अगरतला का राजभवन उज्जयंता महल

अगरतला | त्रिपुरा | भारत

कल उनाकोटी से वापसी के बाद देर शाम मुलाकात हुई केरल से आए नाजी महफूज से। जो हमारी ही तरह भारत घूम रहे हैं पर अंदाज थोड़ा निराला है।

ये जनाब लिफ्ट ले कर और संस्थानों में काम कर कर के गुजारा करके भारत का चक्कर लगा रहे हैं। उत्पल भाई की आज कुछ और ही योजना है।

इसलिए फटाफट तैयार होकर हम तीनों को अगरतला के म्यूजियम में जाने को कहा। फिर शाम तक नीर महल जो भारत का इकलौता पानी के ऊपर महल है।

फिलहाल जो तय हुआ उसी के मुताबिक हम तीनो तैयार होने लगे। चूंकि कपड़े लत्ते काफी मैले हो चुके हैं गुवाहाटी से अबतक के सफर में इसलिए बेहतर होगा इन्हे आज ही धो लिया जाए।

सारे कपड़े ले कर घुस गया दुसलखाने में और आधे घंटे की धुलाई के बाद बाल्टी भर कपड़े छत पर फैलाने के लिए साथी घुमक्कड़ को थमा दिए।

इधर मेरे स्नान के बाद साथी घुमक्कड़ और उधर नाजी महफूज ने अपनी नमाज पढ़ने के बाद निकलने का तय किया। कुछ ही देर में उत्पल जी हमें लेने आ पहुंचे अपने इसी कार्यालय में।

उनकी चार पहिया वाहन में सवार हो कर हम निकल पड़े उज्जयंता पैलेस। जिसके बारे में मुझे नाम मात्र का भी नहीं पता है। पता है तो सिर्फ इतना की राज भवन को ही उज्जयंता का नाम दिया गया है।

शहर में आज बहुत भीड़ भाड़ है। इसका कारण है आज का दिन इतवार। लोग छुट्टी के दिन खूब निकल रहे हैं घर से पिकनिक मनाने। खास बात ये भी देखने को मिल रही है वो ये की काफी तादाद में बंगाली भी नजर आ रहे हैं शहर में।

उत्पल जी ने हम तीनों को राजभवन के सामने उतारा और अपने काम से निकल पड़े। कुछ एक घंटे में दोबारा इसी स्थान पर मिलने के वादे के साथ सड़क पार करके मैं दाखिल हुआ राजभवन में।

अंदर आना हुआ ही है की बड़े से गेट पर विराजमान सुरक्षाकर्मी के दल ने हमें अपनी ओर बुलाया और सभी तरह के बैग जमा करने और खुद की जांच कराने का आदेश दे डाला।

राजभवन में इस कदर सुरक्षा का दायरा होना तो लाजमी है। पर बैग जमा करने का भी मूल्य चुकाना पड़ेगा इस बात से अनभिज्ञ था।

नीले आसमान के नीचे ये सफेद इमारत अलग ही छाती चौड़ी करके चमचमा रही है। गेट से पैलेस तक का लगभग सौ मीटर का रास्ता पैदल नापना होगा।

सुनसान भले ही लग रहा हो पर इक्का दुक्का लोग दिख ही जा रहे हैं। तेज धूप में फटाफट ये रास्ता भी नाप कर सीढ़ियों के पास आ पहुंचा। जिसका जमीन से बेस ही इतना ऊंचा है की पास आते आते पैलेस का गेट ही दिखना बंद हो गया।

उज्जयंत महल राजभवन का मुख्य द्वार

कुछ एक तस्वीरें लेने के बाद दाखिल हो चला भवन में। टिकट की जांच के बाद मालूम पड़ा भवन के अंदर किसी तरह की तस्वीर नहीं ली जा सकती ना तो कैमरे से और ना ही मोबाइल से।

बाई तरफ से शुरू हुए म्यूजियम में त्रिपुरा की पुरानी संस्कृति को देखने का अवसर मिल रहा है। कैसे लोग यहां रहा करते थे।

और आगे आया तो इतिहास के पन्नो से अंग्रेजो के शासनकाल के बारे में जानने को मिला। जो आए तो थे यहां राज करने पर मूह की खा कर वापस लौटा दिए गए।

हर कोने में सफेद वस्त्रों में या तो महिलाकर्मी या पुरीउष्कर्मी जानता को दिशा निर्देश देते दिखाई दे रहे हैं। ताकि यहां हर वस्तु की सलामती बनी रहे। जो बहुत अच्छा कदम है। क्योंकि जनता इतना जागरूक हो जाए तो कहना ही क्या।

आदिकाल में यहां क्या क्या घटित हुआ है उसका भी अच्छे से विवरण दिया गया है। मानव के बसने से लेकर पशु पक्षियों के विकास की कहानी।

मजेदार चीज देखने को जो मिल रही है वो हैं पुराने काल की रोचक कहानियां। जिनको चित्रों के माध्यम से उकेरा गया है।

ऐसी ही एक कहानी पढ़ने को मिल रही है जिसमे बताया गया की कैसे एक महिला शादी के बाद अपने बच्चे को पति के भरोसे छोड़ कर काम पर चली जाती है। पर जब वापस आती है तो अपने बच्चे को जंगली जानवर के द्वारा मृत पा कर आहत हो जाती है।

और इसी के चलते वो अपने लापरवाह पति को हमेशा के लिए छोड़ कर निकल जाती है अपनी बाकी की जिंदगी अकेले बिताने। इस तरह की रोचक कहानियां पढ़ने में मजा तो बहुत आ रहा है पर अब वक्त हो चला है आगे बढ़ने का। क्योंकि संग्रहालय बहुत बड़ा है और वक्त कम।

भवन के दाईं ओर जाने का मौका दिया गया। यहां आ कर मालूम पड़ रहा है की रविंद्रनाथ टैगोर ने अपने जीवनकाल में कितनी उपलब्धियां हासिल की हुई थीं। जो इन कमरों में भी नहीं समा पा रही हैं।

टैगोर जी के बचपन से ले कर मरणोपरांत तक की सभी यादें संजो कर रखे हुए हैं ये संग्रहालय। भूखंड पर तो सिर्फ इतना ही देखने को मिल रहा है।

अब चलते हैं ऊपर वाले माले में। ऊपर के माले में दाखिल होते ही बांग्लादेश के बनने की कहानी हर दीवार पर छलक रही है। मुक्ति वाहिनी से ले कर मुजाबिर उर रहमान तक की कहानी।

कैसे पश्चिम पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान के ऊपर किए गए जुल्मों सितम ढाए थे जिसके तले तब का बांग्लादेश का दम घुट चुका था। ना जाने कितनी ही मां बहनों की आबरू के साथ खेला पाकिस्तान के सैनिकों ने।

ऐसी ऐसी बहायनक कहानियां लिखी हुई है जिनको अक्षरों में लिख पाना संभव नहीं। चित्रों के माध्यम से उस काल के हाल बताने का कष्ट किया गया है।

थोड़ा और पीछे जाएं तो अगले कमरे में नेताजी सुभाषचंद्र बोस के कर्मठ प्रयास को दर्शाया गया है। जिसमे उनके आजाद हिन्द फौज के गठन से लेकर पूर्वोत्तर भारत के राज्यों में ब्रिटिश सरकार के ऊपर किए गए अक्रमाणो का उल्लेख है।

उज्जयंता भवन के बाहर का नज़ारा

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