स्टोरीज ऑफ इंडिया, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश
Leave a comment

ऐतिहासिक 800 साल पुराना कीह मठ

एशिया के सबसे बड़े पुल से अलविदा

बस तो इन पहाड़ियों में डोलती हुई मस्तानी की तरह चलती जा रही है। पीछे मुड़ के देखा तो छोटा सा चिचम गांव बहुत ही खूबसूरत लग रहा है। बस सड़क पर इतना उछाल मार रही है कि ठीक से एक फोटो भी नहीं आ रहा है। बड़ी मुश्किल से एक दो फोटो लेे पाया। 

इधर कंडक्टर बाबू आ गए टिकट काटने। चिचम से किब्बर तक बस। बस तो काजा तक जाएगी। पर मुझे तो किब्बर तक ही जाना रहेगा। थोड़ा समय है पर जल्दी है पहुंच जाऊंगा ऐसा कंडक्टर बाबू बोले।

बस में बैठे सभी गांव से हैं। कोई खेती करने जा रहा है तो कोई काजा बाज़ार खरीदारी करने। गांव वालों के भी खेत उनके घर से काफी दूरी पर हैं। खासतौर पर सभी के खेत नदी के पास है। जाहिर है पानी की भी अच्छी खासी सप्लाई होती रहती है।

यहां पर अधिकतर लोगों के चेहरे मुझे लाल दिखे और काफी सिकुड़े हुए। शायद बहुत ज्यादा ठंडे इलाके में रहने का कारण है। या फिर लाल मिट्टी भी इसकी एक वजह हो सकती है।

ऊबड़ खाबड़ सड़क से होते हुए मैं पहुंच गया किब्बर। जो कि मेरा अगला पड़ाव है। बस का रुकना हुआ पर मुझे पता ही नहीं चला कि यही किब्बर है। जहां की कीह मठ कुछ 8०० साल से भी ज्यादा पुराना है। 

वो तो भला हो इस लड़की का जो उतरते उतरते बताने लगी यही किब्बर है। वरना ड्राइवर साहब तो बहुत ही जल्दी में नजर आ रहे हैं।

बस चलने ही वाली है कि मैंने अपना बैग उठाया और पीछे वाले गेट से उतरने लगा। तभी कंडक्टर बाबू ने सिटी बजते हुए बस रुकवाई।

किब्बर गांव

उतर तो गया किब्बर पर अब कहां जाऊं। दस मिनट की ऊबड़ खाबड़ सड़क में हाल बेहाल हो गया है। ऊपर से इतना भारी बैग लेे कर चलने में आफत आ रही है। 

बस ने तो किब्बर पर बने गेट पर ही उतार कर चल पड़ी। बाकी जो सामने मकान दिख रहा है फिलहाल तो मुझे वहां तक पहुंचना है कैसे भी करके। 

भरी धूप में बैग लेे के आने लगा। पास में ही बनी पाठशाला पर नजर पड़ी तो देखा छोटे छोटे नन्हे बालक लाल वस्त्र पहने अपने बालकाण्ड को भरपूर आनंद ले रहे हैं। 

बुद्ध धर्म में हम ये नज़ारा आराम से कहीं भी देख सकते हैं। ऐसे लाल वस्त्र में बालक या बालिकाएं या वयस्क को अपने जीवन का सिर्फ एक ही सिद्धांत बना लेते हैं वो है साधना।

मैं आ पहुंचा सामने वाली इमारत के सामने। एक मजदूर के अलावा कोई भी नहीं दिख रहा है मुझे। सीढ़ी चढ़ कर पटिया पर आ खड़ा हुआ। 

महज़ बस के सफ़र और बैग लेके यहां तक आने में थकान इतनी लग रही है जिसका हिसाब नहीं। मन कर रहा है यही लेट जाऊं। 

कड़ी धूप में आराम

बैग रखा एक किनारे, मैट तो बैग के बाहरी हिस्से में है तो निकालते वक़्त ज्यादा सोचना भी नहीं पड़ा। और बिछा दिया ज़मीन पर लेटने के लिए। अब यही धूप अच्छी लगा रही है। और बड़ा आराम भी मिल रहा है लेटने से। मानो सारी थकान धीरे धीरे निकल रही हो शरीर से।

लेटे लेटे सामने बनी कीह मठ काफी ऊंचाई पर नजर आ रही है। सोच रहा हूं अभी तो यहां पर भी जाना है। पर बैग लेके यहां तक जाना तो संभव नहीं होगा। या फिर एक एक करके जाया जाए तो भी बात बन सकती है।

इस मठ की शुरू से लेे कर अंत तक चढ़ाई ही इतनी है कि बैग लेके जाने में प्राण निकल जाएं। आधे घंटे धूप की सिकाई और आराम के बाद सारा समान उठा बैग में चिपका दिया। 

बगल से गुजर रहे मजदूर से बैग लगाने का ठिकाना पूछा तो बोला यहीं छोड़ जाओ कोई कुछ नहीं करेगा। अब उनकी बात पर कितना विश्वास करना सही है कितना नहीं ये तो मैं नहीं बता सकता। पर एक पल के लिए सोचा इस घनघोर पहाड़ी इलाके में बैग लेके भी कोई कितनी दूर ही जाएगा। 

पास में पाठशाला, बहुत दूर मजदूर। बैग से चैन और ताला निकाला और लगाने लगा दोनों बैग को जोड़ कर। ताला मारा ही है कि आसपास टूरिस्ट वाहन निकलने लगे। पर अच्छे सभ्य लोग लग रहे हैं। 

हैरानी थोड़ी इस बात की भी लगी कि स्पीति घाटी को भी लोगों ने टूरिस्ट स्पॉट बना दिया है। जो यहां भी गाडियां आती हैं। इस बात से तो बिल्कुल ही अनजान था मैं अबतक।

कीह मठ का प्रवेश द्वार

कीह मठ की और रवानगी

खैर भगवान भरोसे बैग में ताला डाल कर चल पड़ा ऊपर कीह मठ। एक पल को उस मजदूर की बात का आकलन करने के बाद। इस सूनसान इलाके में इस कदर दो लावारिस बैग पड़े हुए हैं। 

अब एक एक करके और भी गाडियां आए रही हैं। जैसे जैसे समय गुजरेगा वैसे वैसे और आती रहेंगी गाडियां। जिस पाठशाला में बच्चे मस्ती के रहे थे अब वहीं कक्षा लग चुकी है। सब बारी बारी से खड़े किए जा रहे हैं। लग रहा है मास्टर साहब आज जम के सवाल पूछेंगे। 

इधर गाड़ी से उतरे लोग भी अपना हुलिया दुरुस्त करने में जुटे हैं। शायद मुझे भी कर लेना चाहिए इतनी पवित्र जगह में जाने से पहले। 

नल्के की पूछ में, एक संत महात्मा मिले। जिनसे मालूम पडा मोड़ से आगे नलका मिल जाएगा। जहां शुद्धता तो की ही जा सकती है। चढ़ाई चढ़ने से पहले दूर आगे लगे नलके के पास आ गया।

नल्के का चलना हुआ और पानी पड़ते ही मेरे हांथ मानो जम से गए हों। इतना शीतल पानी। जल्दी जल्दी हांथ मूह धो कर मानो इतने ठंडे पानी से पीछा छुड़ाने के लिए विवश होना पड़ा मुझे। 

बैग जहां के तहां लावारिस की भांति पड़े हैं। ना इनको देखने वाला कोई ना छेड़ने वाला। मठ से वापस आऊं तो शायद मिल जाएं मुझे।

खैर अच्छे बच्चे की तरह तैयार हो कर चढ़ाई चालू की। इधर बच्चों की पाठशाला में भोजन का समय हो गया है। पूरा मैदान साफ लग रहा है। 

चढ़ाई के दरमियान काफी संत महात्मा आते जाते दिख रहे हैं। जो कदाचित शांत और धैर्य से भरपूर हैं। जिनको देख के ही हम आम मानुष अपनी जीवन की समस्याएं भूल जाएं। 

ऐसे ही किसी चर्चित किताब में मैंने पढ़ा था। किसी भीषण युद्ध के बीच से सात संत गुजर रहे थे। की अचानक दोनों और से गोलाबारी बंद हो गई। उनके गुजर जाने के बाद भी किसी तरफ से गोलाबारी नहीं हुई। और सैनिक वापस लौट गए।

इतनी भीषण शांत मन वाले संतों को नमन। चढ़ाई चढ़ते चढ़ते मैं काफी ऊपर आ चुका हूं। जहां से बैग तिनके के सामान देखे जा सकते हैं। कुछ ही आगे मठ में मजदूर कार्य पर लगे हुए हैं।

जैसा कि कल जिक्र किया था कि हो ना हो ये बिहार, झारखंड के मजदूर होंगे। और पूछने पर भी वहीं के ही निकले। ये यहां के संतो के लिए एक नए हॉस्टल का निर्माण कर रहे हैं। 

कीह मठ(मोनेस्टरी)

अब मैं मठ के द्वार से ठीक सामने आ गया हूं जहां से अन्दर जाने से पहले जूते उतारने ही पड़ेंगे। पर इतने महंगे जूते उतार कर अन्दर जाने में थोड़ा डर भी है। 

दोनों में से कोई ना तैयार हुआ बाहर रुकने को। और चल पड़ा जूते उतर कर मैं अन्दर। बड़ी सी चौखट को लांघते हुए अन्दर आ कर है मालूम पड़ रहा है कितनी पुरानी सभ्यता है और कितना पुराना है ये मठ। कीह मठ!

कुछ अन्दर चल कर सामने छोटे से आंगन में बहुत बड़ा सा दीप प्रज्ज्वलित है। जो एक कांच के शीशे से ढका हुआ है। आस पास नव युवक संत खड़े गपशप करने में लगे हुए हैं। 

प्रवेश द्वार के ठीक दाईं तरफ एक मंदिर। बौद्ध मंदिर। यहां भी काफी जनता अन्दर हो कर आ रही है। मेरा भी जाने का मन है। पर यहां आंगन में बने  प्रज्ज्वलित दीप से नजर ही नहीं हट रही। 

जिस लोटे में ये दीप जल रहा है उसमे एक विचित्र भाषा में ही कुछ लिखा है। हालांकि की पढ़ने में कुछ भी नहीं आ रहा। पर समझने कि कोशिश कर रहा हूं। 

छोटे संतों से पूछा तो उन्होंने बताया कि ये दीप संतों की याद में जलाते हैं। जिन्होंने इस मठ की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी। तो एक दूसरे संत के विचार ही अलग हैं।

दीप से दाईं तरफ सामने बने एक बहुत ही पुराने कमरे में जाने की ज्यादा इच्छा हो रही है। ये इतनी पुरानी है जितनी किसी गांव में किसी बूढ़ी काकी की कोठरी।

यहीं इसी के सामने आ कर खड़ा हो गया इस इच्छा से। तभी अचानक एक संत आए। और पूछने लगे देखना चाहेंगे आप? मैंने भी हामी भरते हुए हां में उत्तर दिया। लामा लेे जाने लगे उस कोठरी के पास।

एक चक्कर घुमाया। और फिर कोठरी का ताला खोलते हुए अन्दर जाने को कहा। अन्दर इतना घोर अंधेरा और उसमे भी एक लकड़ी से बंधा बांस और चक्र। मुमकिन है शायद प्रार्थना स्वीकार करने के लिए घूमाते होंगे। 

पर ये इतना पुराना है मानो दादी की कोठरी। अन्दर जाने की जेहमत भी नहीं की। बाहर ही बाहर से निकलने लगा। लामा जी मुझे अपने कक्ष कि तरफ लेे जाने से पहले पूछने लगे क्या आपने उस मंदिर के दर्शन किए।

मेरे ना कहने पर उस मंदिर के दर्शन कर के अपने कक्ष में आने को कहा। मैं वापस सीढ़ी से नीचे उतर कर मंदिर की तरफ मुड़ा। पर यहां जो दृश्य नीचे घाटी का देखा जा सकता है वो बेहद शानदार। 

बौद्ध धर्म के मंदिर में एक अजब गजब सी शांति होती है। जिसका शायद शब्दों में वर्णन संभव ना हो सिर्फ महसूस किया जा सकता हो। वही इस समय मैं कर रहा हूं। दाहिने हांथ पर ग्रंथ पढ़ते हुए कुछ लामा। जो इतने ज्यादा एकाग्रचित हैं जिनका ध्यान भटकना लगभग असम्भव है।

सामने एक ज्योति और उससे निकलती धीमी अग्नि की श्वेत धारा। यही खासियत है बौद्ध मंदिरों की। शांति!

मंदिर से बाहर आ कर लामा जी के कक्ष की ओर जाने लगा। जो कुछ और ऊपर है। सीढ़ी पर मुझे एक छोटा लामा भी मिला। कक्ष की ओर जाने का रास्ता पूछा तो शर्मा के एक अंधेरी जगह घुस गया जहां से निकला था।

जाहिर है यहीं कहीं आसपास ही होगा कक्ष। थोड़ी और सीढ़ी चढ़ने पर एक और लामा मिले। जिन्होंने ने कक्ष की तरफ जाने का रास्ता बताया।

आओ भगत

स्वागतम

कक्ष के द्वार पर पहुंच कर लामा जी ने स्वागत किया जिन्होंने मंदिर और वो कोठरी दिखाई थी। अन्दर अपने कक्ष में लेे आए। यहां इतनी प्राचीन व्यवस्था देख मन प्रसन्न हो गया। 

जहां सामने बनी मेज़ पर मोम के दिए रखे हुए हैं। और उसके आसपास 

कमरे को ठीक से देख ही रहा था कि लामा जी चाय के साथ प्रस्तुत हो गए। कप में नजर पड़ी तो ये कोई साधारण दूध वाली चाय नहीं है।

पीने के बाद जैसे अलग ही ताजगी आस गई हो शरीर में। मेरे ठीक सामने बैठी महिला ने अपना परिचय पूने से आने का दिया। जाहिर है टूरिस्ट पैकेज पर यहां आगमन हुआ है। ऐसे बहुत टूरिस्ट पैकेज वाले मिल जाएंगे स्पीति के लिए प्रमुख शहरों से।

कुछ टूरिस्ट छोटे बड़े दीप लेे कर आगे बने एक बड़े से हॉल में जा रहे हैं। पर्दे के उस पार बने हॉल में सिर्फ दीप जलाकर रखने वाले ही जा सकते हैं। ऐसा लामा जी में बताया।

पर्दे हटा तो उस पार बने हॉल का भव्य दृश्य दिखा जिसमे एक बड़ी और कुछ छोटी मूर्तियां देखी जा सकती हैं। जहां कुछ दिए पहले से ही प्रज्ज्वलित हैं कुछ अब होने जा रहे हैं।

एक मोहतरमा ₹5०० देके सबसे बड़ा दीपक लेे कर गईं हैं अपनी आस्था को बरकरार रखते हुए। जाने का तो मन है पर बिना दीपक लिए नहीं जाया जा सकता।

चाय पीते ही ऐसी तरोताजगी अाई शरीर में की एक पल में सारी थकान निकल गई।

रहस्य

चाय खत्म करके लामा जी हमें इमारत की सबसे ऊपरी हिस्से में ले जाने लगे। 

यहां उन्होंने बताया और दिखाने भी लगे कि कैसे हर लामा रोजाना यहां काफी समय बीतता है। शुरुआत में इतनी ऊंचाई पर सांस लेने दिक्कत आईं पर अब ठीक है।

कुछ 2-3 कमरे हैं और हर कमरे के बाहर एक लामा पहरा दे रहा है। ताकि वो यात्रियों की मदद कर सके और हर सवाल का जवाब दे सके।

ऐसे ही घूमते हुए वो मुझे उस कमरे में ले आए जहां अभी तक के जन्मे सभी दलाई लामा की तस्वीरें एक कमरे में सुसज्जित हैं। 

बताने लगे कि हर बार दलाई लामा अपने मृत्यु के कुछ वर्षो बाद जब जन्म लेते है तो कैसे अपनी पिछली जीवन की वस्तुओं का चयन करते हैं। ये जानकारी वाकई मे मुझे और इच्छुक बना रही है।

उन्होंने बताया कि जब लामा नए शरीर में अवतरित होते हैं तब वह किसी श्रेष्ठ अथवा वरिष्ठ लामा के सपने में आ कर इस बात को संकेत देते हैं और उन्हें अपनी जन्मस्थली पर सपने के माध्यम से बुलाते हैं। 

फिर वरिष्ठ लामा दलाई लामा की वस्तुओं को लेकर जब उनके सामने प्रस्तुत होते हैं तब उनको कुछ मालाएं दिखाई जाती हैं। जिनमे से वो अपनी ही माला चुनते हैं।

ये सिलसिला अनेकों वर्षो से यूं ही चला आ रहा है। कमरे में रखी किताबों की तरफ इशारा करते हुए लामा जी ने बताया कि साल में एक बार इन सभी किताबों को पढ़ना अनिवार्य होता है। जो बौद्ध ग्रंथ हैं बौद्ध भाषा में लिखित हैं।

इस मंज़िल से सुन्दर बर्फीली पहाड़ियों का दृश्य देखने लायक है। मानो पहाड़ पर आईस क्रीम जमी हो। और बाकी बंजर ज़मीन जहां कुछ और उगाना मुमकिन नहीं।

लामाओं के भोजन का समय हो चला है। लामा जी हमें लेे जाने लगे नीचे मंज़िल पर स्तिथ ध्यान केंद्र में। जहां उनके जैसे अनुनाई एकाग्रचित हो कर भगवान का ध्यान करते हैं।

ध्यान लगाने से सुकून

ऐसे ही इमारत के अन्दर ही अंदर वो हमें एक हॉल में लेे आए जहां सामने एक तस्वीर और आसपास कुछ लोग ध्यान मुद्रा में बैठे हुए हैं। 

मैं भी सबकी नकल करते हुए बैठ गया ध्यान लगाने। पर मन कहीं और ही केन्द्रित है। ध्यान ठीक से लग नहीं पा रहा है। आंख खुली तो सामने वो पुणे वाली महिला भी नजर आईं।

पर यहां भीड़ में ध्यान ठीक से लग नहीं पा रहा है। शांति होने के बावजूद भी। लामा जी अब नदारद हैं। और उन्होंने गुफाएं भी दिखाई थी जहां लोग ध्यान लगाते हैं।

मैं हॉल से निकल कर उन गुफाओं की तरफ आ गया जहां घनघोर अंधेरा है। और हर गुफा में एक लालटेन जैसा बल्ब टिमटिमा रहा है। कोई छोटी तो कोई बड़ी गुफा है।

मैं सबसे कोने वाली गुफा में आ गया। यहां लमाओं के आलावा और कोई भी नहीं है। सैलानी तो बिल्कुल भी नहीं। सोचा इससे बेहतर जगह और क्या ही होगी।

अंधेरी गुफा में ध्यान लगाना! जैसे ऋषि मुनि किया करते थे। सो बैठ गया, जलते बल्ब को बंद किया और लग गया ध्यान में। एकदम शांति में। ना कोई शोर ना शराबा। ना होला ना गुल्ला।

कुछ देर तो किया और बड़ा आनंद आया। करके मैं बाहर निकल आया। मन में एकाएक विचार आया क्यों ना थोड़ी देर और ध्यान लगाया जाए। आ गया वापस गुफा में। इस बार सबसे कोने वाली गुफा में जा बैठा।

इस अज़ब सी शांति में मैं एक अलग ही दुनिया में खो गया। फिर अचानक ध्यान आया समय रहते वापस भी निकलना है। तकरीबन पंद्रह मिनट के ध्यान के बाद बाहर निकल आया। ये पंद्रह मिनट मेरे जीवन के सबसे अनमोल पंद्रह मिनट रहे होंगे।

कीह मठ का सबसे ऊपरी हिस्सा

वापसी

मठ के बाहर आया तो देखने में आया मेरे जूते गायब हैं। पर उसी तरह के एक साइज़ बड़े जूते रखे हुए हैं। मैं समझ गया शायद अजय मेरे जूते पहन कर निकल गया है। कुछ दूर चल कर ऊपर से नीचे झांका तो देखा बैग के पास अजय खड़ा हुआ है।

उसकी तरफ इशारा करते हुए पूछा की क्या मेरे जूते उसके पास है। जब हां में जवाब आया तब थोड़ी तसल्ली हुई। वरना मुझे तो लगा था मेरे जूते तो गए। 

शुक्र है बैग जहां के तहां धरे थे। वरना इतनी देर में किसी शहरी इलाके में तो ये बिक भी चुके होते। ऊपर से नीचे तक के 2०० मीटर के सफर को झटपट तय कर बैग के पास आ पहुंचा। 

बैग में बंधी चैन की ताली खोली, सामान समेटा और चल पड़ा काजा। जहां से मूद नाम के गांव के लिए रवाना होना है। इसी के साथ इस ऐतिहासिक मठ से अलविदा लिया। 

यहां के अनुभव को शायद ही कभी भूलूं। और जीवन में पर्याप्त समय लेके यहां ध्यान लगाने जरूर आऊंगा वो भी बिना जूतों के!

वो मजदूर जहां का तहां काम कर रहा है, जिसने बैग यहीं छोड़ने को हिदायत दी थी। वापसी के लिए शायद ही कोई सवारी मिले। इसलिए यहां से काजा पैदल और हिच हाईक करके है जाना पड़ेगा। 

पहले सड़क वाले मार्ग को चुना जब देखा कोई वाहन ले जाने को तैयार नहीं है तब वापस आ कर पहाड़ी के रास्ते जाना ठीक समझा।

वापस आ कर मठ के पिछले रास्ते से निकलने लगा। काम कर रहे मजदूर ने बताया आगे से जाने का रास्ता और उसी दिशा में मैं चल पड़ा। 

Filed under: स्टोरीज ऑफ इंडिया, स्पीति वैली, हिमाचल प्रदेश

by

नमस्ते, मैं ऐश्वर्य तिवारी हूं। ये उन दिनों की बात है जब मैं अपने जुनून का पालन करने के लिए अपने कॉर्पोरेट जीवन को पीछे छोड़ दिया।भारत को जानने के मेरे अंदर हमेशा एक जिज्ञासा थी क्योंकि इस देश में हर कुछ मील के बाद विविधता, विभिन्न संस्कृति है। हर दिन मेरे लिए एक नए शहर में एक नई प्राणी के साथ एक नया दिन है। मैं एक घुमक्कड़ हूं जो के विभिन्न हिस्सों में घूमना पसंद करता है और जल्द ही भारत से बाहर हो सकता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *