अमरावती की उंडावली गुफाएं

अमरावती | आंध्रप्रदेश व तेलंगाना | भारत

घर से निकलते ही

रात की मौज मस्ती कारण ना बन सकी देर से उठने की। सुबह जल्दी उठ गया।

अमरावती में उंडावली गुफाएं बहुत प्रसिद्ध हैं। जहाँ मैं जाना चाहूँगा। शहर का विभाजन कृष्णा नदी के ऊपर आधारित है।

नदी के पूर्वी उत्तर भाग विजयवाड़ा कहलाता है। दक्षिण भाग अमरावती।

विपुल मुझसे पहले ही उठ चुका है। सुबह स्नान ध्यान के बाद नाश्ते की बात कह कर वापस नीचे चला गया।

स्नान कर मैं भी फटाफट तैयार हो गया।

विपुल ने भी सुझाव दिया कि विजयवाड़ा में ऐसा कुछ खास देखने वाला तो नहीं है लेकिन फिर अगर लालायित है तो गुफाएं देखीं जा सकती हैं।

नीचे पहुंचा तो देखा विपुल की माजी सुबह सवेरे नाश्ता बनाने में लगी हुई हैं। ये देख मुझे अपने घर की याद आ गई।

डोसा थेपला जूस हर तरफ से मेज़ भरी और सजी हुई है। आंटी ने भर पेट नाश्ता कराया। कोई कसर ना छोड़ी।

ना ही पेट में जगह बाकी है। शायद अब तो शाम तक भूख ना लगे।

नाश्ते के बाद ऊपर कमरे में आ पहुंचा। कुछ भी ना छूटे ये सुनिश्चित कर से बैग ले कर नीचे आ गया

विपुल के परिवार से अलविदा ले कर बाहर खड़ी कार में बैग रख लद भी गया।

विपुल खुद मुझे स्टेशन तक छोड़ने निकल पड़ा। घर से स्टेशन महज दो किमी दूर है।

कुछ दस मिनट में साढ़े दस बज रहा है की मैं स्टेशन आ धमका। कार से बैग निकाल विपुल के साथ तस्वीरें ले कर विदा लिया। जीवन में किसी मोड़ पर मिलने का वायदा के साथ।

विपुल द्वारा भव्य मेहमानवाजी से मैं भाव विभोर हूँ। अब तय करनी है आगे की दिनचर्या।

वारंगल जाने के लिए तमाम ट्रेनें उपलब्ध हैं। पर अभी वारंगला जा कर करूंगा भी क्या।

वहाँ के घुमक्कड़ी समुदाय से वेणुगोपाल ने शाम तक आने का आमंत्रण दिया है। बेहतर रहेगा की समय का सदुपयोग कर लिया जाए।

विजयवाड़ा रेलवे स्टेशन पर विपुल से अलविदा लेते ऐश्वर्य तिवारी

वारंगल या अमरावती

विपुल के जाने के बाद विचार कर रहा हूँ उंडावली गुफा जाने का। अब जब यहाँ आया हूँ तो घूमने में ही समझदारी है।

वरना हमारे यहाँ तो ऐसा कुछ भी नहीं घूमने को। इसी विचार पर अमल करते हुए तेज़ी से कार्य कर रहा हूँ।

अब अपना वही पुराना फॉर्मूला। बैग अमानती घर में जमा करो और घूमने शहर को निकल पड़ो सबसे उत्तम है।

वारंगल के लिए दिन की ट्रेन की सीट यूटीएस ऐप से आरक्षित करा ली। जिसके लिए ज्यादा इधर उधर घूमना नहीं पड़ा।

अन्यथा कई बार तो स्टेशन और पटरी से कुछ मीटर दूर रह कर करवाना होता है।

जिसमे बहुत झंझट हो जाती है। कभी हो जाती है कभी लटक जाती है।

अब हांथ में टिकट है तो आत्मविश्वास भी सातवें आसमान पर हैं। टीटी का सामना नजरो ने नजरें मिला कर कर सकूंगा।

टिकट ना होने पर परिसर के बाहर ही मूंह ताके खड़ा रहता हूँ जब ट्रेन से कहीं नहीं जाना होता है तो।

बैग ले कर दनदनाते हुए स्टेशन परिसर में आ गया। स्टेशन पर गजब की भीड़ है।

अगर आपको भारत की जनसंख्या के बारे में जरा भी संदेह हो तो कभी समय निकाल कर पास के किसी बड़े स्टेशन पर कुछ देर वक्त बिताने निकल जाएं ये भ्रम भी टूट जाएगा।

दाएं बाएं खड़े लोगो से पूछने पर पता चला की अमानती घर बाई ओर पड़ेगा। बाईं ओर चलने पर कुछ ही आगे दुकान जैसा दिखने वाले अमानती घर में आ गया।

पहले तो संदेह हुआ क्या यही है? क्योंकि अभी तक जितने भी प्रकार के अमानती घर देखे ये उनमें से सबसे अलग एक दुकान में है।

इसलिए वापस आ कर लोगों से सुनिश्चित करने लगा।

सुबह के ग्यारह बज रहे हैं बैग भी जमा हो चुका है और पर्ची भी मिल गई है।

उंडावली गुफा कृष्णा नदी के दूसरी तरफ है। ये हिस्सा अमरावती कहलाता है। जो अभी कुछ दिन पहले ही नया शहर बना है।

स्टेशन के बाहर निकल गूगल नक्शे की सहायता से सड़क पार कर उंडावली जाने वाली बस का इंतजार करने लगा।

चक्का जाम के कारण काफी देर यूं ही खड़ा रहा। बस के आते ही भीड़ ऐसी टूट पड़ी जैसे अब दूसरा कोई और साधन आएगा ही नहीं।

बस में चढ़ भी मुश्किल से हुआ। दौड़कर आगे वाले दरवाजे से चढ़ा।

पर बैठने को जगह मिल गई है। कंडक्टर साहब के आते ही टिकट कटा कर सुकून से बैठ गया।

अमरावती

विजयवाड़ा में विकास का कार्य प्रगति पर है जिसे देखा जा सकता है। अमरावती की कथाएं नाम का टीवी सीरियल दूरदर्शन पर आया करता था।

तब पहली बार कहीं अमरावती का नाम सुना था। जो अभी तक याद है। अमरावती की विरासत बहुत पुरानी है। कभी अमरावती तेलुगु साम्राज्य का केंद्र हुआ क्रिया था।

अब दोबारा फिर होने जा रहा है।

अमरावती सातवाहन वंश का बौद्ध धर्म का केंद्र हुआ करता था।

बौद्ध मठ और स्तूप पाए गए हैं जिनको सम्राट अशोक ने बनवाया था।

इस वंश ने हिंदू धर्म को बहुत बढ़ावा दिया। अमरलिंगेश्वर मंदिर के आधार पर शहर का नाम अमरावती पड़ा।

 राजवंशों ने हिंदू के बजाए जैन धर्म को खूब बढ़ावा दिया

1750 तक आते आते इस क्षेत्र को फ्रांस के हवाले उसके बाद अंग्रेजो के आधीन रहा। जिसके बाद यह का महत्व ही खतम होता गया।

शहर से आठ किलोमीटर दूर स्तिथ यह गुफाएं याद दिलाती हैं भुभनेश्वर की उदयगिरी और खांडगिरी गुफाओं की।

बस ने गुफा तक तो नहीं पर निर्धारित रूट पर उतार दिया है। अब यहाँ से चौराहा पार करने पर ही दूसरी बस मिलेगी।

चौराहा पार पेट्रोल पंप के पास आ कर खड़ा हो चला बस के इंतजार में।

कुछ पंद्रह मिनट के इंतजार के बाद आखिरकार बस का आगमन हुआ। दस मिनट में मैं गुफाओं के सामने आ खड़ा हुआ।

बस से उतरना हुआ ही है की बूंदाबांदी से तेज बारिश ने दस्तक दे दी है। खुद को बचाते छुपाते शरबत वाले की दुकान के नीचे आड़ लेली है।

यहाँ ये भाईसाहब बॉलीवुड के नब्बे के दशक के गाने सुन रहे हैं। हालांकि इनको समझ कुछ भी नही आ रहा है पर मनोरंजन पूरा हो रह है।

जितना हो सका खुद को बचाया पर फिर भी काफी गीला हो चुका हूँ जोरदार की बारिश में।

बारिश के हल्के होते ही बाहर निकल आया। अभी इतनी है की घूमने फिरने की प्रक्रिया तो शुरू की जा सकती है।

उंडावली गुफाओं का निर्माण छठी शताब्दी में किया गया था

उंडावली गुफाएं

गुफा से अंदर कुछ दूर पर बाएं हाथ पर स्तिथ टिकट घर से दो टिकट कटाए और बारिश की बूंदों से छुपाते हुए जेब में डाल लिए।

मेरे आगे आगे कुछ और पर्यटक भी हैं ये देख कर अच्छा लग रहा है की पौरन चीजों को लोग महत्व दे रहे हैं।

हल्की बूंदबांदी के बीच भागते हुए गुफा की ओर जाने वाली सीढी चढ़ने लगा। 

हल्की बूंदा बांदी अपने पीछे छोड़ गई सोंधी खुशबू। गुफा के सामने पड़े गड्डे पानी से लबालब भर गए हैं।

बलुआ पत्थर के पहाड़ को काट कर इस गुफा का निर्माण हुआ है जिनका छठी सातवीं शताब्दी से से सुराख मिलता है।

ये गुफाएं बौद्ध मठों के रूप में निर्मित हैं। बरसात के मौसम में साधु संत यही आराम किया करते थे। आज कल यहाँ प्रेमी जोड़े आराम करते हैं।

बारिश से बचते हुए सामने मुख्य इमारत की तरफ बढ़ा। जो की कृष्णा नदी की ओर हैं। अंदर कई कक्ष बने हुए हैं।

ऐसे ही एक खुले कक्ष में पर नज़ारा थोड़ा रंगीन पाया।

बाहर सैर सपाटा तो इमारत में लव लपाटा चल रहा है। लज्जा से मैं बाहर निकल आया। 

ऐसा माना जाता है को तेरहवीं शताब्दी तक राजसी संरक्षण प्राप्त था। निर्माण तो राजा विश्वकुंडी के समय हुआ है।

अधिकांश समय ये गुफाएं अनुपयोगी ही रहीं। भारतीय पुरातत्व विभाग ने इसे अपने संरक्षण में ले कर उसे राष्ट्रीय विरासत के तौर पर घोषित कर दिया।

सामने दिख रही चार मंजिला इमारत ही मुख्य गुफा है। चारो ओर हरियाली से घिरी ये गुफा में कई कक्ष और स्तंभ हैं।

इन गुफाओं का कार्य कभी पूर्ण हो ही नही सका। निचले भाग में खाली पड़े कक्षों के अलावा कुछ भी नहीं है।

पहली मंजिल

बेहतर होगा पहली मंजिल पर पहुंचा जाए। 

ध्यान देने वाली बात ये है की नीचे मोटे खंभे लगे हैं और पहली मंजिल पर पतले खंभे।

जो यह दर्शाता है की छठी शताब्दी में भी किस प्रकार की कारीगरी की गई है।

बीच में वयस्क हांथी की प्रतिमा दीवार से सटी हुई है। खंभों में आकृति बनी हुई है। ये खंभे बीच से कटे हुए हैं।

पहली मंजिल सूनी सूनी है। अगली मंजिल पर जा कर देखता हूँ क्या खास है।

सीढी पर से ऊपर जाने के लिए आगे बढ़ा तो वानर सेना ने रास्ता रोक लिया।

बंदर नहीं चाह रहे हैं की इतनी जल्दी मैं ऊपर जाऊं।

नीचे वाले बंदर इमारत में नहीं घुसने से रहे, सीढ़ी वाले बंदर आगे नहीं बढ़ने दे रहे।

हटाने का प्रयास किया जा रहा है तो खौखिया रहे हैं। थोड़ी देर में अपने पापा को बुला लाया।

इनके पापा को आते देख मुझे उल्टा रास्ता पकड़ना ज्यादा आसान समझ आ रहा है। मेरे आगे वाले पर्यटक भी उलट कर पीछे भागने लगे।

दूसरी मंजिल

अब जब पूरा वानर परिवार तीसरी मंज़िल पर पहुंच गया तब मैं आगे बढ़ने की चेष्टा कर रहा हूँ।

पहली मंजिल में जैन शैली देखने को मिली। गुफाएं ग्रामीण इलाकों से घिरी हुई हैं।

कक्षों के बाहर अच्छी खासी जगह है जहाँ पर प्रतिमाएं हैं।

ध्यान देने योग्य है ये चार संतों की प्रतिमाएं जो अलिंदी पर रखी हुई हैं। एक संत को वाद्य बजाते दर्शाया गया है जिसके अगल बगल सिंह हैं।

चार संतो की प्रतिमाए

ना बौद्ध ना जैन ये जान पड़ती है ऋषि मुनि की प्रतिमाएं।

यहाँ मौजूद स्तंभ विजयनगर शैली के आधार पर बने हुए हैं।

यहाँ दूसरी मंजिल में बने कक्ष के स्तंभों पर कई मूर्तियां उत्कीर्णित हुई हैं। जिन्हे दीवार पर गोले के भीतर उकेरा गया है।

एक अलग से कमरे में विष्णु की प्रतिमा लेटी हुई मुद्रा में स्थापित है। प्रतिमा के ऊपर गरुण की मनमोहक आकृति उत्कीर्णित है।

गरुण भगवान विष्णु को ऐसे निहार रहे है जैसे उनकी निद्रा भंग ना होने की जिम्मेदारी इन्ही के ऊपर है।

शेषनाग अपने फन फैलाए भगवान विष्णु को छाँव प्रदान कर रहे हैं।

मैं जूते उतार कर अंदर दर्शन करने आ गया। पंडित जी यहाँ इस प्रतिमा की पूजा नितरोज करते हैं।

प्रसाद के तौर पर फूल पकडाया। पुजारी ने बताया कि उंडावली गुफाएं एक उदाहरण हैं कि आंध्र में कितने बौद्ध कलाकृतियों और स्तूप हिंदू मंदिरों और देवताओं में परिवर्तित हो गए थे।

यह मूल रूप से भुभनेश्वर की जैन गुफा उदयगिरी और खांडगिरी के वास्तुकला जैसा दिखता है।

जहाँ मैं हाल फिलहाल घूम कर आया हूँ । कृष्णा नदी के नजदीक गुफा की पहाड़ी से पत्थर पर नक्काशी के कई अच्छे नमूने देखे जा सकते हैं।

दूसरी मंज़िल पर खम्भों में उनकीर्तित प्रतिमाए

तीसरी मंजिल

तीसरी मंज़िल पर जाने लगा तो एक बार फिर वानरों ने रास्ता रोका।

कुछ लोगों की मान्यता के अनुसार ये गुफा कभी जैन गुफा हुआ करती थी। जिसमे बाद में बौद्ध भिक्षुओं ने अपनाया।

अंत में बौद्ध भिक्षु के जाने के बाद हिन्दू वैष्णव गुफाओं में तब्दील कर दिए गए।

लेकिन इस बार मैं छाती चौड़ी कर के खड़ा रहा क्योंकि मेरे पीछे दस लोग और भी हैं। सारे वानर मानव सेना को देख खुद बखुद मार्ग से हट गई।

अंतिम गुफा

बारिश थमने का नाम नहीं ले रही है। भवन से निकल कर दूसरी गुफा देखने के लिए पहाड़ी के पल्ली तरफ निकल गया।

सक्रिले रास्ते और गीली सीढ़ी पर बहुत आहिस्ते चलना पड़ रहा है। वर्ना ये जानलेवा भी हो सकता है। 

अंतिम गुफा बेहद छोटी और नष्ट है

लेकिन यहाँ यह गुफा बहुत ही छोटी और नस्ट अवस्था में हैं। इसमें एक कक्ष है जिस तक पहुंचने के लिए सीढ़ी है।

आगे सब पथरीला ही है। यहीं अंत है। दीवार पर गज और सिंह की प्रतिमाएं उत्कीर्णित हैं। जो संख्या में चार हैं।

आधे घंटे में पूरी गुफा देख ली। निकल पड़ा बाहर की ओर।

गेट के बाहर पांव रखना ही हुआ है की बारिश और तेज हो गई। मैं भागते हुए गन्ने की दुकान की छांव में खड़ा हो गया।

जूस का मालिक विकलांग। लेकिन सराहनीय बात ये है कि उसने अपनी विकलांगता अपने जीवन पर हावी नहीं होने दी।

अपने जीवन व्यापन के लिए रोजगार कर रहा है।

जब जीवन के किसी मोड़ पर हताश हो कर खड़ा हो जाऊंगा तब तब मुझे ये इंसान का मुस्कुराता हुआ चेहरा जरूर याद आयगा।

लेकिन मजेदार बात यह भी है कि तेलुगु भाषी होने के बावजूद बॉलीवुड के 90 के दशक के गाने सुन रहा है।

पूछा कितना समझ आ रहा है उत्तर आया ‘इल्ला’।

कुछ देर बाद ऑटो से एक लड़का आया और उसे गोद में उठा कर ऑटो में बिठाया दुकान बढ़ाई और ले गया। 

हर घंटे यहाँ से स्टेशन के लिए नगर बस गुजरती है। बस का तो कोई अता पता नहीं हैं।

सामने खड़ी है एक ऑटो उसी में लद कर निकल पड़ा। यहाँ करीब घंटा भर समय बिताया है।

अगर किसी जगह की जानकारी हो और वो जगह कितनी भी खंडहर क्यों ना हो घूमने में आनंद आता है।

ट्रेन दो बजकर दस मिनट की है। आधे घंटे में आराम से पहुंच जाऊंगा। अन्यथा अगली ट्रेन शाम के चार बजे की है।

अगर दो बजे वाली ट्रेन छूट जाती है तो चार बजे वाली से ही जाना पड़ेगा।

ये ऑटो सिर्फ करकटा रोड तक ही जा रहा है। करकटा रोड तक पहुंचने में समय ना लगा।

स्टेशन के लिए बस भी झटपट मिल गई। स्टेशन की ओर जाते हुए कृष्णा नदी के ऊपर बना पुल से नजारा बहुत ही शानदार है।

गनीमत है दो बजे से पहले ही स्टेशन पहुंच गया हूँ। ना कहीं जाम मिला ना बस चालक ने देरी की।

स्टेशन के ठीक सामने उतरकर परिसर में दाखिल हुआ। भागकर अमानती घर पहुंचा। यहाँ पर्ची दिखाई और बदले में बैग उठाया। ट्रेन का पहले प्लेटफार्म पर इंतजार कर रहा हूँ।

ट्रेन अपने निर्धारित समय से देरी से चल रही है। जिसके कारण अभी तक नहीं आ सकी है।

उंडावली गुफा के सामने कृष्णा नदी बनी तालाब

विजयवाड़ा से वारंगल

शाम के पांच बज रहे है ठीक समय पर मैं विजयवाड़ा से वारंगल आ पहुंचा हूँ।

वारंगल में यात्रा समुदाय से जुड़े वेणुगोपाल के घर आमंत्रण है। छह बजे स्टेशन पहुंच कर उन्हें इस बात की जानकारी दी।

ये जनाब तो स्टेशन पर ही कुछ देर बिताने को बोल रहे हैं। इसी संतुष्टि के साथ मुझे लगा तब तक पेट पूजा ही कर लेना बेहतर होगा।

समय का सदुपयोग भी हो जाएगा और वेणुगोपाल से मुलाकात ठीक ढंग से होगी।

बैग सहित मैं परिसर से बाहर निकल आया। भूख भी जोरों की लगी है।

स्टेशन के बाहर सड़क पार कई दुकानें हैं। इनमे से एक कोने की दुकान में आ गया।

यहाँ भीड़ कम है। चूल्हा बाहर लगा है। और भूक्खड़ अंदर विराजमान हैं।

नूडल्स का ऑर्डर तो से दिया लेकिन जिस हिसाब से वो भर भर के लाल मिर्च डाल रहा है, उसके अंजाम कुछ अच्छे नहीं होंगे।

ये देख मुझे अभी से ही प्यास लगने लगी है। खैर कुछ ही देर में नूडल्स परसा गया।

खाना शुरू किया। एक दो निवाले तक तो कोई असर नहीं हुआ पर इसके बाद के निवालों में हालात पतली हो गई। उसका वर्णन ना ही करूं तो बेहतर। 

भर भर के पानी पीना पड़ रहा है गले को शांत रखने के लिए।

चाहता तो फेंक भी सकता हूँ लेकिन अन्न का तिरस्कार करना अशोभनीय है।

पसीने से तर बतर हर निवाला के साथ एक घूंट पानी। जैसे तैसे खतम करके बाहर आया।

पैसे थामाए, सड़क पार कर सामने वाली दुकान में आ गया। लाल मिर्च वाली नूडल्स से पेट नहीं भरा है।

मिठाई तो यहाँ मिलने से रही। इडली से ही जले हुए मूंह को ठंडा करना जरूरी है।

दक्षिण भारत में शायद ही कहीं मिठाई की दुकान मिलेगी। ऐसा हुआ तो ऊंट के मूंह में जीरा वाली बात हो जाएगी।

घुमक्कड़ी समुदाय से मिला धोखा

पेट पूजा के बाद वापस स्टेशन आ गया। अभी कुछ देर में वेणुगोपाल के घर निकल जाना होगा।

पर वेणुगोपाल के द्वारा स्पष्ट संदेश नहीं मिल पा रहा है। जिसके कारण थोड़ा संशय बना हुआ है।

बार बार फोन कर किसी को परेशान करने भी ठीक नहीं है। जब वो खुद अपने काम से फुर्सत पाएंगे तो खुद बखुद बात करेंगे।

इंतजार करते करते दो घंटे बीत चुका है। रात करीब आठ बजे मैंने ही फिर से वेणुगोपाल को अपने आगमन का फिर याद दिलाया।

अब वह अपनी बातों से मुकरने लगे हैं। काम के बहाने हैदराबाद जाने का बहाना करने लगे।

इशारों इशारों में उनका यही कहना है की वो ठहरा नहीं पाएंगे। 

अगर वेणुगोपाल ने पहले मना कर दिया होता तो विजयवाड़ा में ही दूसरे सामुदायिक मित्र प्रेम के आमंत्रण पर उन्ही के घर में ठहर जाता।

वेणुगोपाल बहुत बड़ी चिरांद निकले और सारे किए कराए पर रायता फैला दिया है।

वेणुगोपाल ने एक असमंजस और असहाय स्थिति में ला खड़ा कर दिया है। अब मुझे ही कुछ करना होगा।

उंडावली गुफा की दूसरी मंजिल पर भगवान विष्णु की लेटी हुई प्रतिमा

स्टेशन पर व्यवस्था

उनके द्वारा उत्पन्न इस विकट परिस्थिति में यह साफ हो गया है कि रात गुजारने के लिए जल्द ही कोई व्यवस्था देखनी पड़ेगी।

इस वीराने वारंगल में कुछ ठीक व्यवस्था नहीं जान पड़ रही है। 

स्टेशन परिसर के बाहर खड़े होटल के बारे में ऐप पर देखा तो ज्यादा पता विकल्प नहीं दिख रहे हैं।

जो हैं भी वो बहुत अधिक महंगे हैं।

प्लेटफार्म संख्या एक पर पहुंच कर रेलवे स्टेशन की डोरमेट्री में पता किया तो यहाँ भी सारे कमरे पहले आए ही आरक्षित पाए।

वापस प्लेटफार्म संख्या चार पर आ कर साथी घुमक्कड़ से विचार विमर्श करने पर अंततः यह निर्णय लिया कि आज की रात प्लेटफार्म पर ही सो कर गुजारने में कोई गुरेज नहीं है।

बैग से अंग्रेजी चटाई और स्लीपिंग बैग निकला और यहीं बिछा कर लेट गया। कुछ देर में साथी घुमक्कड़ भी लेट गया।

दोनों एक दूसरे की तरफ पैर कर के लेटे ताकि दोनों तरफ का नजारा मिल सके और हाथों को बैग की बद्दी में फसा कर लेटे रहे। थोड़ी देर में नींद आ गई।

मैं इतनी गहरी निद्रा में सो रहा था कि किसी के जगाने पर भी ना उठता। सोते सोते नौ बज चुके हैं।

रात्रि के एक बजे दो पुलिस कर्मी ने आ कर उठाया। यहाँ लेटने का कारण पूछा और टिकट दिखाने को कहा।

जब उनमें से एक ने बताया कि हम यहाँ उन लोगों की शिकायत पर आए है जिनके पैसे और मोबाइल चोरी हो गए हैं ये सुन के मेरे होश उड़ गए।

उठने पर भारी तादाद में प्रवासी मजदूर घूम पाए। समझ गया चोरी चकारी इन्हीं का किया धरा है। अपनी जेब टटोली तब मेरा मेरे पास ही है।

पुलिस कर्मी के आग्रह पर मैं रात्रि के दो बजे वेटिंग रूम में आ पहुंचा। 

यहाँ लोग पहले से ही अपना बिछौना बिछा कर सो रहे हैं। जैसे अमृतसर के हरमिंदर साहिब धर्मशाला में।

पास में पड़ी बेंच के पास पंखे के नीचे जगह बना कर मैं यहीं अपना बिछौना बिछा कर सो गया।

विजयवाड़ा स्टेशन से उंडावली गुफा से वारंगल 235km की यात्रा

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