आंध्र की नई राजधानी विजयवाड़ा

आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत | विजयवाड़ा

इंतज़ार और सही 

विशाखापट्टनम से निकलने का वक़्त आ चुका है। रात्रि यही सोच कर सोया था की सुबह जल्दी उठ कर सात बजे से पहले प्रवीण जी से मुलाकात हो जाएगी।

नींद में ही जीने के दरवाजे की खटकने को आवाज से समझ गया की किसी ने रात को लगाई हुई कुण्डी खोल दी है।

बस फिर ज्यादा देर ना सोते हुए फटाफट तैयार होने लगा। बिस्तर पर पड़े हल्के गीले कपड़े अब तक पूरे सूख चुके हैं।

साथी घुमक्कड़ ने जो रात में धुलाई करी थी वो कपड़े भी। घर के आसपास इलाकों में शांति है।

इंतजार करने लगा प्रवीण जी की वो कब ऊपर मुझ से मिलने आयेंगे।

सात से साढ़े सात हो गया। साथी घुमक्कड़ भी उठ कर तैया हो चुका है अब तक।

आधा घंटा इंतजार करने के बाद हिम्मत कर के जीने के पास आया। अब जा कर मालूम पड़ा की सुबह गेट खुलने की आवाज यहीं से आई थी।

जब काफी देर प्रवीण जी नहीं आए तो मैं ट्रेन के समय की मद्देनजर रखते हुए निकल पड़ा।

सारा सामान पहले से ही समेंट कर बैग में भर लिया था। इसी कारण इंतजार में ही सूखा समय निकल गया।

अपना बोरिया बिस्तर समेट सीधी उतर कर नीचे की ओर जाने लगा।

उनके घर पर काम कर रही नौकरानी ने बड़ी हैरतभरी नजरों से देखा।

इससे पहले वो कुछ पूछती मैने ही प्रवीण जी के होने के बारे में पूछ डाला। जिसका उत्तर मिला कि वो पहले ही नौ दो ग्यारह हो चुके हैं।

ये तो खेल हो गया। मैं यहाँ उनका इंतजार करता रह गया वो पहले ही खिसक लिए।

आलीशान घर की धुलाई चल रही है। गीली फर्श पर चलते हुए मैं बाहर निकल आया।

प्रवीण जी अजीब निकले। रात में सिर्फ एक पानी से भरा जग  देने भर ही वार्तालाप हुई जो महज साठ सेकंड भी ना चली होगी।

बैग बांधे प्रवीण जी के इंतज़ार में ऐश्वर्य तिवारी

कम से कम सुबह मिल कर तो जाना एक शिष्टता कहलाता है।

अपनी जिम्मेदारी समझते हुए मैने उनको फोन घुमाया। फोन मिलाया पर उठा नहीं। शायद अपने परिवार के साथ किसी तट पर होंगे।

पलट कर उधर  से उनका का कॉल आया। जिसमे उन्होंने हालचाल लिए। फोन पर उनको इकतला कर दिया घर से निकलने का।

शायद कभी हम धोखे धड़े भविष्य में मिल भी गए तो भी एक दूसरे को नहीं पहचान पाएंगे जब तक घुमक्कड़ी समुदाय का पिछला रिकॉर्ड नहीं दिखाएंगे।

ग्रीनपार्क से स्टेशन

विजयवाड़ा के लिए दस बजे की ट्रेन से निकलना है।

यहाँ से स्टेशन दो किमी दूर है। गली कूचों से निकलते हुए सोचा थोड़ा और आगे चलने के बाद ऑटो या बस से निकल जाऊंगा।

पर ऐसा ना हो पा रहा है। गलियों के रास्ते पैदल ही निकल रहा हूँ। कुछ जगह खाने के ठेले भी देखने को मिल रहे हैं।

नाश्ते में इडली, डोसा, छोले पूरी। डेढ़ किमी चलने के बाद अब लग रहा है थोड़ा सुस्ता लेना चाहिए।

स्टेशन भी नजदीक ही है। ट्रेन को निकलने में भी समय है। चाय के नुक्कड़ पर उबलती चाय अपनी ओर खींच रही है।

यहीं रुक कर सुबह की चाय की चुस्की लेने लगा। भुगतान कर निकल पड़ा ताकि ट्रेन में बैठने को जगह मिल जाए।

ट्रेन यूटीएस ऐप से टिकट आरक्षित कर लिए। जो पहली दफा में तो ना ही हो रहे थे।

गजब की भीड़

स्टेशन पर तो आ गया पर मालूम पड़ा की ट्रेन नौ नंबर पर खड़ी है। एक से ले कर नौ नंबर तक पैदल ही चल कर जाना होगा।

मुख्य गेट से जाने के बजाय आगे के रास्ते से निकल रहा हूँ जो पास है।

सुकून इस बात का है की समय भी है और भागदौड़ भी नहीं करनी पड़ी ट्रेन के लिए।

विशाखापट्टनम स्टेशन पर ऐश्वर्य तिवारी

पर सफर आसान नहीं होने वाला है ये तो ट्रेन की भीड़ ने जता दिया। अभी तक के सफर में मुर्शिदाबाद जाने के लिए ही इससे ज्यादा भीड़ देखी थी।

इतनी भीड़ की उम्मीद ना थी। सोचा था ट्रेन में सामान्य हलचल हो गई। पर यहाँ तो पूरा का पूरा गांव खड़ा है। ट्रेन में पैर रखने की जगह तक नहीं है।

ट्रेन का इंजन पिछले डिब्बे से अलग हो कर अगले डिब्बे में लगने जा रहा है।

ना जाने क्या खुजली होती है भारत के लोगों को की ट्रेन इंजन और डिब्बे को जुड़ते हुए तो ऐसे देखते हैं जैसे अगली बार इन्ही से लगवाया जाएगा।

अब के पिछले डिब्बे में भीड़ अच्छी खासी है। बेहतर यही रहेगा की अगले डिब्बे की तरफ रुझान करूं शायद भीड़ कम देखने को मिले।

लंबे चौंड़े स्टेशन पर ही आधा किमी चल लिया होऊंगा। आगे आ कर देखा तो यहाँ पिछले डिब्बे से भी ज्यादा भीड़ नजर आ रही है।

पैर रखने की तो बात ही नही है। अंदर जाने की भी जगह नहीं। आगे लगे डिब्बे में भीड़ कम है।

ये दिव्यांग्जन बोगी मालूम पड़ रही है, मगर, विकलांग कोई भी नहीं दिख रहा। तो फिर इस डिब्बे में इतनी भीड़ कैसे!

सभी के हांथ पैर सलामत है, कोई भी अंधा नहीं दिख रहा, है कैसा दिव्यंगजन डब्बा है।

इस लिहाज से मैं भी इसी डब्बे में चढ़ गया। इस छोटे से कमरे जैसे डिब्बे में भी लोग ठूस ठूस के भरे हुए हैं।

पर बाकी के जनरल डिब्बों से तो बेहतर है। आगे लग रहे इंजन को जुड़ते हुए देखने का तमाशा चल रहा है।

समय काफी है। बैग अंदर रख नाश्ता खोजने निकल पड़ा। पर यहाँ कहीं भी स्टेशन पर बेहतर सुविधा नहीं है।

बकर बकर और सीट

हॉर्न बजते ही इंजन की ओर भागते हुए आया। जब तक कुछ समझ पाता या खरीद पाता ट्रेन के निकलने का समय हो चला है।

आखिरकार ट्रेन चल पड़ी। विशाखापट्टनम से अलविदा ले कर विजयवाड़ा निकल गया।

कुछ तीन चार स्टेशन तक मैं दरवाजे पर ही खड़ा रहा और गाने सुनता रहा। हवा भी अच्छी लग रही है और बाहर की हरियाली भी।

अब जब लग रहा है की बैठ जाना चाहिए तब अन्दर निकल आया। खिड़की के पास एक बोरी रखी हुई है।

मैं उसी बोरी पर अपनी तशरीफ टीका कर बैठने का इंतजाम कर लिया।

डब्बे में एक आदमी अपनी चपड चपड से सिर पका रहा है।

उसको चुप तो कौन ही कराएगा। आस पास बैठे लोग उसकी फ़ूहड़ बातों पर हंस रहे हैं।

उसकी इस बकैती में उसकी पत्नी भी लिप्त है। बस अगर ये चुप हो जाए तो सादर थोड़ी शांति में कटे।

अगले स्टेशन पर अमरूद वाला चड़ा। सब अपनी अपनी जेब से रकम निकाल कर अमरूद खरीदने लगे।

दिव्यांगजन बोगी में इतनी भीड़ में ना देखा एक भी दिव्यांगजन

पर मैं तो तलाश रहा हूँ कब कोई उतरे तो मुझे बैठने को मिले। 

आखिरकार बहुत इंतजार के बाद निदादवोलू जंक्शन आते आते मुझे ऊपर की सीट पर बैठने कि लिए जगह मिल ही गई है।

जब एक अधेड़ उम्र का आदमी उतरने लगा। ऊपर ही बैठे साथी घुमक्कड़ ने सीट कब्जिया ली।

इससे पहले कि कोई और हक जताता इस सीट पर। अब बाकी का सफर सुकून से गुजरेगा।

ऊपर से देखने पर नीचे बैठे लोग चिटी समान नजर आ रहे हैं।

बकर बकर करने वाले आदमी की आवाज ना सुनाई दे इसलिए काफ में संगीत की लड़ी लगा कर बैठ गया।

शुक्र है ज्यादा दूर तक ये विचित्र मानव नहींजा रहा। अगले ही स्टेशन पर सबसे अलविदा ले कर निकल गया।

मानो लग रहा था भतीजी की शादी में आया हो। मोबाइल में वही गिसे पीटे गाने। इंटरनेट भी चलने से रहा।

आंध्र की नई राजधानी विजयवाड़ा में आगमन

सायंकाल के पांच बजे विजयवाड़ा में आगमन हो ही गया। सात घंटे के इस सफर में जनरल बोगी से तो कहीं बेहतर ढंग से आया हूँ।

स्लीपर कोच में भी कम भीड़ नहीं होती। और ना ही इस ट्रेन में कम है।

यही सफर रात में करता to समय बच जाता।

बोगी से नीचे उतरा। सामने पड़ी बेंच पर बैग रख राहत की सांस ली। दिनभर की धूल मिट्टी लपेटने के बाद थोड़ा चेहरा साफ कर लूं तो अच्छा है।

अब ट्रेन भी खाली हो गई है और दिव्यांग्जन बोगी भी।

विजयवाड़ा में घुमक्कड़ी समुदाय से विपुल के आमंत्रण पर उनके घर जाऊंगा।

पहले लग रही भूख को शांत करने का इंतजाम देखा हूँ। रेलवे स्टेशन पर आईआरसीटीसी फूड कोर्ट में अक्सर स्वादिष्ट खाना मिल जाता है।

यहाँ कहीं भी होगा ही। कुछ आगे चल की मिल ही गया। पेट पूजा करने का समय भी सही है।

फूड कोर्ट में अक्सर अच्छा खाना मिलता है वाजिब दाम में। एक टिफिन इडली। जिसके स्वाद से पेट के साथ साथ मन भी भर गया।

अंत में चाय। चाय हर समस्या का निवारण है। यहाँ भुगतान पहले ही अदा करना होता है जिसके बाद मेहमानवाजी की जाती है।

अब तक विपुल ने अपने घर का पता भेज दिया है। जिसके लिए मुझे एक नंबर प्लेटफार्म से निकलना होगा।

बारिश के बाद विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन

बारिश बनी बाधा

पेट पूजा के बाद पुल के माध्यम से निकल पड़ा एक नंबर की ओर।

जहां अभी कुछ देर पहले तक रूखा सूखा मौसम था अब झमाझम बारिश होने लगी।

बारिश के थमने का इंतजार सबको है। एक नंबर प्लेटफार्म के बाहर खड़ा मैं भी इसी इंतजार में हूँ।

 रैपिडो ऐप पर रेंटल बाइक बुक कर ली। खास बात ये है की ये ऐप हर नए शहर में भारी छूट देती है। जिसके कारण खर्चे में थोड़ी कटौती हो जाती है।

बारिश रुकी और उधर फोन बज पड़ा। देखा तो रेंटल वाहन वाले का जो तेलुगु बोल रहा है।

हिंदी भाषी समझ वो हिंदी बोलने लगा। पता सुनिश्चित करने के बाद आने का आश्वासन दिया।

शाम के सात बज रहे है और अभी तक मैं स्टेशन पर ही हूँ। आए हुए भी दो घंटा बीत चुका है मुझे।

रेंटल वाहन के आते ही मैं निकल पड़ा विपुल के घर। कुछ दूर ही पहुंच सका होऊंगा की अचानक भारी वर्षा होने लगी।

जिससे मैं अच्छा खासा भीग चुका हूँ साथ ही चालक भी।

पहले तो ये जनाब वाहन रोकने के इच्छुक नहीं थे ताकि मुझे जल्दी पहुंचा सकें। दबाव डालने पर एक टीन के नीचे आ कर रुका।

ना जाने क्या झिझक थी इनके मन में। पूछने पर बताया की उनकी पिछली सवारी को समय से नहीं पहुंचाने पर हल्ला हुडदंग हुआ था।

जिसका भय उनके मन में बस गया है। हमें ये समझना चाहिए की चाहें वो खाना पहुंचाने वाला आदमी ही या सवारी पहुंचाने वाला सबकी इज्जत करनी होगी।

बारिश रुकते ही मैं दोबारा निकल पड़ा। रास्ता समझ नहीं पा रहे हैं ठीक है। मैं तो इस शहर में ही नया ही और ये इस इलाके में।

बारिश में उस गली में तो पहुंच गया लेकिन विपुल का घर नहीं मिल रहा है।

बंद पड़े वाहन पर सवार ऐश्वर्य तिवारी

विपुल का घर

फोन करने पर विपुल घर से बाहर निकल आया ध्यान दिया तो कोई लड़का पीछे खड़ा फोन पर मेरी ही ओर देखते हुए बात कर रहा है।

शायद यही विपुल हो। स्टेशन से विपुल के घर का रास्ता मात्र दस मिनट का है लेकिन मुझे यहाँ आते आते डेढ़ घंटा लग गया।

विजयवाड़ा जो कि आने वाले समय में आंध्र प्रदेश की राजधानी होने वाली है।

अंधेरे में तो ज्यादा कुछ नहीं देख पाऊंगा इस शहर को। घर पर ही विपुल ने अपने छुटपन के मित्र से मिलवाया जो कुछ गंभीर स्वभाव के मालूम पड़ते हैं।

दो दिन पहले कोलकात्ता की काफी सारी तस्वीरें कैमरे के मेमोरी कार्ड से स्वतः ही उड़ गई थी। जो काफी बड़ा नुकसान रहा।

चर्चा छिड़ी तो समाधान भी सामने निकलने लगा। हम चारों इंजीनियर जुट गए उन तस्वीरों को वापस लाने में।

आधे घंटे लग गए वापस कुछ तस्वीरें पाने में कुछ खुड़पेची टूल्स की मदद से। कोलकाता की ही निकल पाई। वैशाली की जो उड़ चुकी हैं वो वापस मिल पाना मुश्किल है।

विपुल को अंग्रेजी हिंदी के अलावा गुजराती और तेलुगु भाषा का भी ज्ञान है। जो अद्भुत है।

अपने जीवनकाल में विभिन्न शहरों में निवास के दौरान अनेकों भाषाओं को समझने और जानने का मौका मिला।

ये काफी मजेदार और खुद को अपनी ही हदों के पार ले जाने के बराबर होता है कि आपको एक से अधिक भाषा का ज्ञान है।

विपुल अक्सर घुमक्कड़ी करते रहते हैं। इनकी भविष्य की योजना है की की लाख रुपए में यूरोप सरीखे महाद्वीप घूमने जाएं।

रात्रि के नौ बज रहे हैं। योजना बनी की कहीं बाहर निकला जाए। कार में सवार चार घुमक्कड़ किसी दूर आलीशान रेस्त्रां में आ गए कुछ कीमती वक्त गुजारने।

घर वापस लौटते हुए साढ़े बारह बज गए। बातों में कब वक्त गुजर गया पता ही नहीं चला।

विशाखापट्टनम से विजयवाड़ा तक कुल यत्र 370km

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