एलेप्पी के मेड़ में तैरनेवाले घर की लोकप्रियता

एलेप्पी | केरेल | भारत

सुबह हो गयी जनाब

कमरे में गांधी की चित्रकारी है जिसने रातभर सोने ना दिया। कर गया होगा कोई घुमक्कड़ कलाकार यहाँ चित्रकारी। सुबह समय से नींद खुल गई।

आज योजना है की एलेप्पी के मेड़ देखने की जिसके लिए एलेप्पी प्रयातकों के बीच लोकप्रिय है। तैयार हो कर नीचे चल पड़ा मकान मालिक जॉन के पास।

जॉन धर्म से ईसाई समुदाय से हैं। अपना जीवन बिलकुल अय्याशी में गुजार रहे जॉन दिल से जवान है भले ही बाल सफेद हो चुके हों।

जॉन ने मुहत्वपूर्ण सुझाव देते हुए आलप्पुझा के मेड़(बैकवाटर) देखने पर जोर डाला। लौटते वक़्त प्रसिद्ध मरारी तट पर जाने का भी सुझाव दिया।

यह मेड़ दुनिया का सबसे लोकप्रिय पर्यटन स्थल है। जॉन ने बताया आलप्पुझा, जिसे ‘पूर्व का वेनिस’ कहा जाता है, खासकर तैरनेवाला घर(हाउसबोट)/नौका विहार के लिए ही प्रसिद्ध है।

जल्दी तो नहीं निकल सका लेकिन ग्यारह बजे तक पैदल ही कलेन से निकल कर वडा कैनाल की ओर चल पड़ा। पानी पर बसे इस शहर को देखने में आनंद आ रहा है।

यहाँ जनजीवन धरती पर रहने वाले प्राणियों से बिलकुल भिन्न है। जबकि ये शहर का ज्यादातर हिस्सा पानी पर ही बसा है। कहीं कोई सड़क सूखी दिखे ऐसा संभव ही नहीं है।

साइकिल सवार से ले कर दुपहिया वाहन सब पतली सड़को पर जगह बना कर निकल रहे हैं। मजेदार बात है यहाँ बस भी चलती और पानी पर चलने वाला जहाज भी।

करीब डेढ़ किमी यात्रा के बाद वडा कैनाल आ पहुंचा। जैसा जॉन ने बताया था की सैर सपाटे के लिए सरकारी नाव में सवार होना बेहतर रहेगा। जो हर घंटे चलती है।

नाव पर सवार होने की मारामारी भी नहीं है। पास ही दुकान में केरल की शुद्ध नमकीन बिक रही है। टिकट नाव पर नहीं बल्कि टिकट घर से लेना होगा।

जैसे कोई फिल्म देखने से पहले करना पड़ता है बिलकुल वैसे ही। दो सवारी का टिकट ले से सवार हो गया सरकारी नाव में। टिकटघर से न्यूनतम मूल्य पर टिकट मिला।

मैं तो सरकारी नाव में बैैठ कर जल विहार कर रहा हूँ। लोग इस नाव का प्रयोग घर से कार्यालय या अन्य किसी के घर जाने में करते दिख रहे हैं।

मेरी सरकारी नाव चली जिसमें स्कूली बच्चे, बुज़ुर्ग, महिलाएं और अन्य लोग काम पर निकले, नाव पर सवार हैं।

सीट से अधिक यात्री भर लिए हैं नाव में। कुछ खड़े खड़े यात्रा कर रहे हैं। बस अधिक भार से नाव ना पलटे तो बेहतर है। पानी पर मोटर नाव में ऐसे चलने का शायद ये मेरा पहला अनुभव है। पिचावाराम में नाव में सैर की थी।

चारों ओर हरियाली इस कदर है जिसका कोई जवाब नहीं। नाव जीवन रक्षक जैकेट भी लगी हुई हैं। ताकि कोई घटना होने पर कार्यवाही की जा सके।

सरकारी नाव के चलने के इंतज़ार में सवारी

एलेप्पी पर अलग जीवन गुज़र बसर

सड़क पर जैसे जगह जगह गाड़िया खड़ी देखते हैं हम यहाँ जगह जगह पानी पर नाव खड़ी देख पा रहा हूँ। यहाँ का मुख्य आकर्षण है तैरनेवाला घर में जल विहार करना।

मेड़ में मैं जिन तैरनेवाले घर को देख पा रहा हूँ वह पुराने जमाने के केट्टुवल्लम के सुधरे हुए रूप हैं। बगल में बैठे एक बुज़ुर्ग ने बताया कि मूल केट्टुवल्लम चावल और मसाले ढोने वाली नौकाएं हुआ करती थीं।

इन्हें केट्टुवल्लम या गांठ वाली नौकाएं इसलिए कहा जाता है क्योंकि पूरी नाव को केवल नारियल की रस्सियों की मदद से कसा जाता था।

एक हाउसबोट को देख उसकी तरफ इशारा करके बगल में बैैैठेे अंकल जी बताने लगे कि यह हाउसबोट लक्जरी नावें जैसी हैं। जो लकड़ी के पटरों की बनी होती हैं और सभी में आधुनिक सुविधाएं जैसे एयरकंडिशनर, एक से तीन बिस्तर वाले कमरे, बालकनी, और मनोरंजन के विकल्पों से लैस होती हैं।

आधुनिक टॉयलेट, आरामदेह बैठक, रसोईघर और यहाँ तक कि कांटे से झुक कर मछली फंसाने के लिए बालकनी की भी सुविधा होती है।

इसमें से एक तैरनेवाला घर पर दो विदेशी सैलानी बाहर मेड़ का अनोखा नजारा देख रहे हैं और दूसरी नावों को देख कर हाथ हिलाने लगते हैं।

विदेशी सैलानी इसमें दिनों दिन गुजारने के इच्छुक होते हैं। इस प्रसिद्ध मेड़ में यात्रा करने का और उसमे भी एक तैरनेवाला घर में बैठकर मेड़ में यात्रा करने का अनुभव बहुत रोमांचकारी होता होगा।

रास्ते में एक पुराना पुल देखने को मिल रहा है। जिसके जरिए लोग एक टापू से दूसरे टापू पर जा रहे हैं। अंतर सिर्फ पानी का है। शहरों में सड़क और एलेप्पी में पानी।

तैरनेवाले घर का एक दिन का किराया मात्र दस हजार रुपए है से शुरू होता है। जिसमे विदेशी सैलानी रहना पसंद करते हैं। नाविक की अच्छी मोटी कमाई हो जाती होगी इसके जरिए। कुछ पैसा किराए के तौर पर सरकार की जेब में भी जाता होगा।

आखिरकार सरकारी नाव का सफर भी फिलहाल के लिए खत्म हो चला है। चालक ने अगले पड़ाव को आखिरी पड़ाव बताया और पूछने लगे उतरना कहाँ है। जल विहार कर मैं इसी पड़ाव पर उतर गया।

धूप भी तेज़ है इस कारण थोड़ी थकान भी महसूस करने लगा हूँ। जमीन पर उतरने के बाद कुछ दूरी चल कर जगह का जायजा लिया।

यहाँ कोई छोटा कारखाना है जिसमे कार और दुपहिया वाहन का मरम्मत का कार्य दिख रहा है। गोल चक्कर लगाते हुए दूसरे टापू पर आ गया।

जैसे बस के पड़ाव होते हैं वैसे ही नाव के भी। हर जगह नाव यहाँ नहीं रुकी। केवल तय जगह पर ही।

पुल पर सवार

पानी पर भोजन

घूमते हुए दुकान पर आ पहुंचा जिसमे खाना उपलब्ध है। छोटे रेस्त्रां जैसी लग रही है। भूख भी लगी है और समय भी हो चला है भोजन का।

यहीं पर दो थाली मंगवा कर खाने बैठ गया। खाने पर छूट भी मिली और विशेष चटनी भी। नाव पर सवार होने के लिए वापस से उसी जगह जाना होगा।

पेट पूजा कर भुगतान किया और निकल पड़ा सैर सपाटे के लिए। नाव के पड़ाव को पार करते हुए कुछ आगे। सोच रहा हूँ सिर्फ पानी पर ही नहीं धरातल पर घूम कर देख लूं आखिर टापू पर क्या क्या होता है!

पड़ाव के बगल से रास्ता जा रहा है जहाँ से कुछ आगे पुल है। चलते हुए इसी पुल के ऊपर निकाल आया। यहाँ से अलग ही खूबसूरत नजरा देखने को मिल रहा है।

तस्वीरें निकलवाने लगा और निकाली भी। लोग भी चलते फिरते दिखाई पड़ रहे हैं। पुल गिला नजर आ रहा है। ऐसा लग रहा है कोई भारी भरकम वस्तु यहाँ से फेंकी गई हो।

तकरीबन एक घंटा बिताने के बाद वापस निकलने का विचार बना रहा हूँ। पुल से उतरकर वापस पड़ाव पर आ गया। यहाँ से जाने के लिए और भी सवारियां इकट्ठी हो गईं।

आखिरी पड़ाव से नौका को आते देखा और तीन बजे की एक नौका से वापस वडा कैनाल के लिए निकल पड़ा।

दोबारा जल विहार के लिए निकला तो पिछली बार से भी ज्यादा तादाद में तैरनेवाले घर दिख रहे हैं। ये तैरनेवाले घर निगमित बैठकों, छुट्टियाँ बिताने और हनीमून के लिए बहुत आदर्श हैं।

हाउसबोट की यात्रा को सबसे अनोखी यात्रा के रूप में ख्याति प्राप्त है। मेड़ का प्रशांत नौका विहार ने मुझे जीवन का कभी न भूलने वाला अनुभव दे रहा है।

दो युवा किसी प्रतियोगिता की चर्चा कर रहे हैं। जिज्ञासावश मैंने जब पूछा तो उन्होंने बताया कि केरल के प्रमुख त्योहर ओणम के दौरान यहाँ नौकायन प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।

विभिन्न आकारों और प्रकार की नौकायें दौड़ में भाग लेती हैं और विजेता को श्री नारायण की वैजयंती(ट्रॉफी) से सम्मानित किया जाता है।

यह बहुत अद्भुत नजारा होता होगा जिसको देखने मात्र से ही रोमांच पैदा होता होगा। हर पड़ाव से स्कूली बच्चे चढ़ते उतरते दिखाई पड़ रहे हैं।

इन्हीं नावों के माध्यम से लोग एक जगह से दूसरी जगह पर अपना दुपहिया यहाँ तक कि चार पहिया वाहन भी ले जाते हैं। जिनके लिए अलग से बड़ी समान नाव चलती है।

पतली गली से होते हुए विशालकाय पानी में जो समुद्र की भांति लग रहा है वहाँ से नाव गुजर रही है। पानी पर मूंगा – चट्टान भी देखने को मिल रही हैं।

इस विशालकाय पानी के चौराहे पर एक से बड़ कर एक नावें दिख रही हैं। एक से बढ़कर एक तैरनेवाले घर। दूर दृष्टि डालने पर समुद्र जैसा लग रहा है पर समुद्र नहीं है।

इतने बड़े बड़े तैरनेवाले घर जितने बड़े धरातल पर मौजूद होते हैं। इनमे सवार लोग आनंद ले रहे हैं घर की छतों पर बैठ कर। आलीशान तैरनेवाले घर पर अपने लैपटॉप पर काम करते नवयुवक।

पानी के किनारे बने है कुछ आलीशान घर भी। जो पानी पर तैर रहे घरों को मानो बोल रहे हों मैं तो स्थाई हूँ। बस अड्डे की भांति यहाँ भी पड़ाव पर बैठने की उचित व्यवस्था है।

नावों धुलने का अड्डा भी है जैसे धरातल पर कार या किसी दुपहिया वाहन का होता है यानशाला या मोटरघर या मोटरखाना।

सुबह के मुकाबले अब ज्यादा भीड़ है। घंटा भर पानी पर रहने के बाद मैं वडा कैनाल आ पहुंचा जहाँ से मैं कुछ दूरी चल, बस पकड़ कर मारारी तट पर जाने का इच्छुक हूँ।

दूर पानी में नज़र आते तैरनेवाले घर

मारारी तट

बस के माध्यम से और लोगो के द्वारा प्राप्त जानकरी से वडा कैनाल से ही बस में बैठ गया। कुछ ही मिनटों में मरारी तट पर पहुंच गया।

घड़ी में पांच बज रहे हैं। तट पर समय बिताने के लिए बहुत ही कम समय हाथ में है। तट बहुत ही भीतर है। काफी पदयात्रा करनी पड़ रही है। जगह जगह वाहन और दुकानें नजर आ रही हैं।

साफ सफाई में कोई कोताही नहीं है। हरियाली के बीच पतली गली से होते हुए सीधा बाहर आ निकल। यहाँ से तट का नजारा देखने को मिल रहा है जो वाकई बहुत खूबसूरत और अति विशालकाय है।

भीड़ नाम मात्र की दिखाई पड़ रही है। दाहिनी ओर मुड़ कर पेड़ की छांव में बैठ गया। कुछ तस्वीरें निकलवाई। जो अति लुभावनी लग रही हैं।

अजय को नहाने की लालसा हुई मेरे मना करने के बाद भी। कपड़े उतार कर कूद तो गया समुद्र में पर मन में शैतानी खयाल आने लगा।

क्यों ना आज इसे मजा चखाया जाए ताकि हर बार पानी देख कर कूदे ना। उसकी टीशर्ट उठा कर चल पड़ा उसकी ओर। और उसी की ओर समुंदर में फेंकी।

लगा लपक लेगा लेकिन समुद्र की लहरें टीशर्ट बहा कर ले गईं कहीं दूर। इस आस में इंतजार करता रहा की कोई ना कोई लहर आएगी टी शर्ट ले कर पर ऐसा ना हुआ।

सुना तो बहुत था की लहरें सामान ले जाती हैं और दूसरी लहरें वापस कर जाती हैं पर आज वो झूठा साबित हुआ।

जहाँ वह डुबकी लगा रहा है वहीं पास में एक लठ्ठ पड़ा मिला। जिससे लगा वो खेलने बालकों की भांति। समुद्र में और भी लड़के कूद फांद कर रहे हैं। जो आगे जाते तो सुरक्षाकर्मी सिटी बजा कर उन्हे वापस बुला लेते।

समुद्र में नहा लेने के बाद साथी घुमक्कड़ निकल आया। एक लकड़ी का फंस उंगली में घुसा कर। खैर जो हुआ सो हुआ। दूर दराज नावें दिख रही हैं।

पानी से भरे गड्ढे के पास ही बैठ कर नजारे का आनंद लेने लगा। सूरज के ढलते ही आसमान गुलाबी हो चला है। दूर खड़ी समुद्र पर पुलिस की नाव दिख रही है जो गश्त कर रही हैं।

मरारी तट पर लेखक

घर वापसी

कुछ देर बैठने के बाद मैं वापस जॉन के घर निकल गया उसी रास्ते से। हालांकि की आज सबह की योजना के अनुसार शाम तक मुझे निकल जाना था वापस कोच्चि।

लेकिन अगर ऐसा करता तो आलप्पुझा का भरपूर आनंद ना ले पता यह अब एहसास हो रहा है। इसलिए सुबह निकलने से पहले ही जॉन को आज भी रुकने के बारे में अवगत करा दिया था।

बस से उतरने के बाद मैंने उसी ढाबे की ओर चल पड़ा भोजन करने जहाँ कल किया था। आज बाजार में भीड़ है। कल तो एकदम ही सन्नाटा पसरा हुआ था।

ढाबे पर कुछ पुलिसवाले दादागिरी करते हुए कुछ खा उठा रहे हैं। जो चाहें वो मांगा रहे हैं। ढाबे का मालिक भी ये देख मूक बाधिर हो चला है।

खाने के बाद भुगतान कर वापस जॉन के आशियाने पर निकल गया। आते आते ग्यारह बज गया है। अब समय मिला है जॉन से कुछ बातें करने का।

आज भारत बनाम वेस्ट इंडीज मैच भी आ रहा है जिसमें भारत की हालत पतली नजर आ रही है। खैर जॉन के घर में एक घोड़ी भी है जिसे जॉन बहुत प्रेम करते है।

बातचीत करते करते पौने बारह बज गया है, कल कोल्लम जाने की तैयारी के लिए समय से सोना भी जरूरी है। कोल्लम के बाद एलेप्पी ना आ कर सीधा कोची निकल जाऊंगा सरथ के घर।

घर के मालिक जॉन के साथ लेखक
अलेप्पी के मेड पर की कुल 25 किमी की यात्रा

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