से मैं और साथी घुमक्कड़ तस्वीर लेते गए। कुछ लड़के बीच में आने की कोशिश कर रहे हैं उनको हटा कर भी लिया। अकेले भी और साथ में भी।

मेमोरियल की तस्वीर हर कोण से लेने पर अलग ही आ रही है। पास में खेल रही विदेशी सैलानी का बच्चा तस्वीर के बीच में आ गया। साथ ही उसका लंबू पति भी।

मेमोरियल का बीच का हिस्सा खाली है जो अगले और पिछले के बीच में है। यहाँ अच्छी तस्वीरें आ रही हैं।

टहलते हुए मेमोरियल के सामने वाले हिस्से पर आ पहुंचा। हल्का हल्का अंधेरा भी हो चला है।

पर भीड़ में कोई कमी नहीं हुई है। लग रहा है पहले से बढ़ ही गई है। तस्वीर खींचने का सिलसिला अभी भी नहीं थम रहा ना मेरा ना बाकी की जनता का।

बहुत कोशिश के बावजूद मेमोरियल की सामने से तस्वीर लेना संभव ना हो सका। काफी वक्त बिताने के बाद यहाँ से बाहर की ओर निकलने लगे।

तभी उद्यान की तरफ नजर पड़ी जहाँ एक जोड़ा नाग नागिन की तरह लिपटा हुआ है।

पॉल चर्च

काफी अंधेरा भी हो चला है। यहाँ तारामंडल के अलावा पॉल चर्च भी है। तारामंडल तो बंद हो चुका है। सही रहेगा पॉल चर्च में भगवान के साथ कुछ समय व्यतीत कर लिया जाए।

पॉल चर्च भी काफी पुराना मालूम पड़ रहा है। खासतौर पर जब इसकी दीवारों पर नजर पड़ती है जिसमे काई जम चुकी है। चर्च it a बड़ा है की कैमरे में कैद ही नहीं हो पा रही।

ऊपर से अंधेरा। मैं अंदर निकल आया। यहाँ पहले से ही दुकान सजी हुई है साजो सामान की। जीसस क्राइस्ट की मूर्ति के सामने पड़ी बेंच पर कुछ देर के लिए बाकियों की तरह मैं भी बैठ गया।

अच्छा तो लग रहा है साथ ही अब निकलने का भी समय हो रहा है।

पॉल चर्च

नया मोबाइल

सूरज ढल चुका है। अचानक फोन की घंटी बजती है। अक्षय साथी घुमक्कड़ के फोन उसके मित्र के घर पहुंचने कि सूचना देता है।

अक्षय मेरे स्कूल का मित्र है जो मर्चेंट नेवी में कार्यत है। कुछ दिनों के लिए कानपुर गया हुआ है।

कोलकाता में उसके सहकर्मी के घर पर साथी घुमक्कड़ का नया मोबाइल फोन आज आ पहुंचा है।

पिछले दस दिनों से साथी घुमक्कड़ बिना फोन के ही घूम रहा था। कानपुर से निकलने से पहले दशहरा के उपलक्ष में भारी छूट पर यह फोन मंगाया है।

चर्च से बाहर निकल कर गूगल नक्शे की मदद से बस में बैठ गया जो शालीमार तक जा रही है। पूरा रास्ता जाम में निकल गया। एक समय तो ऐसा आया जब मैं खुद ही बस से उतरकर चलने लगा।

दुकानों और सड़क किनारे व्यापारियों से पूछने पर पता लगा अभी दूर है। उस जगह तक पहुंचने के लिए भी अगले चौराहे से ऑटो लेना पड़ेगा।

ऑटो लेने का मतलब है कतार में खड़े होना। पैदल रास्ता नापने के बाद चौराहे पर पहुंचते ही शालीमार की ऑटो के लिए कतार में लग गया।

ज्यादा समय ना लगा। ऑटो में बैठ कर कभी इस गली तो कभी उस गली घूमते हुए शालीमार आ गया। साथी घुमक्कड़ का उत्साह देखने लायक है।

शालीमार में दावत

अक्षय का सहकर्मी मित्र शाक्य हमारी यहीं प्रतीक्षा कर रहा है। ऑटो से उतर कर किराया थमाया और शाक्य से मिले। उनको फोन करके उनको पहचाना।

 शाक्य हमसे मिलकर अति प्रसन्न हुए। जैसे उसे अपने गांव से कोई मिल गया हो। हम सब शाक्य के घर पहुंचे फोन लेने। गुप्त अंधेरी गलियों में घूमते हुए हम घर आ पहुंचे।

यहाँ उनके पहले से ही काफी मित्रगण मौजूद हैं। फ्लिपकार्ट से फोन मंगाया है पर लोगों को फोन के बदले टिकिया मिली है।

एहतियातन फोन निकालने से पहले उसका एक वीडियो बनाना जरूरी समझा। शुक्र है डब्बे के भीतर से फोनेही निकला।

शाक्य और उनके मित्र रुकने पर मजबूर कर रहे हैं। पर यहाँ पहले से ही मेला लगा हुआ है। फोन लेने के बाद बाकी सबसे अलविदा लिया और चल पड़ा आरके पुरम।

शाक्य हमे ऑटो स्टैंड तक छोड़ने आए। निकलने से पेहले साथी घुमक्कड़ ने फोन मिलने की खुशी में एक छोटी सी दावत दी जिसमें हम तीन लोग उपस्थित हैं। 

शाक्य ने कलकत्ता में आने वाली बोली भाषा और लोगो से भेद भाव का जिक्र किया। यहाँ शायद उन्हें कम ही अच्छा लगता है। बहुत जल्दी कानपुर वापस निकल जायेंगे।

फोन और दावत के बाद पास में खड़े ऑटो में बैठ गया। ऑटो भरने में अभी समय लगेगा। आरके पुरम पहुंचने में भी। ऑटो, बस, मेट्रो और फिर से ऑटो करके आरके पुरम पहुंचा।

देर रात्रि ऑटो ना मिलने और दुर्गा पांडाल के चलते ऑटो भी घूमते हुए आरके पुरम पहुंचा। सो किराया भी घुमाने वाला वसूलेगा।

अगले दिन कहाँ घूमना है इस पर राहुल जी से विचार विमर्श किया। दुर्गा पूजा की झलक पूरे कोलकाता में साफ देखने को मिलीं।

जोरों शोरों से लोग अपने अपने आशियाने में त्यारियों में जुटे थे। नवरात्रि के अवसर पर कल खालीघाट जाने की योजना बनाई और विश्राम के लिए अपने कक्ष में चला गया।

रांची से कोलकाता और कोलकाता में विक्टोरिया मेमोरियल, सोनारपुर, शालीमार 501km

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