एलेप्पी तट पर प्राचीन इतिहास

एलेप्पी | केरेल | भारत

कोच्ची में एक घर से दूसरे

कोच्चि से आज आलप्पुझा के लिए रवाना होना है। जब तक मैं सो कर उठा देखा की सामुदायिक मित्र रघु तैयार हो कर कार्यालय के लिए निकलने वाला है।

उसने अपने निकलने से पहले मुझे बताया कि जब मैं घर से निकास करूं उस वक़्त घर में ताला लगाकर चाभी किस जगह पर रखनी है वो जगह भी दिखा दी।

रघु के निकलने के कुछ देर बाद ही मैने साथी घुमक्कड़ को उठाया और यहाँ से जल्दी ही निकलने का हवाला दिया। फटाफट नित्य क्रिया करने में दोनो जने जुट गए।

रघु का घर इस कदर मैला कुचेला पड़ा हुआ है जैसे कोई सरकारी कार्यालय। शायद सरकारी कार्यालय भी इससे अधिक साफ होता होगा।

इतनी देर में रघु के कई फोन आ चुके हैं की मैं कब तक निकल जाऊंगा। पूरा आश्वाशन देते हुए तैयार होने का कुछ समय मांगा और स्नान करने निकला पड़ा।

समस्या है गरम पानी की, बाल्टी और मग्गे की भी। गंदगी इस कदर है और सामान ऐसा अस्त व्यस्त फैला हुआ है की इसे नजरंदाज कर निकलना भी मुश्किल हो रहा है।

अखिकार सफलता पूर्वक दस बजे तक मैं भी स्नान कर लिया। बैग भीतर कमरे से निकाल कर बाहर रखे। कमरे में ताला डाला और रघु को फोन कर सूचित करने लगा।

अब उनके मुताबिक उनकी बताई हुई जगह के बजाए मकान मालिक को चाभी थमा कर निकलना है। सो पहले माले से उतरकर नीचे मकान मालिक के घर में गेट खोल कर घुसने का प्रयास किया जो सफल है।

रघु से बात कराई और चाभी महिला को थमा कर निकल गया। साथी घुमक्कड़ को कोची में दो सामुदायिक मित्रों का साथ मिला गया है। इसलिए उनमें से एक के यहाँ कल रात्रि रुक गया था और दूसरे के यहाँ आज रुकने की योजना है।

 

सरथ और स्वादिष्ट भोजन

यहाँ से जा रहा हुं पलारीवत्तम एक दूसरे सामुदायिक मित्र सरथ के घर जहाँ पर मैं यह दो बड़े बैग रख कर आलप्पुझा के लिए रवाना हो जाऊंगा।

फोन पर सरथ को इस बारे ने पहले से ही अवगत करा दिया है की दो घुमक्कड़ आ रहे हैं। स्थानीय साधन और मेट्रो की सहायता से पलारीवत्तम आ पहुंचा।

यहाँ मेट्रो स्टेशन पर सरथ खुद अपनी ड्यूटी से समय निकाल कर हमें यहाँ लेने आए हुए हैं। तीन टोकन निकला हम स्टेशन पर लगी लिफ्ट के माध्यम से प्लेटफार्म पर पहुंच गए।

कुछ ही क्षणों में ट्रेन के आते ही खाली डब्बे में बैठ कर निकल पड़े। महज पांच मिनट में चांगंपुषा मेट्रो स्टेशन पर आ पहुंचे। स्टेशन इतना बड़ा और सुसज्जित मानो लग रहा हो जापान में खड़ा हूं।

अभी तक जितनी भी मेट्रो कि सवारी की है चाहे वह दिल्ली, कोलकात्ता, बैंगलोर, हैदराबाद, चेन्नई हो इनमे में सबसे महंगी मेट्रो का भाड़ा कोच्चि मेट्रो का लगा। तीन स्टेशन दूूर जाने का ₹30।

लेकिन जैसा किराया उतना ही आलीशान मेट्रो का निर्माण। उल्टा बोल गया मैं जैसा निर्माण वैसा किराया। खैर मेट्रो से उतरने के बाद सड़क मार्ग से हम तीनो एक ऑटो करके सरथ जी के घर को आ निकले।

सरथ अभी तक मार्गदर्शक की तरह आगे आगे चल रहे हैं। जो हर काम में अव्वल हैं। चाहें भाड़ा देना हो या टोकन लेना। मेहमानवाजी में कोई कसर नहीं छोड़ना चाह रहे हैं सरथ।

सरथ अपने कमरे की चाभी साथ में लाना भूल गए हैं। इसलिए मकान मालिक के कमरे में ही फिलहाल के लिए बस्ते रखवा दिए हैं। सरथ के मुताबिक वक्त हो चला है भोजन का।

घर से निकलते हुए वापस चौराहे की ओर आ पहुंचा उसी ऑटो में लदकर। सरथ हमें कहा ले जा रहे हैं कुछ भी जानकारी नहीं। चौराहा पार कर रेस्त्रां की ओर बढ़ चला।

जिस रेस्तरां में आया हूं आया शुद्ध दक्षिण भारतीय खाना मिलता है। मेज कुर्सी पर बैठने के बाद बड़े केले के पत्ते परोसे गए। जिसको पानी से धुलवाया गया।

एक एक कर व्यंजन परोसा जाने लगा। चावल चटनी सब्जी पापड़ देख कर मूंह में पानी आ गया। टूट पड़ा खाने पर जैसे कल का भूखा हूं। वैसे भी कल रात्रि में कुछ खास भोजन नहीं हो पाया था।

केले के पत्ते पर सजी थाल में भोजन और भी स्वादिष्ट हो जाता है। भोजन के पश्चात सरथ के साथ चौराहे तक आना हुआ। उनसे अलविदा लेकर आ गया एर्नाकुलम जंक्शन।

योजना अनुसार स्टेशन परिसर के समीप पहुंचने ही टिकट आरक्षित करा लिया। तब जा कर परिसर में प्रवेश किया। यहाँ से गरुवायुर एक्सप्रेस से आलप्पुझा के लिए निकल पड़ा।

एलेप्पी ज्यादा दूर नहीं है। सड़क मार्ग से भी साधन था पर वो बहुत अधिक समय ले लेता। इसी रेल मार्ग से तिरुवनंतपुरम से कोची पहुंचा था। अब लग रहा है वापस तिरुवनंतपुरम जा रहा हूं।

पोतघात के साथ तस्वीर निकलवाते लेखक

एलेप्पी आगमन

साढ़े तीन बजे तक आलप्पुझा आ गया। आलप्पुझा स्टेशन पहुंचते पहुंचते भूख भी लग आई। यहीं की कैंटीन में नाश्ता करने निकल आया।

नाश्ता तो नहीं पर चाय से ही काम चलाना पड़ रहा है। स्टेशन ज्यादा बड़ा नहीं है। कुछ ही प्लेटफार्म हैं। व्यस्त भी नहीं है। शायद इसलिए ज्यादा विविधता भी नहीं है।

गर्मी का असर कैंटीन के कमरे में भी महसूस किया जा सकता है। आसपास लोगों से पूछताछ करते करते निकल पड़ा तटवर्तीय क्षेत्र की ओर। जो ज्यादा दूर नहीं।

गांव को पार करते हुए गली महोल्ले से गुजरते हुए खुले मैदान की ओर बढ़ चला। समुद्र की लहरों का शोर साफ सुना जा सकता है। लोग ऐसे घूर घूर कर देख रहे हैं जैसे ये उचित समय नहीं है आने का।

चार बजे तक आ पहुंचा समुद्र तट पर। शायद मैं किसी छोटे मार्ग से आ पहुंचा हूं। पक्का रास्ता तो ना जाने कहाँ है। अभी मुझे जिस दिशा में जाना है वो यहाँ से आधा किमी दूर स्तिथ है।

इस समय यहाँ भीड़ ना के बराबर दिख रही है। शायद थोड़ी देर में और भीड़ बढ़ेगी। कुछ आगे सदियों पुराने खंबे गड़े हुए हैं।

जो यहाँ बंदरगाह होने का सबूत दे रहे हैं। इनमे आज जंग लग रही है। जो लोगों को नुकसान भी पहुंचा सकते हैं। तट पर कुत्ते बहुत हैं। अक्सर खूंखार कुत्ते ही पाए जाते हैं तटों पर।

कुछ दूर चलने के बाद थकान के चलते मैं पोटघात की छांव में कुछ देर के लिए लेट गया। इधर साथ में आए है तस्वीर खींचने वाले भाईसाहब जो अपने किस्से कहानी सुनाने में मशगूल हैं।

मछुआरा अपने सहयोगी के साथ सफर पर निकलता हुआ

एलेप्पी तट

तट पर माहौल काफी शांत है। पर्यटक शून्य और बिक्रीकर्ता कुछ अधिक। जब कुछ सूरज की रोशनी कम होती हुई मालूम पड़ी तो उठकर इधर उधर टहलने लगा। अब तक थकान भी कम हो चुकी है और घूमने फिरने की ऊर्जा भी आ गई है।

वैसे केरल को ‘भगवान का अपना देश’ कहा जाता है। केरल में कई बेहतरीन घुमक्कड़ी जगह मौजूद हैं, लेकिन अलप्पुझा की बात ही निराली है।

केरल के समुद्री इतिहास में अलप्पुझा का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है। इसकी प्रकृतिक खूबसूरती के कारण इसे ‘पूर्व का वेनिस’ कहा जाता है।

सेंट थॉमस जोकि ईसा मसीह के बारह शिष्यों में से एक थे अल्लेप्पी पहुंचकर दक्षिण भारत में ईसाई धर्म का प्रचार किया। पुर्तगालियों और डैनिश सेनाओं द्वारा ईसाई धर्म को मजबूती प्रदान की गई थी और इन लोगों ने धड़ल्ले से धर्म परिवर्तन किया।

स्वाधीनता संग्राम में इस शहर का महत्वपूर्ण योगदान रहा। अलप्पुझा समुद्री तट एक लोकप्रिय पिकनिक स्थल जान पड़ता है। समुद्र में घुसा हुआ पोतघाट तकरीबन 137 साल पुराना है।

सन् 2016 में विज्ञान एवं पर्यावरण संस्था ने इस शहर को सबसे साफ सुथरा शहर करार दिया था। कुछ दूरी तक टहलने के बाद विपरीत दिशा में मुड़ चला।

दूर नजर डालें तो मछुआरों को देखा जा सकता है मछली पकड़ते हुए। ऐसे ही यहाँ दो जने अपनी नौका ले कर समुद्र में कूद पड़े हैं। देखते ही देखते इतना दूर निकल गए की चिटी के समान नजर आ रहे हैं।

पांच बजते बजते यहाँ अच्छी खासी भीड़ उमड़ चुकी है। आइस क्रीम से ले कर गुब्बारे वाले का जमावड़ा है। ठंडी आइस क्रीम खाने का मन तो है पर कहीं बीमार ना पड़ जाऊं।

तट के पास कैमरा रख चलचित्र बनाने लगा। मोबाइल से भी कुछ अतरंगी तस्वीरें निकाली। लोगों में उत्साह है। कई लोग अपने परिवार या मित्रगणों के साथ यहाँ समय व्यतीत करने आए हैं। कई पर्यटक भी हैं।

पोतघात के पास पहुंचकर कुछ देर यहाँ समय गुजारने का निर्णय किया। पोतघात के साथ फिर ऊपर लटक कर मैंने अपनी कुछ तस्वीरें निकलवाई।

एक को बार जंग लगे पोटघाट पर लटकने से हाथ में खरोच भी आ गई। पानी में भी गिरते बचा। लहरें इतनी दूर तक आ पहुंची जिसकी उम्मीद ना थी।

जूते में पानी ना भरे इसलिए कुछ सेकंड तो ऐसे ही लटका रहा जैसे कील पर कपड़ा। पानी के जाने का इंतजार करता रहा। कुछ इंतजार बहुत ही कष्टकारी होते हैं।

उतरते हुए हाथ में खरोच आ गई। लटकते हुए तस्वीर। अंधेरा हो जाने के बाद भी काफी देर यहीं रुक रहा। सूरज डूब गया और चांद उग आया। चांद की रोशनी में समुद्र और भी नमकीन लगता है।

अल्लेप्पी तट पर तस्वीरकारिता

छात्रावास में रात

तय हुआ अब निकला बेहतर रहेगा। पास ही तट को मैदान बना शाम के समय यहाँ युवा पीढ़ी बीच फुटबॉल खेलते हुए नजर आ रही है। यह काफी रोमांचक है। मेरी इच्छा हुई खेलने की मगर काफी शाम हो गई है।

नंगे पैर यहाँ तक चलने के बाद यहीं पास में बैठ कर जूते पहनने लगा। तट पर तीन घंटे कब गुजर गए पता ही नही चला।

सात बजे तक तट से निकल कर समुदायिक मित्र जॉन के घर निकल पड़ा जो यहाँ से पैदल मार्ग पर है। जॉन आलप्पुझा में सैलानियों के रहने के हेतु अपना खुद का छात्रावास चलाते हैं।

आज शाम सामुदायिक मित्र के भी मित्र जॉन के आशियाने में गुजरेगी। गली मोहल्ले से होते हुए साढ़े सात बजे तक उनके पास पहुंचा।

जॉन ने अच्छा स्वागत किया। मुझे मेरा कमरा दिखाया जो पहले माले पर है। घर का ऊपरी हिस्सा लकड़ी का निर्मित है जो वाकई शानदार जान पड़ता है।

कुछ देर कक्ष में आराम करने के बाद भूँख लग आई। शायद ही दिन में कुछ खाया होगा। भूँख शांत करने के वास्ते बाहर निकल पड़ा।

पर यहाँ आस पास ऐसी कोई शाकाहारी दुकान नजर नहीं आ रही है जहाँ भोजन कर सकूं। अधिकतर दुकानों में मटन और मुर्गा ही सजा दिख रहा है।

छात्रावास से काफी दूर निकलने के बाद एक ढाबा दिख रहा है। जो खाना खाने योग्य है। यहाँ आकर खाने का ऑर्डर दे दिया।

केरल में अधिकतर जगह मांसाहारी भोजन मिलता है जिसके कारण शाकाहारी खाने वाले कम है। तो इस कंगाली में जो मिल रहा है वह खुशी खुशी कुबूल है।

कोच्ची से अल्लेप्पी तक का कुल सफर 107किमी

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