Month: May 2019

खतरनाक घाटियों में रेकोंग पियो से काज़ा तक का सफर

सुरक्षित बस अड्डा जल्दी सोया ही था जल्दी उठने के लिए। पांच बजे की बस पकड़ने के लिए चार बजे उठना सहूलियत भरा रहा। काल राते सोने से पेहले दरवाज़ा लकड़ी के लट्ठे से जाम कर दिया था। इसलिए कोई अन्दर ना आ सकता था, और ना ही आया। बस आ रहा है तो वो है शोर शराबा।  रेकोंंग पियो बस अड्डे से अधिकतर बसें सुबह सवेरे निकल लेती हैं तब जा कर कहीं २००-२५० किमी दूरी का सफर शाम तक तय कर पाती हैं। कुछ यही हाल शायद मेरा भी होने वाला है?  दरवाज़ा खोला तो पाया जितना शोर छन कर अन्दर आ रहा है उतनी भीड़ तो ना दिख रही है। मैंने चार्जिंग प्वाइंट से सारे मोबाइल और पावर बैंक समेट कर सब अन्दर लपेट दिया। इतनी देर में अजय निकल गया नहाने। इधर मैने सारा बुरिया बिस्तर समेटा। उड़के हुए दरवाज़े को देख लोग अब अन्दर आने लगे हैं। कुछ ने तो अपना मोबाइल भी जड़ दिया है चार्जिंग पे। दस मिनट में अजय तैयार हो कर आ गया। इधर अजय के …

कल्पा का सुसाइड पॉइंट जहाँ लोग जाते है मौत को गले लगाने!

बदली योजना सुबह जल्दी उठने कि बजाए आंख बहुत देर से खुली। जैसा रात में हाँथ में बैग फसा कर सोया था सुबह खुद को वैसा ही पाया। बेंच पर नींद भी सही आ गई। उसके ऊपर स्लीपिंग बैग गद्दे का कम कर गया। रात में कमरे का दरवाजा उड़का लिया था ताकि कोई अन्दर ना आ पाए। कमरे में तीन बेंच पड़ी सो तीन आदमी। नींद खुलने पर देखा कि सामने वाली एक बेंच खाली पड़ी है। बस अड्डे पर हलचल भी हल्की फुल्की दिख रही है। यात्रियों का आना जाना बरकरार है। कुछ अपना झोला झंडा लेे कर बाहर ही बैठे हैं। कमरे में वो ही आ रहे हैं जिनको अपना फोन चार्ज करना है। मोबाइल तो मेरा भी चार्ज नहीं है। सारे मोबाइल और पावर बैंक चार्जिंग पर लगा कर मैं और अजय बारी बारी से तैयार होने लगे। बस अड्डे पर ही बने दुसलखाने में। जब तक मैं तैयार हुआ तब तक बस अड्डे की भीड़ भी कम हो गई। योजना यही है कि काजा के लिए निकला जाए फिर पूरा …

बस अड्डे में किया कब्ज़ा

जल्दी उठने से तौबा आंख खुली मगर उठने का मन नहीं हो रहा है। अजय ने भी उठाने की कोशिश की पर मैंने उठने से इंकार कर दिया। कल रात में जो तय हुआ वो पूरा ना हो सका। सुबह जल्दी उठना, सूर्योदय(सनराइज) देखना। आखिरकार छह बजे आंख खुली। देखा तो टेंट में बैग और मेरे अलावा कोई भी नहीं है। सूर्योदय तो हो चुका है। शरीर में जकड़न और थकान दोनों है। टेंट के बाहर निकला तो देखा वो उपद्रवी लड़के अभी भी टेंट के अंदर सो रहे हैं। जिनकी कल रात पूरी घाटी में आग लगाने की योजना थी। आज शाम तक हर हालात में रेकोंग पियो पहुंचना है। टीले पर नजर पड़ी तो देखा वहाँ अजय वहाँ ऊपर वीडियो बना रहा है। पांच बजे उठ कर कुछ फोटो और वीडियो बनाने निकल गया था। अभी घाटी में लगभग काफी लोग टेंट के अंदर ही सो रहे हैं। शायद कुछ का रुकने का विचार हो पर मेरा नहीं। अजय के नीचे आते ही सारा सामान समेटने लगा। मूह धोने के लिए भी पानी …

अनोखी 360° सिरोलसर झील

निकलने की तैयारी रात को भले ही देरी से सोया लेकिन जल्दी उठने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बस पकड़ने के लिए मैं समय पर उठ गया। मोबाइल में समय देखा तो अभी चार बज रहे हैं। हिमाचल में एक दफा बस छूटी तो समझो पूरा दिन बर्बाद। ये तीन चार घंटे की नींद ले कर खुद को तसल्ली दी। उठ जा ऐश्वर्य, हम बस में सो लेंगे। मन ने बात भी बड़ी जल्दी मान ली। मैट पर से उठ ही रहा हूँ कि तभी अलार्म बज उठा। अलार्म बजने से पहले उठना आज की पीढ़ी के लिए किसी उपलब्धि से कम नहीं। अलार्म बजा तो लगा मानो बम फटा हो। नींद ना खुली हो होश आया हो। बस छूटने और दिन की बर्बादी से बचने के लिए नींद भंग करना बहुत जरूरी है। इस विचार मात्र से पूरे शरीर में बिजली दौड़ गई हो। फटाफट बोरिया बिस्तर समेट कर बैग में डाला। रातभर ऊनी मोजे टोपा सब बाहरी ही पड़ा रहा। मैट, चादर सब लपेट कर बैग में एडजस्ट कर दिया। बैग टांगा और …

मनाली के बुद्ध मंदिर में जाना आखिर क्यों घुमाते हैं चक्र?

होटल की सुबह कल के मुकाबले आज आंख जल्दी खुल गई। लेकिन सुध नहीं है करना क्या है? खिड़की पर नजर पड़ी तो देखा। कमरे के बाहर से खिली खिली धूप की किरणे खिड़कियों से आर पार होते हुए अन्दर आ रही हैं। यही किरणे जब चेहरे पर पड़ी तो फिर नींद ना आई दोबारा।  शरीर में थकान इतनी है की जी चाह रहा है मनाली में एक दिन और रुक जाऊं। हल्का हल्का बुखार भी महसूस हो रहा है। जो सुस्ती मैकलोडगंज से लगी है वो अभी तक जाने का नाम ही नहीं ले रही। कभी कभार एक गलती भी भारी पड़ जाती है। जिसका भुगतान लंबे समय तक करना पड़ता है। उठ तो गया पर कल की थकान नहीं गई। दरवाज़ा खोल कमरे के बाहर निकलने पर थोड़ी हल चल दिख रही है। कल की मुलाकात में अमित भाई कुछ इस्राइलियों के साथ वार्तालाप करते नजर आए। पहले तो मुझे आभास हुआ कि शायद इनको हीब्रू भाषा का ज्ञान होगा। ठीक से सुना तो समझ आया अंग्रेजी में बातें हो रही हैं। अगर …

मनाली में मिली जमकर भीड़

उठते ही दिखा अद्भुत दृश्य कड़ाके की शरीर गला देने वाली ठंड में सुबह चार बजे सोया था। इतनी गहरी निद्रा जिसका कोई जवाब नहीं। सारे मोबाइल, कैमरे, सेल सब चार्जिंग पर लगा कर है सोया था। ताकि जब उठुं तो खाली फोन लेके ना निकलना पड़े। धकापेल नींद से भी नाटकीय ढंग से जगा। कल जिस हिसाब से सफर में समय बिता उसका तो कोई जवाब नहीं। उसके बाद की थकान और भयंकर नींद। आलम ये रहा की नींद टूटी कुछ इस कदर की दरवाज़े पर नरेंद्र भाई को खड़ा पाया। बिस्तर से उठा तो पाया अजय खिड़कियों से पर्दे हटा रहा है। और खिड़की के बाहर बने घर के पीछे के पहाड़ लाजवाब हैं। फिर तो नींद ऐसी उड़ी जिसका कोई जवाब नहीं। सुबह दस बजे आकर नरेंद्र भाई ना खटकाते तो ना जाने और कितनी ही देर तक मैं सोता रहता। शायद अगला एक घंटा और। वो भी इसलिए आए ताकि कमरे की साफ सफाई हो सके। चमकते सूरज के बाद ठंड में भी कमी आई है। कमरे के बाहर आया तो …

चंडीगढ़ से मनाली तक का जोखिम भरा सफर

जम्मू से अम्बाला शालीमार एक्सप्रेस से सुबह के पांच बजे मैं अंबाला पहुंचा। यहाँ से ये तय किया कि चंडीगढ़ से दिन की बस में बैठ कर मनाली निकल जाऊंगा। ट्रेन से उतरा तो स्टेशन पर काफी भीड़ देखने को मिली। बैग लेके इधर उधर दुसलखाने की खोज करने लगा। काफी देर और दूर तक चलने के बाद दाहिने हांथ पर मुझे लोगों का जमावड़ा दिखा। जिससे मुझे लगा शायद यही वो जगह है जिसकी तलाश है। पर वो ना है। थोड़ा आगे बढ़ा तो दुसालखाना भी मिल गया। कुछ एक घंटे में तैयार होकर मैं स्टेशन के बाहर आया। सुबह के आठ बज रहे हैं। अब ये पता करना है कि चंडीगढ़ के लिए बस कहाँ से मिलेगी। स्टेशन के बाहर ही पता चला चंडीगढ़ को जाने के लिए बहुतेरी बसें हैं। मैन रोड पर आते ही यहाँ खड़ी एक बस नजर आई। चंडीगढ़ से अंबाला कंडक्टर द्वारा चंडीगढ़ चंडीगढ़ आवाज़ सुन मैं लद गया इसी बस में। बस में अधिकतर सवारियां रोजमर्रा की मालूम पड़ रही हैं। कोई चंडीगढ़ अपने दफ्तर को निकला …

जम्मू से कश्मीर जाने की जिद्द

कटरा से जम्मू आगमन डोलती हुई बस से रात्रि के तीन बजे तक कटरा से जम्मू आ पहुंचा। बस में कब झपकी लग गई पता ही नहीं चला। दुविधा ये है कि मुझे जाना है कश्मीर। लेकिन वहाँ बदहाली के कारण सब अचानक बंद पड़ गया। ज़ाकिर मूसा के मारे जाने के बाद पूरा जम्मू कश्मीर प्रभावित हो गया है। ऐसा ये पहली बार नहीं हुआ है। घरों में टीवी के सामने बैठ कर हम अक्सर ऐसी खबरे सुनते आ रहे हैं। “कश्मीर में बिगड़े हालत लोग घरों में कैद होने को मजबूर।” “आतंकी हमले में कश्मीर में कर्फ्यू। घुसबैठिए चार घंटे में किया ढेर।” शिवखोड़ी से लौटने के बाद मुझे ऐसी किसी खबर की कोई उम्मीद नहीं थी। मैं कल रात स्तब्ध भी था और हैरान भी। आखिर ये क्या हुआ। समझ भी नहीं आ रहा था क्या करना सही रहेगा। आनन फानन में लिया जम्मू आने का फैसला ही मुझे सही लगा। देर रात जब बस पहुंची तब कंडक्टर ने जोरदार आवाज लगाते हुए सोते हुए सभी यात्रियों को उठाया। सोते हुए यात्रियों …

शिवखोड़ी की रेहस्मई गुफाएं

जाने की तैयारी कल रात जितनी देरी से सोया आज सुबह उतना विलंब उठने में भी हुआ। छोटे से कमरे में सारे इलेक्ट्रॉनिक आइटम भी रात भर में चार्ज हो गए। बंद पड़े कूलर के ऊपर से दाईं तरफ के प्लग में अपना खुद का सॉकेट फिट किया था। जिसमे दो ट्रांसफार्मर(पावर बैंक), दो मोबाइल एक GoPro, एक चार सेट वाला सेल चार्जर खुसा है। आज हर हाल में शिवखोड़ी की रेहस्मई गुफाएं देखने जाना है। जितना सॉकेट के ऊपर लोड है उतना तो आम आदमी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में चलते फिरते उठा लेता है। आंख खुली बिस्तर पर आसपास हाथ पटका लेकिन मोबाइल ना मिला कहीं। मिलेगा भी कैसे मोबाइल तो दो गज की दूरी पर बंद कूलर के ऊपर रखा है। अंगडाते- जम्हाई लेते हुए बिस्तर से नीचे उतरा। आंख मसलते हुए कूलर पर रखे मोबाइल में समय देखा तो नौ बज रहे हैं। सिर्फ दो घंटे में पहुंचना है बस अड्डे। आज भारत की राजनीति के लिए बड़ा दिन है। हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव के नतीजे शाम तक घोषित होने …

आधी रात में वैष्णो देवी की चढ़ाई

पठानकोट से कटरा तीन घंटे के भीतर पठानकोट से कटरा पहुंच गया। बस में ज्यादा सवारी नहीं है, जो थी भी वो फुटकर में पहले ही उतरती गईं। लेकिन ये एक डेढ़ घंटे का सफर बड़ा मजेदार रहा। इन हरी भरी पहाड़ियों के बीच से गुजरना अच्छा अनुभव है। ऐसी पहाड़िया हो और तन्हा गाने बजते रहें तो मनुष्य एक अलग ही संसार में पहुंच जाता है। बगल में रखे बैग में छोटे बैग को जोड़ा और खुद को तैयार करने लगा आज की रात एक लंबी चढ़ाई के लिए। कंडक्टर बाबू हल्ला मचाते हुए अलार्म घड़ी का काम कर गए। जो बची कुची सवारियां सो गईं थीं वो भड़भड़ा के जाग उठीं। चलती बस में मैं डगमगाते हुए अपना बैग लेकर दरवाज़े तक आ गया। ना तो बस अभी रूकी है ना ही मैं नीचे उतरा हूं। दलालों में मची होड़ चौराहे से बस मुड़ती है और कुछ लड़के मुझे रिसिव करने के लिए दौड़ लगा देते हैं। दरवाजे का सहारा लिए मैं खड़ा सोच में पड़ गया, क्या मैं इन्हे जनता हूं? हद्द …