अजंता एलोरा से भी पुरानी उदयगिरी खंडागिरी गुफाएं

उड़ीसा | भारत | भुवनेश्वर

धीरज की परीक्षा

आंख खुलने पर यही ध्यान आ रहा है की आज आश्रम से निकल कर यात्रा समुदाय से जुड़े एक जने के यहाँ जाना है।

ये यात्रा समुदाय के मित्र भी सीधे तौर पर नहीं मिले। एक दूसरे सज्जन ने इनसे बात करके मुलाकात करने को कहा है।

अच्छी बात ये है की प्रशांत भाई अपना दुपहिया वाहन छोड़ गए हैं। जिससे कटक, कोणार्क मंदिर और जगन्नाथ पुरी मंदिर भी कम समय ने पहुंचा जा सकता है।

अन्यथा पहले मेरी यही योजना थी की हर एक शहर में रुक कर इतमीनान से समय देता हुआ चलूंगा। उस योजना में कटक जाना शामिल नहीं था। वरन इस योजना में है।

कक्ष में स्नान ध्यान करने के बाद कमरे में फैले सामान को समेटने लगा। जैसे बिजली के जो उपकरण चार्जिंग पर लगे थे उनको निकलना।

जिसमे मोबाइल से ले कर पावर बैंक, डिजिटल बैंड। सबको अपनी जगह पर रखा।

बैग पैक कर निकलने की तैयारी करने लगा। कोशिश यही है जितनी जल्दी आश्रम से निकल जाऊं उतना अधिक समय घूमने में बीता पाऊंगा।

साथी घुमक्कड़ दुपहिया वाहन ले कर इमारत के आंगन में ले आया। दोनो बैग सरकाते हुए इन्हें मैं गाड़ी के पास तक ले आया।

आश्रम में दिन की गतिविधियां शुरू हो गई हैं। सफेद वस्त्रों में साधु महाराज ध्यान लगाए या फिर मंदिर के सामने प्रार्थना में लीन।

गाड़ी चालू करके आगे पीछे साथी घुमक्कड़ कर ही रहा था की एक सज्जन आ धमके। जो अभी कुछ समय तक बेंच पर बैठे थे।

अचानक मेरे सामने प्रकट हुए। एक टूक देखने लगे। उनके इस तरह से देखने में मैं खुद को असहज अवस्था में पा रहा हूँ।

मूंह के पास आ कर खड़े ये महाशय आश्रम से जाने का कारण पूछने लगे।

उनके अचानक दिए गए विचित्र दर्शन से मैं क्षण भर के लिए कांप गया। डर तो और भी ज्यादा तब लगा जब उन्होंने जाने का कारण पूछा।

उनके हर प्रश्न का उत्तर मैने देना शुरू किया। वह मेरे जवाबों का इतना धीमा उत्तर दे रहे हैं जो मेरी शहनशीलता को ललकारने का काम कर रही है।

पिछली रात के प्रवचन से मेरे दिमाग पर गहरा प्रभाव पड़ा है। जिसकी वजह से जल्द से जल्द निकलना और भी आवश्यक हो जाता है।

मैंने उन्हें अपने आने और जाने का कारण बताया। तो उस पर भी एक और प्रश्न। मैं उत्तर देता जाता वह एक के बाद एक सवाल दागते जाते।

वह तब तक चुप नहीं हुए जबतक मैंने अपना वाहन चालू कर जाने की अज्ञा नहीं मांगी। दिनभर बात करने के विचार में लग रहे थे।

भला हो जो उन्होंने मुख्य द्वार का मार्ग बताया वरना मुझे तो लग रहा था कि कहीं द्वार पर हमें रोकने के लिए ताला ना डलवा दें।

सत्संग विहार आश्रम से छुट्टी

प्रशांत जी के वाहन से निकल पड़ा यात्रा समुदाय मित्र प्रीतेश प्रियदर्शनी के घर। वाहन पर दो प्राणी के साथ दो बड़े बैग भी है।

देखा जाए तो यह कृत्य वाहन पर जरूरत से ज्यादा भार देने का काम कर रहा है। लेकिन नियम के अनुसार दो है लोग सवार हैं।

इसलिए कहीं भी किसी पुलिस कर्मी ने कोई भी रोक टोक नहीं की।

मुख्य सड़क पर गाड़ी दौड़ाते हुए गूगल नक्शे कि सहायता से मैं अपने ड्राइवर साथी घुमक्कड़ के साथ आश्रम से पटिया रोड आधा घंटे में पहुंच गया।

यह क्षेत्र शहर के बिल्कुल बाहर बसा है। हरियाली ही हरियाली नजर आ रही है। शहर से बाहर होने के कारण स्वच्छता बहुत है।

सड़क के एक पार तो मैदान दूसरी ओर पहाड़ी। जिस पर बना मंदिर याद दिला रहा है पुराने काल के तपस्वियों की।

जो ऐसी पहाड़ी चोटी पर जन्मों तपस्या में लीन रहते थे।

दो गली छोड़ कर एक जैसे मकानों को देख कर मैं भ्रमित हो गया। मालूम ही नहीं पड़ रहा कौन सा घर किसका है।

भ्रम स्तिथि वश किसी दूसरे के घर के सामने खड़े हो कर प्रीतेश को फोन मिलाने लगा।

दूसरे घर से अपना नाम पुकारे जाने पर पलटा तब पाया चोटी बांधे एक लड़का खड़े हंस रहा है। मेरे इस कृत्य पर की मैं किसी दूसरे के घर के सामने किसी दूसरे का घर समझ बैठा।

दुपहिया वाहन घर के अंदर लगा कर बैग के साथ असली घर में दाखिल हुआ। दो मंजिला इस घर में जगह की कोई कमी नहीं है।

जान परिचय

काफी वक्त जान परिचय में निकल गया। अबतक घूमे हुई जगहों की किस्से कहानियां सुनाने में।

प्रीतेश और उसका मित्र जिसके साथ वो रहता है बड़े चाव से कहानियां सुन रहे हैं। आए हुए घंटा भर तो चुटकी बजाते निकल गया।

भूख के चलते प्रीतेश ने सुझाव दिया बाहर कहीं चल कर सुबह का नाश्ता करने के लिए। अपनी योजना बताते हुए मैने जरूरी सामान बड़े बैग से निकाल कर छोटे बैग में भर लिया।

प्रीतेश भी कटक निवासी हैं। इस कारण उनका कटक के प्रति लगाव बहुत है। वहाँ घूमने लायक जगह भी सुझाने लगे।

साथ ही उदयगिरि और खंडगिरि भी जो कटक के रास्ते ही पड़ती हैं।

फिलहाल तो भूख का निवारण करने के लिए घर से अपने अपने वाहन पर निकल पड़े हम चार लोग।

मैं अपने वाहन से प्रीतेश के पीछे पीछे चलने लगा। ये जनाब जिस दिशा में ले जाएंगे आज वहीं भोजन होगा।

मुख्य सड़क पर कुछ विश्वविद्यालयों के समीप बने रेस्त्रां में दस्तक दी। पर यहाँ वो भोजन उपलब्ध नहीं है जिसकी प्रीतेश को तलाश है।

प्रीतेश राष्ट्रपति पुरस्कार द्वारा सम्मानित हैं जिन्हे खाने को ले कर बहुत दिलचस्पी है। साथ ही खाने के ऊपर एक किताब भी लिख रहे हैं।

पटिआ रोड पर सवारी करते चार आदमी प्रीतेश, सुब्रत, साथी घुमक्कड़, ऐश्वर्य

इसीलिए इनको ज्यादा पता है खाना खजाना के विषय में। दो तीन रेस्त्रां को नजरंदाज करते हुए हम पहुंच गए किसी गली के नवीनतम रेस्त्रां में।

गाड़ी से उतर कर प्रीतेश और उनके साथी ने सुनिश्चित किया की यहीं करनी है पेट पूजा।

ये रेस्त्रां एक अच्छी कलाकृति का शानदार नमूना है। ये पटिया रोड का सबसे मशहूर रेस्तरां हैं।

रेस्त्रां नया ही नहीं बल्कि नए जमाने के हिसाब से जनता को मद्देनजर रखते हुए बनाया गया है।

साजो सज्जा भी पुराने समान को दीवारों पर लटका कर भूखे मनुष्य को अपने बचपन के दिनों में ले जा रहे हैं।

जैसे ये पुराना टेप रिकॉर्डर, पुरानी घड़ी और भी काफी कुछ।

मेनू कार्ड पर तमाम तरह के व्यंजन हैं। मैने वही मंगाया जिससे भूख मिट सके और दिनभर ऊर्जावान बना रहूँ।

सामने लगे टीवी में बॉलीवुड गाने चलचित्र सहित चल रहे हैं।

पेट पूजा करने के बाद भुगतान करने चला तो प्रीतेश ने रोक दिया। शाम को एक बार फिर खाने पर बुलावे के साथ रात को भुगतान मैने अपने जिम्मे ले लिया।

कटक रवानगी

वाहन चालू किए और दोनो गाडियां घर की ओर निकल पड़ी। इस दौरान घुक्कड़ी के वीडियो बनाने पर जोर देते हुए प्रीतेश ने इसके फायदे गिनाए।

पटिया रोड से बाहर आ कर सड़क विभाजन के साथ हमारे रास्ते भी विभाजित हो गए। प्रीतेश अपने गृह को निकल गया और मैं उदयगिरि खंडगिरि गुफाएं।

गुफाएं देखने के बाद कटक जाऊंगा जहाँ सुभाष चन्द्र बोस जी का जन्म स्थल है। अब उनके घर को संग्रहालय बना दिया गया है।

पटिया रोड से हाईवे की तरफ जाते हुए उदयगिरि और खंडगिरि की गुफाएं पड़ती हैं। इस हाईवे पर अक्सर हांथी भी देखे गए हैं।

जिसके कारण यातायात बाधित होता है। या सही तौर पर कहूँ तो हांथी का रास्ता हम मानव बाधित करते हैं।

आधे घंटे के भीतर मैं उदयगिरि खंडगिरि की गुफाओं आ पहुंचा। सड़क पार करते हुए दाहिनी तरफ आ गया। जहाँ गाड़ी खड़ी करने की जगह तलाशने लगा।

सूर्य देवता आसमान में अपना जलवा दिखा रहे हैं। ज्यादा ना तलाशने पर ही चार पहिया वाहन के बीच में लगा कर चल पड़ा।

सड़क के इस तरफ खंडगिरि गुफाएं हैं और उस पार उदयगिरि गुफाएं। टिकट घर भी सड़क के उस पार ही है।

गेट से भीतर घुसने का प्रयास करने पर जवाब मिला की पहले टिकट फिर दिखाई।

बाईं तरफ टिकट घर की ओर आ गया। जहाँ ज्यादा भीड़ नहीं है। इसलिए टिकट मिलने में ज्यादा देर नहीं लगेगी।

साथी घुमक्कड़ को खिड़की के आगे खड़ा कर पेड़ की छाव में आ गया। मुझे लगा इन गुफाओं को देखने का कोई शुल्क अदा नहीं करना होगा।

पर शुल्क लेना भी बेहतर है। ताकि जनता भी समझ सके की कौन सी चीज कितनी मूल्यवान है।

अजंता एलोरा से भी पुरानी उदयगिरी खंडागिरी गुफाएं

टिकट ले कर प्रवेश किया इन दो हजार साल पुरानी गुफाओं में। सामने पाया बोर्ड। जिस पर हिंदी, ओड़िया और अंग्रेजी में यहाँ का इतिहास उकेरा गया है।

मजेदार बात यही है की दोनों गुफाएं दो अलग अलग पहाड़ी पर हैं। उदयगिरि में अटठारह गुफाएं हैं तो वहीं खंडगिरि में पंद्रह गुफाएं मौजूद हैं।

ये दोनों गुफाएं एक दूसरे के सामने हैं। खंडगिरि गुफाओं में प्रवेश निशुल्क है। पर यहाँ नहीं।

दोनो ही गुफाएं जैन परम्परा से संबंधित हैं। जैसा बोर्ड पर पढ़ा की इन गुफाओं की खुदाई खारवेल और उसके उत्तराधिकारियों ने कराई थी।

खुदाई प्रथम शताब्दी ईसा पूर्व में हुई है। जाहिर है ये गुफाएं उससे भी पुरानी रही होंगी। 10 11वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक चली।

गुफाओं को समझने के लिए ये जानना जरूरी है की गुफाओं की एक कतार में स्तिथ कोठरियां या तो बरामदे में खुलते है या खुली जगह में।

कक्ष जिसमें उठा हुआ सिरा तकिया के रूप में इस्तेमाल किया जाता था जिसे बाद में पूजा गृह में तब्दील कर दिया गया

कोठरियों के फर्श का एक सिरा कुछ उठा हुआ है। संभव है की इसे तकिया के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा होगा।

बाद में इन्ही कोठरियों को पूजा घर में परिवर्तित कर दिया गया था।

कोठरियों के प्रवेश द्वार पर स्तिथ स्तंभों के ऊपर विभिन्न जानवरों का अंकन है।

यहाँ की रानीगुम्फा और स्वर्णपुरी मंचपुरी दो मंजिला गुफा है। इनमे से एक गुफा हाँथीगुम्फा में मगध और कलिंग जिन की मूर्ति को वापस लाने का उल्लेख है।

ये यह दर्शाता है की ईसा पूर्व के लोग इतिहास को आगे तक पहुंचाने के लिए कितने जागरूक और सजग थे।

गुफाओं के माध्यम से अनेकों कार्यों का लेख किया है। जो आज हम तक पहुंच पाया है।

रेलिंग के सहारे बनी सीढ़ियों से ऊपर चढ़ने लगा। ब्राम्ही लिपि में खारवेल का लेखा जोखा है जो प्रथम ईसा पूर्व का है। ये हांथीगुम्फा में है।

तेज धूप में हालत सूख गई है। दिन के डेढ़ बजे ये हालत है। यहाँ पर्यटकों के लिए हर प्रकार की सुविधा उपलब्ध है। पानी पीने से ले कर पानी बहाने तक की।

आसपास के उद्यान को काफी सजा धजा कर रखा हुआ है। जो देखने में भी आकर्षक लग रहा है। दर्शाता है की यहाँ पैसा सही जगह इस्तेमाल हो रहा है।

रानीगुम्फा सीढी चढ़ते हुए मेरे दाहिने हांथ पर है। जो दो मंजिला है।

ऊपर बनी गुफाओं की तरफ आया जहाँ तीन खंबो पर टिकी एक गुफा है।

अजीब से मुख वाली ये गुफा में ठीक वही पूजा घर है जैसा बोर्ड पर लिखा हुआ है।

इसके भी ऊपर जाने का रास्ता है। लोग इस गुफा की छत पर नजर आ रहे हैं।

इन गुफाओं को ठीक से समझने के लिए अध्यन की जरूरत है। ऊपर बनी चट्टान पर एक लाइन में आठ छेद है जो जाने क्या दर्शा रहे हैं!

रानीगुम्फा हाँथीगुम्फा

गुफाओं के मुंह दरवाजों जैसे हैं। जहाँ से दिन के समय सूरज की रोशनी आ सकती है। रात को चाँद की रोशनी गुफा में आती है जिससे गुफाओं में उजाला रहता है।

कुछ एक तस्वीरें निकालने के बाद इस गुफा की छत की ओर बाई ओर बने जीने से बढ़ा।

छत से पूरा शहर नजर आ रहा है। जब शहर नहीं होते होंगे तब दूर से ही ये गुफाएं नजर आती होंगी।

आज की आधुनिकता सब ले डूब रही है। कई गुफाओं तक तो पहुंच पाना भी संभव नहीं है।

छत पर अलग ही अक्रतियां देखने में आ रही हैं। कहीं बड़े गोलाकार में कुछ पत्थर पड़े हुए हैं। जो समय के साथ चूर हो गए हैं।

किसी आकृति जा कुछ जरूरी अंग हुआ करता रहा होगा। गोल आकार के छेद ना जाने क्या बताना चाह रहे हैं।

यहाँ पर छोटी से छोटी गुफा का भी कुछ न कुछ नामकरण है। जैसे एक कमरे वाली बाघ गुफा।

खंडगिरि की चोटी पर बना दिगंबर जैन मंदिर

सामने दिख रही पहाड़ी खंडगिरि है। जिस पर काफी बड़ा दिगंबर जैन मंदिर बना हुआ है। लोग वहाँ जाते हैं पर इस बदलते मौसम में मैं ना जाने वाला।

वहाँ जाने का मतलब है कटक के लिए समय काटना।

अबतक धूप भी बादलों के बीच में छुप गई है। शहर का नजारा देखने के बाद दाईं ओर से चलकर नीचे जाने लगा।

ये गुफाएं अजन्ता एलोरा जितनी प्रसिद्ध तो नहीं, लेकिन निर्माण सुंदर ढंग से किया गया है।

एक गाइड को हिंदी बोलते हुए सुना कि यहाँ पर जैन साधु निर्वाण प्राप्ति की यात्रा के समय करते थे।

कुछ गुफाएं प्राकृतिक हैं। लेकिन ऐसी मान्यता है कि कुछ गुफाओं का निर्माण जैन साधुओं ने किया था।

ये प्रारंभिक काल में चट्टानों से काट कर बनाए गए हैं। इन्हें न जाने कितनी पूर्णिमा वाली चाँदनी रातों में बनाया गया था।

यह निर्माताओं कि बुद्धिमानी का प्रतीक है। इन गुफाओं में बैठकर साधुजन शांति से समाधि लगाते थे और कठोर तपस्या करते थे। उदयगिरि खंडगिरि से ज्यादा आकर्षित दिख रही हैं।

गुफाओं का काफी हिस्सा श्रतिग्रत हो चुका है। जो टूटे हुए खांबो और मूर्तियों को देख कर बताया जा सकता है।

इस लिहाज से काफी दूर तक फैली और काफी आगे तक बनी होंगी ये गुफाएं।

हांथीगुम्फा पर गाइड तो है पर हिंदी भाषी नहीं। ओड़िया भाषा भी कई लहजे में बोली जाती है।

हाँथीगुम्फा में पहरेदारी करते हाँथी

शहर का अलग लहजा और गांव का अलग। यहाँ दो हांथी खड़ी अवस्था में हैं। खंबों पर मूर्ति। एक कोने पर पहरेदार जो हांथ में भला लिए खड़ा है।

भीतर बने हैं चार कमरे। जिसमे जाने का मार्ग एक और से थोड़ा आसान है।

ऐसे ही दूसरी गुफाओं में भी कुछ ऐसा ही दृश्य देखने को मिल रह है। पहरेदार और खम्बों पर मूर्ति। भीतर शयनकक्ष।

कुछ एक मंजिला कुछ दो। नीचे उतरने से पहले रानीगुम्फा की ओर आया जिसके आगे शानदार उद्यान सजा हुआ है।

दो मंजिला इस गुफा में अनेकों कक्ष हैं। कुछ के द्वार पर कलाकृति उकेरी गई हैं। कुछ कलाकृतियां मिट गई हैं।

यहाँ हर द्वार कुछ ना कुछ बोलता है। अभी भी काफी कुछ है जो यहाँ बचा हुआ है। काफी कुछ समय के साथ घुल गया है।

प्राकृतिक आपदाओं के चलते भी इस गुफा को श्रृति पहुंची होगी जो देखा जा सकता है।

पर यहाँ आ कर काफी जानकारी प्राप्त हुई।

कुल पचास मिनट घुमाव के बाद बाहर की ओर निकलने लगा।

जी तो चाह रहा है खंडगिरि भी जाऊं। पर ये गुफाएं अपने नाम के अनुरूप खंडहर अवस्था में हैं। ना तो यहाँ जाने का भी कोई शुल्क है।

गाड़ी के पास आ कर निकल पड़ा कटक सुभाष चंद्र बोस का जन्मस्थल।

दो मंजिला रानीगुम्फा

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