1024 साल पुराना ताबो मठ

भारत | ताबो | स्पीति वैली | हिमाचल प्रदेश

हिक्किम टिकट वापसी

हिक्किम तो जाने से वंचित रह गया और निरशाभाव के साथ काजा को वापसी करनी पड़ी। अभी फिलहाल टिकट वाला प्रकरण चल ही रहा है।

मुद्दा और भी तूल पकड़ता जा रहा है। क्यूंकि कंडक्टर ने पैसा तो ले लिया था पर टिकट नहीं थमाया था। हिलती डुलती बस काजा बस स्टॉप आने के बाद, कंडक्टर ना जने कहाँ को नौ दो ग्यारह हो गया।

मैं बस से उतरा और पीछे से साथी घुमक्कड़ भी। साथी घुमक्कड़ ने कंडक्टर को सबक सिखाने कि ठान ली है। यही वजह है कि बात हिमाचल प्रदेश रोडवेज कॉर्पोरेशन तक पहुंचाने की बात छिड़ गई है।

मैं इसलिए भी इच्छुक नहीं हूँ क्यूंकि ना तो रकम बहुत अधिक लगी थी। दूसरी बात और जिन गांव वालों के हजारों पैसे इसमें खपे थे वो एक एक करके नदारद होते चले गए।

जब यहाँ का मूल निवासी को ही फिक्र नहीं फिर यहाँ मेरे कुछ चंद पैसों के लिए रोडवेज क्या ही करेगा। लेकिन फिर भी साथी घुमक्कड़ का साथ देते हुए घुमाने लगा नंबर।

हालांकि फोन में नेटवर्क नहीं आ रहा है पर सामने वाले को हड़क में लेने के लिए ऐसा करना पड़ता है। बस अड्डे के बाहर ही धीरे धीरे जमावड़ा लगने लगा है।

उस कंडक्टर के पसीने छूटने लगे सिर्फ ये देख कर ये लड़के अब शिकायत दर्ज करवा कर ही मानेंगे। पता नहीं था वरना कब का फोन घुमाने वाला नाटक करने लगता।

तभी अपने साथी के बचाव में वो ड्राइवर साहब आ गए जिनके साथ में पिछले दो दिनों से सफर कर रहा हूँ। उनके बीच बचाव और समझाने के बाद ही थोड़ा गरम माहौल ठंडा हुआ है।

कंधे पर हाँथ रखते हुए बस अड्डे से बाहर वो हमें पास के रेस्त्रां ले आए। धीरज देते हुए बताने लगे “माई डियर सिर्फ आपके ही पैसे नहीं लगे हैं वो सैकड़ों अनुनाई के हजारों पैसे डूबे हैं वो श्रद्धा भाव से अपने धर्म गुरु की झलक देखने को जा रहे थे”

नुकसान किसका ज्यादा हुआ? अगर सही मायनों में देखा जाए तो उनका। मेरे कुछ चंद पैसे उनकी श्रद्धा के आगे तिनके सामान भी नहीं है।

गपशप

इसी बीच ड्राइवर साहब ने तीन कप चाय ऑर्डर कर दिं। बातें चल ही रही थी कि चर्चा उठी पाप के भागीदार होने की। ड्राइवर साहब बोलने लगे आज मैं या मेरी बस उस टीले को पार ना कर सकी। जिसके

बाद मुझे कितने लोगों को हाय लगी होगी। अगर मैं गाड़ी बढ़ा भी देता तो शत प्रतिशत संभावना थी कि बस के बाएं हिस्से के सारे शीशे ऐसे छरछराते हुए टूटते जिसका कोई जवाब नहीं था।

और तो और सड़क के दाहिने हिस्से के धसने से हो सकता था गाड़ी शीशे टूटने के बाद पलट कर पहाड़ी में गिर जाती। तब कितने लोग गारंटी लेते मेरी या मेरी गाड़ी की।

आश्चर्य तो ये सुन कर हुआ जब उन्होंने बताया ये गाड़ी हिमाचल प्रदेश रोडवेज या सरकार की तरफ से नहीं बल्कि उनकी जमा पूंजी के दांव पर है।

यदि गाड़ी को कुछ भी होता तो ये ड्राइवर साहब की जिम्मेदारी होती उसे मरम्मत कराने की। और यदि गाड़ी ही ना रहती तो 35 लाख हरजाना भरो।

मेरे तो ये सुन के है होश उड़ गए। वैसे भी इस पहाड़ी पर गाड़ी आगे ना ले जाने में ही समझदारी थी। उसमे आगे ले जाने में ये तय था।

या तो गाड़ी के शीशे चकनाचूर होते या गाड़ी पलट जाती। अथवा दोनों। बाते हो ही रही हैं कि चाय आ गई। लेमन टी नींबू की चाय।

ये पिछले दो दिनों से मुझे अलग अलग तरह को चाय पीने को नसीब हुआ है। जिनमे से तीन मैंने पहली बार चखी है मिंट टी, घी टी और अब ये लेमन टी।

दूध की बनी चाय तो हम अक्सर पीते ही हैं। और कल भी पी। ड्राइवर साहब के साथ बहुत बार सफर करने के बाद कुछ अच्छे से ही घुल मिल गए हैं।

यही वजह है कि वो भी बहुत अच्छे से घुल मिल गए हैं। वो भी जानने के इच्छुक हैं कि आखिर घूम क्यों रहे हैं और निवासी कहाँ के हैं?

जैसे अमूमन एक आम नागरिक पूछता है। पर मुझे लगा कि शायद ड्राइवर साहब हिमाचल के ही निवासी हैं। पर उन्होंने भ्रम तोड़ते हुए बताया कि वह हरिद्वार से हैं।

बार बार हरिद्वार जा कर अपने पाप धुलने की बात को दोहरा रहे हैं। पर ये बात की तारीफ करते हुए नहीं थक रहे हम सो ये को इन दुर्गम पहाड़ियों में गाड़ी चलाने की जो कला इन चालकों में है वो घाटी के बाहर ले चालकों में हो ही नहीं सकती।

जिस कुशलता और निपुड़ता से वो गाड़ी संभालते हुए आगे बढ़ते हैं उसका कोई सानी नहीं। इस बात पर तो ड्राइवर साहब ने भी हामी भरी। और सारा श्रेय अभ्यास को दिया।

खुद भी बोले और अन्य चालकों की तारीफ भी की। बाकी उम्रदराज चालकों से काफी युवा हैं ये साहब। इसी के साथ ड्राइवर साहब ने अलविदा लेने को बात कही।

ड्राइवर साहब के साथ लेखक

जाते जाते बैग की समस्या को भी सुलझा दिया। समस्या ये हो रही थी कि अगर ये बैग कहीं रख दिया जाए तो आसपास या जानकारी एकत्रित करने में थोड़ी सहूलियत हो जाएगी।

ड्राइवर साहब ने दुकान पर ही बात करके बैग रखने की व्यवस्था करवा दी। और मैंने मौके का फायदा उठा कर ड्राइवर साहब को हमेशा के लिए लिए अपने कैमरे में कैद कर लिया।

इस्राइलियों से भीड़ा संयोग

बैग की चिंता छोड़ अब बाहर ही ज्यों त्यों घूमने लगा। हिक्किम तो जाने से रहा। ताबो को जाने वाली बस का समय पूछा तो पता चला अभी निकालने में वक्त है।

लेकिन ज्यादा देर से भी नहीं। बेहतर रहेगा कुछ साफ सफाई हो जाए तो बेहतर। जब ज्यादा दूर जाना ही नहीं है तो बेवजह रेस्त्रां में बैग रखने का कोई औचितय ही नहीं।

इसलिए वापस आ कर बैग निकलवाने लगा। देखा तो रेस्त्रां के रसोई घर में बैग ऐसे पड़े हैं जैसे कोई आलू प्याज की बोरी। तुरंत बैग उठा कर बैग रखे।

काजा बस अड्डे पर अमानती घर की भी सुविधा मुहैया नहीं करवाई गई है। बैग से कपड़े निकालने के बाद पास में दिख रहे दुसलखाने में जा घुसा।

शुद्धिकरण के कुछ देर के बाद जब निकला तो नजर पड़ी उन लड़कों पर जिनसे काजा में मुलाकात हुई थी। वही तीन इजरायली लड़के जिनसे कल्पा में मुलाकात हुई थी।

जिनको हम ले कर गए थे सुसाइड प्वाइंट और वापसी में ओमनी गाड़ी से उन्होंने हमें वापस रेकोंग पियो तक छोड़ा था। उन्होंने वायदा तो किया था मिलने का पर कुछ इस तरह को मुलाकात की उम्मीद नहीं थी किसी को भी।

बस फिर क्या था सफर में ऐसे किसी यात्री से दोबारा मुलाकात होती है तो समा ही अलग बंध जाता है। जाहिर है आपकी भी कभी ना कभी किसी ना किसी से हुई होगी?

जैसे मैं उनको देख कर चौंका वैसे ही वो भी। ऐसे खुशी से गले मिले जैसे बिछड़े यार मिल गए हों। बात हुई। जैसा कि उन्होंने कहा था कि उनका एक और मित्र और उसकी मंगेतर भी कहीं ना कहीं से मिलेंगे। ठीक वैसा ही देखने को मिला।

उन्होंने उनसे मुलाकात भी कराई। इस अनिश्चित मुलाकात के बीच आखिर पूछ ही लिया कि उन्हें इतना समय कैसे लग गया यहाँ आने में, जबकि वो हमसे पहले ही निकल लिए थे।

उन्होंने बताया कि उनको नाको गांव इतना पसंद आ गया को काफी समय उन्होंने वहीं बीता दिया जिस वजह से इतना समय लग गया।

काज़ा बस अड्डा

खैर इधर मैं और उधर वो अपनी तैयारियों का जायजा लेने लगे। खाने पीने का समान दुकानों से भर भर खरीद अपनी ओमनी गाड़ी में डालने लगे।

अमूमन यात्री जब अपने घर से लंबे अंतराल के लिए बाहर निकलता है तो अपने देश का झंडा रख ही लेता है। जैसे मेरे बैग में भी ऐसा ही एक झंडा है।

ये जनाब भी अपनी गाड़ी में ऐसा ही एक झंडा लगा रहे हैं। जान में तो किसी देश का लग रहा है पर जब पूछा तो मालूम पड़ा की ये ज्यूस धर्म के भगवान का झंडा है।

जिन्हे किंग ऑफ किंग्स के नाम से पुकारते हैं। जो राजाओं का भी रहा है। ये सारे के सारे अपने में मस्त हो चले। हम सबने एक दूसरे से अलविदा लिया और आगे के सफर की शुभ कामनाएं भी दी।

पेट की भूख या बस?

इधर घूमते फिरते बस अड्डे के पास आया जहां लावारिस की तरह बैग पड़े हुए थे अबतक। यहाँ ऐसा कोई खतरा नहीं है कि बैग या किसी अन्य वस्तु पर आंच आए जैसे शहरी इलाकों में घटित हो जाता है।

भूख जोरों की है। पर अभी मालूम पड़ा की कुछ ही देर में ताबो के लिए बस रवाना होने को है। बेहतर यही रहेगा कि बस अड्डे के आस पास ही रहा जाए।

आसपास कोई ऐसा रेस्त्रां भी नहीं जहां भूख मिटाई जा सके। कुछ ही देर में बस भी निकलने को है। पर इन दो बसों में से कौन सी बस जाएगी ये अभी निर्धारित नहीं हुआ है।

ये तय होने में ज्यादा देर ना लगी। और फट से एक बस का हॉर्न बज पड़ा। ये संकेत है यही बस निकलेगी कुछ देर में सवारी लेके।

बस अड्डे के भीतर से बाहर निकल आई। और ड्राइवर साहब ने बाहर लगा कर सारा झमेला ही समाप्त कर दिया। हां ना के चक्कर में मेरा सिर चकराने लगा है।

बैग लेके चढ़ ही गया। कुछ एक सवारियों का और आना हुआ। तब तक ड्राइवर कंडक्टर इधर उधर हो लिए। लेकिन बस काफी खाली है।

ड्राइवर कंडक्टर की ये जोड़ी एकदम नई है जिसके साथ आज सफर होगा। ना तो वो भाईसाहब हैं जिनके साथ चिचम् और मुद गया था। ना ही हिक्किम वाले भ्रष्ट कंडक्टर।

हिमाचल प्रदेश में ये आमतौर पर देखने को मिला है कि जब भी दो बसें आपस में एक दूसरे को आर पार करती है तो उनके ड्राइवर घंटों बस रोक कर आपस में बात करने का माद्दा रखते हैं।

ताबो जाते वक़्त स्पीति घाटी का नज़ारा

जैसे इनकी मुलाकात सफर के अलावा शायद ही कहीं होती हो। अबतक बस तो नहीं पूरी भरी पर ताबो निकलने का समय हो चुका है।

चंद घंटों का सफर

एक दफा हॉर्न बजाय और बस चल पड़ी अपने सफर पर। सुबह की तरह ठंड नहीं है। तेज़ धूप होने के कारण बिना स्वेटर के भी काम चल रहा है।

इतने में कंडक्टर साहब आगे से टिकट काटते हुए पीछे सीट तक आ पहुंचे। कुछ ही मिनटों में बस गंव से बाहर निकल आई। ताबो तक का टिकट महंगा नहीं पड़ा। ना ज्यादा दूरी है काजा से ताबो मेहेज़ 5० किमी।

देखा जाए तो एक डेढ़ घंटे का सफर है। नदी के समांतर पहाड़ों के बीच से डोलती हुई बस चली जा रही है। रास्ते भर दुपहिया वाहन बुलेट गाड़ी ले जाते दिख रहे हैं।

बुलेट लेकर आना भी सुविधाजनक रहता है। खुद की हो तो क्या बात है। मगर कभी कभी यही गाड़ी काल बन जाती है। जैसे रैकोंग पियो से काजा की ओर आते वक्त देखने को मिला था जब एक लड़का हाँथ में साइलेंसर लिए खड़ा था।

बात चल ही रही है कि एक वाक्या सामने होता हुआ नजर आया। जब दो लड़कों सड़क के बीचों बीच खड़े हो कर बस को रुक जाने की गुहार लगाने लगे।

और किनारे खड़ी है उनकी पंचर बुलेट। हमारे सामने जीता जागता उदाहरण है। बस कुछ आगे आ कर रूकी। तब उनमें से एक लड़का तिरपाल में सारा सामान लेकर बस में चढ़ने लगा।

पहले एक फिर दूजी। और उसका दूसरा साथी पीछे या तो बुलेट घासीटते हुए आएगा। या फिर कैसे ये तो वही जाने?

अंगड़ाई लेने के बहाने खड़ा हुआ तो देखा एक लोडर हाँथी की तरह इधर की ही ओर चला आ रहा है। बुलेट गाड़ी का भी इंतजाम हो गया।

अब एक आदमी सामान ढो कर कुछ आगे तक आ जाएगा। और दूसरा लोडर में बुलेट लाद कर पहुंच जाएगा। सामान के लड़ते है बस निकल पड़ी वापस से अपने सफर पर।

ये फायदा रहता है दो लोग में अगर दुपहिया वाहन है तो। वरना एक होता तो कितनी आफत हो जाती ये तो परिस्थितियां समझा ही देती हैं।

टिकट कटा तो पता चला ये भाईसाहब भी ताबो जा रहे हैं। शायद कुछ आगे तक जाना होगा पर गाड़ी खराब होने के चलते अब ताबो में ही आज की रात बिताएंगे।

छोटा सा बसेरा ताबो

चक्के घुमाते हुए लेखक

तय समय के भीतर हम ताबो आ पहुंचे। बस रूकी, मेरे साथ कुछ एक सवारियां उतरी वो सामान लादे लड़का भी। जो सड़क पार करने के बाद खड़ा हो गया अपने साथी के इंतजार में।

एक स्कूली छात्रा भी जो ताबो में बने स्कूल में पढ़ाई के लिए काजा से यहाँ तक का सफर तय किया। सफर फिर बस का हो या ज़िन्दगी का कठिनाइयों को पार करके ही कुछ हासिल होता है।

शाम के चार बज रहे हैं और सूरज अभी भी उफान पर है। हाय गर्मी ये जान ले कर ही मानेगी। पर इस पहाड़ी इलाके में सूरज के ढलते ही ठंड का केहर चालू हो जाता है।

साथ मे उतरी हैं एक अधेड़ उम्र का जोड़ा। जिनका दावा है कि वो हमें एक रात के लिए किराए पर कमरा दिलवा सकती है वाजिब कीमत पर।

उनका मन रखने के लिए चल पड़ा उनके साथ साथ। वैसे सच कहूँ तो इतनी सहूलियत की आदत नहीं है। की कोई कस्ट लेके हमारे लिए कमरा यवकोई और प्रबंध करे।

ऐसे में थोड़ी शक की सुई घूमने लगती है कि क्या सामने वाला वाकई ईमानदार है भी या नहीं। पर फिर भी भरोसा करके चल लगा पीछे पीछे।

तनिक दूर बोल कर एक किमी चलने पर मजबूर कर दिया आंटी जी ने। बैग लादे लादे कमर टूट गई है। गली कूंचों से होते हुए एक दो खंड के मकान के सामने ला कर खड़ा कर दिया।

बाहर से ही अपनी सहेली को आवाज़ देने लगीं। पहले तो एक सज्जन फिर एक नौजवान मोहतरमा गोद में बच्चा लिए हसती हुई बाहर आई।

मेहमान बोल कर कमरा दिखाने की बात कही तो लड़के के साथ हमें दूसरे खंड में कमरे देखने को बोला। सीढ़ी चड़ने के बाद यहाँ कुछ कमरों में काम चल रहा है और कुछ बंद पड़े है।

कमरा तो बेहद सटीक है पर जब दाम पूछे तो थोड़ा महंगा लगा और उसमे भी उन्होंने इसमें खाने का चार्ज नहीं जोड़ा है।

खैर ये सौदा तो ना हो सका। जबतक नीचे आया आंटी जी जा चुकी थीं अपने रास्ते। जब कमरा सौदा पसंद ही नहीं आया तो रुक कर क्या फायदा।

ताबो मठ

बैग लेकर वापस ताबो मठ की तरफ आने लगा। अब जब ये तय है कि कल रुकना ही नहीं है तो मठ बंद होने से पहले घूम लेना ज्यादा बेहतर है।

अगर साधन कि समस्या ना होती तो शायद कल शाम तक तो जरूर रुकता। बैग लादे लादे मठ के सामने आ खड़ा हुआ। शुक्र है मठ अभी भी आगंतुकों के लिए खुला हुआ है।

ताबो भवन

ताबो मठ में भी रुकने की व्यवस्था जान कर मन प्रसन्नता से भर गया। बैग सहित रिसेप्शन में कमरा देखने की इच्छा जाहिर की तब एक भाईसाहब ने कुछ प्रश्न पूछे।

और बताने लगे की दो लोगों के हिसाब से कमरा खाली नहीं है। दो सीटर कमरे सारे भर चुके हैं। ये थोड़ा निराशाजनक जरूर है। मठ में रुकने से और बेहतर क्या हो सकता है।

बस अड्डा भी पास में ही है। पर तीन लोगों वाला कमरा खाली होने की बात कही। जिसे देखने की इच्छा जाहिर की। कमरा तीन लोगों के हिसाब से तो उपयुक्त है पर महंगा है।

एक रात के रुकने के लिए इतने पैसे देने का औचित्य नहीं बनता। तीन लोगों के हिसाब से तो सही बैठ रहा है।

बैग लेके बाहर आने लगा तभी एक विदेशी मोहतरमा बाइकर सीढ़ी चढ़ते हुए दिखीं। जो बाकायदा दस्ताने, प्रोटेक्टर वगैरह पहन कर मानो एकदम लग रहीं हो की विश्व के कल्याण के लिए धरती पर अवतरित हुई हों।

खैर इससे पहले मठ बंद हो बेहतर यहीं रहेगा भारत के सबसे पुराने मठ में हो लिया जाए। सामने लगे बोर्ड पर इस मठ के स्थापना साल ही पढ़ के हैरान हो गया।

996 ईसवी में स्थापना और फिर ना जाने कितनी बार इसके ऊपर आक्रमण। हर बार टूटा हर बार उठ खड़ा हुआ ये मिट्टी का बना मठ। अपने आप में जीता जागता मिसाल है।

मठ के अंदर का नज़ारा

1996 में अपनी हजारवीं वर्षगांठ के मौके पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम भी आयोजित हो चुका है। मठ में नए पुरानी छोटी छोटी इमारतें देखने को मिल रही हैं।

ना सिर्फ मनुष्य की बल्कि कुदरत का भी केहर देखने को मिला है ताबो मठ को। 1975 के भूकंप के बाद इसे दोबारा बनने में काफी समय लग गया।

996 में जब कोई सीमा नहीं हुआ करती थी तब इस मठ का सीधा संपर्क तिब्बत की अन्य मठों से हुआ करता था। बंद पड़े कमरों में तरह तरह की पेंटिंग हैं।

ज्यादातर कमरे 4 बजे ही बंद हो चुके हैं। किसी बोर्ड पर लिखा पढ़ा की इनके द्वारा स्कूल भी चलाया जाता है। शायद ये उसी स्कूल की बात कर रहे हैं जिसके लिए वो छात्रा बस से उतरी थी।

तरह तरह के त्योहार अक्सर होते रहते हैं। जिनमें गांव के लोग जरूर आते होंगे शिरकत करने।

ताबो मठ को अजंता का हिमालय भी कहा जाता है। वैसे दो तरफ से बड़ी बड़ी पहाड़ियों से घिरा ये मठ अपने आप में लाजवाब प्रस्तुति दे रहा है।

पश्चिम की तरफ सिना तने खड़ी ये पहाड़ी के पीछे धीरे से सूरज छुप गया। और इजाजत दे गया ठंड को केहर बरपाने के लिए।

एहतियातन जैकेट पहले से ही पहन रखी है हमने। इसलिए ज्यादा फर्क नहीं पड़ रहा है। है तो ये मठ अपने आप में अनोखा।

मिट्टी के इस मठ के रखरखाव में काफी समय निकल जाता होगा। यहाँ साधु संन्यासी अपनी ही धुन में नजर आ रहे हैं।

ये मठ की पुरानी इमारत है। कुछ ही दूर संन्यासियों के लिए नए भवन का भी निर्माण किया गया है। वही देखने बाहर निकला। दोनों इमारतों के बीच बने एक बड़े से बराम्मदे में कई चक्के लगे हुए हैं।

जिनको घुमाया जाता है। इनको क्यों घुमाया जाता है ये तो मनाली ने जाना था। मैं भी मंदिर जैसे टीले के नीचे लगे चक्के को घुमाने लगा। चारों ओर एक चक्कर लगाने के बाद नीचे आ खड़ा हुआ।

मेरे ठीक सामने एक फोटोग्राफर की टीम खड़ी है। जो अपना कैमरा स्टैंड में कैमरा सेट करने में लगी हुई है। गौर करने वाली बात ये है कि जिस जुनून के साथ सो दोनों अपने काम में मगन हैं वो देखने लायक है।

आसपास क्या हो रहा है शायद उनको पता ही नहीं। अपने काम ने इतनी गहराई से जुटे हुए हैं। सोचा अभी समय पर्याप्त है। तो नए भवन को भी देख लिया जाए।

नया भवन

बैग लेके आ गया नई इमारत के सामने। पर यहाँ एक बार फिर किस्मत गच्चा दे गई। जब पता लगा ये इमारत भी बंद है। आसपास का नजारा को पहाड़ी से घिरा हुआ है उससे इसमें चार चांद लगा रहे हैं।

पास में खड़े महाशय को ना जाने क्या दिखा की टिप्पणी करते हुए बुलाने लगे। बात छिड़ी तो पता लगा भाईसाहब एनआरआई है और गृहस्थ जीवन त्याग कर सन्यास ले लिया है।

पता नहीं क्या सूझा कि तकरीबन डेढ़ दो घंटे तक अपने ज्ञान भेदी बाणों से साथी घुमक्कड़ को घायल कर दिया। इन डेढ़ घंटे में हर पल मुझे ये लगता रहा कब ये महाशय हमें जाने की इजाजत देंगे।

बातों में इतना उलझ गया और देर हो गई कि वो दो लड़के भी आ गए जिनकी बुलेट पंचर हुई थी। एनआरआई बाबा ने उनको भी ज्ञान से परिपूर्ण कर दिया।

नया ताबो मठ

सबका उत्थान करने के आधे घंटे बाद जबरदस्ती इजाजत ले ही ली। अन्यथा शायद इनका साथ में रुकने का इरादा लग रहा था। साथ चल रहे लड़कों ने अपना परिचय देते हुए चंडीगढ़ का निवासी बताया।

बताया कैसे उनका सफ़र रहा और कब तक और रुकना रहेगा स्पीति घाटी में। उनमें से नेल्सन ने घाटी में डायनामाइट विस्फोट वाला वीडियो दिखाया। की कैसे जगह जगह विस्फोट करके घाटी को कमजोर किया जा रहा है।

गुलशन और नेल्सन ने अपने आज रात रुकने की व्यवस्था तो कर ली है। समय रहते मुझे भी कर लेनी चाहिए। वरना अंधेरे में कहाँ कहाँ भटकुंगा।

अलविदा के मैं निकल तो पड़ा आशियाना ढूढने। पर घूम फिर कर वापस उसी घर में टिकासरा डाला जिसमे आंटी जी ने सुझाया था।

ताबो में घर के सामने का दृश्य

शायद कभी कभी बड़ों की बात मान लेनी चाहिए।

मुद से काज़ा से हिक्किम से ताबो तक का कुल सफर 135km

Similar Posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *