1857 की क्रांति में कानपुर का योगदान

कानपुर

अँग्रेजों के खिलाफ बिगुल 

बिठूर के महल से स्वतंत्रता आंदोलन की चिंगारी फूट रही है। मराठा क्रांतिकारियों के साथ बिठूर के रमेल नगर के मल्लाह इस आजादी की जंग में नाना साहब का साथ देने को तत्पर हैं।

नाना साहब की दहाड़ पर कानपुर ही नहीं बल्कि आसपास की रियासतें भी एक जुट हो गईं हैं। वो पहले ऐसे नायक हैं जो अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज बुलंद कर रहे हैं।

अभी तक अँग्रेजी हुकूमत का परचम पूरे देश पर लहरा रहा था। सारी रियासतें अलग-थलग थीं जिसका अँग्रेजों ने खूब फायदा उठाया। एक दूसरे को आपस में लड़ाकर अपना उल्लू सीधा किया।

मराठा क्रांतिकारी अँग्रेजों के लिए पहले भी सिरदर्द थे और अब एक बार फिर तैयार हो रह हैं।

सूरज अपने चरम पर है। भीषण गर्मी में नाना साहब अपनी सेना के साथ अँग्रेजों की घेराबंदी करने कानपुर कूच कर रहे हैं।

अवध के अन्य हिस्सों से विद्रोह की सुगबुगाहट कानपुर तक आ पहुंची है।

जीटी रोड पर गंगा किनारे कानपुर ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना का प्रमुख गढ़ है। जरूरत पड़ने पर यहाँ से कहीं भी सेना आसानी से भेजी जा सकती है। चाहें पंजाब हो या बंगाल।

बिठूर से कानपुर के रास्ते कल्याणपुर में नाना साहब की मुलाकात विद्रोहियों से हुई। ये मतवाले सिपाही दिल्ली को कूच कर बादशाह से मिलने निकल पड़े हैं। विद्रोहियों से बातचीत के दौरान एक पल के लिए नाना का मन भी बदलने लगा।

नाना साहब को लग रहा है की उनको दिल्ली कूच कर जाना चाहिए और मुगलों का साथ दे कर अँग्रेजों से लोहा लेना चाहिए।

चतुर अज़ीमुल्ला नाना के तेवर समझ रहे हैं। अज़ीमुल्ला ने स्थिति को भांपते हुए नाना साहब को हिदायद देने लगे।

“आप कानपुर में ही विद्रोहियों का नेतृत्व करें। क्योंकि दिल्ली में एक कमजोर बादशाह के हुकुम को मानना आपकी शान के विपरीत होगा।”

नाना को ये बात जैसे अंदर तक भेद गई हो। नाना खुद तो कानपुर निकल पड़े और साथ ही इन विद्रोहियों को भी कानपुर चलने का आदेश दिया।

विद्रोही आनाकानी करने लगे। दिल्ली जाने की जिद्द पर अड़े रहे। नाना ने इन विद्रोहियों को अपने पक्ष में लाने के लिए तनख्वाह बढ़ाने और सोने चांदी उपहार स्वरूप देने का प्रस्ताव रखा।

कहने लगे

“आप सबको की कंपनी की अँग्रेजी सेना को उखड़ने में मदद करना होगी।”

विद्रोही और नाना साहब में अच्छी सुलह बन बैठी। रजामंदी के साथ नाना अब और भी बड़ी सेना के साथ कानपुर रवाना हो चले।

हो हल्ले के बीच नाना साहब आज के आज ही 22 मई की शाम तक जीटी रोड से बाईं तरफ नवाबगंज में प्रवेश कर गए। अपने साथ लाए हैं तोपों का जखीरा, सैनिक, पैदल सैनिक, घुड़सवार फौज।

नवाबगंज अँग्रेजो का शस्त्राघर है। तोपखाने में तैनात 53वी देसी पैदल सेना को लग रहा है की नाना साहब अँग्रेजो की सुरक्षा हेतू यहाँ पधारे हैं। ये पैदल सेना सिपाही शहर के माहौल से बिलकुल बेखबर हैं।

ना तो इन पैदल सैनिकों का अंदाजा सही है और ना नाना साहब के इरादे। इन सैनिकों का इस तरह अंदाजा लगाना भी गलत नहीं है। 

नाना साहब की वजह

क्रांति के पहले नाना साहब अँग्रेजो के वफादार हुआ करते थे। पहले भी जनरल व्हीलर की मदद करी है।

जब अपने स्वयंसेवकों को भेजा था व्हीलर की सेवा में। पर जब से अँग्रेजों ने उनके पिता की मृत्यु के बाद माली इमदाद(पेंशन) बंद की है तब से नाना साहब अँग्रेजों के विरुद्ध हैं।

लॉर्ड डलहौजी ने नाना साहब को दत्तक पुत्र होने के कारण पेंशन देने से मना कर दिया था। ऐसे में नाना साहब को इस बात से बहुत दुख पहुंचा। नाना साहब ने 1853 में अपने सचिव अजीमुल्लाह को पेंशन बहाली पर बात करने के लिए लंदन भेजा।

अजीमुल्लाह खान हिंदी, फारसी, उर्दू, फ्रेंच, जर्मन और संस्कृत का अच्छा ज्ञाता है। इस दौरान अजीमुल्लाह ने अँग्रेज अधिकारियों को समझाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उनकी सभी दलीलें ठुकरा दी गईं।

ब्रिटिश अधिकारियों के इस रवैये से नाना साहब बेहद खफा थे। ऐसे में आज के समय उन्होंने अँग्रेजों का साथ देने के बजाय उनके विरुद्ध बगावत को ही सबसे अच्छा विरोध का माध्यम माना।

अँग्रेजों का साथ दे कर भी अपनी जनता पर नाना कभी जुल्म नहीं करेंगे और ना करते। अंगारे सब की आंखों में हैं। कानपुर सैनिकों की महत्वपूर्ण छावनी बन चुकी है।

जगह जगह हिन्दू मुसलमानों व सैनिकों की गुप्त सभाएं हो रही हैं। जनता के ऊपर विद्रोह और स्वंत्रता का भूत सवार है। 

वो तो भला हो नाना साहब का और रामचंद्र पांडुरंग(तात्या टोपे) का जिनके विद्रोह ना करने के हुकुम को जनता मान रही है। वरना अँग्रेजों का कचुमड अभी के अभी निकल जाता।

बिठूर महल के पास नानाराव पार्क में स्तिथ पेशवा की मूर्ति।

मूल नाम धोंडूपंत। सन् 1824 में जन्मे माधवनारायण राव की संतान। पिता पेशवा बाजीराव के सगे भाई। दत्तक पुत्र। 

रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब, तात्या तोपे, मई के शुरुआती दिनों की घटना से परिचित हैं। कानपुर के अँग्रेज भी। नाना के साथ तात्या, लक्ष्मीबाई की अगुवाई में क्रांतिकारी एकजुट होने लगे हैं।

नवाबगंज में खजाने को अपने कब्जे में लिया जा चुका है। जीटी रोड पर भी नाना की सेना का कब्जा है। उनका एकमात्र लक्ष्य है मराठाओं का खोया हुआ गौरव और साम्राज्य लौटाना।

जिसे अँग्रेजों ने पैरों तले कुचल दिया। आखिरी पेशवा को सरजमीं से कोसो दूर यहाँ कानपुर भेज दिया गया था।

अति आत्मविश्वास 

नाना अपने भाई बालासाहब व मंत्री अजीमुल्ला खां के साथ गंगा किनारे पहुंचे।

कंपनी के जनरल व्हीलर को स्थानीय भाषा का अच्छा ज्ञान है। मेहरारू भी भारतीय है। इस वजह से व्हीलर यहाँ की जनता के बीच अच्छा खासा घुला मिला है।

मेरठ, आगरा, मथुरा और लखनऊ में कंपनी के खिलाफ आजादी की चिंगारी फूट चुकी है।

या यूं कह लो ज्वालामुखी फट चुकी है जिसने अँग्रेजों की जड़े हिलाकर रख दी हैं।

पर यहाँ व्हीलर को अपनी सेना और जनता पर पूरा भरोसा है की कानपुर में ऐसा कुछ घटित हो ही नही सकता। अन्धविश्वास।

व्हीलर समझता है की कंपनी हुकूमत के खिलाफ कोई बोल नहीं सकता। अँग्रेजों को यह एहसास भी नहीं है कि देश में उनके खिलाफ आक्रोश पनप रहा है।

इसी आत्मविश्वास के चलते व्हीलर ने लखनऊ में में बीती 30 मई को क्रांति की आग को बुझाने के लिए कंपनी की अँग्रेजी टुकड़ी को लखनऊ रवाना कर दिया।

कुल 900 लोग, जिसमे से 300 सैन्य पुरुष, 300 महिला और बच्चे और कुछ 150 व्यापारी, सेठ, विक्रेता बचे हैं। बाकी के भारतीय मूल के स्थानीय नौकर।

युद्ध निकट आ रहा है पर कानपुर में अभी तक हालत सामान्य है। जन जीवन और शहरों के मुकाबले अच्छा चल रहा है। खेती बाड़ी, गौशाले चट्टे, बाजार सभी कुछ सजा धजा है।

पर अँग्रेजों के परिवार सहमे हुए हैं। सब के सब मोर्चे में किलेबद्ध होने लगे।

भारतीय सैनिकों को एक एक कर तनख्वाह ले जाने का आदेश दिया जाने लगा। इस डर से की बकाया या तनख्वाह रोकने से कहीं सैनिक विद्रोह ना कर दें। माहौल को देखते हुए ये मामूली बात नहीं है।

अँग्रेज और उनके परिवार में महिला बच्चे बहुत भयभीत हैं। डर के मारे काम भी नहीं हो रहा। नौकरों को कब का बाहर भेज दिया गया है। कुछ तो खुद ही भाग चुके हैं।

इधर देसी सिपाही अँग्रेजों की इस कृत्य से खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे हैं।

तात्या तोपे एक कुशल सेनानायक थे जिन्होंने जनसमूह का नेतृत्व बखूबी ढंग से किया।

विद्रोह की आग में घी

आग में घी डालने का काम लेफ्टिनेंट कॉक्स ने कर डाला। कॉक्स ने बीती रात दो जून को भारतीय कर्मी पर गोली दाग दी। सिपाही तो बच गया पर शायद अब अँग्रेज ना बच पाएं।

एहतियातन या भारतीयों को दिखाने के लिए कॉक्स को तुरंत जेल में डाल दिया गया। आज सुबह ही कॉक्स को निर्दोष बता कर छोड़ भी दिया गया।

इससे भारतीय सिपाही और भड़क उठे।

इधर ये अफवाह उड़ने लगी है की भारतीय सैनिकों को परेड में बुला कर उनका कत्लेआम किया जाएगा।

हर वर्ग का सिपाही सतर्क हो गया है। अफवाह को इतनी तवज्जो मिल रही है की सैनिकों ने खुद को तैयार करना शुरू कर दिया।

इधर भद्दर गर्मी में अँग्रेजों ने दक्षिणी भाग में शरण ले ली है। व्हीलर के साथ। भय के बीच अँग्रेजी सिपाहियों को कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।

साथी अँग्रेज उन्हें बचाने इसी दिशा से आयेंगे इसी के सहारे व्हीलर सबके साथ यही दुबक गया है।

नाना का साथ

इधर परेड के पास सिपाही टिक्का सिंह का असंतोष का घड़ा फूट गया। टिक्का सिंह अपनी सेना के साथ विद्रोह करने लगा।

भवनों में आग लगा दी गई। गोरों पर निशाना साध उनके बंगले और साजो सामान को तहस नहस करने लगे। जला फूंक कर बराबर कर दिया।

दफ्तर, डाकघर, सरकारी इमारतें को लूटा जा रहा है। सारे दस्तावेज जला कर खाक करने पर तुले हैं बागी।

आग में झोंकने के बाद टिक्का नवाबगंज में बैठे नाना साहब के पास चल पड़ा।

साहूकार और अमीर भी विद्रोहियों के गुस्से का शिकार बन रहे हैं। ज्यादातर अमीरों के घर बार लूटकर तबाह कर दिया गया है।

नाना उसूलों के पक्के हैं इसी कारण तो अब तक एक भी अँग्रेज के हताहत होने की खबर नहीं है। कोषागार में भी नाना के सैनिक तैनात हैं।

व्हीलर को बार बार यही लग रहा है की बागी सैनिक दिल्ली को रवाना जो जायेंगे। पर सैनिक क्यों ही जाएं, ना उनके पास नेतृत्व की कमी है ना गोला बारूद, ना ही धन की।

शस्त्राघर और कोषागार दोनो पर ही पकड़ मजबूत है। सैनिकों ने भी नाना साहब को अपना राजा घोषित कर दिया। 

भूल चूक

रात डेढ़ बजे बंगाल रेजिमेंट की तरफ से तीन गोलियां चलाई गईं। ये गोलियां रिसालदार मेजर भवानी सिंह के द्वारा दागी गई हैं।

गोलियों की गूंज से रेजिमेंट के बाकी सिपाही जाग उठे। इधर अस्थाई किले में पनाह लिए अँग्रेजी सिपाहियों ने भी गोलियां चलानी शुरू कर दीं।

फिर क्या दोनो ओर से धका पेल गोलियां चल पड़ीं। रुकने का नाम ही नहीं ले रहीं।

सुबह जब ये खबर नाना साहब को पता चली तो चल पड़े खंदक(अस्थाई किला) की घेराबंदी करने।

पहुंच कर नाना साहब ने एक विनम्र पत्र खंदक में भिजवाया। जिसमे ये बता दिया गया है की कल सुबह दस बजे हमला किया जाएगा। आत्मसमर्पण का सुबह तक का समय दे दिया गया।

शुरू हुआ युद्ध

छह जून की सुबह सरकारी खजाना लूटा जाने लगा। असलहा, गोला-बारूद भी साथ ले जाने की तैयारी है। जेल में बंद साथियों को मुक्त कराया गया।

नाना साहब के द्वारा दिया गया आत्मसमर्पण के बारह घंटे की अवधि समाप्त हो चुकी है। छुपे बैठे अँग्रेजों के खंदक पर हमला बोल दिया गया।

सुबह के दस बज रहे हैं। नाना ने तोपे तैनात कर दी हैं। पहला गोला दागा गया। भारी गोलाबारी हो रही है जो जारी रहेगी जब तक आत्मसमर्पण ना कर दिया जाए।

हमले नाना के सैनिक और विद्रोही मिलकर कर रहे हैं। अँग्रेज ने चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया।

आधा दिन बीत जाने के बाद अवध देसी पैदल सेना की चौथी तथा पाँचवीं पलटने भी नाना की फ़ौज में आ मिलीं।

नई पलटनों ने नये स्थान से अपनी तोपों द्वारा किले के भीतर उस स्थान पर गोले बरसाने आरंभ कर दिया जहाँ कुआँ है। किले के लोगों के लिए पानी प्राप्त करने का यही एकमात्र साधन है।

अँग्रेज अपनी जिंदगी और घर बार बचाने में फंसे हुए हैं। ताश के पत्तों की तरह बिखर चुके हैं। अँग्रेज इसे अपनी कंपनी राज की समाप्ति की तरह देख रहे हैं।

व्हीलर विद्रोहियों को बर्बर लोगों का झुंड मान रहे हैं। कुछ ढीले पड़ चुके अँग्रेज सिपाही किले के अंदर ना आ सके और बाहर ही मारे गए। पर अँग्रेजों खुद को बचाने की जी तोड़ कोशिश कर रहे हैं।

एक अफवाह नाना के सैनिकों और विद्रोहियों के बीच फैली है की खंदक के आसपास बारूद बिछी है जिसके पास जाते ही धमाका हो जाएगा। इसलिए सैनिक अंदर जाने के पक्ष में कत्तई नहीं हैं।

मौत का तांडव

9 जून को 7 नं. रिसाले तथा 48 वीं देसी पलटन की दो कंपनियों ने चौबेपुर में पड़ाव डाले पड़ी थीं। विद्रोह कर दिया। समस्त अँग्रेजी अफसरों को मौत के घाट उतार दिया।

फ़तेहपुर से 60-70 अँग्रेज नाव-द्वारा गंगा से होते हुए नवाबगंज पहुँचे, जहाँ उन सबको मार डाला गया।

जैसे ही नाना साहब के अँग्रेजों गढ़ में घुसने की खबर मिली आसपास के कई और विद्रोही सिपाहियों उनके दल में शामिल होने चले आए।

चार दिन बाद आज नाना की सेना बढ़कर बारह से पंद्रह हजार के बीच हो गई। जिसमे हर वर्ग का भारतीय शामिल है। ऊंची जाति से लेकर छोटी जाति। हिंदू मुस्लिम। पेशवा के सिपाही अब तक अँग्रेजों पर कहर बन कर टूटे।

अँग्रेजों को पीछे धकेला

11 तारीख हो गई है। अस्थाई किले पर भीषण आक्रमण खोल दिया गया। जैसे तैसे अँग्रेजों मोर्चा संभाले हुए हैं। इन पांच दिनों में ही हालत पस्त होती नजर आ रही है। जान के लाले पड़े हैं।

बाहर नाना साहब की सेना ने खंदक को घेर लिया है। सिपाहियों ने आसपास की इमारतों में छुप कर गोली चलाने की अपनी जगह बना ली।

इसके जवाब में कैप्टन मूरे ने रात को एक बटालियन तैनात कर दी जो इन गोलाबारी का जवाब दे सके।

नाना साहब सवादा कोठी चल पड़े जो यहाँ से दो मील दूर है। जिससे की वो अब यहाँ से सीधा हमला कर सकें। पर विद्रोहियों की उत्साह के कमी के कारण ऐसा ना हो पा रहा है।

नाना साहब की सेना को रणनीति में बदलाव का फायदा मिल रहा है। अब सेना इमारतें को श्रतिगस्त करने लगी है।

छोटे सेनावास को तबाह कर डाला। आग लगाने की कोशिश नाकाम रही।

शाम को बड़ा हमला बोला गया। पर अंदर दाखिल होने के बजाय सैनिक अभी तक अंधविश्वास में हैं। आज अँग्रेजों को धूल चटाई।

अस्पताल किया स्वाहा

अँग्रेजों के बनाए हुए अस्पताल की इमारत में आग लगा दी गई। सारा डाक्टरी सामान नष्ट हो गया। अब किले में मौजूद सैनिकों के लिए जून की प्रचंड गर्मी से बचने का एकमात्र साधन भी चला गया।

इस कृत्य के बाद जैसे अँग्रेज पस्त हो गए। काफी जख्मी अँग्रेज जो अस्पताल में भर्ती थे जल कर खाक हो गए।

इससे नाना की सेना को काफी बल मिला और हमले के लिए तैयार हो गए।

नई पलटन का विद्रोह

अँग्रेजों की कठिनाइयाँ दिन ब दिन बढ़ती जा रही है। रसद कम हो गई है और किले के चारों ओर का घेरा दिन-प्रतिदिन कड़ा होता जा रहा है।

इधर व्हीलर निरंतर लखनऊ में संदेश भेज रहा है। जिसका उत्तर उसे नहीं मिल पा रहा। मिलता भी कैसे लखनऊ खुद विद्रोहियों के कब्जे में है।

प्लासी के युद्ध की वर्षगांठ

गोलीबारी और गोला बारूद से लड़ाई जारी है। अँग्रेजों का जीना दुश्वार के दिया गया है। ठीक सौ साल पहले यानी 23 जून 1757 ।e प्लासी के युद्ध में अँग्रेजो ने विजय हासिल कर भारत में शासन करने की नीव रखी थी।

एक अफवाह ये भी उड़ी है की कंपनी के सौ साल पूरे होते ही भारत में अँग्रेजों का नाश हो जाएगा। इससे भी विद्रोहियों को बल मिल रह है।

विद्रोहियों ने भीषण हमले की योजना बना ली है। मोर्चा संभाल रही है बंगाल बटालियन के घुड़सवार फौज।

बड़ी दीवार के सहारे छिप कर पैदल सेना ने अँग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। इस मोर्चे में कमांडर राधे सिंह शुरआती हमले में मारे गए।

जिन रुई की बेलाओं के सहारे पैदल सेना खड़ी है उसमे देखते ही देखते भीषण आग लग गई। जो सैनिकों के लिए घातक साबित हो रही है।

शाम तक भी खंडक में घुसने में विद्रोही विफल हुए। अब तक कानपुर का कोना कोना आजादी के लिए उठ खड़ा हुआ है। अब तक क्रांतिकारियों के हमले से अँग्रेज हिल चुके है।

सड़ती लाशों के बीच झूझते अँग्रेज

बहुत ही कम खाने और पानी के बीच अँग्रेजों ने बीस दिन यूं ही गुजार दिए।

जैसे जैसे लोग मरते जाते अँग्रेज बाहर पड़ी सड़ रही साथी की लाशों जो खंदक में उनको घसीट कर अंदर कर लेते। उसी अवस्था में सूख चुके कुएं में फेकते जा रहे हैं।

वही कुआं जिससे कुछ दिन पहले तक पानी पिया जाता था। कठोर मिट्टी की वजह से खोदना भी मुश्किल है। ना ही शरीर में इतनी जान है की किसी की कब्र खोदी जाए ना मिट्टी इजाजत दे रही है।

खराबा सौंच व्यवस्था के चलते हालत बदतर हो रहे हैं। कालरा, डायरिया, चेचक जैसी घातक बीमारी से अँग्रेज ग्रस्त हैं।

दाना पानी बंद, दवाई भी अस्पताल के उड़ जाने के बाद ना के बराबर थी।

आत्मसमर्पण का दिन

व्हीलर का मनोबल भी टूट चुका है। तब से ज्यादा जब से उसका बेटा युद्ध में मौत के मूंह में समा गया है।

इन सब कठिनाइयों को अँग्रेज कब तक झेल पाएंगे ?

लगातार चली बमबारी, स्नाइपर फायर, हमलों के परिणामस्वरूप अँग्रेजों को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है।

अस्थाई किले के बाहर बारूद बिछी होने के कारण सैनिक आगे नहीं बढ़ रहे हैं। पस्त अँग्रेज आत्मसमर्पण को तैयार हैं। इसके अलावा उनके पास दूसरा कोई विकल्प भी नहीं। जब जिंदा रहेंगे तो ही बात बनेगी। भूखे प्यासे मर जायेंगे नहीं तो विद्रोहियों की गोली खा कर।

अंत में 26 जून को किले के अंदर से सफ़ेद झंडा लहरा कर जनरल व्हीलर ने अपने तमाम सैनिकों के साथ आत्म-समर्पण कर दिया।

नाना साहब की शर्तें उन्होंने स्वीकार कर लीं और 27 तारीख़ को अँग्रेजों का किले से निकलकर गंगा के रास्ते इलाहाबाद जाना तय हुआ। चालीस नावें सत्तीचौरा घाट पर लगाई गयीं ।

सत्तीचौरा कांड

खंदक के बाहर नाना साहब ने भारी मात्रा में घोड़ा गाड़ी, हांथी महिलाओं और बच्चों के लिए भिजवाए ताकि इनको सुरक्षित घाट किनारे तक भिजवाया जा सके।

अँग्रेजी सिपाहियों को अपने साथ हथियार, गोला बारूद ले जाने की इजाजत दे दी गई। जिनको पहरा दे रहे हैं विद्रोही सैनिक।

सुबह तड़के आठ बजे अँग्रेजों को पहरे में किले से घाट तक लाया गया। हरदेव मंदिर के चबूतरे पर भारी भीड़ एकत्रित है। करीब दस हजार लोग। अंग्रेज़ों का मान मर्दन देखने के लिए उतावले हैं।

अजीमुल्ला खां, बाबा भट्ट बालारव, कोतवाल यहीं मौजूद हैं। लगभग 40 नावों की व्यवस्था जा चुकी है। तात्या इस सारी व्यवस्था पर नज़र रखे हुए हैं।

जैसे ही अँग्रेज सिपाही नदी के किनारे पहुँचे, लोग उन्हें देखने के लिए उत्सुक हो उठे। निकलने वालों में से व्हीलर सबसे आगे हैं।

छठी देसी पलटन के इलाहाबाद से कानपुर आये सिपाहियों ने यहाँ के लोगों को नील के अत्याचारों के बारे में बताया। किस प्रकार बाज़ार लुटे गये, गाँव के गाँव जला दिए गये। महिलाओं को जबरन पकड़ कर अपने साथ ले गए।

पुरुषों और बालकों को इन अँग्रेजों ने फाँसी पर चढ़ा दिया। नवजात शिशुओं को संगीनों से गोद दिया और इन अँग्रेजों ने औरतों और बच्चियों से बलात्कार किये। ये ख़बर सुनते हीं आम जनसमूह और सिपाहियों का क्रोध चरम पर पहुँच गया।

जैसे ही फिरंगियों से भरी नाव चली, भीड़ में से किसी ने बिगुल बजा दिया। जिसे सुन कर मल्लाह नाव को छोड़ कर नदी में कूद पड़े। नावें डूबने लगीं। 

पहला हमला अँग्रेजों ने किया, मल्लाहों पर गोलियाँ चलायीं। जवाब में घाट पर तैनात सिपाहियों ने भी गोलियाँ चलायीं।

सिपाही नावों पर शेर की तरह टूट पड़े। सारी नावों में कोलाहल मच गया। कोई तैरने लगा, कोई डूब गया तथा किसी को गोली लगी। गंगा भी रक्त से रक्तिम हो गयी।

सिपाही इतने आक्रोशित हो चुके हैं क़ि दाँतों से तलवार पकड़ कर तैर रहे हैं। जहाँ उन्हें कोई शत्रु डूबता या तैरता हुआ मिलता तुरन्त उसके रक्त से अपनी तलवार रंग लेते। घाट पर कोलाहल मच गया।

कुछ नावों में आग लग गयी और जो अँग्रेज इस से कूदे वो डूब कर मर गये। गंगा की धारा को अँग्रेजों के खून से लाल कर दिया गया है। घाट पर हर तरफ लाशों का अंबार नज़र आ रहा है।

इस प्रकार पूरे 100 वर्ष बाद प्लासी के युद्ध की शताब्दी मनाई गई। सौ वर्ष पहले अँग्रेजों ने कुछ इसी अंदाज में 23 वर्षीय बहादुर सिराज उद दौला को मैदान ए जंग में मारा था। आज उन्हें मारा जा रहा है। समय का पहिया घूम गया है।

अधिकतर सभी अँग्रेज मार डाले गये। ज्योंही यह ख़बर नाना साहब को मिली उन्होंने तुरंत इस हत्याकांड को बंद करने का आदेश दिया।

नरसंहार बंद हुआ। हत्याकांड में बचे 120 स्त्री और बच्चों को पानी से निकाल कर सुरक्षित रूप से सवादा की कोठी में पहुंचा दिया गया।

अँग्रेजों ने आज से पहले अपने को इतना लाचार और डरा हुआ महसूस नहीं किया होगा। जैसा वो पराए देश के लोगों के साथ करते आ रहे हैं।

सवादा के घेराव के समय नाना साहब भी यहीं ठहरे हैं। इस अफ़रातफ़री में एक नाव बच कर भाग निकली जिसमें मोब्रे टामसन, डोला फ़ीस तथा कुछ अन्य अँग्रेज स्त्री, पुरुष तथा बच्चे सवार थे।

इस बीच तट के दूसरी ओर से गोलियां चलाई जाने लगीं। अँग्रेज डर से सफेद झंडा ले कर खड़े हो गए। उनको वहाँ से निकला गया। सुरक्षित सवादा घर ले जाया गया।

जमीन पर इन अँग्रेजों को बिठाया गया। गुस्से से भरे नाना के सैनिक मारने को तैयार हैं। अँग्रेज मरने से पहले अंतिम बार ईश्वर को याद करने चाहते हैं। उनकी प्रार्थना सुनी गई और नाना साहब को इससे कोई ऐतराज नहीं है।

अँग्रेजो ने आज छल किया है। नाना ने उनके इलाहाबाद पहुंचने का इंतजाम कराया। यहाँ तक की उन्हे बंदूक अपनी सुरक्षा के लिए दीं। यही बंदूक का इस्तेमाल नाना के सैनिकों पर करना शुरू कर दिया।

अँग्रेजों को घायल किया गया। सजा के तौर पर सिर धड़ से लग कर मौत की नींद सुला दिया गया।

महिलाओं और बच्चों को बीबीघर उनके पुराने साथियों के साथ रख दिया गया।

मेस्कर घाट जिसका नाम बदल कर नानाराव घाट रख दिया गया है।

नाव के भगौड़े 

30 तारीख़ को भागी हुई नाव भी पकड़ ली गयी।

भागी हुई नाव में सवार थॉमसन और उनके साथी नंगे पांव ही जान बचाकर भागने लगे। बचे कुचे अँग्रेज एक गांव में आ छिपे। विद्रोही पीछा करते करते यहाँ भी आ पहुंचे।

बचे हुए अँग्रेजो को मौत के घाट उतार दिया। बाकी बचे भागने में सफल रहे। जो तट किनारे जा कर नदी में कूद गए। तैरकर किसी दूसरे तट पर आ पहुंचे।

विद्रोही इन्ही के इंतजार में थे। पर यहाँ भी सिर्फ एक मारा गया। बाकी फिर से बचकर भाग निकले।

इस नाव में भागने वाले थॉमसन के अलावा चार अँग्रेज मर्द बच निकले। जिन्हें मुरारमऊ के ज़मींदार दुर्विजय सिंह ने शरण दी। जो अँग्रेजों का वफादार है।

इस ज़मींदार ने इन भूखे-नंगे अँग्रेजों को एक महीने तक अपने यहाँ छिपाये रखा। चार में दो दो अँग्रेजी अफसर कालरा से मारे गए। और फिर उन्हें इलाहाबाद पहुँचा दिया।

सत्तीचौरा घाट पर दो अँग्रेज लड़किया जिंदा रह गई। जिनमे से एक एमी और दूसरी व्हीलर की बेटी मार्ग्रेट। 

एमी अपनी नाव से गिर पड़ी थी जिसके बाद वो नदी के बहाव की तरफ ही तैरती गई। ये सब तब हुआ जब घर पर कत्लेआम जारी था।

तट किनारे पहुंचने पर एमी की मार्ग्रेट से मुलाकात हुई। घंटों दोनो लड़कियां घाट पर ही छुपी रहीं। विद्रोहियों ने जब उन्हें पकड़ा उनमें से मार्ग्रेट को घोड़े पर एक मुस्लिम अपने साथ भगा ले गया।

एमी को दूसरा मुस्लिम पास के एक गांव में ले गया। यहाँ ला कर उसकी सुरक्षा का बीड़ा उठाया बदले में उसका धर्म परिवर्तन कर उसे इस्लाम कुबूल कराया।

मेस्कर घाट पर स्तिथ मेमोरियल।

बीबीघर कांड(नानाराव पार्क )

बचे कुचे औरतों और बच्चों को सवादा घर से बीबीघर में भेजा जाने लगा। शुरआत में ये गिनती 120 थी जो अब बढ़ गई है।

कुछ गीले कपड़ों में, कुछ घायल अवस्था में बंदूक की गोली से या तलवार की धार से, कुछ कीचड़ से सनी हुई।

फतेहगढ़ से लाए गए कुछ और औरतों बच्चों को भी इन्हीं के साथ शामिल कर दिया गया। अब संख्या 200 के पर पहुंच चुकी है।

इनकी देख रेख का जिम्मा हुसैनी बेगम को सौंपा गया। खराब व्यवस्था के चलते कालरा और डायरिया से काफी मौतें होने लगीं।

नाना साहब चाहते थे की इन बंदियों के आधार पर वो अँग्रेजों से बात करें। उधर इलाहाबाद से कंपनी लखनऊ और कानपुर को वापस कब्जाने निकल पड़ी थी।

नाना साहब की कंपनी से मांग है की ये सेना वापस इलाहाबाद निकल जाए। ब्रितानी सेना पर नजर रखने के लिहाज से नाना ने दो सैन्य टुकड़ी भेजी। जो अँग्रेजी सेना से फतेहपुर में मिली। यहाँ नाना की सेना को हार का मुह देखना पड़ा।

अपने भाई बाला राव के नेतृत्व में दूसरी सेना भेजी जिसे हैवलॉक ने हरा दिया। पकड़े गए सैनिकों से कानपुर के हाल पूछने पर काफी जानकारियां हांथ लगी।

हैवलॉक और नील अब कानपुर की ओर बढ़ने लगे।

जब नाना साहब को हिंसा की खबर मिली तब तात्या तोपे और अजीमुल्लाह के साथ विचार विमर्श में बीबीघार में कैदियों का निष्कर्ष निकला।

सलाहकार तो कैदियों को मारने के पक्ष में पहले से ही थे। एक बदले के रूप में जो हिंसा अँग्रेजी सेना मचाते हुए आ रही है। भारतीय औरतों और बच्चों के साथ जो दरिंदगी नील और हैवलॉक कर रहे हैं वो शर्मनाक है।

कंपनी से बातचीत के सारे रास्ते विफल होते दिख रहे हैं। उधर कंपनी लोगों पर जुल्म ढहाते हुए कानपुर में प्रवेश की योजना बना रही है।

बेरहमी से जो कत्लेआम चला आ रहा है उसका बदला लेने और कंपनी को उसी के अंदाज में जवाब देने का मन बनाया गया।

आखिरकार 15 जुलाई को बीबीघर के बंद कैदियों को मारने के निर्देश दिए गए। निर्देश किसने दिया इसके पुख्ता प्रमाण नहीं हैं।

विद्रोहियों ने चार अँग्रेजों को सूली पर चढ़ा दिया। पर जब उनसे बच्चों औरतों को मारने को कहा गया तो वो पीछे हट गए।

नाना साहब अब तक सवादा घर छोड़ चुके थे। उनसे ये कृत्य देख नही जाएगा।

औरतों को कमरे के बाहर निकलने का फरमान सुनाया गया जिसे उन्होंने मानने से इंकार कर दिया। घर के ही अंदर कपड़े और कुंडों के सहारे खुद को कैद कर लिया।

खिड़की में बने छेदों से विद्रोहियों ने धावा बोल दिया। अगला राउंड फायर करने से पहले ही विद्रोही सिपाही दृश्य से विचलित हो गए।

चीख पुकार की आवाज सुन कर वो अपने हथियार जहाँ के तहाँ डाल कर चल पड़े। जाते जाते घोषणा कर गए की उनसे अब किसी को ना मारा जाएगा।

हुसैनी बेगम को सिपाहियों की इस हरकत पर बहुत क्रोध आया और सिपाहियों को डरपोक करार दिया।

जल्लाद को बुलवा कर हुसैनी बेगम ने कमरे में बंद सभी कैदियों को कटवाना शुरू कर दिया।

अगले दिन ये तय हुआ की इन अँग्रेजों की लाशों को कुएं में फेंक दिया जाएगा। ऐसा ही हुआ।

कंपनी का जुल्म

कंपनी की सेना अगले दिन 16 जुलाई को कानपुर आ पहुंची। अँग्रेजी सिपाहियों को लग रहा है की बीबीघर में कैद अपने साथियों को छुड़ा लिया जाए।

अंदर दाखिल होते ही चारो तरफ खून ही खून नजर आने लगा। अंदर पसरा सन्नाटा। मरे हुए महिलाओं और बच्चों की लाश को एक सूखे कुएं में पाया।

मैदान में किसी के फटे कपड़े, तो किसी के खून से सने बाल जमीन पर बिखरे हैं। लाशों की बदबू से कुछ कंपनी के सिपाही उल्टी करने लगे।

कई अँग्रेज सिपाही इस मंजर को देख खौफ खा रहे हैं। ये प्रमाण है भारतीय पर अत्यधिक जुल्म ढहाने का। कंपनी ने तय किया की इस घटना की सजा यहाँ की आम जनता को दी जाएगी।

सेना ने स्थानीय लोगों को लूटना शुरू कर दिया। आसपास के घर जला डाले गए। सिर्फ इसलिए की किसी ने इस हत्याकांड को रोकने की कोशिश नहीं की।

जो अपनी बेगुनाही का सबूत नहीं दे पा रहा है उसको विद्रोही माना जा रहा है। जो खुद को विद्रोही मान रहे है उनसे बीबीघर की चौखट चाटने को मजबूर किया जा रहा है।

जिस पर नीच जाति के द्वारा पानी डलवा कर चटवाया जा रहा है। विद्रोही सिपाही अगर हिंदू है तो उसे गाय का मांस और मुस्लिम है तो से सुअर खिलाया जा रहा है। जुल्म की सारी हदें पार कर दी है कंपनी ने।

फांसी पर लटकाने से पहले मुसलमानों को सुअर की खाल में लपेटा जाने लगा। नीच जाति के हिंदू ऊंची जाति को फांसी पर लटका रहे थे। कइयों के मुताबिक इससे उनका धर्म भ्रष्ट हो रहा है।

किसी को फांसी तो किसी को गोली से भून दिया गया। किसी को टॉप से बांध कर उड़ा दिया गया। अधिकतर लोगों को बीबीघर के सामने लगे बरगद के पेड़ से लटका दिया गया।

बूढ़ा बरगद जो कुछ साल पहले गिर चुका है। इस पेड़ पर 133 निर्दोष लोगों को फांसी पर लटका दिया गया था।

बरगद के पेड़ पर अँग्रेजों ने एक साथ 133 लोगों को फांसी दे दी। इन्ही की लाशों को सड़क किनारे दफना दिया गया।

इस नरसंहार ने कंपनी के अफसर और सैनिकों के लिए लोग का गुस्सा जमकर फूटने लगा। लोग अब और भी ज्यादा अँग्रेजी सरकार से नफरत करने लगे। विद्रोहियों के समर्थन में लोग गांव शहर में उनका जबरदस्त समर्थन और संवेदना करने लगे।

ऐसे ही एक गांव से 140 लोगों को पकड़ा गया जिसमे पुरुष, महिलाएं और बच्चे शामिल हैं। दस को तो बिना किसी सबूत या मुकदमे के ही फांसी पर लटका दिया गया।

साथ लोगों से जबरन फांसी का लठ्ठा बनवाया गया बल्कि बाकी बचे कूचों को कोड़ों से पीटा गया।

भारतीय महिलाओं को अगवा कर उनके साथ जबरदस्ती करने की घटना आम हो गई।

जब किसी दूसरे गांव से करीब दो हजार लोगों ने इसका विरोध किया तो अँग्रेजो ने पूरे गांव को ही जलवा के खाक कर दिया।

दहल उठा संसद

इस घटना से देश में अँग्रेजों की हुकूमत की चूलें हिल गईं। यह हत्याकांड पूरे विश्वभर में चर्चित हुआ, जिसके बाद ब्रिटिश संसद में नाना को पकड़ने की मांग जोर पकड़ने लगी।

सत्तीचौरा और बीबीघर हत्याकांड इतना भयावह था कि लंदन की एक सड़क का नाम भी कानपोर स्ट्रीट रख दिया गया। यही नहीं, लंदन के थिएटरों में नाना साहब को गोली से उड़ाने और उन्हें फांसी देने वाले नाटकों का मंचन तक किया गया।

ब्रिटिश सरकार पर जन दबाव इतना ज्यादा बढ़ा कि बार-बार नकली लोगों को नाना साहब के रूप में बंदी बनाकर जनाक्रोश शांत करने की कोशिश की गई।

बीबीघर नामक कुएं में मारकर फेंकी गई अँग्रेज सैनिकों की महिलाओं औऱ बच्चों की लाशें देखकर अँग्रेज भी दहल गए थे। गुस्से में अँग्रेजों ने बीबीघर को जमीदोंज किया।

इसके अलावा शहर के आसपास के गांवों में भी अँग्रेजों ने खूब कत्लेआम किया। जानकारों के मुताबिक अँग्रेजों ने इस दौरान तकरीबन 7,000 लोगों को मौत के घाट उतारा।

हत्‍याकांड का आरोप नानाराव पर लगाया गया कि उनके इशारे पर यह नरसंहार किया गया। नानाराव अंग्रजी हुकूमत के सबसे बड़े दुश्मन बन गए। अँग्रेजों को जिसपर शक होता है, उस क्रांतिकारी को मौत के घाट उतार देते।

बढ़ते दबाब को देखते हुए अँग्रेजों ने कईबार नकली नानाराव को पकड़कर फांसी पर लटका दिया, लेकिन असली नानाराव कभी अँग्रेजों के हाथ नहीं लगे।

सत्तीचौरा कांड की याद में अँग्रेजों ने इस घाट को “ मैस्कर घाट “ नाम दिया। जिसे आज नानाराव घाट कहा जाता है।

इस कांड के प्रतिशोध में 31 मई 1860 को ब्रिगेडियर ज्वाला प्रसाद को अँग्रेजों ने फाँसी दे दी। इसी मैस्कर घाट पर नाव उपलब्ध करवाने वाले मल्लाह बुद्धू चौधरी और लोचन मल्लाह को भी अँग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया।

सत्तीचौरा कांड 1857 एवं कानपुर के इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण घटना है। 

@ऐश्वर्य तिवारी

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