अकबर के द्वारा निर्मित स्वयं का मकबरा

उत्तर प्रदेश | भारत | सिकंदरा

साथ चलने की योजना रद्द

आज फतेहपुर सीकरी निकलना है। वहां के सामुदायिक मित्र के निमंत्रण पर आज की रात उन्हीं के घर पर रुकूंगा। पर अभी सिराज और डेविड दोनो ही घोड़े बेंच कर सो रहे हैं।

कल रात तक ये दोनो प्रयागराज निकल रहे थे। गुरुद्वारा जाने के बाद टुंडला जाने का साधन भी पता किया। घर आते आते योजना बदलते हुए बताया की साथ चलेंगे फतेहपुर सीकरी तक।

इस पर मैंने वहां के सामुदायिक मित्र को भी इकताला कर डाला लगे हाथ। उन्हे भी और अधिक लोगों के आने से कोई परहेज नहीं है।

कुछ ही देर में डेविड भी उठ कर स्नान ध्यान करने में जुट गया। उसी के कुछ देर बाद सिराज भी। साढ़े छह बजे तक पवन का संदेश आया की बीमारी के चलते उनके घर पर रुकना संभव नही हो सकेगा।

इधर ये बात मैने सिराज और डेविड को सुनाई जिसे सुन कर वो उदास हुए। दोनो की ही योजना फतेहपुर सीकरी जाने की थी। जो अब बदलती हुई नजर आ रही है।

करीब घंटे भर की बातचीत के दौरान मालूम पड़ा की डेविड मनाली और सिराज प्रयागराज के लिए निकल रहा है। और मैं अभी भी फतेहपुर सीकरी जाने के लिए अडिग हूँ।

इन सबके बीच गौरव अभी भी सो ही रहा है। घड़ी में नौ बजते ही फोन की घंटी बजा कर उसे उठाया। चाय पर चर्चा के बाद हम निकल पड़े हाईवे की ओर। जहाँ से सभी को अपनी अपनी मंजिल मिलेगी।

गुरु का ताल

डेविड को लिफ्ट लेने के गुर सिखाते हुए गुरुद्वारे के सामने आ कर खड़ा हो गया। बाहर ही चल रहे लंगर पर बैठ कर खाना खाने की व्यवस्था पूछने पर मालूम पड़ा की गुरुद्वारे में ही अंदर बड़े हॉल में इस तरह की व्यवस्था है।

लंगर छाकने गुरुद्वारे में प्रवेश कर गया। एक कमरे में जूते और दूसरे कमरे में तीनों के बैग एक डोरी से बांध कर जमा करवा दिए।

जमा हुए समान का टोकन ले कर सीढ़ी से ऊपर दर्शन की ओर चल पड़ा। इस बार डेविड भी दर्शन के लिए साथ में आया है। दर्शन के बाद बाईं ओर प्रशाद ग्रहण करने के लिए कतार में लग गया।

आज धूप तेज है। जिस वजह से गर्मी भी लग रही है। आगरा में प्रदूषण का स्तर भी उच्चतम है। लंगर छाकने दाईं ओर बने हॉल में प्रवेश कर गया।

सिराज को देश के विभिन्न क्षेत्रों में गुरुद्वारे का भोजन का स्वाद चखा है। उसे लगा की यहाँ भी खुद से ही थाली उठानी होगी बाकी जगह की तरह।

उसी के तर्ज पर चलते हुए जब थाली उठाने चला तो सामने बैठे सरदार जी चिल्लाते हुए बर्तन ना छूने को कहा। जिस पर हम तीनो वहां से निकल कर दरी पर आ कर बैठ गए।

बाहर खड़े सरदार जी के अनुसार यहाँ चावल देने का वादा तो अधूरा ही रह गया। रोटी और दाल से ही काम चलाना होगा। खाने के बाद खुद ही बर्तन धोने की व्यवस्था सर्वोत्तम है।

जो हर जगह होना चाहिए। इससे मेजबानों पर बोझ नहीं पड़ता। बर्तन धुलने के बाद सिराज और डेविड चाय पर चर्चा करने लगे। मैं बैठ कर उनके चलने का इंतजार। क्योंकि मुझे तो चाय छोड़े समय हो गया।

एक दूसरे से अपनी अपनी आगे की रणनीति सांझा कर रहे हैं। सिराज को प्रयागराज तक पहुंचने में आने वाली जगहों का विवरण दे रहा हूँ। ये आज ट्रक के माध्यम से आगरा से प्रयागराज तक जाना चाह रहा है।

चर्चा के बाद जमा किए हुए बैग और जूते लेने मैं नीचे आ पहुंचा। टोकन दिखा कर पहले बैग फिर दूसरे कमरे से जूते लिए। गुरुद्वारे से निकल सिराज टुंडला की ओर निकल ट्रक का इंतजार करने लगा।

इसी बीच पुल के नीचे ट्रक जा खड़ा हुआ। जिसे लपकने के लिए सिराज दौड़ पड़ा। इस तरह ये मेरी सिराज से अंतिम मुलाकात है। सड़क पार कर मैं और डेविड अपनी मंजिल की ओर निकल पड़े।

सीकरी जाने से पहले अकबर के मकबरे पर जाने की योजना है। डेविड से अलविदा ले निकल पड़ा मकबरे की ओर। बुलेट से जा रहे सज्जन ने मकबरे तक छोड़ दिया।

सिकंदरा

सड़क पार कर पैदल चलते हुए प्रस्थान द्वार पर आ खड़ा हुआ। यहाँ कहीं मालूम ही नहीं पड़ रहा है की भीतर जाने के लिए मार्ग किधर से है। या फिर टिकट कहाँ से मिलेगी!

घड़ी में सुबह के ग्यारह बज रहे हैं। बाईं ओर जाते हुए एक मंजिला इमारत की ओर आने लगा। पर यहाँ तो कुछ भी नहीं। वापस मुड़ते हुए पेड़ की छांव से गुजरकर दूसरी इमारत की ओर आ गया जो विपरीत दिशा में है।

मालूम पड़ा की कागजी टिकट की बिक्री नहीं है। सिर्फ मिलेगा तो ऑनलाइन ही। नाला पार कर बैनर की ओर आ गया। भारी बस्ता इमारत पर ही छोड़ दिया।

पर कुछ ही देर में बस्ते के लिए हो हल्ला होने लगा। वापस आ कर फिर से लादना पड़ा। बैनर पर लगे क्यूआर पहेली को मोबाइल यंत्र पर पेटीएम के माध्यम से जोड़ने पर सीधा भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की जाल में आ गया।

यहाँ से एक टिकट बना कर मोबाइल में सुरक्षित किया। काउंटर पर पहुंचकर कर्मचारी को टिकट दिखा भीतर प्रवेश करने लगा। पर अभी एक और टिकट कटना बाकी है।

जिसमे प्रवेश शुल्क कटेगा वो भी अंतरजाल से। खैर ये टिकट भी कटवा कर आखिरकार दाखिला मिल ही गया। भीषण गर्मी में मार्ग से होते हुए मकबरे के द्वार के पास आ गया।

यहाँ लगातार कर्मचारियों और मजदूरों द्वारा काम जारी है। पीछे दाहिने हिस्से पर किसी महल की मरम्मत चल रही है। कुछ लडको का एक दल मकबरे की ओर अपने मार्गदर्शक के साथ बढ़ रहा है।

मैं मकबरे से दूर तस्वीर लेने निकल आया। एकांत में। यहाँ से अच्छी तस्वीर आ रही हैं। भीषण गर्मी में पसीने से तर बतर हो चला हूँ।

वापस मार्ग पर आते हुए छोटे से द्वार भीतर प्रवेश करने लगा। ये द्वार जाने किस काम का है! समझ से परे है। छोटे द्वार के आगे है जहाँगीरी द्वार यहाँ पर सुरक्षाकर्मी मौजूद हैं।

पर मजेदार बात ये है की इस छोटे द्वार के बनने के पीछे भी कहानी है। कहते है उस काल में छह सात फीट के औसतन लोग हुआ करते थे। पर अकबर साढ़े पांच फीट का ही था।

जिस कारण लोग उसे ताने दिया करते थे की इन्हे कौन सलाम करेगा। तब बीरबल की सलाह पर इस छह फीट के द्वार का निर्माण कराया गया था। जिससे जो भी अंदर आएगा उसे झुक कर ही आना होगा। इस तरह से वो मकबरे को भी सलाम करता हुआ आएगा।

मुझे लग रहा था की टिकट की जांच शायद ही कहीं हो। पर यहाँ आते ही ये भ्रम टूट गया। द्वार पर ही कर्मी द्वारा बस्ते की जांच हुई। बस्ता जमा कराने की दरख्वास्त पर पीछे की दुकान की ओर इशारा मिला।

यहीं पर बैग जमा करा कर कैमरे के साथ इत्मीनान से बिना किसी बोझ के निकल पड़ा।

ध्वस्त पड़ा दरवाज़ा

मुख्य स्थान पर प्रवेश

आगरा से चार किमी दूर सिकंदरा में ये मकबरा करीब चार एकड़ में फैला है। तेज धूप के कारण पर्यटक बहुत ही नाममात्र के दिखाई पड़ रहे हैं।

कड़ी धूप में मकबरे की तस्वीर लेने के बाद आगे बढ़ चला। साथ ने चल रहे दल के साथ मार्गदर्शक भी है जो काफी बाते बता रहा है। सामने से आते हुए लड़के से तस्वीर निकलवाई और मकबरे की ओर निकल आया।

तेज धूप में बस यही लग रहा है कितनी जल्दी छांव में आ जाऊं। मार्गदर्शक ने कई अहम जानकारियां दीं। जैसे तीन आयामी वाली चित्रकला इमारत।

सन् 1984 से यहाँ ऊपर जाने का रास्ता बंद कर के रखा हुआ है।

चित्रकला देखने के बाद मकबरे के दाईं ओर निकल आया। यहाँ एक पत्थर पर विश्राम कर ही रहा था की मार्गदर्शक एक एक कर सबको बीच में खड़ा कर ताली बजवाने लगा।

फिर एक आदमी को एक खंबे के कोने पर और दूसरे को दूर खंबे के कोने पर से संचार करने को कह रहा था। इसमें एक वक्ता होता दूसरा श्रोता जिसकी आवाज बिलकुल साफ सुनाई पड़ती।

एक एक कर जब सब ताली बजा कर निकल गए तब मैं भी मध्य में खड़ा हो कर ये प्रयोग करने लगा। मध्य में ताली बजा कर सुनने से प्रतिध्वनि सुनाई पड़ रही है। जो दूर बैठ कर बिलकुल साधारण लगती है।

ऐसा इसलिए क्योंकि ठीक इसके नीचे सात फीट खाली गड्ढा है। इस तरह 44 जगहों पर है। क्योंकि अकबर चाहता था की उसकी सभी आने वाली पीढ़ियों को यहीं दफनाया जाए। पर ये ऐसे की ऐसे ही खाली पड़ी हैं। पर 40 खाली पड़ी हैं।

कुछ इस प्रकार है यहाँ के खंबे की संरचना। इसी तरह के खंबे पूरे परिसर में हैं। जैसा मकबरे के सामने का दरवाजा है ठीक उसी तरह बाकी तीन दिशाओं में भी दरवाजा है।

जिसमे से दक्षिण द्वार तो एकदम ही जर्जर है। जिसकी ना तो मरम्मत हुई है ना तो आसार दिख रहे हैं भविष्य में होने के। मकबरे के चारों ओर चक्कर लगा कर सारे दरवाजे दिख रहे हैं।

अकबर बेऔलाद था जिस कारण वो अपनी हिंदू रानी जोधाबाई के साथ पैदल नंगे पैर सलीम चिस्टी की दरगाह पर दुआ मांगने गया था।

दुआ कुबूल होने के बाद बेटा हुआ जिसका नाम सलीम रखा। पर अपने धर्म के अनुसार उसने नाम रखा जहाँगीर। जहाँगीर और अनारकली की कब्र लाहौर में बनी है।

अकबर का मकबरा चारों ओर से सममित है। जिस कारण ये एक जैसा ही लगता है। पांच खाने मकबरे के दाएं बाएं हैं। कुल 44 खाने हैं। जिसमे से चार घिरे हुए हैं। जिसमे अकबर और उसकी बेटियों की कब्र हैं। बाकी अभी भी खाली पड़े हैं।

साथ ही यहाँ पर प्रेमी युगल भी बहुत देखने को मिल रहे हैं। अंतिम द्वार देखने के बाद थक कर बैठ गया पास पड़ी बेंच पर। यहाँ मरम्मत के कार्य की निगरानी के लिए अफसर भी दौरा करते दिख रहे हैं।

इसी इमारत में है मकबरा

अकबर का मकबरा

उठकर आखिरकार मकबरे में प्रवेश करने लगा। यहाँ भी जूते चप्पल उतारने पड़ेंगे। पर रखने की कोई व्यवस्था नहीं। स्लेट के पीछे जूते छुपा कर अंदर आ गया।

कहा जाता है की अकबर के मकबरे को नष्ट भी किया गया था। हरियाणा के राजकुमार ने बदला लेने के लिए अकबर की अस्थियों को कब्र से निकाल कर पूरे शहर में घुमाया था।

पर इन बातों में कितनी सच्चाई है किसे पता। अंदर एक पर्यटक दीवार पर उकेरी हुई आकृतियों का चलचित्र बना रहा है। पास खड़े मार्गदर्शक ने बताया की कभी इन दीवारों पर सोना हीरा जड़ा हुआ करता था।

उसे सोने का घर भी बोला जाता था। औरंगजेब ने गोकुल नाम के जमींदार को मरवा दिया था जिसका बदला लेने राजा राम सिंह ने धावा बोल दिया था।

कोई कहता है राजा राम सिंह ने अकबर की हड्डियों को जला कर राख में मिला दी थीं।

पूरे मकबरे में आग लगा दी थी। सारा कुछ पिघला कर लूट कर ले गए थे। तभी से अब तक यहाँ की दीवार काली पड़ी हुई है। 1905 में कर्जन ने दोबारा इस जगह पर सोने की चित्रकला कराई थी। पतली सी गली से होते हुए अकबर के मकबरे के पास आ खड़ा हुआ।

यहाँ खड़े मौलवी और जानकारी देने लगे। अकबर के द्वारा पहले से ही इस जगह को निर्धारित कर लिया गया था। यहाँ तक कि निर्माण कार्य भी शुरू हो गया था।

पर जहाँगीर ने अकबर की मृत्यु के बाद इसे पूरा कराया। पर जैसा अकबर चाहता था वैसा ना बन सका। लाहौर में मृत्यु के बाद उनकी लाश को यहीं पर ला कर दफनाया गया था।

अकबर तो ये भी चाहते थे की उनके सभी पुश्तों की कब्र यहीं बने। पर ऐसा बिलकुल भी संभव ना हो पाया। कब्र के पास कुछ समय गुजर निकल आया बाहर।

तेज धूप में बस अब किसी तरह सीकरी पहुंचने की योजना बना रहा हूँ। प्रवेश द्वार के पास पहुंच कर दाईं ओर पानी पीने निकल आया।

आज जहाँ पानी की व्यवस्था है कभी यहाँ अस्तबल हुआ करता था। मुगलकाल में यहाँ गुलाब की खेती हुआ करती थी। जो फूल भर कर मकबरे के पास बने चौकर पानी से भरे टैंक में डाल दिया जाते थे। जो इस तरह के आठ है। हर द्वार पर दो टंके।

द्वार पर बनी किताब की दुकान से बैग उठा कर निकल पड़ा बाहर की ओर।

बाहर निकलने से पहले बाईं ओर पड़ने वाली इमारत को ओर आ गया। अंदर दाखिल हुआ ही की एक सोती हुई अम्मा जी नींद से जाग उठी और इस महल के बारे फर्राटे से बताने लगीं।

जिसकी ना तो मुझे सुनने की इच्छा थी ना जानने की। महल के सामने है सिकंदर लोदी का महल है।

जहाँगीर ने इस कांच महल का निर्माण कराया था जिसको बनने में चौदह साल लगे। कहा जाता है की जब जहाँगीर मदिरा का सेवन करता था तभी इस महल का निर्माण कार्य होता था।

इसी कारण इस महल की दीवार पर सुराही, थाली, गिलास की नक्काशी देखी जा सकती है। जो मदिरा के कारण ही है।

कांच महल के सामने बना लोदी महल है। यहाँ पहले सिकंदर लोदी का मकबरा हुआ करता था जिसे बाद ने दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।

जहाँगीर का कांच महल

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