Year: 2019

रिएक पीक ट्रैकिंग

ऐजवाल कल त्रिपुरा से मिजोरम की राजधानी ऐजवाल में आ तो गया था, पर न खाने का सुख ना जीने का ठिकाना। ऐसा लग रहा था मानो परदेस चला आया हूं। बस अड्डे पर रात बिताने के बाद सुबह की दिनचर्या में व्यस्त हो गया। अजय की योजना के अनुसार आज रियक जाएंगे जो मिजोरम की सबसे सुंदर पहाड़ियों में से एक है। बस अड्डे पर कल भी सन्नाटा पसरा था और आज भी सन्नाटा पसरा है। नित्य कर्म के बाद बैग और टेंट समेटा और आगे की योजना बनाने लगा। बस अड्डे के कर्मचारियों से मालूम पड़ा की रियक जाने के लिए वापस एजवाल के बाजार जाना पड़ेगा। बाजार तो जाना ठीक है पर पेट में कुछ होना भी तो चाहिए। बैग बंधा रखा है, देर है तो बस उठाने की। अजय सारी चीज़ें पता करके आ चुका है। बस अड्डे पर ऐसा सन्नाटा पसरा है जैसे शहर में कर्फ्यू लगा हो। आखिरकार सारे काम धाम निपटा कर निकल पड़ा सुबह की चाय के लिए। बस अड्डे के सामने दिख रही इमारत में नीचे …

उनाकोटी 99 लाख 99 हजार 999 मूर्तियां

आश्चर्य यात्रा परसों रात से कल शाम तक के लगातार सफर ने बुरी तरह थका दिया था। जिस वजह से कल अगरतला पहुचनें के बाद भी कोई प्रमुख जगह जाना ना हो सका सिवाय विभान सभा भवन के। घुमक्कड़ी समुदाय से उत्पल जी ने काफी मदद की अब तक। आज उन्होंने मेरे और अजय के लिए उनाकोटी जाने का प्रबंध किया है। उनाकोटी पूर्वोत्तर भारत का बहुत ही जाना माना नाम है। हालांकि कुछ दिनों पहले तक मैं भी इसके बारे में नहीं जानता था। जाना तब जब बंगलौर के एक आर्मी कैंप में एक लड़के ने इस जगह का जिक्र किया। आज उसी जिक्र की हुई जगह पर उत्पल जी हमें भेज रहे हैं। जिसकी ना मैंने कोई योजना बनाई थी ना सोचा था। कल ही उस रास्ते से गुजरते हुए आया हूं। कल रात में ही सुबह के आठ बजे तक तैयार हो जाने का इशारा कर दिया था। ध्यान में थी ये बात और इसलिए अपने हिसाब से समय पर ही तैयार हो कर निकला। सुबह सुबह अपने घर से चल कर …

विश्व का एकमात्र डबल डेकर रूट ब्रिज

टायरना संध्या होने को आई है। घड़ी में पांच बज चुके हैं। और ठीक पांच बजे के बाद यहाँ प्रवेश बंद हो जाता है। पास में बने काउंटर से गाड़ी पार्किंग की पर्ची कटाई। समस्या हेलमेट की आ रही है। सो वो भी रखवा दिया किसी तरह बात चीत करके इन्हीं की दुकान में। यही इनकी दुकान है और यही आशियाना। गाड़ी पार्किंग में खड़ी है जिसकी रखवाली ये लोग सुबह शाम रातभर करेंगे। टायरना नाम का पहला गांव पड़ेगा उसके बाद नॉनग्रियाट गांव। जहाँ है डबल डेकर रूट ब्रिज। लगभग 4.5 किमी का ये सफर कितनी देर में तय होगा ये तो कुछ देर में पता चल जाएगा। इधर बैग लेके निकला ही हूँ कि एक दलाल पीछे लग गया। जो रास्ता दिखाने की ज़िद्द कर रहा है। पर मेरी भी जिद्द है रास्ता खुद बाखुद तय करने की। अभी बात चल रही है कि बड़े बैग यहीं रखवा दिए जाएं और जरूरी सामान ही ले जाया जाए। पर फिर हुआ कि बैग सहित ही गांव की तरफ जाना सही रहेगा। सारा सामान अपने साथ …

पृथ्वी का सबसे बरसाती शहर

भारत बांग्लादेश सीमा भारत बांग्लादेश सीमा तक जा कर कुछ देर बीता कर ही अच्छा लगा। वापस जाने लगा तो सीमा पार से सैलानी भी आते दिखे। जो भारतीय चेकपोस्ट पर अपने कागज दिखा कर भारत की सीमा में दाखिल हो रहे हैं। कुछ लोगों का मानना है कि बांग्लादेश से अभी भी घुसबैठ हो जाती है क्यूंकि भारत का काफी हिस्सा खुला हुआ है। जिसे ना किसी दीवार या कटीले तारों से बांधा गया है। फिलहाल मुझे बांग्लादेश तो नहीं पर चेरापूंजी के लिए समय से रवाना होना है। कीचड़ और मलबे से किसी तरह रास्ता बना कर बाहर निकलना हुआ। मावलेनोंग जाने का विचार भी है। पर जाम इतना भीषण लगा हुआ है कि मावलेनोंग को जाने वाले रास्ता खोजने पर भी नहीं मिल रहा है। ट्रकों के जमावड़े को पार करते हुए आगे बढ़ा तो मालूम पड़ा मावलेनोंग को जाने वाला रास्ता पीछे छूट गया है। जिस पर दोबारा जाने का मतलब है जाम का सामना करो। वैसे मेरा मानना है कि अगर हम अपने शहर और गांव को इतना स्वच्छ बना …

एशिया का सबसे स्वच्छ गाँव मावलेनोंग

डारंग में सुबह आज एशिया के सबसे साफ गांव जाने का विचार है जिसका नाम है मावलेनोंग। ये गांव लगातार एशिया के सबसे स्वच्छ गांव की श्रेणी में शुमार ही रहा है। सुबह के साढ़े छह बज रहे हैं। रात के अंधेरे में तो सिर्फ नदी का शोर ही सुनाई पड़ रहा था पर अभी उजाले में काफी कुछ देख सकता हूँ। तंबू के ऊपरी हिस्से में कीड़े चिपके हुए हैं। शायद रोशनी होने के कारण सब यहीं आ कर बस गए थे रात में। पर गनीमत है अन्दर एक भी नहीं हैं। कल शाम की सड़क दुर्घटना के बाद मरहम पट्टी करी थी। जिससे कुछ हद तक फायदा तो मिला है। दर्द भी कम है और खून भी जमा हुआ है। अजय तंबू के बाहर पहले से ही मौजूद है। तंबू के अंदर सिर्फ मैं और दोनों बैग। बाहर झांका तो सामने बेहती नदी से काफी दूरी और ऊंचाई पर हूँ। मोबाइल की रोशनी में इतना तो दिखा था कि एक पेड़ के नीचे मनरेगा के बोर्ड के सामने। पर अभी सब कुछ साफ़ …

मेघालय सड़क दुर्घटना में बाल बाल बचा

एलिफेंटा से डावकी गांव एलिफेंटा झरना मेहेज घंटे भर के अंदर ही भ्रमण हो गया। खास है तो सिर्फ वो झरना जो भारत के किसी और कोने में ना मिले। वापसी में जिस दुकान में बैग रखे हुए थे वहीं से थोड़ा नाश्ता करना बेहतर लगा। नाश्ता भी इसलिए ही किया क्योंकि दुकानदार ने हमारा बैग रखवा कर काफी बोझ हल्का कर दिया था। जिस कारण झरना इत्मीनान से देखना संभव हो पाया। आखिर इंसान ही इंसान के काम आता है। और ये इंसानियत अभी ज़िंदा है। सैलानी होने का फायदा भी यही है की दूसरे शहर में लोग अक्सर मदद के लिए हांथ आगे बढ़ा ही देते हैं। चार कोस दूर खड़ी स्कूटी को चालू करके ले आया दुकान के पास। एक बैग आगे ठूंसा और दूसरा बैग अजय ले कर बैठ गया पिछली सीट पर। फिलहाल कुछ दूरी तक गाड़ी मैं ही चलाऊंगा और उसके कुछ दूरी तक अजय। ये क्रम ऐसे ही चलता रहेगा शाम तक जबतक मंज़िल पर पहुंच ना जाऊं। गेट के पास पहुंचा तो यहाँ पार्किंग की रसीद मांगने …

एलीफैंटा झरना या थ्री स्टेप वॉटरफॉल?

अच्छी नींद आंख रितेश जी की हवेली में खुली। ये हवेली ही उनका किराए का घर है। वैसे तो उनका खुद का भी घर बाल बच्चे सब हैं पर किसी दूसरी दुनिया में। आज शिलोंग से दरांग गांव की ओर रवाना होना है। देर रात तक गप्पे लड़ाने के बाद रितेश भाई किसी की मदद के लिए आधी रात को रवाना हो गए थे। आंख खुली तो वो घर पर ही थे। बस मैं भी निकलने की तैयारी में जुट गया। बैग वैसे के वैसे ही रखे हुए हैं। नित्य क्रिया के बाद गरमा गरम चाय पर चर्चा होने लगी। चर्चा में दरांग गांव जाने की बात उठी जहाँ पर उमगोट नदी को जमीनी स्तर पर भी देखा जा सकता है। मतलब की आर पार। इतने में आशुतोष जी भी आ गए और अपने किस्से कहानी बयां करने लगे। उन्होंने बताया कि कैसे खासी आदिवासी यहाँ के इलाकों से पिछड़ते गए। और आज भी अपने अस्तित्व के लिए लड़ रहे हैं। रितेश जी के घर पर खाना बनाने वाली दाई भी आ गईं। जिन्होंने सबके …

ना मिला पूर्वोत्तर भारत के स्कॉटलैंड में खाली होटल

असम के हालात सामान्य कामाख्या देवी मंदिर के दर्शन के बाद अब समय से शिलोंग पहुंचना भी ज़रूरी है। घुमक्कड़ी समुदाय के किसी भी सदस्य ने दरख्वास्त नहीं स्वीकारी है। अंधेरा होने से पहले पहुंच कर होटल ढूंढने की भी चुनौती रहेगी। इसलिए टूरिस्ट इंफॉर्मेशन सेंटर से जानकारी एकत्रित करने के बाद सीधा बस अड्डे की के रवाना हो गया। मिली जानकारी के अनुसार हालात सामान्य हैं और कई क्षेत्र संकट से बाहर उबर आए हैं। गली कूंचों से होते हुए तपती धूप में आ गया बस अड्डे। यहाँ मेरी ही तरह पहले से ही और भी सवारियां बस के आने का इंतजार कर रही हैं। एक किनारे पकड़ कर भारी भरकम बैग लेकर बैठना ठीक लग रहा है। पास की दुकान में पूछताछ में पता चला कि आधे घंटे के भीतर ही बस का आना संभव है। आधा घंटा तो नहीं पर कुछ ही क्षण के भीतर बस आ पहुंची। दिन के साढ़े तीन बज रहे हैं। बस आ तो गई है लेकिन वापस जाने के लिए पहले मुड रही है। उसके बाद सवारियों …

ब्रह्मांड का गर्भ कामाख्या देवी मंदिर

स्वच्छ गुवाहाटी आज कामाख्या देवी मंदिर जाने की योजना है। फिर वहीं से शिलोंग। पर अभी प्रशांत जी के घर में आंख खुली है। कुछ हलचल तो है घर में। जैसा प्रशांत जी ने कल बताया था सुबह वो भी निकल जाएंगे अपने कार्यालय शायद उसी की तैयारी में जुटे हुए हैं। जमीन पर ही बिछे गद्दों पर चैन की नींद ली। मखमली बिस्तर का भी कोई मुकाबला नहीं है जमीन पर लगे बिस्तर से। जमीन से जुड़े लोग ये बात समझ सकते हैं। नींद टूटी तो मैं भी उठकर तैयारी करने लगा निकलने की। इच्छा तो है एक दिन और रुकने की पर ऐसा करने पर शायद बाकी के जगहों के लिए देरी भी हो सकती है। घर के सामने का नजारा तो बहुत ही लाजवाब है। खासतौर पर ये दाहिने हिस्से पर बसी पहाड़ी। प्रशांत जी ने कभी चढ़ाई तो नहीं कि पर वो जरूर इस जगह पर जाना चाहेंगे। इनके घर में सुबह तो बहुत ही कमाल की होती है। बताते है प्रदूषण पहले के मुकाबले यहाँ भी बढ़ गया है। जिस …

भारत का सबसे स्वच्छ रेलवे स्टेशन: गुवाहाटी

सफर पूर्वोत्तर भारत के लिए परसों रात यानी 12 जुलाई को नई दिल्ली से गुवाहाटी के लिए ट्रेन पकड़ने की कवायद शुरू हो गई थी। दिनभर बैग लगाने में ही बीत गया। रुका भी किसी दूसरे के खाली कमरे में था। और स्थाई निवासी हैं वो इस समय कानपुर में हैं। सुबह उनका भी कॉल आया कि उनका भी सामान लेते आना जिसे वो कानपुर स्टेशन पर ले लेंगे। दिनभर की मेहनत के बाद शाम को कहीं जा कर बैग लग पाया। एक अलग से सामान का झोला भी जिसे कानपुर में रखवाना है, और उसमें मेरा समान है। भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में कितना समय लगेगा इसका अंदाज़ा तो नहीं लगाया है अभी। पर कुल मिला कर महीने भर के ऊपर समय निकल जाएगा ऐसी गणना है। दिन में खाने बनाने के बाद शाम को खाने की बारी आई। खा पी कर दिल्ली स्टेशन पर पहुंचा। स्टेशन इतना बड़ा की समझ ही ना आए की प्लेटफॉर्म कहां कहां हैं। भागते हुए प्लेटफॉर्म नंबर एक से दाखिल होने लगा। जहां सुरक्षा जांच हुई। जिसमें कुछ …